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दैनिक जागरण भदोही के ब्यूरो चीफ रत्ननाकर दीक्षित की कलम से....

बनारस के हिंदुस्तान अखबार के सीनियर फोटोग्राफर मंसूर भाई को समर्पित लघुकथा...

-आसिफ कल सात कार्यक्रम है शहर में। सभी महत्‍वपूर्ण हैं। सभी कार्यक्रम के फोटो जरूर चाहिए।

-हो जाएगा सर।

-अरे खाक हो जाएगा। पिछली बार प्रतिद्वंद्वी अखबार तुम्‍हें पीछे धकेल दिए थे। बड़ी बेइज्‍जती हुई थी। नोएडा से पूछताछ की गई थी। वो तो मैं था तुम्‍हारा बचाव कर गया नहीं तो घर के सामने चाय पकौड़ी बेचते नजर आते। यार आसिफ प्रोफेशनल बनो। वो जमाना गया जब चार फोटो परिचितों का लाए और चिपका दिए।

-आसिफ भाई मस्‍त, हरफौना, सभी के दुख में दुखी और सभी के सुख में सुखी रहने वाले थे। संपादक की ये झिड़की सुनने के बाद अंदर ही अंदर बहुत मर्माहत हुए लेकिन चेहरे पर वहीं चिरपरिचित मुस्‍कान। कोई कुछ समझ ही नहीं पाया।

-देर रात घर गए, पत्‍नी ने सबसे पहले बीपी और शुगर की दवाई दी। शिकायत भरे लहजे में बोली कुछ दिन अवकाश क्‍यों नहीं ले लेते। सेहत में सुधार हो जाता। 16 से 18 घंटे तक शहर के इस कोने से उस कोने तक दौड़ते रहते हो।

-अच्‍छा ठीक है, हो गया न, दवा ले ली न।

-दवा से अधिक तुम्‍हें आराम की जरूरत है आसिफ। तुम समझते क्‍यों नहीं हो।

-आसिफ भाई कुछ जवाब देते उससे पहले ही उनका बेटा आया और बोला, पापा-पापा इतनी रात क्‍यों करते हो। सभी के पापा तो शाम तक घर आ जाते हैं। पापा आज मैं अपने दोस्‍त शुभम के घर गया था, उसके पापा बहुत बड़े आफीसर हैं लेकिन जब मैंने बताया कि आप का बेटा हूं तो गोद में लेकर खिलाने लगे।

-बेटे की बाल सुलभ बातें सुनने के बाद पत्‍नी की ओर मुखातिब होते हुए आसिफ भाई बोले, देखा ये है अखबार का जलवा। तुम क्‍या जानो, चलो खाना दो और आराम करो। कल सुबह कई कार्यक्रम हैं चार बजे जगा देना।

-बेचारी पत्‍नी तो आसिफ भाई का मुंह ही देखती रह गई। लगी सोचने जिसका जिस्‍म बीपी, शुगर, गुर्दा आद‍ि रोगों से ग्रसित हो उसका अपने पेशे के प्रत‍ि इतना जुनून।

-रात गई बात गई। आसिफ भाई उसी जोश-खरोश के साथ अपने पेशे के साथ न्‍याय करते रहे। लेकिन अपने परिवार, अपने रिश्‍तेदार, अपने भाई-बंधु, अपने समाज साथ ही साथ खुद अपने साथ न्‍याय नहीं कर पाए। यह अहसास उन्‍हें तब हुआ जब बीएचयू जैसे संस्‍थान में उन्‍हें बेड तक नसीब नहीं हुई।

-क्‍या जमाना है, स्‍स्‍स्‍स्‍साला जहां निदेशक से लगायत चपरासी तक आसिफ को देखने के बाद सलाम करता था वहीं आज उनके शरीर का इलाज करने से परहेज कर रहा था।

-भला हो उनके दो-चार परिचितों का जो उन्‍हें निजी अस्‍पताल ले गए लेकिन नियति की क्रूर गतिविधि के आगे कुछ नहीं पाए।

-आसिफ भाई दुनिया छोड़ गए। पत्रकारिता जगत के सभी साथी उनके साथ बिताए पलों को सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं। लेकिन कोई यह बताने को तैयार नहीं है कि आखिर आसिफ भाई असमय काल के गाल  में क्‍यों समा गए।

-आसिफ भाई पर इतना दबाव क्‍यों बनाया गया क‍ि सात्विक विचार का आदमी असमय अपनी दुनिया छोड़ कर चला गया।

नोट---

-ये कुछ ऐसे प्रश्‍न हैं जो पत्रकारिता जगत के उंचे पदों पर बैठे जाहिलों को अनुत्‍तरित कर देंगे। भागेंगे ऐसे सवालों से। बचेंगे ऐसी परिस्‍थ‍ितियों का जवाद देने से।

इस कथा के लेखक श्री रत्नाकर दीक्षित वरिष्ठ पत्रकार हैं और दैनिक जागरण भदोही के ब्यूरो प्रमुख हैं।


मंसूर आलम के बारे में हिंदुस्तान के समाचार सम्पादक रजनीश त्रिपाठी लिखते हैं....

यह तो धोखा हुआ न मंसूर...!

मंसूर आलम यह तो धोखा है। पहले तो कभी बिना बताए कोई बड़ा कदम नहीं उठाते थे। इस बार जब जीवन का सबसे बड़ा कदम उठाना हुआ तो मेरा इंतजार करना तो दूर मुझसे पूछा तक नहीं। हम दोनों ने अस्सी घाट पर बैठकर रिटायरमेंट के बाद तक कि प्लानिंग की थी और आप अकेले दुनिया से रिटायरमेंट लेकर चुपके से निकल लिये।

शनिवार को दोपहर में पलभर की बात टेलीफोन पर हुई थी, आपने कहा था कि डाक्टर साहब आ गए हैं, राउंड से लौट जाते हैं तो बात करता हूं लेकिन फिर फोन नहीं आया। उसी दिन सुबह अमन ने फोन पर आपकी दशा बिगड़ने की जानकारी दी थी। मैंने उसे ढांढ़स बंधाया था और इसके पहले तकरीबन छह साल पहले जब आप गंभीर बीमार पड़े थे तो संकठा जी से मनौती मांगकर हम लोग आपको उसी सर सुंदरलाल अस्पताल से सुरक्षित लाए थे, ये बात मुझे सदा याद रही है। इस बार भी संकठाजी से प्रार्थना की थी और आस भी... लेकिन शायद मां ने ध्यान नहीं दिया। इस बार तो सर सुंदरलाल अस्पताल के आईसीयू में आपके लिए एक अदद बेड का टोटा पड़ गया। तमाम साथियों की कोशिशों के बावजूद जब बेड की उपलब्धता पूर्वांचल के सबसे बड़े अस्पताल में न हो पाई तो मजबूरन प्राइवेट की ओर रुख करना पड़ा। यह हम सबके जीवन की सबसे बड़ी नाकामी है कि आपकी जान बचाने के लिए जरूरी संसाधन तत्काल नहीं जुटा पाए। कितने लाचार हो गए हैं हम।

पिछले हफ्ते ही आपने फोन पर मुझे अस्पताल में भर्ती होने और पैर का आपरेशन प्रस्तावित होेने की जानकारी दी थी। यह भी कहा था कि हो सकता है कि दवा से काम बन जाए लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। मैंने आपसे कहा था कि इस बार इतवार को आऊंगा तो भेंट होगी। परेशान मत होईए। सब ठीक हो जाएगा।... लेकिन आपरेशन के बाद हालत बिगड़ी तो बस बिगडती चली गई।

मंसूर आलम जैसा दोस्त मिलना किसी जन्म के पुण्य का फल होता है। मैंने भी पुण्य किया लेकिन शायद उतना नहीं जितना लंबे साथ के लिए जरूरी होता है। इस वक्त जब मंसूर आलम अपने घर के बरामदे में बर्फ की सिल्लियों पर चिरनिद्रा में लीन हैं, मेरे लिए कुछ लिख पाना, कुछ कह पाना दुरुह है। बस इतना कह सकता हूं कि वह अपने फन का माहिर था, उसने फोटो पत्रकारिता की हमारी पीढ़ी को नई दिशा दी। फोटो जर्नलिज्म को स्टूडियो फोटोग्राफी की भेंट चढ़ने से हिम्मत के साथ रोका। वह एक संवदेनशील इंसान था। वह हर किसी के सुख-दुख में चट्टान की तरह खड़ा रहता था। वह अच्छा दोस्त था और खुशमिजाज इंसान। वह असामान्य माहौल को अपनी मौजूदगी और पंच से सामान्य बनाने की ताकत रखता था। अरसे तक बीमारियों के मकड़जाल में घिरने और पेशे के दबावों को झेलते हुए कई बार उसने मुझसे कहा कि अब गुरु हो नहीं पा रहा है। मैंने हर बार अधिकतम प्रयास और प्रदर्शन का सुझाव दिया था। मंसूर अपनी जिम्मेदारियों को शिद्दत से महसूस करते। एक संयुक्त परिवार की रक्षा किस हद तक त्याग से की जा सकती है, मंसूर उसके मिसाल थे।

कभी हताशा के दौर में मंसूर से तकलीफें साझा करता तो वह पलभर में समाधान ढूंढ़ निकालते। मंसूर के लिए दोस्त शब्द कहना शायद छोटा होगा। वह इंसान मेरे जीवन का एक ऐसा हिस्सा रहा है, जिसका न होना इंसान के लिए विकलांग होने से जैसा है। आज मैं उसी तकलीफ से जूझ रहा हूं, क्या करूं...।

(सालभर पहले एक वेबसाइट ने मंसूर आलम के व्यक्तित्व पर कुछ लिखने के लिए कहा था। मैंने हड़बड़ी में थोड़ा बहुत लिखा जिसे आज फिर से याद करना चाहता हूं। उस लेख को पढ़ने के बाद मंसूर मेरी कुर्सी तक आए थे और भावुक होकर कहा था- कुछ ज्यादा लिख दिया आपने..। तब मैंने कहा था- गुरु आप पर तो मैं पूरी किताब लिख सकता हूं।)  

(पुरानी पोस्ट जो कभी लिखा था मैंने, नीचे है..)

...और बदल दिया फोटो पत्रकारिता का चाल, चरित्र और चेहरा

अस्सी पर शास्त्रीजी की पान की दुकान पर खड़े पत्रकारों के समूह में एक स्वस्थ युवा भोजपुरी और काशिका में अपनी आलोचना बड़ी चतुराई से कर रहा था। कभी वह अपने पेशे को तो कभी अपनी कौम पर कटाक्ष करता। उसके अंदाज में आकर्षण था और मौजूद पत्रकारों के चेहरे पर उसकी साफगोई की तारीफ भरी मुस्कान। यही युवा एक दिन बीएचयू परिसर में पोस्टमार्टम घर के बाहर एक व्यक्ति से बात करते हुए चुपके-चुपके कुछ नोट कर रहा था। खबर निकालने के लिए वह लाश ढोने वाले से भी बड़े आत्मीय ढंग से बात करता। यही युवा एक दिन सिगरा स्टेडियम में पत्रकारों की क्रिकेट टीम की ओर से फ्रंट फुट पर खेलता हुआ दिखा। ये तीनों ही अवसर मुझे इसलिए याद हैं कि इस युवा अविवाहित (तब) फोटो पत्रकार ने मेरे मन को लुभाया था। कारण पता नहीं क्योंकि न तो उसका शरीर सुदर्शन था और न ही कोई और प्रत्यक्ष आकर्षण लेकिन न जाने मन ने कहा कि यह युवा तो दोस्ती लायक है। बाद में इस युवा की कृतियों ने मुझे उसका मुरीद बना दिया।

बिल्कुल ठीक समझा आपने मैं बात कर रहा हूं मंसूर आलम की, जिन्होंने मेरी नजर में एक लंबे अंतराल के बाद बनारस की फोटो पत्रकारिता में ताकतवर बदलाव का बिगुल फूंका था। एक ऐसे काकस को तोड़ने की हिम्मत दिखाई थी जिसने वर्षों से अपनी महंतई के बूते काबिल फोटो जर्नलिस्टों को आगे बढ़ने से रोका था।

मंसूर आलम से मेरी मुलाकात आज अखबार में 1989 में हुई थी। खेल डेस्क से जुड़कर तस्वीरें उतारने वाले मंसूर कब मेरे दिल के सर्वाधिक करीब हो गए, पता ही नहीं चला। कुछ ही दिनों में मेरी जो़ड़ी शहर के सजग पत्रकारों में होने लगी। कारण साफ था। मैं और मंसूर रोज निकलते, यह तय कर कि गुरु आज कुछ अलग करना है। इस संकल्प को पूरा करने के लिए 20-25 किलोमीटर की दूरी तो छोटी लूना या खटारा स्कूटर के बूते ही तय कर लेते। फिर लौटते तो चेहरे पर सुकून चस्पा रहता। क्योंकि मेरी कई न्यूज स्टोरी को ताकत मिली तो उसकी वजह मंसूर की बोलती तस्वीरें थीं। आज अखबार में काम शुरू करने से पहले मंसूर दैनिक जागरण में अंशकालिक संवाददाता थे। उन्हें खबरों की पूरी समझ थी और फिर किस खबर पर कौन सी फोटो फबेगी, वह भी बड़ी आसानी से समझते थे।

आज अखबार में श्वेत श्याम तस्वीरों के जमाने में भी हम दोनों ने खूब प्रयोग किए। इसके लिए हमें आजादी भी मिली। यह कहते हुए कोई संकोच नहीं कि तत्कालीन सिटी इंचार्ज गोपेश पांडेय जी ने कभी हमसे नहीं पूछा कि क्या कर रहे हो। जब हम खुद की पहल से खास स्टोरी और तस्वीरें ले आते तो वह उसकी न केवल तारीफ करते बल्कि उसे और चुस्त बनाने के लिए शीर्षक और इंट्रो सुधार देते। तत्कालीन खेल संपादक श्री शुभाकर दुबे जी भी हमारी जोड़ी के काम की हमेशा तारीफ करते।... और हां, कभी अवकाश के संयुक्त संपादक रहे पंडित कृपाशंकर शुक्ल जी तो कापी लेकर उसके शीर्षक में ऐसा रस घोल देतेे कि वह अगले दिन के अखबार का स्वर बन जाता।

मंसूर चंद दिनों में ही शहर के अच्छे फोटो जर्नलिस्टों में शुमार हो गए थे। आज अखबार में खबरों की तरह ही बड़ी फोटो को भी महत्व मिलने लगा था। बोलती तस्वीरों का जमाना लौटने लगा था। तभी राष्ट्रीय सहारा की लांचिंग की तिथि तय हुई। मंसूर की कृतियों ने सहारा के तत्कालीन संपादकों को स्वतः अपनी ओर आकर्षित किया। एक दिन पता चला कि उन्हें राष्ट्रीय सहारा अखबार में नौकरी मिल गई है। यह मंसूर के करियर का संभवतः टर्निंग प्वाइंट था। सहारा में रहकर मंसूर ने अपनी छायाकारी को खूब तराशा और दिल्ली तक से तारीफ पाई।

फिर 2001 में हिन्दुस्तान का बनारस से प्रकाशन तय हुआ तो मंसूर फिर तत्कालीन संपादकों की पहली पसंद बने। आनन-फानन में मंसूर की ज्वाइनिंग हुई और फिर खूब धमाल, खूब चमत्कार हुए। शहर ही नहीं बाहर भी मंसूर का जलवा कायम हुआ। प्रयाग कुंभ मेले की यादगार तस्वीरों ने तहलका मचाया। संयोग से 2011 में समाचार संपादक के तौर पर हिन्दुस्तान में मेरी नियुक्ति हुई तो मंसूर के साथ लगभग 20 साल से टूटा पेशेवर रिश्ता फिर से जुड़़ गया। पेशेवर रिश्ता इसलिए कह रहा हूं क्योंकि दोस्त तो हम सदा-सर्वदा से रहे। इलाहाबाद में लगभग पांच साल की तैनाती के दौरान छुट्टियों में जब भी बनारस आया, मंसूर से मिले बगैर यात्रा पूरी नहीं हुई। पते की बात यह भी कि हम दोनों ने अपने हर सुख-दुख की चर्चा ईमानदारी से की। इस भरोसे के साथ कि हम सच्चे दोस्त हैं। मिलकर समस्याओं का समाधान भी ढूंढ़ा।

मंसूर एक बार गंभीर रूप से बीमार पड़े। मैंने संकठा मंदिर में जाकर उनके लिए प्रार्थना की। वह प्रार्थना मां ने सुनी। मंसूर जल्दी ही ठीक हो गए और अपने मूल कार्य में लग गए। आज जब उम्र बढ़ती जा रही है, मंसूर को कभी किसी काम से कतराते, सुस्ताते हुए नहीं देखा। बल्कि खास अवसरों पर अच्छी तस्वीर बनाने की बेचैनी जरूर महसूस की। मंसूर उन चुनिंदा फोटो जर्नलिस्टों में से हैं, जो रोज कुछ नया करने के लिए विकल रहते हैं। वह उसमें रोज तो सफल नहीं होते होंगे लेकिन जिस दिन कामयाबी मिलती है, उनके चेहरे पर चहक को आसानी से पढ़ा जा सकता है।

मंसूर ने बनारस की फोटो पत्रकारिता को कभी डूबने से बचाया था। पहले की काबिल पीढ़ी तब हाशिये पर हो गई थी और वर्तमान पीढ़ी महंत बनी फिर रही थी। मंसूर ने कई अच्छे फोटो पत्रकार तैयार कर जमाने के लिए चुनौती खड़ी कर दी। वे सभी अच्छा काम कर रहे हैं।

मंसूर बेहद संवेदनशील हैं। वह जितना अपने परिवार के लिए फिक्रमंद होते हैं, उससे कतई कम नहीं अपने दोस्तों-मित्रों के लिए। ऐसे जिंदादिल, खुशमिजाज दोस्त पर मुझे फख्र है।

रजनीश त्रिपाठी हिंदुस्तान अखबार के समाचार संपादक हैं.

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