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पत्रिका ने सुप्रीमकोर्ट जाने पर कर दिया था अमित को टर्मिनेट

कविता ने कई सपने देखें होंगे कि पति अमित नूतन को मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार उनका बकाया मिल जायेगा तो सुकून की जिन्दगी जीना शुरू कर देंगे मगर ऐसा हो ना सका और एक बेहतर जिन्दगी का सपना देखने वाली कविता नूतन ने सपना पूरा होने के पहले ही दुनिया को अलविदा कह दिया। राजस्थान पत्रिका के भोपाल एडिशन में असिस्टेंट बिजनेस मैनेजर पद पर कार्यरत अमित नूतन ने अप्रैल २०१६ में माननीय सुप्रीमकोर्ट में जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार अपने एरियर और वेतन वृद्धि की मांग को लेकर एक केस लगाया था। साथ भी अमित नूतन ने कामगार आयुक्त कार्यालय में भी गुहार की थी कि उन्हें मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार बकाया वेतन और एरियर दिलाया जाये।

अप्रैल २०१६ में अमित ने सुप्रीम कोर्ट में केस लगाया और केस लगाने के चार दिन बाद ही राजस्थान पत्रिका ने उन्हें मेल भेज कर बताया कि उन्हें टर्मिनेट कर दिया गया है। इसके बाद जिंदगी की गाड़ी पूरी तरह पटरी से उतर गई। अमित नूतन की पत्नी कविता नूतन ने पति का साथ दिया। उनके जज्बे को सलाम किया और कहा कि मैं आपके साथ हूं। हम ये लड़ाई जीतेंगे। हम सच के साथ हैं और जीत हमारी होगी। मिलनसार कविता के समर्थन से अमित का भी उत्साह बढ़ा। मगर ११ फरवरी को ३६ साल की कविता नूतन की तबियत अचानक खराब हो गयी। बेरोजगारी के दौर में परिवार में किसी की तबियत अचानक खराब होना वाकई घर के मुखिया का हाथ-पैर फुला देगा।

पाई पाई को मोहताज अमित नूतन ने रात तीन बजे अपने दोस्त पंकज जैन को फोन किया। पंकज की मदद से एम्बुलेंस बुलाकर कविता को अस्पताल में भर्ती कराया गया। चिकित्सकों ने उन्हें आईसीयू में रखा मगर 13 फरवरी को कविता ने दुनिया को अलविदा कह दिया। हालात ये हो गयी कि अमित के पास अस्पताल के बिल देने के भी पैसे नहीं थे। अमित का साथ दिया मजीठिया क्रांतिकारियों ने। सबने अपने अपने समर्थ के अनुसार अमित नूतन के खाते में पैसा भेजा। कुछ पत्रिका के साथियों ने भी मदद की। मगर राजस्थान पत्रिका प्रबंधन ने कोई भी मदद नहीं की।

अब सवाल ये उठता है कि कविता नूतन की मौत के लिये जिम्मेदार किसे माना जाये। पत्रिका प्रबंधन को, जिसने सिर्फ इसलिये अमित नूतन को काम से निकाल दिया कि उन्होंने अपना अधिकार मांगा था या देश के उस सिस्टम को जिसकी लेटलतीफी की शिकार कविता नूतन हो गयीं। अमित अपने दोस्तों को दिल से धन्यवाद देते हैं और कहते हैं आज दोस्तों ने साथ नहीं दिया होता तो पता नहीं क्या होता। मगर अमित साफ कहते हैं कि मैं अपनी पत्नी का सपना पूरा करूंगा जरूर। मुझे न्यायिक व्यवस्था पर पूरा भरोसा है और एक दिन अखबार मालिकों को अपने मीडियाकर्मियों को उनका अधिकार देना ही पड़ेगा।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
९३२२४११३३५

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  • Guest - Kashinath Matale

    Sad news for Com. Amit Kumar and for all the friends of Amit.
    Amit BAhai ko to Patrikase paisa milna chahiye. Aur Patrika hi jababdar hai. Parntu Apne Desh ki system bhi utni hi jababdar hai. Sab Time Pass karte hai. Sarkar ka kor Dar raha hi nahi.
    Yeh Sab Janata hi sochna chahiye.
    I salute the departed soul of Nutan wife of Com. Amit.

    from Nagpur, Maharashtra, India

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