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  • #IndiaTvExposed : अजीत अंजुम जी, चोर की दाढ़ी में तिनका इसी को कहते हैं!

    इंडिया टीवी का इतनी जल्दी डिफेंस मोड में आ जाना चौंकाने वाला है...

    Sanjaya Kumar Singh : इंडिया टीवी #IndiaTvExposed से डिफेंस मोड में क्यों है? मुझे कथित अभियान, साजिश की सूचना संपादक अजीत अंजुम की पोस्ट से मिली। इमरान शेख की चिट्ठी में एक सर्वज्ञात और सबसे साधारण (आज कल के हिसाब से) आरोप के अलावा कोई खास बात नहीं है। अभी तो उसने प्रधानमंत्री से मिलकर सारी बात बताने के लिए समय भर मांगा है। मुझे नहीं लगता कि किसी विशेष संबंध या कारण के इमरान शेख को प्रधानमंत्री से मिलने का समय मिल पाएगा। फिर भी इंडिया टीवी का इतनी जल्दी डिफेंस मोड में आ जाना चौंकाने वाला है। चोर की दाढ़ी में तिनका इसी को कहते हैं।

  • 'आप' सिद्धू को सीएम का चेहरा बना रही तो इससे उसकी दरिद्रता ज़ाहिर होती है : ओम थानवी

    Om Thanvi : क्या आप पार्टी सचमुच नवजोत सिद्धू को पंजाब में मुख्यमंत्री का चेहरा बना रही है? अगर ऐसा है तो इससे आप पार्टी की दरिद्रता ही ज़ाहिर होती है। जैसा कि सुनते हैं, पंजाब में पार्टी की ज़बरदस्त साख पहले ही क़ायम हो चुकी है। फिर सिद्धू उसे क्या भोगने आ रहे हैं? 'आप' भ्रष्टाचार, अपराध और हिंसा से दूर रहते हुए पनपी पार्टी है। जबकि सिद्धू हिंसा के ऐसे मामले में शामिल रहे हैं, जिसमें उनके ही शहर के एक नागरिक को जान से हाथ धोना पड़ा था।

  • 'जनसत्ता' जिस हाल में निकल रहा है उसमें यही समझना मुश्किल हो गया है कि निकल किस लिए रहा है!

    Sanjaya Kumar Singh : जनसत्ता एक अच्छा अखबार था और जब खराब होना शुरू हुआ तो लगातार खराब होता गया। उसका कोई ग्राफ नहीं बना। कुंए में (गड्ढे) में जाती बाल्टी की तरह सीधी रेखा बनती जा रही है। मैं समझ रहा था कि बाल्टी मराठवाड़ा के किसी कुंए में छोड़ दी गई है पड़ी हुई है। लेकिन अच्छे अखबार के पाठक भी अच्छे होते हैं और बता देते हैं कि जनसत्ता आज कैसे और नीचे गया। एक दिन मैं भी लिखने बैठा था तो लगा कहां दीवार पर सिर मारूं।

  • 'जी न्यूज' के पक्ष में प्रदर्शन! सुधीर चौधरी हुए खुश, देखें तस्वीर

     

    Sanjaya Kumar Singh : ज़ी न्यूज कार्यालय के बाहर इन युवकों ने ज़ी न्यूज की खबरों से एकजुटता दिखाते हुए प्रदर्शन किया और इसे जी न्यूज के रामनाथ गोयनका पुरस्कार विजेता, संपादक सुधीर चौघरी ने अपने फेसबुक पेज पर लगाया है। कैप्शन लिखा है:

  • 'फ्री सेक्स' का सही हिंदी शब्द 'संभोग' है यानि जो समान रूप से भोगा जाए

    Sanjaya Kumar Singh : फ्रीसेक्स को हिन्दी में गलत समझकर उसपर हल्ला मचाने वालों को नहीं पता है कि क्रिया रूप में सेक्स के लिए हिन्दी में सही शब्द संभोग है। मोटे तौर पर इसका मतलब समान रूप से भोगना हुआ। जिसे गैर हिन्दी भाषी (आप कहना चाहें तो कह लीजिए अंग्रेजी की कम ज्ञानी) ने फ्री सेक्स लिख दिया और हिन्दी के ज्ञानियों ने उसका मतलब लगाया मुफ्त यौन संबंध या उन्मुक्त संबंध। बाकी लोग पूरी बात पढ़े जाने समझे बिना लगे हिन्दी से बलात्कार करने जो नहीं कर सकते थे वे बलात्कार का मजा लेने के लिए पूछते रहे फ्रीसेक्स का मतलब क्या होता है।

  • Arise India Limited : पढ़िए इस नालायक कंपनी की कहानी एक पीड़ित पत्रकार की जुबानी

    Sanjaya Kumar Singh : नाम अराइज Arise India Limited. - लक्षण चिर निद्रा में सोने वाले। मैंने पिछले साल आपकी कंपनी का एक गीजर चैम्पियन 25 लीटर खरीदा था। कुछ ही महीने उपयोग करने का बाद टपकने लगा। इस साल गीजर की जरूरत शुरू हुई तब से शिकायत करने की कोशिश करते हुए जब शिकायत दर्ज करा पाया तो मेकैनिक ने बताया कि टैंक बदलना पड़ेगा। मेरे पास खरीदने की रसीद थी, गारंटी कार्ड उस समय नहीं था। मेकैनिक फिर आने की कहकर गया और लापता रहा। दीवाली की छुट्टी के चक्कर में मैने फोन नहीं किया। फोन मिला तो बताया गया कि मैकेनिक ने कहा है कि मेरे पास गारंटी कार्ड नहीं है – इसलिए मामला खत्म।

  • TH TIGER HOLIDAYS वालों की इस नोटिस से कौन डरेगा!

    Sanjaya Kumar Singh : इन्हें अंग्रेजी तो नहीं ही आती है, हिन्दी आती होती तो हिन्दी में ही लिखते! अगर आप किसी को कोई सेवा प्राप्त करने के लिए पैसे दें और बाद में महसूस करें कि आपको सेवा ठीक नहीं मिली, ठग लिया गया और यह भी कि आप किसी ठग या चोर कंपनी के चक्कर में फंस गए थे तो क्या करेंगे? मेरे ख्याल से सबसे पहले यही कोशिश करेंगे कि अपने सभी मित्रों-परिचितों को बताएंगे कि फलां कंपनी ठीक नहीं है, पैसे लेकर पूरी सेवा नहीं देती है, मैं ठगा जा चुका हूं आदि।

  • अपनी रिपोर्टर पूजा की आड़ क्यों ले रहे हो सुधीर चौधरी, साफ कहो नैतिक जिम्मेदारी मेरी है

    Sanjaya Kumar Singh : गैर-जिम्मेदार रिपोर्टिंग पर एफआईआर हुई तो पढ़िए सुधीर चौधरी का बचाव। संपादक जी कह रहे हैं कि रिपोर्टर पूजा मेहता सिर्फ 25 साल की है। पूजा को ममता बनर्जी की असहिष्णुता झेलना पड़ रहा है जबकि पूजा अपने संपादक की नालायकी झेल रही है। ज़ी न्यूज संतुलित खबरें कर रहा होता तो खिलाफ खबरों पर भी एफआईआर नहीं होती है और संपादकी झाड़ने वाले मौका मिलते ही फंसा दिए जाते हैं - ये कौन नहीं जानता है। पूजा नहीं जानती होगी सुधीर चौधरी को तो पता ही है। अब पूजा की आड़ क्यों ले रहे हो। कहो, नैतिक जिम्मेदारी मेरी है। पूजा का नाम एफआईआर से हटा दिया जाए। पूजा की आड़ में खुद बचने का रास्ता क्यों खोज रहे हो।

  • अब बताओ जनरल वीके सिंह साहब! प्रेस को प्रेस्टीट्यूट बनाने के लिए कौन जिम्मेदार है?

    Sanjaya Kumar Singh : जनरल वीके सिंह ने मीडिया को प्रेसटीट्यूट कहा था तो लोगों को बहुत अच्छा लगा था और अब भी लोग इस विशेषण का उपयोग करते ही हैं। लेकिन अभी जो हालात हैं उसमें मीडिया काम कैसे करे और सूचना कैसे दे? इसपर कोई बोलने वाला नहीं है। मीडिया की अपनी मजबूरियां हैं। फिर भी, कहने की जरूरत नहीं है कि यह स्थिति सरकारी नालायकी के कारण है और मुश्किलों से निपटने का शुतुरमुर्गी तरीका है। जिसतरह वेस्यावृत्ति कोई शौक से नहीं करता उसी तरह संभव है कि मीडिया की भी मजबूरियां हों।

  • अमेरिका में खबरों को बेचने के लिए उन्हें झूठ के आंसुओं से नहीं सींचा जाता

    साथी Sanjay Sinha ने अमेरिका के ट्विन टावर पर हमले की खबर से संबंधित एक टिप्पणी आज सवेरे फेसबुक पर लिखी और पांच घंटे में 400 शेयर 913 लाइक और 274 कमेंट आए। इनमें ज्यादातर सकारात्मक या पक्ष में हैं। टिप्पणी में उसने मुझे भी टैग किया है क्योंकि उन दिनों हिन्दी में ई-मेल तभी संभव था जब दोनों जगह हिन्दी के एक ही फौन्ट हो। संजय अमेरिका से अपनी खबरें मुझे भेजता था और मैं प्रिंटआउट दफ्तर में देता था जिसे दुबारा कंपोज कर जनसत्ता में छापा जाता था। टिप्पणी मेरी वाल पर भी है और अगर आपने पूरी पोस्ट नहीं पढ़ी तो यह हिस्सा पढ़िए...

  • आज लगा कि प्रभाष जी की यादों को संघ ने गोद ले लिया है!

    प्रभाष परंपरा न्यास द्वारा आयोजित कार्यक्रम पर जनसत्ता के कुछ पुराने लोगों की चर्चा.... प्रभाष प्रसंग में नहीं जा सका। अफ़सोस था। फिर फेसबुक पर किसी का लिखा ये पढ़ा और अफ़सोस कम हुआ: "अभी वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद् डॉ. क्लॉड अल्वारेस का 'गणेश और आधुनिक बुद्धिजीवी' विषय पर प्रभाष परंपरा न्यास द्वारा आयोजित कार्यक्रम में व्याख्यान चल रहा है। वे महत्वपूर्ण बात कह रहे हैं, "वैसे तो मेरे परिचय में कहा जाता है कि मैं 'रोमन कैथोलिक' हूं लेकिन रोम से हमारा क्या लेना-देना, वास्तव में मैं 'हिंदू क्रिश्चियन' हूं, क्योंकि मेरे पूर्वज हिंदू थे और मैं मानता हूं कि जो भारत में रहता है वह सब हिंदू है।"

  • आत्महत्या पर उतारू है BSNL

    वैशाली, गाजियाबाद में मेरे पास बीएसएनएल के तीन लैंडलाइन नंबर थे। वैशाली में एयरटेल आने के बाद बीएसएनएल पर निर्भरता कम होती गई और बिल का भुगतान नहीं हुआ। टेलीफोन कटा रहा और कटा ही रह गया। कोई हिसाब नहीं, कोई सूचना नहीं, कोई कार्रवाई नहीं। मैंने मान लिया कि जमा की गई सुरक्षा राशि बीएसएनएल ने रख लिया। सरकारी कंपनी खा गई। मैंने भी छोड़ दिया। वास्तविकता चाहे जो हो।

  • इंडियन एक्सप्रेस का ज़ी न्यूज से विश्व दीपक के इस्तीफे की खबर छापना यानि अंधेरे में एक किरण तो है ही

    मुझे पत्रकारिता का पेशा इसीलिए पसंद है। अपना काम करते रहने के लिए किसी लाला की दुकान की जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि, लालाओं ने स्थिति इतनी विकट कर दी है कि किसी चैनल या अखबार में नौकरी करने के लिए गालियां सुननी पड़ती है जबकि नौकरी छोड़ना इतना आसान नहीं होता है। पर नौकरी छोड़कर कहां कोई इतना कवरेज या समर्थन पाता है। घर-परिवार चलाने के लिए पत्रकारिता के सिद्धांतों से समझौता करके नौकरी करते रहने से अच्छा है पत्रकारिता छोड़कर पैसे ही कमाए जाएं और पैसे कमाने का बंदोबस्त हो या हो जाए तो विशुद्ध (जैसा मन करे) पत्रकारिता की जाए।

  • इसलिए लड़के आत्महत्या नहीं करते, लड़कियां कर लेती हैं

    प्रत्यूशा की मौत के बहाने : मरने वाली लड़की ही क्यों?

    Sanjaya Kumar Singh : मैंने किसानों की आत्महत्या पर नहीं लिखा, डेल्टा मेघवाल की मौत पर भी नहीं लिखा लेकिन प्रत्यूशा बनर्जी की मौत पर लिख रहा हूं। कारण इसी में है फिर भी ना समझ में आए तो उसपर फिर कभी बात कर लेंगे। फिलहाल प्रत्यूशा और उसके जैसी अभिनेत्रियों की मौत के कारणों को समझने की कोशिश करते हैं। जो छोटे शहरों से निकलकर बड़ा काम करती है। शोहरत और पैसा कमाती हैं, सब ठीक-ठाक चल रहा होता है और अचानक पता चलता है कि उसकी मौत हो गई (आत्महत्या कर ली, हत्या हो गई या शीना बोरा की तरह) या गायब हो गई। कारण हर तरह के हैं, होते हैं लेकिन प्रेम संबंध, पति, प्रेमी, आशिक, ब्वायफ्रेंड की भूमिका भी सामने आती है और कुछ मामले खुलते हैं, कुछ नहीं खुलते हैं। मरने वाली बदनाम जरूरी होती है या कर दी जाती है। मीडिया ट्रायल की अलग समस्या है। जो तुरंत बंद होना चाहिए पर वह हमारे हाथ में नहीं है।

  • ईमानदारी के इस पर्व में सबसे ज्यादा नकदी भाजपाइयों के पास पकड़ी गई

    Sanjaya Kumar Singh : भ्रष्टाचार दूर करने और देश में ईमानदारी स्थापित करने के भाजपाई राष्ट्रवादी त्यौहार के 50 दिन जैसे-जैसे पूरे होने के करीब आ रहे हैं इसका क्रूर और असली चेहरा सामने आ रहा है। यह रंगपोत कर चेहरा चमकाने की कोशिश का वीभत्स रूप था। लोगों की जान लेकर भी छवि बनाने का क्रूर खेल। भक्तों और सरकार के हिसाब से ईमानदारी स्थापित हो चुकी है और कालाधन लगभग खत्म हो गया है।

  • ऑफिसियल ट्रिप है, ऐश कीजिए कंपनी के खर्चे पर... कोई पत्रकारिता नहीं है यह सब...

    Sanjaya Kumar Singh : भड़ास पर छपी 'पुण्य प्रसून बाजपेयी, सुप्रिय प्रसाद, राहुल कंवल और दीपक शर्मा कल क्यों जा रहे हैं लखनऊ?' खबर को पढ़कर एक पुरानी घटना याद आ गई। जनसत्ता के लिए जब मेरा चुनाव हुआ उन्हीं दिनों जमशेदपुर से निकलने वाले एक अंग्रेजी अखबार के संवाददाता की हत्या हो गई थी। पत्रकारिता को पेशे के रूप में चुनने से पहले मुझे यह तय करना था कि कितना खतरनाक है यह पेशा। मैंने जमशेदपुर के एक बहुत ही ईमानदार पत्रकार से इस बाबत बात की। उनसे लगभग सीधे पूछा था कि जिस पत्रकार की हत्या हुई उसकी तो कोई खबर मुझे याद नहीं है। दूसरी ओर आप एक से बढ़कर एक खबरें लिखते हैं - क्या आपको डर नहीं लगता धमकी नहीं मिलती।

  • करण थापर ने अरुण शौरी से पूछा- आप मोदी के प्रति इतने कटु इसलिए हैं कि आपको मंत्री नहीं बनाया?

    Sanjaya Kumar Singh : अरुण शौरी और करण थापर की शानदार और दिलचस्प बातचीत। अंत में करण थापर ने पूछा है, क्या आप नरेन्द्र मोदी के प्रति इतने कटु इसलिए हैं कि आप मंत्री बनना चाहते थे और आपको मंत्री नहीं बनाया गया। इसका दिलचस्प जवाब देते हुए अरुण शौरी ने पूछा, हम लोग एक दूसरे को कितने साल से जानते हैं? यही कोई 20-30 साल। चलिए 20 साल। मैं आपसे पूछता हूं, क्या आपको लगता है कि मैं इन लोगों के साथ रह पाता। और फिर हंसते हुए कहते हैं, इस लिहाज से मैं उन्हें दूरदर्शी कहूंगा कि उन्हें पहले से अंदाजा था।

  • कैसे-कैसे मीडिया संस्थान और मीडिया में नौकरी की ये कैसी शर्तें?

    यह कोई प्रयुक्ति पब्लिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी है जो अपने सेवा करार में बताती है कि कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय के तहत पंजीकृत है। यह लोगों को नौकरी पर रखती है तो उनसे "सेवा करार" करती है। इसमें यह नहीं बताया गया है कि सेवा के बदले क्या दिया जाएगा पर यह प्रमुखता से लिखा है कि बांड की तारीख एक साल (12 महीने) नौकरी जरूर करूंगा। यही नहीं, इसमें यह भी लिखा है कि अगर बांड पर दस्तखत करने वाला ऐसा नहीं कर पाया तो उसे एक लाख रुपए बतौर पेनल्टी देना होगा।

  • क्या एनडीटीवी ने मोदी सरकार के दबाव में चिदंबरम का इंटरव्यू नहीं दिखाया?

    Sanjaya Kumar Singh : एनडीटीवी पर कार्रवाई हो, इसकी आड़ में ब्लैकमेल गलत है... एनडीटीवी के खिलाफ कोई वित्तीय मामला है। यह हमेशा से कहा जाता रहा है। एनडीटीवी का स्पष्टीकरण भी आता रहा है। सरकार के खिलाफ मीडिया संस्थानों पर आरोप कोई नई बात नहीं है और सरकार समर्थक माने जाने वाले मीडिया संस्थान पर विपक्षी दल आरोप लगाएं इसमें भी कुछ नया नहीं है। पर भड़ास 4 मीडिया की आठवीं सालगिरह के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी संजय कुमार श्रीवास्तव ने बिना नाम लिए एनडीटीवी का जिक्र किया था और श्रोताओं को यह यकीन दिलाया था कि दाल में कुछ तो काला है। परोक्ष रूप से उनका कहना यही था कि संस्थान में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम का बेनामी निवेश है जिसकी जांच करने से उन्हें रोका गया।

  • घटिया और लचर है प्रधानमंत्री का मीडिया मैनेजमेंट

    Sanjaya Kumar Singh : घटिया और लचर है प्रधानमंत्री का मीडिया मैनेजमेंट... खादी एंड विलेज इंडस्ट्रीज कमीशन की डायरी और कैलेंडर पर महात्मा गांधी की फोटो हटाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फोटो लगाए जाने के सवाल पर भक्त मीडिया ने पता नहीं अधिकारियों की इच्छा या आदेश पर या अपने स्तर पर ही नया पैंतरा लिया है। और, इस मामले में प्रधानमंत्री की छवि को हो सकने वाले नुकसान को धोने की कोशिश है। तर्क वही कि फोटो के उपयोग से पहले प्रधानमंत्री कार्यालय से अनुमति नहीं ली गई थी। यहां, यह खबर जब पहली बार आई थी तो आधिकारिक तौर पर क्या कहा गया था, उल्लेखनीय है। इंडियन एक्सप्रेस की साइट पर मूल खबर के साथ पीएमओ की प्रतिक्रिया भी है और इसका उल्लेख शीर्षक में ही है, "विवाद अनावश्यक है"।