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Satyendra PS : महंत आदित्यनाथ। शपथ ग्रहण के बाद यूपी के मुख्यमंत्री हो जाएंगे। यूपी के मुख्यमंत्री से मतलब मिनी प्रधानमंत्री। नरेंद्र मोदी द्वारा महंत को मुख्यमंत्री बनाना वास्तव में बहुत साहसिक कार्य है। इस साहस के लिए कॉमरेड मोदी को लाल सलाम। आदित्यनाथ उस दौर के हैं जो पीढ़ी Uday Prakash की पीली छतरी वाली लड़की पढ़कर बढ़ रही थी। मेरे लिए तो खुशी की बात है कि आदित्यनाथ भी उदय प्रकाश के न सिर्फ अच्छे पाठक रहे हैं, बल्कि उनको कई कहानियां और कविताएं याद थीं। साथ ही यह भी खुशी है कि लंबे समय से शीर्ष राजनीति से वंचित गोरखपुर को फिर एक शीर्ष नेता मिला है। उम्मीद की जाए कि उस इलाके की तकदीर और तस्वीर बदलेगी।

उदय प्रकाश जब गोरखपुर में अपने रिश्तेदार की याद में आयोजित कार्यक्रम में गए थे और आदित्यनाथ के साथ मंच साझा किया था तो उस समय बड़ा बवाल हुआ था। आदित्यनाथ ने उदय प्रकाश की कहानियों व कविताओं का कई मौकों पर उल्लेख किया। इसके चलते उदय प्रकाश को दक्षिणपंथी और जाने क्या क्या घोषित किया गया था। कथित और असली तमाम मतलब ढाई सौ से ऊपर वामपंथियों ने हस्ताक्षर अभियान चलाया था कि उन्होंने कैसे योगी के साथ मंच साझा किया? उदय प्रकाश को खूब गरियाया गया...

है न मजेदार!!

महंत आदित्यनाथ को दक्खिन टोले के धुर आलोचक की ओर से ढेरों शुभकामनाएं। उम्मीद है कि वह पूर्वांचल की गरीबी मिटाने और पूरे प्रदेश को एक बेहतर मुकाम देने में सफल होंगे और भाजपा को मिले प्रचंड जनादेश का लाभ उठाते हुए जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरेंगे।

बिजनेस स्टैंडर्ड हिंदी, दिल्ली में कार्यरत पत्रकार सत्येंद्र प्रताप सिंह की एफबी वॉल से. इस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं...

Saurabh Pandey उसी 'बदनामी' के कारण सम्मान वापसी का कु/सु चक्र रचा और चला गया था। उसे भी नयनतारा हथिया ली थी..

Satyendra PS जिन लोगों ने हस्ताक्षर अभियान चलाए थे, वह साहित्य क्षेत्र की एक गिरोह है. उनको कोई गलतफहमी नहीं थी. उदय़ जी ने कलबुर्गी की हत्या के विरोध में साहित्य अकादमी लौटाया तब भी बाकायदा इस गिरोह के कुछ सदस्यों ने अभियान चलाता था। लेकिन जो लोग गिरोहबंदी से हटकर उदय जी को व्यक्तिगत जानते हैं, वह उनकी भावनाओं को समझते हैं.

Saurabh Pandey सम्मान लौटाने वाले पहले लेखक कवि उदय प्रकाश ही थे। चाहे जिस नाम से लौटाए हों। वो योगी के साथ मंच साझा करने का प्रायश्चित ही था। बाद में ये दूसरे रूप में प्रचार पा गया

Satyendra PS मुझे उस समय का आपका स्टैंड नहीं पता था Saurabh Pandey जी। अभी भी मैं गैर साहित्यिक आदमी हूं. साहित्य थोड़ा बहुत समझ मे आ भी जाए तो कविता फविता तो बिल्कुल समझ में नहीं आती है। बकिया हमें आज तक समझ में न आया कि उदय जी का अपने रिश्तेदार की बरखी में जाना बुरा था, या योगी आदित्यनाथ वहां आए थे, वह बुरा था। या आदित्यनाथ का उदय प्रकाश के लेखन का प्रशंसक होना वामपंथी बंधुओं को नागवार गुजरा था. साहित्यकार और वामपंथी लोगों को दर्द किधर से उठा था. यह आज तक समझ में न आया.

Satyendra PS मने हम अपने वामपंथी साथियों से जानना चाहेंगे कि पुरस्कार लौटाना अगर उदय जी का प्रायश्चित था तो वह पूरी तरह पाप मुक्त हुए हैं या उनको काशी ले जाया जाए। अब वामपंथी भाइयों के इतना चिढ़ने और दक्खिन टोला वाले भाइयो के उदय प्रकाश का प्रशंसक होने से कुछ कुछ हम्मै भी संदेह होता है. दक्खिन टोला वाले तमाम लोग उदय प्रकाश की कहानियों के प्रशंसक हैं. एक रोज मैंने कहा कि आप अपने किताब के पहले पेज पर डिस्क्लेमर छपवाइए कि दक्खिन टोले वाले लोग इस किताब को न पढ़ें, लेकिन उदय जी कहते हैं कि किसी को पढ़ने से रोकना कहां का न्याव है.

Amit Pandey वो सिर्फ लेखक हैं। कोई भी पंथी नहीं हैं।

Satyendra PS मुझे भी कुछ ऐसा लगता है अमित जी. लेकिन साहित्यकार लोग जब कुछ कुछ कहते हैं तो कुछ कुछ गड़बड़ लगने लगता है अचानक. और आप शायद इससे वाकिफ नहीं हैं. आदित्यनाथ से मंच साझा करने के कारण उनके खिलाफ जबरदस्त अभियान चलाया गया। उसके कई साल बाद जब उन्होंने कलबुर्गी की हत्या के विरोध में पुरस्कार लौटाने की घोषणा की तो वामपंथी भाई लोगों ने नए सिरे से अभियान चलाया कि आदित्यनाथ के साथ बैठक र उन्होंने जो पाप किया था, पुरस्कार लौटाकर उसका प्रायश्चित कर रहे हैं.

Shashi Bhooshan आप पत्रकार हैं। भूत भले न जानें भविष्य बेहतर समझते हैं। अब सम्मान के लायक अवस्था में भी पहुँच चुके हैं। लेकिन जाने क्यों मुझे लगता है आपने यह संस्मरण लिखकर अच्छा नहीं किया। या पता नहीं आपने यह संस्मरण लिखने का इंतज़ार ही किया हो। कुछ भी हो सकता है। आज आदमी अपनी विवेचना के साथ कहीं तक जा सकता है।

Bhoot Nath भाय जी योगी से नाल जोड़नी है तो सीधे जोड़िये. उदय को बहाना मत बनाइये. बाकी आपने यह मजेदार कहा कि योगी को उदय प्रकाश की कहानियां याद हैं? किसने बताया योगी ने? गजब है भई. वैसे देश में बढ़ती सांप्रदायिकता व फासीवाद के लिए चिंतित उदय जी ने कुछ लिखा की नहीं योगी भाई के सीएम बनने पर!

Satyendra PS महंत आदित्यनाथ का मुख्यमंत्री बनना यूपी के इतिहास की एक अनोखी परिघटना है Shashi Bhooshan ji. उदय जी का उनके साथ मंच साझा करने के बाद उठे तूफान को भी अनोखा माना जा सकता है। वह क्यों हुआ कैसे हुआ किसने किया कैसे गिरोहबंदी हुई सब कुछ अजीब था। उस पर चर्चा एक स्वाभाविक सी बात है।

Satyendra PS योगी को उदय प्रकाश की कहानियां याद थीं, यह लिखा मैंने Bhoot Nath ji. अब का पता नहीं। यह उन दिनों छपी खबरों से और अपने वामपंथी साथियों की सुलगन से पता चला था, वरना आदित्यनाथ को मैं साइंस का विद्यार्थी ही मानता था जो कुसंगत में पड़ गया हो। मेरा ऑब्जर्वेशन रहा है कि साइंस स्ट्रीम वाले कट्टर होते हैं चाहे वह वामी हो या दक्खिन टोले का। नाल जोड़ने वाली बात आपने बहुत महत्त्वपूर्ण कही। गोरखपुर में मैंने बमुश्किल 6 माह काम किया है और उस दौरान 10 मुलाकातें हुई होंगी। वो भी प्रोफेशनल। दिल्ली में आने के बाद मैं अपने काम में लग गया। वो अपने काम में लगे ही थे। दूसरे तरीके से जरूर नाल जुड़ा हुआ है। गोरखपुर में मेरे 90% रिश्तेदार, परिजन आदित्यनाथ से जुड़े हैं। सब अब बम बम हैं। उस साइड से मैं चाहकर भी कभी नाल तोड़ न पाया!

Satyendra PS हम तो यही उम्मीद करेंगे कि वो अच्छा काम करें। बाकिया नरेंद्र मोदी ने 3 साल में फेंकने के अलावा देश में कुछ भी नही किया। उनके 5 काम भी नही गिनाए जा सकते जो उनकी सरकार के हों और उसका कोई इम्पैक्ट देश या पब्लिक पर सकारात्म क पड़ा हो। बनारस वाले 3 साल से काशी को क्योटो बनने के इन्तजार में हैं। हां, गोरखपुर वालों को उम्मीद है। महज डेढ़ साल के लिए गोरखपुर से वीर बहादुर सिंह सीएम बने थे और उतने ही समय में गोरखपुर जितना चमका था उतना ही आज भी चमक रहा है। कुछ चमक नष्ट भी हुई है। रामगढ़ ताल, नेहरू पार्क, तारा मंडल, इंदिरा पार्क जो भी खूबसूरत दिखे वह सिंह की योजनाएं थीं। हम तो उम्मीद करेंगे कि आदित्यनाथ गोरखपुर मंडल को टूरिस्ट हब के रूप में डेवलप करें जिसमे देशी विदेशी पर्यटक गोरखपुर में ठहरें। वहां रामगढ़ ताल में दिन भर बोटिंग, उसके अगले बगल विकसित दिव्य मार्केट में लोकल शॉपिंग करें। बखिरा झील में एक दिन प्रवासी पक्षियों को देखने में बिताने के साथ नौकायन और बोट में कुछ नाइट स्टे टाइप करें। वहां से लुम्बिनी घूमने जाएं। लुम्बिनी से पोखरा नेपाल के हिल स्टेशन का आनन्द लें। और गोरखपुर लौटकर आएं तो बुद्ध स्थल कुशीनगर में एक दिन बिताकर घर के लिए फ्लाइट पकड़ें। यह पूरी तरह 5 दिन का पॅकेज हो सकता है जो गोरखपुर मंडल की तस्वीर बदल देगा। यह इंफ्रा डेवलप में महज 6 महीने लगेंगे। साथ ही गोरखपुर के लिए अब सस्ती विमान सेवा भी शुरू हो जाएगी जिससे आफ सीजन में फ्लाइट से हम लोग भी घर जा सकेंगे। रेल तो प्रभु जी खा ही गए 2 साल में। हम तो अच्छे की ही उम्मीद करेंगे। हेल्थ, एजुकेशन में भी बहुत कुछ साल भर में करके पूर्वांचल को डेवलपमेंट मॉडल बनाया जा सकता है।

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