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चेन्नई : मीडिया पर नियंत्रण की चौतरफा मांगों के बीच पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा ने कहा है कि इससे अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। जस्टिस वर्मा ने मीडिया पर सरकारी नियमन की संभावना को सबसे बदतर स्थिति करार दिया। न्यूज ब्राडकास्टिंग स्टैंडर्डस अथॉरिटी (एनबीएसए) के चेयरमैन वर्मा ने फिक्की द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में कंटेंट रेगुलेशन विषय पर बोलते हुए यह बात कही। वर्मा ने आगाह किया कि बगैर बाहरी दखल के प्रेस की आजादी बनी रहना जरूरी है जिससे मीडिया में भागीदारी सुनिश्चित रहे।
उन्होंने कहा कि नियमन की कवायद को देखते हुए मीडिया प्रेस की आजादी को मिल रही सबसे कठिन चुनौती से जूझ रहा है जो अंतत: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असर डालेगा। स्वनियमन की वकालत करते हुए जस्टिस वर्मा ने कहा कि अगर सरकार दखल देकर मीडिया के नियमन का काम करेगी तो इससे बदतर स्थिति कुछ और नहीं हो सकती। केंद्रीय मंत्री शरद पवार को पड़े तमाचे की घटना का जिक्र करते हुए वर्मा ने कहा कि उन्हें सिर्फ एक तमाचा पड़ा मगर टीवी में उन्हें कितनी बार थप्पड़ मारे गए। क्या यह सनसनी नहीं है। मीडिया ट्रायल पर उन्होंने कहा कि जो कुछ अदालतों में होता है उससे कहीं ज्यादा स्टूडियो में बैठे बैठे हो रहा है। उन्होंने न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने की वकालत की लेकिन जजों की जवाबदेही की हिमायत की। उन्होंने कहा कि मीडिया को पूर्वाग्रहों से दूर रहकर खबरों को जनता के सामने पेश करना चाहिए। साभार : एजेंसी