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''चाहे जितना तोड़ ले जाओ, अकेला सुनील शुक्ला निकाल लेगा पूरा अखबार!'' ये चुनौती भरे शब्द उत्साह जगाने के बजाये बताते हैं कि हार से पहले की छटपटाहट किन शब्दों में जुबान पर आ जाती है। अपनी हरकतों के साथ ही कहीं भी कुछ भी बोल पड़ने के लिए कुख्यात सुनील शुक्ला के ये बोल भोपाल में मीडिया के साथियों के बीच खूब चटखारे के साथ कहे-सुने जा रहे हैं। दैनिक जागरण समूह के नईदुनिया अखबार के भोपाल संस्करण (नवदुनिया) के संपादक श्री शुक्ला को लेकर जो नया किस्सा चर्चा में है, वो कुछ इस प्रकार है।

हुआ ये कि अपने एक साथी के शादी कार्यक्रम में साहब पहुंचे तो मान-सम्मान की आदतन लालसा में पूरे कार्यक्रम स्थल पर कुलांचे मारने लगे। लोग भी समझते हैं इसलिए दुआ सलाम कर साहब को आगे पास करते गये। इस क्रम में शुक्लाजी का सामना एक ऐसे बंदे से हो गया, जिसे उन्होंने कभी मौका दिया था, पर शुक्लाजी की हरकतों से तंग आकर उसने नवदुनिया को अलविदा कह दिया। बंदे में दम था, इसलिए उसे मप्र सहित कई राज्यों में नंबर वन अखबार ने अपने साथ ले लिया। हालांकि शुक्लाजी उसे अब तक नाकारा ही बताते हैं। अब शुक्लाजी का पारा चढ़ने लगा, पहले तो वे शिष्टाचार की परिधि में थे पर अचानक फट पड़े, उन्होंने चुनौती देने के लहजे में कहा- ''.....तुम चाहे जितने भी आदमी नवदुनिया से तोड़ ले जाओ, मैं सुनील शुक्ला अकेला ही अखबार निकाल कर दिखा दूंगा।'' और न जाने क्या-क्या बोल गए साहब।

आवाज भी बुलंद इसलिए आस-पास के लोग भी सुन रहे थे और तरस खा रहे थे साहब की बुद्धि पर कि जिस बन्दे से उलझ कर वो अपने और सामने वाले मीडिया संस्थान के मालिकों तक बात पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं वह तो खुद मामूली कर्मचारी है और नियुक्ति में उसकी भूमिका नहीं है। दरअसल पिछले कुछ महीनों से नवदुनिया से 'प्रतिभा पलायन' की गति तेज हुई है और शुक्लाजी आदतन इसका ठीकरा भी दूसरों पर फोड़ रहे हैं। इसलिए शादी समारोह में मेहमान होने की मर्यादा भूल गए।

वैसे भी शुक्लाजी की बदजुबानी नयी नहीं है। उनकी हरकतों के चलते नवदुनिया में उनके 27 माह के कार्यकाल में 30 से ज्यादा पत्रकार बाहर का रास्ता अख्तियार कर चुके हैं। हालांकि वे हर जाने वाले के बाद उसके पैरों के निशान पर बेदम आरोपों की लाठी पीटते हैं और ताली बजवाते हैं। दरबारी भी मरता क्या न करता के अंदाज में सुर में सुर मिलाते हैं।

जो साहब को जानते हैं उनके लिए ये सब नया नहीं, पर जो नहीं जानते वे पत्रकारों की इस सूची पर गौर फरमायें, जो शुक्लाजी की बदसलूकी के चलते नवदुनिया को अलविदा कह गये। इनमें एक भी नाम ऐसा नहीं है जो साहब के विषय में दो शब्द भी बोलने को तैयार हो। सवाल है कि इन सभी पत्रकारों में यदि योग्यता न होती तो बड़े संस्थान इन्हें ज्यादा वेतन देकर क्यों अपने साथ जोड़ते? इनमें से कोई एक दिन भी बेरोजगार नहीं रहा।

इन्होंने नवदुनिया को कहा अलविदा-
सुमेर सिंह यदुवंशी, वीरेंद्र राजपूत, नितिन दवे, प्रमोद शर्मा, विनीत दुबे, सान्ध्यदीप काशिव, रूपेश राय, हरीश दिवेकर, हर्ष पचौरी, आशीष दुबे, धर्मेन्द्र पांचाल, लक्ष्मीकांत मिश्र, शशि तिवारी, रश्मि प्रजापति, रामकृष्ण गौतम,  प्रदीप शर्मा, सौरभ मिश्र, हरेकृष्ण दुबोलिया, अर्पण खरे, नितिन साहनी, पंकज जैन, राजेश शर्मा, रामगोपाल राजपूत, मुक्तेश रावत, नरेंद्र शर्मा, मनोज अवस्थी, प्रशांत शर्मा, सोनल जैन, सोनल भार्गव, गुरुदेव बिल्लोरे।

आने वाले कुछ दिनों में इस सूची में कई नाम और जुड़ सकते हैं। इसमें राजेश शर्मा एक ऐसा नाम है जो पहले दिन स्वागत अभिनन्दन के बाद लौटे ही नहीं। किसी तरह दैनिक भास्कर में अपनी कुर्सी बचाई। इसी तरह पंकज जैन और नीतिन साहनी भी कुछ दिनों बाद ही चलते बने। ये हालात उस नवदुनिया के हैं जिसमें अवसर मिलना मप्र के हर पत्रकार की हसरत होती थी और जिन्हें मौका मिला उनके लिए गर्व की अनुभूति। हालात को समझने के लिए दो वरिष्ठ पत्रकारों की दुर्दशा भी नजीर मानी जा सकती है, ये हैं श्री राजीव सोनी और श्री आनंद दुबे। सोनीजी स्टेट ब्यूरो के बजाय सिटी सेक्शन में काम कर रहे हैं, तो वर्षों क्राइम रिपोर्टिंग कर चुके दुबेजी धर्म की खबरों के प्रेस नोट सम्हाल रहे हैं।

वैसे तो कुछ को छोड़ लगभग सभी घुटन में काम कर रहे हैं, जिसकी स्पष्ट छाया नवदुनिया पर रोज दिखती है, सभी के साथ उनके पत्रकारीय जीवन का घिनौना अनुभव भी साहब की कृपा से है, लेकिन सभी की पीड़ा को शब्द देना संभव नहीं है।

हाँ ये जरूर है कि साहब की नासमझी और अपनों के लिए नवदुनिया में जगह बनाने के चक्कर में 100 से ज्यादा कर्मचारियों ने संस्थान पर मजीठिया वेज बोर्ड मामले में केस कर दिया है। संस्थान के उच्च अधिकारियों को भी पता चल चुका है कि मजीठिया केस इन्हीं की करतूतों का नतीजा है। ज्ञात हो कि मजीठिया मामले को लेकर हुई समझौता बैठक में भी शुक्लाजी के रवैये पर कर्मचारियों ने ग्रुप एडिटर श्री आनंद पांडेय के सामने आपत्ति दर्ज़ कराई थी, लेकिन उनकी आपत्ति खारिज कर दी गयी थी।

भोपाल से एक पत्रकार द्वारा भेजी गई चिट्ठी पर आधारित.

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  • Guest - Barbad naidunia

    ग्वालियर, जबलपुर, इंदौर और रायपुर सभी जगह भोपाल जैसे हाल हैं। असल में दोष सुनील शुक्ला का नहीं है। उस जोकर को संपादक बनाया आनंद पांडे ने। माने बंदर के हाथ उस्तरा दोगे तो क्या होना है? अभी भड़ास पर ही खबर थी कि कैसे मजीठिया वालों के साथ दुर्व्यवहार हुआ, कैसे ग्वालियर की नईदुनिया संपादक ने एक पत्रकार के साथ घटिया हरकत की। रायपुर में भी एक जोकर काम कर रहा है। वहां भी प्रतिभा पलायन हो रहा है।
    पांडे और उसके भांडों ने नईदुनिया में इतनी गंद फैला दी है कि अब इस अखबार का भगवान ही मालिक है। सब दलाली के काम में लगे हैं। एन्टी सरकार एक दो खबर चला देते हैं, फिर ब्लैकमेल करना या कोई काम निकलना इनका काम हो गया है। मालिकों को ज्ञान पेल दिया जाता है कि सरकार हिला डाली, जबकि उनको मालूम ही नहीं कि रेवेन्यू लॉस वो झेल ही रहे हैं, अखबार की भी साख मिट्टी हो रही है। हर जगह ईमानदार कर्मी किनारे कर दिया गया है। जयकारे लगाने वाले भी इन दिनों लड़ रहे हैं कि किसका जयकारा पांडे तक पहुँचता है। इधर पांडे है कि मलाई पर ध्यान दे रहा है। फिर कोई भी भांड लेकर आ जाये। मासिक माल आना चाहिए।

  • Guest - जितेंद्र

    ** कई घर वाला दुकानदार सम्पादक....

    क्या बात है। जितने शहर उतने घर। यही है आनंद पांडे का मंत्र नंबर 1, मन्त्र 2. एक जगह 1 साल से ज्यादा काम मत करो, पोल खुल जाती है। नईदुनिया में ढाई साल हो गए हैं इसलिए सब जाहिर हो गया है।
    इससे पहले का हाल देखें...गलत लगे तो पांडे से ही कन्फर्म कर लें। भास्कर ने गुजरात भेजा तो भाई डर गया।
    3 कारण थे .....
    1. अपने चेलों को वहां कैसे ले जाता
    2. वहां गुजराती कैसे सीखता
    3. बैतूल में बैठे अपने 2 भाइयों को बड़ा ठेका कैसे दिलवाता और बड़ा कारखाना कैसे खुलवाता।
    ... PG तो journalism
    नहीं PR में ही किया है ना इसलिए जुगाड़ लगाकर जागरण में घुस गया। जो फंडे भास्कर के चीफ रिपोर्टर & चीफ सब तक को रटे होते हैं उन्हें ऐसे पेश किया जैसे सिर्फ वही सीखकर आया हो। जागरण ने भी सोचा भास्कर का स्टेट हेड मिल रहा है, जो mp में 3 जगह एडिटर रहा है तो इससे बेहतर क्या होगा.... ले लो। चेहरा देखकर धोखा खा गए। जबकि भास्कर ने रायपुर, इंदौर & भोपाल तीनों जगह इसे डेढ़ साल भी नहीं रखा। पोल खुलते ही दूसरे सेंटर भेज देते थे। फिर से गुजरात भेज ही रहे थे। वहां मेहनत ज्यादा थी इसलिए गया नहीं।
    ....नहीं गया कोई बात नहीं। अपने जो चेले लाया उन्होंने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। पहला रिकॉर्ड सैलरी हाईक का।
    1. सुनील शुक्ला- भास्कर ग्वालियर में 75 हजार भी नहीं पाने वाले को 1 लाख 10 हजार में लाया। 50 % से ज्यादा ग्रोथ।
    2. प्रमोद त्रिवेदी- भास्कर जबलपुर में सिटी भास्कर इंचार्ज को नईदुनिया इंदौर में सीनियर एनई। वहां सैलरी 25 हजार भी नहीं थी और यहां 40 हजार। यानी 60% से ज्यादा हाइक।
    3. मनोज प्रियदर्शी. भास्कर रायपुर में 25 हजार से सीधे 40 हजार। यानी 60% हाइक। जो आदमी सेंट्रल डेस्क में सिंगल कॉलम खबर नहीं बना पाता, उसे इनपुट हेड बना दिया। एक साल बाद आउटपुट हेड बनाया। सिंगल कॉलम खबर वाली बात अतिश्योक्ति लगती है लेकिन सच है। कभी भी कोई भी टेस्ट कर सकता है।
    4. अजीत सिंह, भास्कर जबलपुर में 40 हजार भी नहीं पाने वाले को सीधे 65 हजार प्लस यानी 60 % से ज्यादा हाइक।
    इतनी जबरदस्त हाइक पर लाए गए इन अति योग्य लोगों की परफॉर्मेंस क्या है वो तो प्रोडक्ट देखकर ही समझ आती है। नईदुनिया के लोग भी सही फीडबैक दे देंगे।
    और भी बहुत से नगीने लाए गए हैं, जिनकी डिटेल देना यहां सम्भव नहीं। नाम ही काफी हैं... अश्विनी, लव व्यास, रामकृष्ण गौतम, महेंद्र श्रीवास्तव, अरविंद पांडे, नवीन जायसवाल, जबलपुर में dne यादव & ne गुप्ता, भोपाल में राजपूत, राजीव शर्मा, सौरभ खण्डेलवाल.. पूरा पेज इन लोगों की योग्यता & सैलरी & कारनामों से भर जाएगा।
    ** एक चीफ रिपोर्टर है जबलपुर में रविन्द्र दुबे जो बिना सिंगल कॉलम खबर लिखेे ही डबल प्रमोशन पाकर न्यूज़ एडिटर हो गया। कई टैक्सियों और कई फ्लैट का मालिक यह पत्रकार जबलपुर के एक बड़े सिंडिकेट का हिस्सा माना जाता है।
    -जितेंद्र ठाकुर, इंदौर

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