Category: इवेंट, पावर-पुलिस, न्यूज-व्यूज, चर्चा-चिट्ठी... Published on Friday, 20 January 2012 15:46 Written by एनके सिंह
कुछ माह पहले हेडमास्टरों की एक बैठक में एक सरकारी अधिकारी ने कहा, “सभी बच्चों का दाखिला लें; उनके साथ मारपीट न करें; उन्हें पास करके अगली कक्षा में भेजें और सुनिश्चित करें कि वे अगले साल भी दाखिला लें और अगर आप ऐसा कर लेते हैं तो आप यह तय मानिए कि आपने शिक्षा के अधिकार के तहत मिले अपने टारगेट को प्राप्त कर लिया है”। अधिकारी के इस आदेश के पीछे छिपा संदेश स्पष्ट था। संकेत यह था कि बच्चा पढ़ने आए न आए, रजिस्टर में नाम होना चाहिए; पढ़ाने की कोई ज़रूरत नहीं है; और अगले साल भी यही काम करना है ताकि येन-केन-प्रकारेण ‘लक्ष्य’ हासिल हो सके।
एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर)-2011 की ताज़ा रिपोर्ट में यह किस्सा बयां किया गया है। व्यापक रूप से किए गए इस सर्वेक्षण में सरकार के तमाम दावों के खोखलेपन को उजागर किया गया है। अध्ययन में इस बात को भी दर्शाया गया है कि किस तरह से बीमारू राज्य (बिहार, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और साथ ही साथ उत्तराखण्ड व छत्तीसगढ़) शिक्षा के क्षेत्र में लगातार पिछड़ रहे हैं। भारत सरकार ने प्राथमिक शिक्षा के बजट को बढ़ाते हुए 68,710 (सन 2007-08) से बढ़ाकर 97,255 करोड़ (सन 2009-10) कर दिया लेकिन ऐसा लग रहा है कि इन सारे प्रयासों पर संबंधित राज्य सरकारों के भ्रष्ट-तंत्र ने पानी फेर दिया है। दरअसल शिक्षा देने की ज़िम्मेदारी संवैधानिक रूप से ही नहीं व्यावहारिक रूप से भी राज्य सरकारों की ही है।
असर की रिपोर्ट देखने के बाद यहां प्रश्न यह उठता है कि क्या इसी किस्म के प्रयासों से हम चीन जैसे राष्ट्रों से मुकाबला कर सकेंगे। आज भारत में जहां उच्च-शिक्षा के लिए केवल 13.5 प्रतिशत छात्र दाखिला (जी.ई.आर) ले रहे हैं वहीं चीन व मलेशिया, जो हमसे काफी पीछे रहा करते थे, के 22.1 व 24 प्रतिशत छात्र आज उच्च शिक्षा में दाखिला लेते हैं। जबकि अमेरिका में उच्च-शिक्षा में 81.6 प्रतिशत छात्र प्रवेश लेते हैं। एक और उदाहरण देखिए। आज से 18 साल पहले जहां चीन में केवल 1900 पी.एच.डी हुआ करते थे (जबकि भारत में करीब 3000 पी.एच.डी होते थे) आज 22 हजार पी.एच.डी हर साल निकलते हैं। भारत में केवल छह हजार पी.एच.डी निकल रहे हैं, जबकि अमेरिका में 40 हज़ार। अगर यही स्थिति रही तब भारत “पॉवर इज़ नॉलेज” (ज्ञान ही शक्ति है) की दौड़ में कितना पीछे रहेगा इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
असर की रिपोर्ट के अनुसार यू.पी, बिहार, मध्यप्रदेश में कक्षा पांच में आधे से ज्यादा छात्रों को कक्षा दो का ज्ञान नहीं रहता, वह गणित से घबड़ाया हुआ है। दाखिले के जो आंकड़े राज्य सरकारों के हैं, खासकर उत्तरप्रदेश और बिहार के वे असर के आंकड़ों के मुताबिक फर्जी हैं। उत्तरप्रदेश के ज़िला आजमगढ़ में जब एक युवा ग्राम-प्रधान ने वजीफा देने के लिए कक्षा पांच के छात्रों को बुलाया और अध्यापकों से कहा कि जो-जो बच्चे छात्रवृत्ति ले रहे हैं उनसे रजिस्टर में हस्ताक्षर करवाएं तो बमुश्किल-तमाम चार बच्चों ने हस्ताक्षर किया जबकि अन्य 70 बच्चों ने अंगूठा लगाया। अचंभित प्रधान ने अध्यापकों से जब अंगूठा लगाने का कारण पूछा तब अध्यापकों ने बताया कि ये छात्र लिख नहीं सकते। गहराई में जाने पर पता चला कि राज्य के अफसरों और मंत्री की हिदायत है कि अगर उपस्थिति पूरी नहीं हुयी या छात्र कक्षा में फेल हुए तो अध्यापक का तबादला कर दिया जाएगा। लिहाज़ा उत्तरप्रदेश के अधिकांश भाग में शिक्षक, छात्र आए न आए उपस्थिति दर्ज करते हैं, छात्र को पढ़ाने की कोई ज़रूरत नहीं होती और अगले क्लास में उनका दाखिला हो जाता है।
चूंकि शिक्षा के क्षेत्र में राज्य सरकार की भूमिका बहुत बड़ी है और अभी तक शिक्षा को लेकर जनमत इतना प्रबल नहीं हुआ है कि कि सरकारें उससे प्रभावित हों लिहाज़ा लगातार शिक्षा को लेकर सरकारी उदासीनता बनी हुयी है। यहां तक कि उत्तरप्रदेश और बिहार ऐसे राज्य हैं जो कि अभावग्रस्त के मतों से सरकार में आते हैं, उनके यहां भी यह उदासीनता विकराल रूप से है। असर के सर्वेक्षण में पाया गया कि जहां दक्षिण के तमाम राज्य और उत्तर में बिहार और छत्तीसगढ़ ने कुछ क्षेत्रों में अच्छी प्रगति दिखायी है, वहीं उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश बुरी तरह पिछड़े हैं। 11 से लेकर 14 वर्ष की आयु के बच्चों का स्कूल में दाखिला प्रतिशत उत्तरप्रदेश में सबसे खराब रहा है। उसी तरह से उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में अभिभावकों का भरोसा सरकारी स्कूलों से इतना उठ चुका है कि वो ग़रीबी के बावजूद बड़े पैमाने पर महंगे प्राइवेट स्कूलों की तरफ भाग रहे हैं।
बीमारू राज्यों में राजस्थान और नए राज्य छत्तीसगढ़ को छोड़कर बिहार, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश क्रमश: सबसे नीचे हैं। मानव विकास सूचकांक 2011 की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार बिहार, मध्यप्रदेश व उत्तरप्रदेश सबसे नीचे क्रमश: 35, 33 व 32वें स्थान पर हैं। 34वें स्थान पर ओडिशा है। दरअसल छत्तीसगढ़ और झारखण्ड तीसवें और इकतीसवें स्थान पर हैं क्योंकि यहां प्राकृतिक संसाधनों को जमकर बेचा जा रहा है जिससे प्रतिव्यक्ति-आय सरकारी दस्तावेजों में बढ़ गयी है। हालांकि इन सभी पांच राज्यों में स्वास्थ्य और शिक्षा बेहद खराब है। उत्तरप्रदेश की सरकार जो कि अपने को गरीबों की मसीहा मानती है, उसने पांच साल वर्ष के शासनकाल में मानव विकास लगभग हर मानदण्ड पर राष्ट्रीय औसत से नीचे रहा है चाहे वह प्रतिव्यक्ति आय हो, साक्षरता हो या स्वास्थ्य संबंधी कारक हों। ऐसा लगता है कि इन राज्यों में केंद्र द्वारा दिए गए फंड का इस्तेमाल सरकारी अमला अपनी जेब भरने में कर रहा है।
हाल ही में सी.ए.जी की एक रिपोर्ट में पता चला है कि बिहार, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में मरे हुए लोगों को रोज़गार दिया गया है। विश्व भूख सूचकांक की एक अन्य ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश बेहद गरीब अफ्रीकी देशों से भी बदतर स्थिति में हैं और इसको बेहद चिंतनीय वर्ग में रखा गया है। अभी हाल ही में बिहार में लड़कियों को साइकिल देने की योजना का राज खुला और पाया गया कि कटिहार, शिवहर, रोहतास सरीखे ज़िलों में एक-एक लड़की के नाम पर दो से तीन साइकिलों की धनराशि निकाली जा चुकी है और जांच में उनके पिता और घर का पता नहीं मिल रहा है। मिड-डे मील योजना की जांच करने पर पता चला कि माननीय गुरु जी लोगों ने उपस्थिति रजिस्टर में छात्रों की उपस्थिति शत-प्रतिशत दिखायी है, जबकि बच्चों की वास्तविक उपस्थिति एक-चौथाई ही है। वहीं मिड-डे मील का तीन-चौथाई खुद खा गए हैं। केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित सर्वशिक्षा अभियान के तहत बिहार के 380 प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालयों का तीसरी पार्टियों से निरीक्षण कराया गया, जिसमें 350 में गड़बड़ियां पायी गयीं। असर व अन्य संस्थाओं की जांच में उत्तरप्रदेश में भी कमोबेश इसी तरह की स्थिति पायी गयी। ध्यान रहे कि बिहार में नीतीश कुमार को जबर्दस्त वोट इन्हीं योजनाओं के आधार पर मिले थे।
‘बीमारू’ राज्यों खास करके यू.पी, बिहार व मध्यप्रदेश में अगर कोई क्रांतिकारी कदम नहीं उठाया गया तो अगले दस साल बाद जो नयी पीढ़ी आएगी व न तो रोज़गार की होड़ में आगे होगी न स्वास्थ्य के स्तर पर बेहतर होगी। इन राज्यों में भ्रष्टाचार भी अपने चरम पर है। दुष्यन्त कुमार का शेर याद आता है-
सिर से सीने में कहीं, पेट से पांवों में कभी,
एक जगह हो तो कहें, दर्द इधर होता है।
लेखक एनके सिंह वरिष्ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्लॉग पोस्टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. यह लेख आज के दैनिक भास्कर में भी प्रकाशित हो चुका है.