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अनेहस शाश्वत, लखनऊ

कांग्रेस का फिलहाल का पराभव देख दिमाग में अनायास मुगलों की मनसबदारी प्रथा की याद कौंध गयी। यह मनसबदार ही थे जिन्होंने मुगलों को दुनिया की अतुलनीय और चकाचौंध वाली ताकत बनाया और मनसबदारों के ही चलते आखिरी मुगल बादशाहों की ताकत लाल किले के भीतर तक ही सीमित होकर रह गयी। आज के माहौल में भी मनसबदार हालांकि एक जाना-माना और चलता हुआ शब्द है लेकिन मनसबदार और मनसबदारी दरअसल होती क्या थी, यह बहुत कम लोग जानते हैं। इसके विश्लेषण से शायद कांग्रेस के पराभव पर भी कुछ रोशनी पड़ सके इसलिए इसे जानना अप्रासंगिक नहीं होगा।

मुगल साम्राज्य को ताकतवर बनाने के लिए सम्राट अकबर ने कई नई मौलिक संस्थाओं की स्थापना की। मनसबदारी भी ऐसी ही एक संस्था थी। यह संस्था साम्राज्य के लिए प्रशासन, कर वसूली और सैन्य संचालन हेतु योग्य व कुशल व्यक्ति तैयार करती थी। संस्था के भीतर चेक और बैलेंस सिस्टम का भी अनोखा इंतजाम किया गया था। मनसबदारी की सबसे छोटी इकाई थे जात और सवार।

जात का मतलब पैदल सैनिक और सवार का मतलब घुड़सवार। सबसे छोटी मनसबदारी में दो सौ सवार और दो सौ जात होते थे। उनके नेतृत्व के लिए एक मनसबदार होता था। इस को एक छोटी जागीर दी जाती थी जिसकी आमदनी से वह खुद को और अपने जात-सवारों को तनख्वाह देता था। और बचा लगान सरकारी कोष में जमा करा देता था। उस जागीर में लगान वसूली और शुरूआती कानून व्यवस्था कायम रखने का काम भी उसी मनसबदार का था। यह अपने से ऊंचे मनसबदार से संबद्व होता था जो पांच सौ सवार-जात का मनसबदार होता था।

मनसबदारों का यह क्रम सात हजारी तक जाता था, यानि सात हजार सवार और सात हजार जात पर एक सात हजारी मनसबदार होता था, जो आमतौर पर मुगल साम्राज्य के इक्कीस सूबों में से किसी एक सूबेदार के प्रति जवाबदेह होता था, और यह इक्कीस सूबेदार सीधे मुगल सम्राट को रिपोर्ट करते थे। भिन्न स्तर के मनसबदारों को उनकी हैसियत से जागीरें दी जाती थीं जो उनके खर्च के लिए होती थीं, बची रकम सरकारी कोष में जमा कर दी जाती थीं।

मुगलों के साम्राज्य में सारे प्रशासनिक और सैन्य पदों पर नियुक्ति इसी संस्था में से होती थी और मुगलों के गौरवशाली समय में अक्सर यह होता था कि दो सौ सवार-जात का मनसबदार अपनी योग्यता और कार्यकुशलता से सात हजारी मनसबदार बनने में सफल रहता था। इन मनसबदारों का बाकायदा तबादला भी होता था ताकि किसी एक जगह शक्ति संचय कर वे बादशाह को चुनौती न दे सकें।

मनसबदारी का यह ढांचा जहांगीर के शासनकाल तक जैसे का तैसा बना रहा जहां उन्नति के लिए योग्यता एक मात्र शर्त थी। शाहजहां का समय आते-आते इसमें वंशानुगत होने के चिन्ह प्रगट होने लगे थे। तब बड़ा और ठहरा हुआ साम्राज्य था, इसमें योग्यता से अधिक इतर गुणों की आवश्यकता थी। आरंगजेब के समय में यह ढांचा पूरी तरह भ्रष्ट और वंशानुगत हो गया। अब मनसबदारों की पहली प्राथमिकता साम्राज्य और बादशाह का नहीं वरन अपना कल्याण करने की थी।

कई बार ऐसा हुआ कि दिल्ली में बैठे शाहजहां या औरंगजेब ने दक्षिण के उपद्रवियों से निपटने के लिए वहां के स्थानीय मनसबदारों को आदेश दिया लेकिन आदेश का पालन करने के बजाय वे विद्रोहियों से मिलकर चैन की वंशी बजाते रहे। बहरहाल प्रतापी औरंगजेब के चलते उसके समय तक मनसबदारी प्रथा काफी कुछ सफलतापूर्वक कार्य करती रही लेकिन उसके बाद के बादशाहों के समय मनसबदार खुदमुख्तार होते गये और इनमें जो सूबेदार थे उन्होंने अपने-अपने सूबों में अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली, जिसमें वे बादशाह के लिए नाममात्र के लिए जिम्मेदार थे। नतीजे में आखिरी मुगल बादशाह लालकिले तक सीमित होकर रह गये।

याददाश्त पर जोर डालें तो याद आयेगा कि कांग्रेस का ढांचा भी ऐसा था कि शुरुआत चवन्निहा मेंबरशिप से करके कांग्रेस का अदना सा कार्यकर्ता मुख्यमंत्री, राज्यपाल और प्रधानमंत्री पद तक पहुंचा था। कांग्रेस के शुरुआती समय में चवन्नी देकर कांग्रेस की मेंबरशिप ली जाती थी। यह साधारण कांग्रेसी स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में सक्रिय कार्यकर्ता थे जो अपने कार्यों और योग्यता के बल पर वरिष्ठ पदाधिकारी बन जाते थे। स्वतंत्रता के बाद ये ही सत्ता के विभिन्न स्तरों पर काबिज हो गये।

यह सिलसिला इंदिरा गांधी के समय तक कमोबेश बदस्तूर चला। अगर जवाहरलाल नेहरू को वंशानुगत शासन की मानसिकता का मान भी लिया जाये तो यह कांग्रेस के कामराज सरीखे मनसबदार ही थे जो नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री के पक्ष में लामबन्द हुये। हालांकि इंदिरा गांधी के करिश्माई नेतृत्व के तले कांग्रेस संगठन का काफी कुछ क्षरण भी हुआ लेकिन काफी हद तक नीचे से ऊपर जाने की परंपरा बनी रही।

राजीव गांधी के साथ ही कांग्रेस पूरी तरह से और घोषित तौर पर शीर्ष से निम्न स्तर तक वंशानुगत संगठन के सहारे चलने लगी, इसमें निष्ठा, नेतृत्व के प्रति कम अपने प्रति ज्यादा होती है। ऐसे संगठन बहुत दिन नहीं चलते। कांग्रेस भी नरसिंह राव के बाद लड़खड़ाई, लेकिन सहानुभूति से उपजे सोनिया गांधी के करिश्माई नेतृत्व में उसे फिर संजीवनी मिली। लेकिन इस लंबी अवधि का उपयोग संगठन और सत्ता के वंशानुगत मनसबदारों ने केवल स्वार्थ सिद्धि में किया।

नतीजे में कांग्रेस का ढांचा पूरी तरह बिखर गया और फिलहाल महारानी दस जनपथ तक सीमित होकर रह गयी हैं। दुखद यह भी है कि भयानक हार के बावजूद कांग्रेस के इस वंशानुगत मनसबदारी से निकलने के कोई संकेत नहीं हैं। भारत के लोकतंत्र को सामंती लोकतंत्र भी कहा जाता है। हो सकता है ‘समय‘ भारतीय लोकतंत्र को इस अवस्था से गुजारने के बाद अमेरिका और इंग्लैंड सरीखा आधुनिक लोकतंत्र बनाने की ओर अग्रसर करे।

लेखक अनेहस शाश्वत सुल्तानपुर के निवासी हैं और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. घुमक्कड़ी, यायावरी, किस्सागोई और आरामतलबी इनके स्वभाव में हैं. इन दिनों वे लखनऊ में रहकर जीवन की आंतरिक यात्रा के कई प्रयोगों से दो-चार हो रहे हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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