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Priyabhanshu Ranjan : संघियों की संकीर्ण मानसिकता देखिए... 'भारत छोड़ो आंदोलन' के 75 साल पूरे होने के मौके पर RSS के प्रचारक रहे भाजपा नेता नरेंद्र मोदी ने हमेशा की तरह अपने भाषण (लफ्फाजी) में जवाहर लाल नेहरू का कहीं कोई जिक्र नहीं किया। न ही इशारों में कुछ कहा कि आजादी की लड़ाई में नेहरू का भी योगदान था। मोदी ने अपने भाषण में इस बात का भी जिक्र करना जरूरी नहीं समझा कि 'भारत छोड़ो आंदोलन' का प्रस्ताव अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के बंबई अधिवेशन में 8 अगस्त 1942 को पारित हुआ था। भला, अपने मुंह से कांग्रेस का नाम कैसे ले लेते 'साहेब'?

अपने आप को 'निष्पक्ष' दिखाने की लाख कोशिश के बावजूद लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की पक्षपाती राजनीति खुलकर सामने आ ही जाती है। महाजन ने अपने भाषण में ये तो कहा कि बंबई के गोवालिया टैंक मैदान में 8 अगस्त 1942 की शाम हुई एक बैठक में 'भारत छोड़ो आंदोलन' का प्रस्ताव लाया गया था। लेकिन वो ये कहने में सकुचा गईं कि ये बैठक कांग्रेस की थी, प्रस्ताव कांग्रेस की तरफ से नेहरू ने ही पेश किया और पारित भी कांग्रेसियों ने ही किया।

अपने नेता नरेंद्र मोदी का अनुकरण करते हुए महाजन ने भी नेहरू का नाम लेना जरूरी नहीं समझा। पर दीन दयाल उपाध्याय का नाम लेना नहीं भूलीं, जिनके बारे में खुद भाजपा के लोग ढंग से 10 लाइन नहीं बता पाते कि आखिर उनका योगदान क्या था। पार्ट टाइम रक्षा मंत्री अरूण जेटली ने भी राज्यसभा में यही 'नेक' काम किए। संघियों को पता नहीं किसने सलाह दे दी है कि वो नेहरू का नाम और काम गिनाना बंद कर देंगे तो नेहरू खत्म हो जाएंगे। सबको अपनी तरह बेवकूफ समझ रखा है!

पीटीआई में कार्यरत पत्रकार प्रियभांशु रंजन की एफबी वॉल से.

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