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आशुतोष महाराज के शिखंडी चेले को जवाबी पत्र

यशवंत भाई, मजा आ गया, आज किसी भड़ासी ने अपने दिल का गुब्‍बार आपके पोर्टल पर उड़ेल दिया। अच्छा ही किया आपने कि उसकी भड़ास मुझ तक यानी आलोक पाण्डेय तक पहुंचा दी, अन्यथा बेचारा क्या पता अपना फ्रस्टेशन कहां निकालता। ‘कई तीरंदाजों ने रची आशुतोष को आज समाज से हटाने की साजिश, फेल हुए’ इस शीर्षक के साथ प्रकाशित भड़ास प्रथम दृष्टया प्रतीत होती है कि आशुतोष महाराज ने खुद ही गढ़ी है। कारण कई हैं, जैसे लेखक महोदय घोषित करते हैं कि वह आज समाज के शुरुआती दिनों में आज समाज का हिस्सा थे और डेढ़ बरस तक बने रहे।

जाहिर है कि आशुतोष महाराज के यह स्वयंभू चम्मच मेरे आज समाज-अंबाला पहुंचने से पहले विदा हो चुके थे। बावजूद इसके उन्हें मेरे क्रिया-कलापों के बारे में इतनी ज्यादा जानकारी है, वाकई कमाल है। फिर भी लेखक ने खुद को शिखंडी साबित करते हुए नाम देने से परहेज किया है तो मैं मान लेता हूं यह नामर्द छिपकर हमला करने में ही यकीन करता है। बहरहाल मैं हरफनमौला हूं तो कलेजा भी बड़ा रखता हूं। इसी नाते खुलकर जवाब देने को आगे आया। प्यारे पाखंडी तुमने लिखा कि आज समाज का सारा दारोमदार सिर्फ रवीन ठुकराल और आशुतोष के कंधे पर है। रवीन जी तो काबिल हैं, लेकिन आशुतोष की बुनियाद सिर्फ झूठ और मक्कारी पर टिकी है। टिटपुंजिया अखबारों में चाटुकारिता करते हुए नौकरी करने वाले इस शख्स को सतीश कुमार ही दैनिक भास्कर लेकर गए थे और वहां से आज समाज लेकर आए। अव्वल तो इसने फर्जी सेलरी स्लिप लेकर यहां तनख्वाह 18 हजार रुपए लगवाने में कामयाबी हासिल की, और इसी फर्जीवाड़े के जरिए सब एडिटर से सीधे चीफ सब एडिटर बन बैठा। अहसानफरामोशी की पराकाष्ठा देखिये आशुतोष अपनी तरक्की के चक्कर में आज समाज में लाने वाले दोस्त सतीश कुमार को डैमेज करने लगा। पत्तेचाटी के जरिए प्रमोशन हथिया लिया और सतीश को फर्जी शिकायत के जरिए रवीन जी की नजरों में खलनायक बना दिया।

बहरहाल, आशुतोष ही आज समाज का दारोमदार संभाले है तो वहां बैठे बाकी लोग क्या बेकार हैं। वैसे यह दावा तो आशुतोष महाराज अक्सर ही करते रहते हैं कि वह अकेले ही अखबार निकाल लेंगे। पाखंडी चमचे, अजय शुक्ल जैसे काबिल व्यक्ति के लिए तुमने लिखा कि उन्हें सिर्फ आशुतोष ही टांगकर रख सके। क्या भूल गए कि आशुतोष जब चंडीगढ़ देखता था तो इसकी हरकतों से तंग होकर रवीन जी ने इसे फीचर डेस्क पर भेज दिया था। समझ में नहीं आया कि तुमने यह बात क्यों छिपाई। दरअसल जी-मेल चैटिंग के जरिए कुछेक आला अफसरों को एक-एक पल की रिपोर्ट अपने मन-मुताबिक देकर आशुतोष प्रबंधन का करीबी बना रहा। इसी मुखबिरी को हथियार बनाकर आशुतोष ने खुद का बहुत फायदा किया। मेरे को तो अंबाला पहुंचे 7 दिन ही हुए थे, आशुतोष को मेरे से अपनी कुर्सी हिलती दिखने लगी तो मेरे खिलाफ भी मेल-मेल खेलने लगा। फर्जी शिकायतों और बात का बतंगड़ बनाकर परोसने की इंतहा हो गई तो आला अफसरों के सामने तथ्य रखते हुए इसका भेद खोल दिया। अफसरों ने देखा कि पीठ पीछे आशुतोष उन्हें भी गालियां बकता है तो किनारा कर लिया। आशुतोष महाराज को अपनी दुकान में ताला लगता दिखा तो लगे अंट-शंट बकने। जिन अफसरों को पल-पल की खार बताते थे, उन्हीं को खामख्वाह बताने लगे। प्रिय पाखंडी ऐसे पलटू है तुम्हारे आशुतोष महाराज।

यार, तुम्हारी समझदानी पर तरस आया है। तुम लिखते हो कि जैसे मैं हिन्दुस्तान - जमशेदपुर से भगाया गया, वैसे ही आज समाज से भगाया गया। कुछ लाइनों के बाद लिखते हो कि अच्छा यह हुआ कि जनाब पाण्डेय जी भाग निकले, वरना सस्पेंड तो किया ही जाना था। भाई एक तरफ तो लिखते हो कि भगाया गया और फिर बताते हो कि खुद भाग निकले। वाकई जबरदस्त कन्फ्यूज हो, बिल्कुल अपने गुरुघंटाल आशुतोष की तरह। प्यारे तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूं कि आज तक मैंने नौकरियां छोड़ी ही हैं। आशुतोष के चेले, तुमने लिखा कि अंबाला में यूपी के पंडितों की फौज काम कर रही थी, अब चंद पंडित बचे हैं। तो प्यारे, काबिलियत जहां रहती है-दमकती है। ब आशुतोष को काबिल सब एडिटर नहीं मिल रहे हैं तो विभिन्न अखबारों के आपरेटरों को सब एडिटर बनाकर भर्ती कर रहा है। तुम्हारा गुरु परेशान है, जल्दी करो, जहां भी हो, नौकरी छोड़ो और तुरंत अंबाला पहुंचकर आज समाज में चार चांद लगाने में आशुतोष की मदद करो। यह एक चेले का नैतिक कर्तव्य भी है।

एक बात तो भूल ही गया कि जा तुम आज समाज में काम कर रहे थे और भविष्य का संपादक तुम्हारे सामने था तो भला तुमने आज समाज क्यों छोड़ दिया। यूं तो तुम जानते ही होगे, फिर भी नाम छद्म है तो मान लेता हूं कि यह जानकारी तुम्हें नहीं होगी। तुम कहते हो कि तेरा गुरुघंटाल आज समाज का निष्ठावान कार्यकर्ता है, जबकि वह दैनिक जागरण में निशिकांत जी के चरणों में लोटकर नौकरी मांग चुका है। वहां से कंफर्मेशन कॉल आई थी, इत्तेफाक से मेरे ही पास। नतीजा आशुतोष से पूछ लेना। लखनऊ में कैनविज टाइम्स में कार्यरत एक वरिष्ठ सहयोगी और मेरे मित्र के जरिए खबर मिली है महाराज ने वहां भी अपना सीवी भेजा है। खुद को काबिल समझने वाले तुम्हारे भविष्यमान संपादक ने इतने बबूल के पेड़ बोये हैं कि लगभग सभी संस्थानों में उनके किस्से आम हैं और शुभचिंतकों की भरमार। इस आधार पर विश्वास है कि लखनऊ में भी दाल नहीं गलेगी।

अंतिम बात। महाराज का चरित्र। भर्ती मेला में लड़कियों को भर्ती करने के बाद तुम्हारे महाराज ने मुझे बताया था कि अमुक कन्या शादीशुदा मर्दों को खुश करती है। फीचर डेस्क की एक महिला के लिए खुद तमाम किस्से सुनाते थे। पूर्व में संस्थान में काम करने वाली एक कन्या के घर चाय पीने के बहाने अक्सर पहुंच जाते थे। एक दिन मकान मालिक ने बेइज्जत करते हुए भगा दिया तो उस गली में जाने से डरने लगे। मेरे साथ नए मकान की तलाश में उधर पहुंच गए तो उस मकान के सामने से भाग खड़े हुए। बाद में असली बात तो कुछ दबाते-छिपाते हुए बताई। अगले दिन मैं खुद मकान मालिक से मिला तो पूरी सच्चाई सामने आई। प्रिय शिखंडी, तुम्हारे महाराज के किस्से और भी हैं। पहली शादी से लेकर दूसरी तक पहुंचने के, लेकिन मैं व्यक्तिगत जिंदगी में झांकना नहीं चाहता। अगर ज्यादा इच्छुक हो तो मुझे गोंडा जिले के परसपुर पोस्ट के चिरहुआं गांव तक पहुंचने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। अभी तक के लिए इतना ही.

तुम्हारा ही

आलोक पाण्डेय

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