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रासबिहारी पाण्डेय

बहुत दिनों से उत्तराखंड भ्रमण की इच्छा थी। वैसे तो उत्तराखंड को देवभूमि कहा गया है। यहाँ बहुतेरे तीर्थस्थल और ऐतिहासिक महत्त्व के दर्शनीय स्थल हैं लेकिन उन सबमें यमुनोत्री, गंगोत्री,  केदारनाथ और बदरीनाथ प्रमुख हैं। अक्सर ये यात्राएं लोग समूह में करते हैं, बसों से या छोटी गाड़ियाँ रिजर्व करके। ये बस और छोटी गाड़ियों वाले ड्राइवर यात्रियों को एक निश्चित समय देते हैं जिसके भीतर यात्रियों को लौटकर एक निश्चित स्थान पर आना होता है। मेरे एक मित्र ने बताया कि निश्चित समय होने की वजह से कभी कभी कई लोग बिना दर्शन लाभ लिए बीच रास्ते से ही लौटकर उक्त स्थान पर चले आते हैं ताकि अगली यात्रा के लिए प्रस्थान कर सकें।

इन यात्राओं में केदारनाथ धाम की यात्रा जरा मुश्किल है, संभवतः यहीं के लिए समय कम पड़ता होगा। समूह में यात्रा करने में सैलानीपन का भाव बाधित होता है, इसलिए मैंने निर्णय किया कि मैं अकेले इस यात्रा पर निकलूँगा। मैंने आठ दिन का समय निश्चित किया कि जितना संभव हुआ, घूमकर लौटूँगा। मैंने 6 जून की रात एक बजे  मुंबई के उपनगर वसई से गुजरनेवाली गाड़ी संख्या 19019 देहरादून एक्सप्रेस का रिजर्वेसन करा लिया।

अंग्रेजी तारीख के अनुसार7 जून को चलकर 8 जून को शाम 4 बजे हरिद्वार पहुँचा। यहाँ से मुझे जगजीतपुर स्थित गंगा बचाओ अभियान के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले संत स्वामी शिवानंद जी के आश्रम मातृसदन में पहुँचना था। गंगोत्री से गंगा सागर तक की यात्रा करनेवाले कवि निलय उपाध्याय यहाँ काफी समय रह चुके हैं, उनके ही निर्देशानुसार मैं यहाँ जा रहा था। हरिद्वार रेलवे स्टेशन से शंकर आश्रम और फिर वहाँ से जगजीतपुर के लिए तीन पहिए वाले वाहन चलते रहते हैं। जगजीतपुर बस अड्डे के पास उतरकर थोड़ा पैदल चलकर यहाँ पहुँचना हुआ।

आश्रम के बगल से गंगा की निर्मल धारा बह रही थीं। बड़ा ही मनोहारी वातावरण था। मातृसदन पहुँचकर मैं स्वामी शिवानंद जी के शिष्य स्वामी पूर्णानंद जी से मिला। थोड़ी देर बाद स्वामी शिवानंद जी से भी मुलाकात हुई। मैंने उन्हें अपने द्वारा किया भगवद्गीता का दोहानुवाद भेंट किया। वे काफी प्रसन्न हुए। कई एकड़ में फैले मातृ सदन में सैकड़ो पेड़ लगे हैं। आम, नासपाती, कटहल, लीची, नींबू.....देखते जाइए और पेड़ों की शीतल छाँव का आनंद लेते जाइए...... आश्रम का वातावरण अद्भुत लगा।

गंगा जी के शीतल जल में स्नान करके यात्रा से संतप्त शरीर को बहुत राहत मिली। शाम को हर की पौड़ी के लिए निकला। दक्ष आश्रम से थोड़ा आगे बढ़ा ही था कि रास्ते में  टी.एन.दुबे जी से मुलाकात हो गई। दुबे जी मुंबई में नैसर्गिक विकलांग सेवा संघ नाम की एक संस्था चलाते हैं। वे कुछ विकलांग मित्रों को लेकर बद्रीनाथ के दर्शन के लिए निकले थे। अप्रत्याशित रूप से उनसे मिलकर बड़ा आनंद आया। उनके साथ देर तक बातें होती रहीं, फिर चाट और चाय का आनंद उठाया गया। मुझे याद आया कि हर की पौड़ी पर गंगा आरती में शामिल होना है, इसलिए उनसे आज्ञा लेकर हर की पौड़ी के लिए प्रस्थान किया लेकिन वहाँ पहुँचने तक आरती का समय निकल चुका था। संभवतःसात बजे दस मिनट के लिए आरती का आयोजन होता है।

वैसे मैं वाराणसी में गंगा आरती देख चुका हूँ...इसलिए हर के पौड़ी के उस स्वरूप की कल्पना करके माँ गंगा को नमन करते हुए देर तक घाटों पर भ्रमण करता रहा। यहाँ गंगा की दो धाराएं निकालकर बीच में बहुत बड़ा स्पेस रखा गया है, जहाँ यात्रियों का हुजूम उमड़ा रहता है। यहाँ की चहल पहल और यात्रियों का उत्साह देखते ही बनता है। करीब एक घंटे यहाँ घूमता रहा और मोबाइल से कुछ तस्वीरें लेकर फेसबुक पर पोस्ट किया। फिर मातृ सदन की ओर चल पड़ा। साधु संतों के साथ पंगत में भोजन करके बिस्तर पर लेटा तो यात्रा में थका शरीर सुबह छह बजे के आसपास चेतनावस्था में आया। नित्यक्रिया के पश्चात आश्रम के संतों से बात करने पर पता चला कि गंगोत्री और बद्रीनाथ के लिए डायरेक्ट बसें हैं लेकिन वे सुबह छह बजे ही चली जाती हैं क्योंकि वहाँ पहुँचने में पूरा दिन निकल जाता है और रात में पहाड़ी रास्तों पर बसें नहीं चला करतीं। हरि इच्छा भावी बलवाना.....मुझे हरिद्वार घूमने के लिए एक और दिन मिला। दोपहर के भोजन के पश्चात बस अड्डे की ओर निकल पड़ा। हरिद्वार में गंगा की चार पाँच धाराएँ देखने को मिलीं, पता चला कि सिंचाई के लिए ये धाराएँ निकाली गई हैं। 

मैंने यात्रा से संबंधित जानकारियाँ लेनी शुरू की तो पता चला कि चारों धाम की यात्रा में अमूमन 9 दिन का समय लगता है जिसका यात्रियों से पैकेज डील होता है। यह पैकेज तीन हजार से बीस हजार तक का है जिसमें अलग अलग तरह की सुविधाएं हैं। ऋषिकेश में साफ सुथरी ब्यवस्था है, यहाँ से थोड़ा घालमेल भी है।   उत्तराखंड सरकार की बसें हरिद्वार से गंगोत्री और बद्रीनाथ तक तो जाती हैं लेकिन केदारनाथ और यमुनोत्री के लिए कई टुकड़ों में यात्रा करनी पड़ती है। मैंने निर्णय किया कि कल सुबह की बस से पहले गंगोत्री जाऊँगा फिर आगे देखा जाएगा। यहाँ से मैंने बाबा रामदेव के पतंजलि योगपीठ जाने का निश्चय किया। यह स्थान हरिद्वार से 25 किलोमीटर दूर रुड़की जाने के रास्ते में साहिबाबाद के पास है। बस का किराया 20 रुपये है।

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