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पत्रकारिता दिवस बीते कुछ ही रोज हुए हैं... हम उस दिन केवल पत्रकारों की बात करते हैं... लेकिन हम भूल रहे हैं कि इसी जमात का एक हिस्सा है इंटर्न.. इनकी बात आज तक न लिखी गयी और न सुनी गयी... इनकी बात तो बस ऑफिस के अंदर तक ही रह गई.. ये जमात धीरे धीरे बढ़ती जा रही है... आज इंटर्न ही वे गुलाम हैं जो रोज वक़्त पर आते हैं और वक़्त के बाद जाते हैं... इनको पैसे तो दूर की बात, कई बार इज़्ज़त तक सही से नहीं मिलती है... आज इनकी संख्या इतनी है कि आप इंटर्न के लिए नया चैनल लांच कर सकते हैं..

इंटर्न हर पत्रकार का बचपन होता है... आज हम पत्रकारिता नहीं कर रहे, बस कीबोर्ड की गुलामी कर रहे हैं। जैसे ही आप पत्रकार बनाने का सफर शुरू करते हैं, पहला सवाल यही करा जाता है कि आपको कीबोर्ड की गुलामी आती है या नहीं यानि हिंदी टाइपिंग आती है या नहीं। अगर आप कीबोर्ड के गुलाम नहीं तो आप पत्रकार नहीं। जितनी तेज टाइपिंग उतने तेज पत्रकार। आप सोचते होंगे ये ज्ञान वाली जो पत्रकारिता है वो कहां से आयी, अगर आप ऐसा सोच रहे तब ये आपकी गलती नहीं... आप बच्चे को सिर्फ बड़ा देख रहे हैं... भूल रहे हैं कि उसका बचपन यानि एक “इंटर्न” की ज़िंदगी। इंटर्न हर पत्रकार का बचपन होता है, यहाँ पैदा होने वाले बचपन की बात नहीं हो रही... पत्रकारिता में शुरुआत की बात हो रही है।

अब बात इंटर्न की ज़िंदगी की...  वो गुलाम जो खुशी–खुशी गुलामी करता है, वो रोज इतनी टाइपिंग करता है कि कीबोर्ड भी बोलना शुरू कर देता है ‘भाई इंटर्न हो क्या‘... वो केवल कीबोर्ड से रोज बात नहीं करता बल्कि वो रोज खूब सारी साइट से भी बात करता है... देखता है किसको ट्रांसलेट करना है... ट्रांसलेशन इंटर्न का दूसरा धर्म है.... उसको कैसे न आएगा यह धर्म... अगर इस धर्म की पालना में आपसे चूक होगी तो आप इंटर्न के लायक नहीं... आप कितना भी बोल लो... हम हिंदी जर्नलिज्म कर के आये तो क्या हुआ... तुम इंटर्न का धर्म नहीं निभाओगे.... इंटर्न की ज़िंदगी यहीं नहीं रुकती...  उसको सब आना चाहिए जो शायद वहां पर किसी को न आता हो...

इतने क्यों बढ़ रहे है इंटर्न?... आज देश में दो लोगों की पढाई की जगह की कमी नहीं... एक बी.टेक और दूसरी पत्रकारिता.... आपको गली गली इंस्टीट्यूट मिल जायेंगे... अब तो चैनल भी अपने इंस्टीट्यूट खोल कर बैठ गए हैं। अब सोचो इतने बच्चे पास कर कहां जायेंगे... कौन देगा इन्हें नौकरी... नौकरी तो बाद की बात है, इनको इंटर्न कौन देगा, पहला सवाल यही आता है...

ये सबसे बड़ा सच है...  हर चैनल सच दिखने का दावा करता है लेकिन वो अपने इस सच से भागता है.... हर पत्रकार जानता है एक इंटर्न की व्यथा लेकिन वो इसे बोलना नहीं चाहता... जो चैनल आगे हैं वो भी इस बात में पीछे दिखते हैं... जो तेज हैं उनकी इसमें कोई रफ़्तार नहीं दिखती... यहाँ तक कि सबसे अलग दिखने वाले चैनल भी इस पर कुछ अलग नहीं दिखते...

अभय पांडेय

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