Category: इवेंट, पावर-पुलिस, न्यूज-व्यूज, चर्चा-चिट्ठी... Published Date Written by डॉ. नूतन ठाकुर
: मायावती की अवसरवादिता को पहचान चुकी है जनता : जितेन्द्र सिंह बबलू वही सज्जन हैं जिन पर उत्तर प्रदेश कॉंग्रेस की अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी के माल एवेन्यू स्थित घर को सरे-शाम जला देने का आरोप लगा. यह घर उत्तर प्रदेश की बहुत ही ताकतवर मुख्यमंत्री मायावती के घर से मात्र कुछ ही दूरी पर था और लखनऊ के सबसे सुरक्षित इलाकों में माना जाता है. उस समय लखनऊ के एक आईजी और एक एसपी सिटी पर भी इस जघन्य कांड में शरीक होने का आरोप लगा था. बहुत शोर-गुल मचा था पर हुआ कुछ नहीं था.
जितेन्द्र सिंह बबलू बहुजन समाज पार्टी के माननीय विधायक थे और इस रूप में वे पूरी तरह सुरक्षित थे और आदरणीय भी. वे उन मायावती की सरकार में था जो स्वयं एक महिला हैं, एक दलित घर में पैदा हुई हैं, जो स्वयं का जीवन अत्यंत संघर्षमय बताती हैं और जिनकी पूर्ण बहुमत की सरकार मात्र क़ानून व्यवस्था के नाम पर ही बनी थी, क्योंकि आम लोगों का यह मानना था कि इसके पूर्व की मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी की सरकार क़ानून व्यवस्था के क्षेत्र में पूरी तरह नाकाम रही थी. लोगों ने यह आरोप लगाया था कि बबलू इस घटना के आरोपी हैं पर मायावती को ये बातें नहीं सुनाई पड़ी. वे आराम से बैठी रहीं और उनकी तरह की एक महिला रीता बहुगुणा पुलिस, प्रशासन से ले कर कोर्ट-कचहरी तक दौडती-भागती रहीं.
लेकिन जैसे ही बीकापुर विधानसभा के इस वर्तमान विधायक ने बहुजन समाज पार्टी छोड़ी, उनके तो जैसे ही दिन फिर गए. साथ ही मायावती सरकार को बबलू की तमाम पुरानी आपराधिक गतिविधियों की याद भी आने लगी. उनकी गलती यह थी कि वे बसपा छोड़ कर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में उभर रहे मुसलमानों में अपनी पैठ बना रहे पीस पार्टी में शामिल हो गए. इसके साथ ही इनके अपराधों की लम्बी फेहरिस्त के चलते बसपा सरकार ने इनको घेरना शुरु कर दिया और अंत में अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी के माल एवेन्यू स्थित घर को जलाने के ही आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया गया.
मैं एक बार भी नहीं कह रही कि जीतेन्द्र सिंह बबलू एक पाक-साफ़ आदमी हैं या वे समाज के ऐसे रोल-मॉडल थे जिन पर उनके किन्हीं आदर्शो के चलते अत्याचार किया जा रहा हो. वे कोई डॉ. विनायक सेन नहीं जो गरीबों के लिए संघर्ष करने के जुर्म में जबरदस्ती फंसा दिये गए हों. बबलू एक ज्ञात आपराधिक व्यक्ति के रूप में स्थापित हैं, जिनके विषय में आम धारणा है कि वे हत्या, अपहरण, अन्य तमाम जघन्य अपराधों में लगातार लिप्त रहे और उनके बल पर ठेकेदारी और रंगदारी द्वारा करोड़ों-अरबों की दौलत कमाई है. आज उनकी पत्नी अनीता सिंह जब उत्तर प्रदेश के राज्यपाल से अपने पति के प्राणों की गुहार करती हैं तो एक महिला के रूप में मुझे उनसे पूरी सहानुभूति होती है, लेकिन यह भी तो लगता है कि ये वही बबलू हैं जिनके लिए इंसानों की जान गाजर-मूली की तरह रही है.
और इससे बढ़ कर यह बात भी बड़ी अजीब लगती है कि जो महिला क़ानून-व्यवस्था के नाम पर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनती हैं, क्या उन्हें तब यह इस बात का एहसास नहीं होता कि उनके घर के थोड़ी ही दूरी पर इन्हीं जितेन्द्र सिंह द्वारा एक दूसरी महिला का घर जला दिया गया था? क्या उन्हें इस दूसरी महिला के प्रति थोड़ी भी संवेदना नहीं जगती? इसीलिए जब बबलू बसपाई नहीं रहते और इस घटना में गिरफ्तार कर लिए जाते हैं तो मुझे यह मायावती की न्यायप्रियता नहीं दिखती. मुझे तो यह उनकी राजनैतिक अवसरववादिता ज्यादा नज़र आती है.
लगभग यही कहानी बहुजन समाज पार्टी के बाहुबली सांसद धनंजय सिंह के मामले में दुहराई जाती मिली, जब उनको हत्या के एक पुराने मामले में रविवार को लखनऊ स्थित आवास से गिरफ्तार किया गया. पत्रकारों से पूछने पर लखनऊ के पुलिस उप-महानिरीक्षक डी के ठाकुर ने बताया कि जौनपुर जिले के केराकत थाना क्षेत्र में धनंजय के खिलाफ हत्या का एक मुकदमा दर्ज था, उसी मामले में उनकी गिरफ्तारी की गई है.
ज्ञातव्य हो यह मामला आज का नहीं था, घटना 1 अप्रैल 2010 की थी. केराकत कोतवाली थाना क्षेत्र के बेलांव घाट पर हुए दोहरे हत्याकाण्ड में केराकत कोतवाली में अपराध संख्या 2042/10 धारा 302, 109 के तहत अभियोग पंजीकृत हुआ था, जिसकी जांच बाद में सीबीसीआईडी को चली गयी थी. घटना के बाद पूरे जनपद में भूचाल सा आ गया था. धनंजय सिंह का नाम इस घटना में उसी समय आया था. लेकिन उस समय धनंजय सिंह को पूछने वाला कोई नहीं था. होता भी क्यों? वे बसपा के माननीय सांसद जो थे और प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के खासमखास, जिनके पिता को मायावती ने विधायक का टिकट दिया था.
दिक्कत तब शुरू हुई जब धनंजय पिछले कुछ समय से बसपा से बगावती तेवर दिखा रहे थे. धंनजय सिंह पार्टी से अनुमति लिए बिना पहले 'नोट के बदले वोट' मामले के अभियुक्त अमर सिंह से जेल में मिले थे और उनके पक्ष में बयान दिया था. उस समय बसपा को पहली बार समझ में आया था और पार्टी ने कहा था कि धनंजय सिंह ने क्षेत्रीय विकास निधि का दुरुपयोग किया है, धनंजय सिंह ने अवांछनीय और अराजक तत्वों को बीएसपी से जोड़ने का काम किया और वह क्षेत्र की जनता को प्रताड़ित करते हैं. बाद में बसपा ने पार्टी विरोध गतिविधियों के आरोप में धनंजय को निलम्बित कर दिया था, लेकिन कुछ समय बाद उनका निलम्बन वापस ले लिया गया था. फिर पता नहीं अंदरखाने क्या बात हुई होगी कि धनंजय सिंह उस पुराने दोहरे हत्याकांड में अचानक से गिरफ्तार हो गए. गिरफ्तारी के बाद धनंजय सिंह ने संवाददाताओं से कहा कि राज्य सरकार साजिश के तहत उन्हें फंसा रही है, उनके खिलाफ फर्जी मुकदमे दर्ज करवाकर उन्हें गिरफ्तार करवाया गया है और ऐसा करके प्रदेश सरकार अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर रही है.
मेरी ना तो जितेन्द्र सिंह बबलू के प्रति कोई हमदर्दी है और ना ही धनंजय सिंह के प्रति. लगभग सारे लोग इस विषय में एकमत हैं कि चाहे ये दोनों लोग विधायक हो जाएँ, सांसद हो जाए, या फिर कल को मंत्री ही क्यों ना हो जाएँ, ये लोग मूल रूप से अपराधी हैं और जरायम इनका पेशा रहा है. लेकिन जो बात वास्तव में कष्ट पहुंचाती है वह यह कि ये सारे लोग उसी समय क्यों अपराधी दिखने लगते हैं जब ये सत्तारूढ़ पार्टी के विपरीत जाने लगते हैं. फिर दूसरे तमाम नेताओं और पार्टियों की तरह ऐसा मायावती के साथ भी क्यों होता है? मैं मायावती का नाम खास कर इसीलिए ले रही हूँ क्योंकि वे एक महिला हैं, दलित के घर पैदा हुईं, संघर्षशील रहीं. पर ऐसा क्यों कि दौलत और ताकत की हवस उन्हें वैसे-वैसे अपराध करने पर मजबूर करता है जिसे जनता डर के मारे उन्हें कहती तो नहीं लेकिन इतिहास ऐसी सारी बातों को नोट जरूर करता है.
अच्छा रहा होता यदि मायावती जीतेन्द्र सिंह बबलू य धनंजय सिंह को उस समय गिरफ्तार करतीं जब वे लगभग पांच साल पहले पूरी जनता का विश्वास जीत कर उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज हुई थी. अब तो शायद बहुत देर हो गयी है. आगामी चुनाव में जनता जिसे भी वोट दे, चाहे वह मायावती हो या कोई अन्य पर वह यह अपने मन में यह जरूर जानेगी कि मायावती किसी भी जितेन्द्र सिंह बबलू या धनंजय सिंह का तब तक कुछ तक नहीं बिगाडेंगी जब तक वह बसपा में रहेगा और जैसे ही उसने पार्टी छोड़ी वह दुनिया का सबसे कुख्यात अपराधी बना दिया जाएगा. शायद इसीलिए इन सभी जितेन्द्र सिंह बबलू और धनंजय सिंह की गिरफ़्तारी अपना सारा अर्थ एकदम से खो बैठती है.
डॉ. नूतन ठाकुर
स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता