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सहारा-सेबी केस विश्व के आधुनिक न्यायिक इतिहास में अपनी तरह का अकेला मामला है जिसमें न सिर्फ निर्धारित कानूनी प्रावधानों का उलंघन किया गया बल्कि नियामक संस्थाओं का पक्षपातपूर्ण रवैया भी स्पस्ट रूप से सामने आया। जैसा कि 2 मार्च 2014 को पंजाब केसरी ने अपने सम्पादकीय में उल्लेख किया था कि 2004 में यूपीए सरकार बनने के बाद एक केबिनेट मंत्री को देश के दो प्रतिष्ठित लोगों (मा. मोदी जी और मा. सहाराश्री) को नेस्तनाबूद करने का टास्क दिया गया था।

उसके बाद सरकारी एजेंसियों द्वारा चरणबद्ध तरीके से इस तरह के नोटिफिकेशन और नियम-कानून लाए गए जिससे सहारा इंडिया परिवार के व्यावसायिक क्रिया-कलापों पर विपरीत प्रभाव पड़े या धीरे-धीरे नष्ट होने की प्रक्रिया की तरफ बढ़े। उन तमाम प्रयासों के बाद भी जब उनके आकाओं को मनमाफिक परिणाम नहीं मिले तो, एक काल्पनिक व्यक्ति रोशन लाल के द्वारा शिकायत का हवाला देकर सेबी द्वारा कार्यवाही शुरू करवाई गई। जबकि यह केस सेबी के अधिकारक्षेत्र के बजाय कंपनी अफेयर मंत्रालय के अधीन बनता था, जिससे सहारा इंडिया परिवार ने उक्त योजनाओं (OFCD) की अनुमति ली थी।

सहारा इंडिया को माननीय न्यायालय पर पूर्ण भरोसा था इसीलिए संस्था कोर्ट गई परंतु उम्मीद के विपरीत माननीय न्यायालय के निर्देश भी पूर्वाग्रह से ग्रसित थे। सहारा द्वारा पेश किए सभी प्रस्ताव ठुकरा दिए गए। सेबी ने जो कुछ कहा वह सही माना गया और सहारा की हर दलील और तर्क को गलत माना गया। पहले आदेश दिया गया निवेशकों को पूरी रकम लौटाई जाए और इस कार्यवाही से संबंधित दस्तावेज सेबी को सौंप दिए जाएं। जब ऐसा किया गया तो पहले सेबी ने दस्तावेज लेने में आनाकानी की और माननीय न्यायालय के आदेश के बावजूद आजतक उनका सत्यापन नहीं किया गया। उसके बाद आदेश दिया गया संपूर्ण राशि सेबी को दी जाए और सेबी निवेशकों को रकम लौटाए।

ये आदेश दो बार भुगतान करने जैसा था, जबकि एक सामान्य वित्तीय विशेषज्ञ भी इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं होता कि किसी भी वित्तीय संस्थान या बैंक के केबल तीन प्रतिशत जमाकर्ता भी एक साथ अपनी जमाराशि लेने आ जाएं तो उनको तुरंत भुगतान संभव नहीं हो पाएगा क्योंकि कोई भी बैंक या वित्तीय संस्थान जमाराशि का एक बड़ा हिस्सा अन्य व्यावसायिक गतिविधियों में निवेश करके रखते हैं और तभी वे जमाराशि पर ब्याज देने की स्थिति में होते हैं। सेबी के पास करीब चौदह हजार करोड़ रुपये जमा होने के बाद भी अभी तक केबल पचपन करोड़ रुपये की राशि का ही भुगतान सेबी द्वारा किया गया है। इसके बावजूद कोर्ट ने कभी न तो दस्तावेजों के सत्यापन और ना ही भुगतान से संबंधित कोई सवाल-जवाब सेबी से किया। पूरी अदालती कार्यवाही में अव्यवहारिक आदेश दिए गए जिससे उनके अनुपालन में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जब निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर मा. सहाराश्री जी को न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया था, तब सम्मानित बेंच के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ राजीव धवन ने कहा था कि 4 मार्च 2014 का आदेश पहले से लिखा हुआ था। अदालत ने इस लिखित आदेश की सिर्फ घोषणा की। डॉ धवन ने अदालत की अवमानना मामलों के लिए सुप्रीम कोर्ट की नियमावली का हवाला दिया। वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि इस नियमावली के एक भी प्रावधान का पालन नहीं किया गया। उसके बाद दस हजार करोड़ की क्रूरतापूर्ण शर्त थोपी गई जो विश्व-इतिहास की सर्वाधिक जमानत राशि थी।

अभी जो तीसरे पक्ष के श्री स्वामी पर दस करोड़ का जुर्माना, विदेश जाने पर रोक और 27 अप्रेल को कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया है वह भी पूरी तरह से अव्यवहारिक है। यह निर्देश एक धमकी की तरह है जिससे कोई भी तीसरी पार्टी सहारा इंडिया से कोई डील करने से पहले सौ बार सोचे। क्या इस निर्देश के बाद कोई तीसरा पक्ष सहारा इंडिया परिवार के साथ कोई सौदा करने आ सकता है जिससे कोर्ट के आदेशानुसार रकम जमा करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके। पिछले छह-सात वर्षों की कार्यवाहियों का निष्कर्ष जो मुझे समझ में आता है वह यह है, माननीय न्यायालय और सेबी का किन्हीं निवेशकों के हितों की रक्षा करने का कोई इरादा नहीं है, शुरू से ही उनका बस यही लक्ष्य नजर आ रहा कैसे एंबी वैली की नीलामी हो, कैसे सहारा इंडिया परिवार का ज्यादा से ज्यादा नुकसान हो। इस संपूर्ण घटनाक्रम को देखकर एक ऐतिहासिक घटना बार-बार मेरे जेहन में कौंधती है, जो इस प्रकार है :

जब कभी भी हम पाश्चात्य दर्शनशास्त्र का अध्ययन या चर्चा करते हैं तो जिस महान दार्शनिक का नाम सबसे पहले आता है वो अब से करीब 2500 वर्ष पूर्व यूनान में जन्मे सुकरात हैं। उनकी गिनती अब तक के विश्व-इतिहास के कुछ सर्वश्रेष्ठ विवेकशील व्यक्तियों में की जाती है। उनकी बातें और विचार इतने बुद्धिमतापूर्ण, शिक्षापूर्ण और गहराई लिए हुए थे कि युगों के पार आज करीब ढाई हजार वर्ष बाद भी अत्यधिक प्रासंगिक और उपयोगी बने हुुए हैं। उस समय यूनान में तत्कालीन सत्ताधारी और प्रभावशाली लोगों ने उन पर राष्ट्रद्रोह, युवाओं को भ्रमित करने और उस समय के देवताओं का अपमान करने यानी नास्तिक होने का आरोप लगाया था, जिसकी सजा मृत्युदंड थी। न्यायपालिका में सुनवाई की प्रक्रिया काफी लम्बी चली। मानव-इतिहास के सबसे महान तर्कशास्त्रीयों में से एक सुकरात के सामने विरोधी-पक्ष और न्यायधीशों की एक न चली, सुकरात ने अपने अकाट्य तर्कों से सबको निरुत्तर कर दिया था। फिर भी सुकरात की हर दलील और तर्क को गलत माना गया और सुकरात को मृत्युदंड दिया गया था। सुकरात को अपराधी ठहराने के बाद उन्हें माफ़ी मांग कर और अपना रास्ता बदल कर मृत्युदण्ड से बचने सुविधा दी गई। इसके बाद सुकरात ने कहा वह ऐसे अपराध के लिए क्षमा नहीं मांग सकते जो उन्होंने कभी किया ही नहीं, न वह जुर्माने के रूप में धन दे सकते हैं और ना ही अपना रास्ता बदल सकते हैं। इसके बाद अदालत में सुकरात ने एथेन्सवासीयों को संबोधित करते हुए जो शब्द कहे वे विश्व-इतिहास की अमूल्य धरोहर माने जाते हैं, जो इस प्रकार हैं :

"मैं उनसे कह रहा हूँ जिन्होंने मुझे मौत की सजा दी है और मैं एथेंस की जनता से भी कहता हूँ, ओ एथेंसवासियो! शायद तुम सोचते हो, कि मैं पर्याप्त तर्क प्रस्तुत न कर पाने के कारण दंडित हुआ हूँ, जिनके (तर्कों) द्वारा मैं तुम्हें सहमत कर सकता था। अगर मैं ऐसा करना उचित समझता तो तुम्हें राजी करके बरी होने की कोशिश करता। मैं किसी बात के आभाव के कारण दण्डित हो रहा हूँ, पर वह तर्क नहीं हैं और न ही मेरे द्वारा किया गया कोई अपराध है। इसका कारण मेरा दुःसाहस और ढिठाई है। मैंने वैसी बातें करने की प्रवृत्ति नहीं दिखाई, जिसे सुनना तुम सब पसंद करते। अगर मैं रोता-पीटता, विलाप करता--और भी ऐसी बातें कहता, जो मुझ जैसे व्यक्ति को सोभा नहीं देती। न तो मैंने तब खतरे से बचने के लिए ऐसा कुछ किया, जो किसी स्वतंत्र व्यक्ति के लिए अशोभनीय विचार हो और न ही अब मुझे इसको लेकर कोई पछतावा है। इस तरह अपना बचाव करके जीने के बजाय तो मैं मर जाना पसंद करूँगा; क्योंकि युद्ध में अथवा किसी मुकदमे की सुनवाई में मुझे या किसी भी अन्य व्यक्ति के लिए मृत्यु से बचने के लिए हरसंभव साधन का प्रयोग करना उचित नहीं होता। युद्ध में हर कोई जानता है कि कोई व्यक्ति हथियार डालकर और अपने विपक्षियों से दया की भीख माँगकर मौत से बच सकता है। इसी तरह दूसरी तरह के खतरों में भी मृत्यु से बचने के अन्य उपाय हैं। बसर्ते आदमी वह सब कहने और करने को तैयार हो!  ... ओ एथेंसवासियो! मृत्यु की अपेक्षा दुष्टता से बचना कहीं अधिक कठिन होता है; क्योंकि इसकी गति मृत्यु से तीव्र होती है।..."

अतः मैं देश के नीतिनियन्ताओं से आग्रह करना चाहता हूँ कि देश के उद्यमियों के साथ आतंकवादियों जैसा व्यवहार मत करिए, उद्यमियों के साथ इस तरह का व्यवहार करने से इस देश का भला नहीं होने वाला है क्योंकि कोई भी उद्यमी अकेला नहीं होता है उसके साथ हजारों-लाखों लोगों की जिंदगी भी जुड़ी होती है। कोई भी देश चाहे कितना भी संपन्न क्यों न हो अपने सभी नागरिकों को सरकारी नौकरी नहीं दे सकता है।

मेरा मानना है नियामक संस्थानों की भूमिका औद्योगिक संस्थाओं का मार्गदर्शन करना होना चाहिए न कि बदले की भावना से कार्य करना, जिससे देश में उद्योगों का विकास हो सके, देश में ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिए रोजगार सृजन का कार्य हो सके। क्योंकि किसी भी देश या मानव समाज का उत्थान उस समाज या देश में रोजगार के अवसरों के सृजन से सीधा जुड़ा है। जो देश या समाज अपने लोगों के पालन पोषण, शिक्षण-प्रशिक्षण, विकास और प्रतिभाओं के उपयोग में जितना आगे रहे हैं, इतिहास साक्षी है ऐसे देशों और समाजों ने हमेशा समृद्धि, खुशहाली और शांति हासिल की है।

धन्यवाद!

(एक मीडियाकर्मी द्वारा भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित.)

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