भाग 9 : 1 दिसम्बर, 1983 को नौनिहाल ने बेगम पुल पर आबू लेन के नाले के पास मुझे सर्दी से ठिठुरते हुए मेरठ की जन समस्याओं पर कॉलम शुरू करने को कहा था। मजे की बात ये है कि 'मेरठ समाचार' में वे महज एक उप संपादक थे। फिर भी अखबार के संपादक और मालिक राजेन्द्र अग्रवाल ने उन्हें अखबार की सामग्री के बारे में हर फैसला करने की छूट दे रखी थी। तो मैं ठीक 48 घंटे बाद पहली किस्त लिखकर उनके पास पहुंच गया। यानी तीन दिसंबर, 1983 को। यह किस्त मेरठ की आवास समस्या पर थी। नौनिहाल ने पढ़ा। कई बार पढ़ा। उसमें काफी करेक्शन किये। हैडिंग दिया- 'मेरठ में आवास समस्या का निदान संभव'
यह कॉलम 5 दिसंबर, 1983 को छपा। अंदर के पेज पर। लेकिन इस कॉलम का इंट्रो नौनिहाल ने पहले पेज पर बॉक्स में छापा- ''मेरठ महानगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख नगर है। राजधानी के निकट होने से भी यह नगर महत्वपूर्ण है। प्रत्येक महत्वपूर्ण नगर की समस्याएं भी अधिक होती हैं। जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ मेरठ महानगर की समस्याओं में भी वृद्धि हुई है। आज नगरवासी जो समस्याएं अनुभव करते हैं, उन्हें प्रस्तुत करने के लिए 'मेरठ समाचार' एक नया स्तम्भ 'जन समस्या' आरंभ कर रहा है। इस श्रंखला में नवोदित लेखक एवं पत्रकार श्री भुवेन्द्र त्यागी 'मेरठ समाचार' के पाठकों को नगर की प्रमुख समस्याओं से अवगत करायेंगे। आपकी समस्याएं भी आमंत्रित हैं।''
वैसे तो मैं कई महीने से फोकटिया रिपोर्टिंग कर रहा था, पर इस कॉलम की पहली किस्त छपते ही मैं मेरठ में स्टार बन गया। अगले ही दिन मुझे एन. ए. एस. कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. शर्मा ने क्लास में चपरासी भेजकर मुझे अपने ऑफिस में बुलाया। शाबासी दी। मैंने कहा, 'सर, ये सब मेरे गुरु नौनिहाल की कृपा है। उन्होंने मुझे न सिर्फ यह कॉलम लिखने का मौका दिया, बल्कि इसके लिए महत्वपूर्ण सुझाव भी दिये।'
डॉ. शर्मा ने कहा, 'मेरी ओर से नौनिहाल जी को बधाई देना।'
'सर, आप लिखकर दे दें, तो आपकी प्रतिक्रिया छापने में नौनिहाल जी को बहुत खुशी होगी', मैंने अनुरोध किया।
और उन्होंने तुरंत एक कागज पर प्रतिक्रिया लिखकर दे दी। मैंने जाकर वह नौनिहाल को दे दी। वे वाकई खुश हो गये।
'अच्छा काम करने का यही संतोष होता है। अब ये कॉलम तुझे लिखने में और मुझे छापने में और भी मजा आयेगा', उन्होंने कहा।
नौनिहाल ने इस कॉलम की प्रतिक्रियाओं का भी एक कॉलम 'मेरी आवाज सुनो' संपादकीय पेज पर शुरू किया। पहली प्रतिक्रिया डॉ. शर्मा की छपी। फिर तो हर कॉलम के बारे में दर्जनों पत्र आने लगे। कॉलम से ज्यादा मशहूर उस पर प्रतिक्रियाओं का कॉलम हो गया। उन पत्र लेखकों में से भी कई को नौनिहाल ने बाद में पत्रकार बना दिया। आज ब्रांडिंग और को-ब्रांडिंग का जमाना है। नौनिहाल ने आज से 27 साल पहले मेरठ के छोटे से अखबार में इसे कर दिखाया था। आज के एमबीए ब्रांड मैनेजर भी शायद इतना ओरिजनल कांसेप्ट ना दे पायें।
'मेरठ समाचार' में 5 दिसंबर 1983 से 31 मार्च 1984 तक छपे इस कॉलम ने मेरठ के सुस्त से पत्रकारिता-जगत में हलचल शुरू कर दी। कुछ महीने बाद दिल्ली के दो प्रमुख अखबारों 'नवभारत टाइम्स' और 'हिन्दुस्तान' ने इसी कांसेप्ट पर शहरों पर आधारित कॉलम शुरू किये। मुझे वे दिखाकर नौनिहाल ने कहा, 'जो पहले मारे वो मीर।'
आवास के बाद अन्य समस्याओं पर छपे कॉलम इस प्रकार थे-
जल समस्या - तेरे कूचे में आये हैं पानी तो पिला दे जालिम (12 दिसंबर, 1983)
प्रदूषण समस्या - बना दे तू बढिय़ा यहां की फिजा (21 दिसंबर, 1983)
सफाई समस्या - सफाई विभाग की सफाई की जरूरत (6 जनवरी, 1984)
बिजली समस्या - ये बिजली वाले क्यों लगाते हैं करंट (12 जनवरी, 1984)
डाक समस्या - डाक विभाग खुद ही हो गया है बैरंग (3 फरवरी, 1984)
बैंक समस्या - बैंक वालो फलो-फूलो, पर जनता को मत भूलो (21 फरवरी, 1984)
राशन समस्या - मुंह लटकाये लोग वापस लौटते (28 फरवरी, 1984)
टेलीफोन समस्या - टेलीफोन तारों का जाल बना जी का जंजाल (17 मार्च, 1984)
ट्रैफिक समस्या - लाल-हरी बत्ती की परवाह नहीं किसी को रत्ती (31 मार्च, 1984)
आखिरी किस्त के दो दिन बाद यानी 2 अप्रैल, 1984 को नौनिहाल ने कॉलम के बारे में पाठकों से मिले प्रतिसाद का धन्यवाद छापा। इस बीच एक बड़ी सफलता हमें मिली। 'मेरठ समाचार' का सर्कुलेशन 5 दिसंबर, 1983 को सात हजार था। यह 31 मार्च, 1984 को बढ़कर दस हजार हो गया। यानी चार महीने में सर्कुलेशन 50 फीसदी बढ़ गया था। नौनिहाल ने इससे खुश होकर मुझे एक बॉल पैन दिया। नौनिहाल को पैनों का बहुत शौक था। उनके पास 300 से ज्यादा पैन थे। अगर वे किसी से खुश हो जाते, तो उसे पैन भेंट कर देते। लेकिन अगर उन्हें किसी का पैन पसंद आ जाता, तो उसके पास वह पैन छोड़ते भी नहीं थे। इसमें छोटे से सैल वाली इलेक्ट्रॉनिक घड़ी भी थी। यह उनका सबसे प्यारा पैन था। इस तरह नौनिहाल से इनाम में मिले कुल दस पैन आज भी मेरे पास हैं। सभी मैंने संभाल कर रखे हैं।
... लेकिन वो पहला इनामी पैन मेरे लिए सबसे खास है। मैं जीवन में कोई अंधविश्वास नहीं मानता। एक को छोड़कर... जब भी मुझे कोई महत्वपूर्ण लेखन करना होता है या किसी खास दस्तावेज पर दस्तखत करने होते हैं, तो मैं आज भी उसी पैन से करता हूं... पिछले 27 साल से मेरे लिए दुनिया में सबसे कीमती चीज यही पैन है!
लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है। वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है।

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