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भला ऐसे भी कोई जाता है... : जिंदगी बहुत खूबसूरत है, लेकिन अपनों के बिना तू अच्छी नहीं लगती। मेरे व्हाट्सएप पर वरिष्ठ पत्रकार पठानिया जी का अंतिम संदेश यही था। पत्रकारिता में अपना जीवन खपा देने वाले बड़े भाई समान मित्र राकेश पठानिया अंतिम समय में मुझे याद करते रहे। (जैसा पारिवारिक सदस्यों ने आज अल सुबह बताया)। पता नहीं दोस्ती के कई कर्ज चुकाने बाकी रह गए।

जीवन सच में अनमोल है। आपके लिए खुद की जि़ंदगी न जाने क्या महत्व रखती है, लेकिन परिवार के लिए आप ही जि़ंदगी हो। यह वक्त न तो किसी तरह के वाद-विवाद का है और न ही इस असमय मृत्यु के कारणों की पड़ताल का। हम सबका फर्ज यह है कि हम पठानिया जी के परिवार की ऐसी क्या मदद करें कि उनका आगे का जीवन आसानी से कट सके। दोस्तों! पठानिया जी की पहचान एक कर्मठ पत्रकार के रूप में रही। पत्रकारिता के अलावा उनका कोई अतिरिक्त व्यवसाय नहीं रहा। धर्मपत्नी गृहिणी हैं, जबकि दो बच्चे अभी छोटी कक्षाओं में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

मैं दिल से आभारी हूँ धर्मशाला के प्रतिष्ठित व्यवसायी एवम दिवंगत पठानिया जी के मित्र श्री मुन्नू ठाकुर जी का जो संकट की इस घड़ी में पांच लाख की आर्थिक सहायता के साथ सामने आए हैं। वहीं नूरपुर के पूर्व विधायक श्री राकेश पठानिया ने दिवंगत पत्रकार राकेश पठानिया जी के एक बच्चे की शिक्षा का पूरा खर्च वहन करने की बात कही है। उम्मीद है दैनिक जागरण संस्थान उन्हें समुचित मुआवज़ा प्रदान करेगा। हमसे जो हर संभव मदद होगी, उसके लिए हम तैयार हैं।

पत्रकार शशिभूषण पुरोहित की फेसबुक वॉल से. 

जिंदादिली की मिसाल राकेश पठानिया की मौत की मनहूस खबर

etv वाले मृत्युंजय की फेसबुक पोस्ट ने आज मझे सुबह सवेरे बुरी तरह झटक दिया था। पोस्ट में कांगड़ा जिले में पत्रकारिता के सूरमा और जिंदादिली की मिसाल राकेश पठानिया की मौत की मनहूस खबर मिल गयी। मृत्युंजय ने पत्रकार समाज को हुयी इस बड़ी क्षति की सूचना देकर अपना धर्म निभाया लेकिन राकेश पठानिया जैसे पत्रकारिता के 'वीर पुरुष' को मौत यूँ घेरकर निगल लेगी यह सब यकीं करना मुश्किल हो रहा था। तब फेसबुक पर कई पोस्टों ने तेज़ी पकड़ी तो बीसियों बार पढ़ पढ़कर भी दिल को दिन भर दिलासे देने जुटा रहा क़ि नहीं यह कैसे हो सकता है! लेकिन यह सच था क़ि शान ए धर्मशाला हमारे बड़े भाई राकेश पठानिया अब नहीं रहे थे। फट से जागरण में फोन घुमाया तो पुराने मित्रों ने बताया क़ि हाँ यह सही है लेकिन सब अचानक।हुआ है। पिछली शाम तक ठीक थे। दिनेश कटोच ने ही इन मेरे जागरण वाले मित्र को भी बताया था क़ि पठानिया अब ठीक हैं। शुक्रवार को तो पठानिया ने जागरण में भी खुद ही बताया था क़ि अब उन्हें लग रहा है क़ि वह ठीक हो जाएंगे। मतलब सब सामान्य था। मगर शनिवार की रात पठानिया के जीवन के लिए एक ऐसी घुप अँधेरी रात साबित हो गयी थी क़ि जिसका कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता था। बताया गया क़ि टांडा मेडिकल कॉलेज में केमोथेरापि के बाद शनिवार को उनकी तबियत आधी रात के बाद एकाएक ऐसी बिगड़ी क़ि थामी नहीं जा सकी। दिन भर मित्रों से चर्चा करता रहा पठानिया की। कइयों ने अपने अपने अनुभव बांटे।

अभी रात सामने आ गयी। अब सोने की कोशिश कर रहा था लेकिन आँखों के आगे से भाई पठानिया की सूरत-सीरत हटने का नाम नहीं ले रही थी तो सोचा क़ि क्यों न श्र्द्धांजलि के कुछ शब्द उन्हें मैं भी समर्पित कर दूँ। राकेश पठानिया सचमुच पूरी तरह।से पत्रकारिता को ही समर्पित थे। पहले कभी जनसत्ता तो फिर उसके बाद दैनिक जागरण। जागरण के लिए उन्होंने बतौर पत्रकार ही नही बल्कि एक अभिभावक की भूमिका भी निभायी। प्रेस स्थापित करने से लेकर अखबार के हर खरे बुरे के चिंतक और किसी भी संकट के दौर में बेहतरीन व्यवस्थापक। यूँ तो वह बड़े अंतर्मुखी थे।लेकिन कभी कभी घुटन से बचने के लिए दिल की बातें साझी भी कर लिया करते थे। वह एक सरल सकारत्मक व्यक्तितव के धनि थे। बुरा करने से बचते थे और ऐसी ही सलाह भी दूसरों को दिया करते थे। पत्रकारिता में भिड़न्त और सींगबाज़ी इन्हें पसंद नहीं थी।

उन्हें मैंने ऐसे महसूस किया कई बार क़ि वह समाज में सभी पक्षों के पैरोकार थे। पत्रकारिता से वह सब नहीं जिससे किसी भी पक्ष को क्षति हो। खिलाफ खबर भी लिखेंगे लेकिन शब्द शिष्टता और शब्द संयम पर पूरा जोर। मैंने उन्हें एक टीम लीडर के रूप में कई बार बढ़िया काम करते हुए देखा। वह किसी को नाराज करने के पक्ष में कभी नहीं रहते। टीम में सभी को प्यार से और कम संसाधनों की स्थिति में अपना बेहतर देने की सदा प्रेरणा देने की उनके प्रयासों को हम कई बार देखते और महसूस करते थे। यह उनके व्यक्तितव का ही करिश्मा था क़ि जागरण के संजय गुप्ता इन्हें व्यक्तिगत तौर पर जानते थे और इन पर हर मामले में भरोषा करते थे। तात्कालिक मुख्य महा प्रबन्धक निशिकांत ठाकुर हिमाचल के तमाम बड़े निर्णय पठानिया से ही मशविरे के बाद लेते थे। उनसे जुडी कई स्मृतियाँ जेहन में उछल कूद-भागमभाग कर रही है और दिल-दिमाग को बेचैन कर रही हैं। भाई आपको हमेशा याद रखेंगे और आपका वो फोन उठाते ही जुबां से निकलने वाला 'जय देया महाराज'।

वरिष्ठ पत्रकार राजेश्वर ठाकुर की फेसबुक वॉल से.

(स्व. राकेश पठानिया)

बड़का चली आ...

मैं जागरण आफिस छोटे पाउ नवनीत  कन्ने मिलना गया तां ओहथु बड़का ओरां दुस्सी पे। मैं पैरीं हत्थ लाये तां बड़के गले ने लाई ल्या। पूछ्या अज कतां?  मैं ल्या अज तुहां सोगी मिलना आई गया, बड़का बड़ा खुस, शीशे पार नवनीत हल्की स्माइल दई ने दुरे ते हाल चाल पुछि ल्या। बड़के चा मंगाई लई,गप्प छप चली,बड़के कताबा ताई कई सुझाब दई पाए। कुछ ईजा करना कुछ उंझा। मिंझो पता हा बड़का ठीक नी ए, पर बड़के कुछ बी शो नी होना दित्ता, फेस पर से नेचुरल रौनक नी थी पर बड़का पूरा जोर लाये की कुछ भी शो न होय। जेलु में एचपीसीए दे भ्रष्टाचार दे खिलाफ मामला चकया तां बड़के बड़ी मदद कित्ती। प्रेस क्लब दे पचां धूप्पा च कुर्सी लाई ने बड़के ते सलाह लेनी। बड़के वाल बड्डा आरी एक्सपीरियंस था।

बड़का गर्मजोशी ने मिलदा था पर सलाई दिन्दी बारी बड़ा गंभीर। ए मत करदे,से करी लेना। मैं तिन की साल पहले शिमले आई रया तां मुलाकात घटी गई। विच पाकिस्तान दे मैचे खिलाफ जेलु मैं मुहिम चलाई तां बड़का बड़ा खुस पर बमारिया दी बजा ने बेशक बड़का डोन होना शुरू होई आ था पर खबर से दई कड़क इ लिखनी। मैं पूछ्या बड़का अजकल सुझदे नी, बोल्या अजकल यरा मेरे ते दौड़ पज्ज नी हुंदी तां एथि डेस्क पर ठीक रहन्दा। नवनीत कन्ने मिलला तां नवनीते गलाया बड़के दा जिंदगी भर दा एक्सपीरियंस अजकल अहाँ दे कम्मे ओ दा। एथि बड़के जो कोई टेंशन ब नी ए। बमारी ते तंग होई बड़के रिजाइन करना लाया हा तां नवनीते रिक्वेस्ट कित्ती तुहां टेंशन मत ल्या।

जागरण आफिस आई ने जे दिल करे से करा, जेलु दिल करे तेलु आ कन्ने जा। भाई, इन्हा दे ओने ने सांझो सबनी जो बड़ा कुछ सिखने जो मिलदा, नवनीत दी सेंसटिविटी मिंझो कॉलज टेमे ते पता थी हुन तां वैसे बी नवनीत काफी मैच्योर है उन्नी इकी तीरे ने दो निशाने लाये। बड़का बी अडजस्ट कन्ने बड़के दे एक्सपीरियंस दा फायदा उपरे ते बड़के दा दिल भी ओर ओई जाँदा। कल पता लग्गा बड़का अपना एक्सपीरियंस जागरण आफिस बंडी ने पता नी कतां जाई रया। हुन बड़के दी सकल नी सुजनी बस,ख़बरां च बड़के दी झलक सुजनी जेडी बड़के वाकियों जो बंडी। बड़के दी कमी कदी पूरी नी ओई सकदी। भगवान बड़के दी आत्मा जो शांति दें। जय हिंद

-विनय शर्मा
डिप्टी एडवोकेट जनरल
हिमाचल सरकार

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