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  • ''जिया इंडिया'' नाम की पत्रिका लांच होने से पहले ही संपादक कृपाशंकर को हटा दिया गया!

    Abhishek Srivastava :  कल नोएडा के श्रमायुक्‍त के पास मैं काफी देर बैठा था। एक से एक कहानियां सुना रहे थे मीडिया संस्‍थानों में शोषण की। अधिकतर से तो हम परिचित ही थे। वे बोले कि टीवी पत्रकारों की हालत तो लेबर से भी खराब है क्‍योंकि वे वर्किंग जर्नलिस्‍ट ऐक्‍ट के दायरे में नहीं आते, लेकिन अपनी सच्‍चाई स्‍वीकारने के बजाय कुछ पत्रकार जो मालिकों को चूना लगाने में लगे रहते हैं, वे इंडस्‍ट्री को और बरबाद कर रहे हैं। जो नए श्रम सुधार आ रहे हैं, उसके बाद स्थिति भयावह होने वाली है। कई दुकानें बंद होने वाली हैं। उनसे बात कर के एक चीज़ यह समझ में आई कि समाचार-दुकानों को बंद करवाने में जितना मालिक का हाथ होता है, उससे कहीं ज्‍यादा मालिक की जेब पर गिद्ध निगाह गड़ाये संपादकों की करतूत काम करती है।

  • 'अभय सिन्हा जैसे घटिया और भ्रष्‍ट लोगों से आनंद कुमार को बचना चाहिए'

    Abhishek Srivastava : कल रात मोबाइल पर एक संदेश आया, ''कृपया स्‍वराज संवाद में योगदान के लिए निमंत्रण स्‍वीकारें, 14 अप्रैल, 10-6 बजे, इफको चौक मेट्रो स्‍टेशन के अतिनिकट। आप को आगे बढ़ाएं। न छोड़ेंगे, न तोड़ेंगे। सुधरेंगे, सुधारेंगे। धन्‍यवाद। आनंद कुमार, अभय सिन्‍हा।'' Prof Anand Kumar के साथ अभय सिन्‍हा का नाम देखकर थोड़ा अचरज हुआ। अभय सिन्‍हा से मेरा और Rajesh Chandra का 2003 में पाला पड़ चुका है। ये तीन सिन्‍हा बंधु हैं।

  • 'आप भी ज्‍यादा बोलोगे और मुसलमानों के पीछे घूमोगे तो अंदर जाओगे, मोदी को मीडिया-वीडिया से डर नहीं लगता'

    Abhishek Srivastava : कुछ देर पहले एक उच्‍च शिक्षा संस्‍थान के दो अधेड़ काउंसलरों से मैं रूबरू था। एक पंजाबी मैडम हैं और एक अवधी सर। बात चल पड़ी अच्‍छे दिनों पर तो मैंने मोदी सरकार की कुछ आलोचना की। सर ने मैडम की ओर देखा और मैडम ने इशारा भांपते हुए कहा, ''अच्‍छे दिन तो आने ही हैं जी... देखा नहीं आपने, कैसे ओबाम्‍मा ने आइएसआइ(एस) को खतम करने की प्रोमिस करी है। बस, अपने यहां भी कुछ ऐसा ही हो जाए...।'' सर ने सर हिलाया, मुस्‍कराए और लंबी सांस छोड़ते हुए बोले, ''हां... सही बात है, ये साले सर पे ही चढ़ गए हैं। कुछ तो करना ही पड़ेगा... क्‍या मैडम?''

  • 'आप' में लवंडई जारी है... : टीवी पर सबा नक़वी का शर्मनाक बचाव और पुण्य प्रसून का विश्वसनीय कटाक्ष...

    Abhishek Srivastava : कोई पत्रकार जब पार्टी बन जाता है तो उसके चेहरे पर डिफेंस की बेचारगी झलकने लगती है। वहीं कभी पार्टी रहा पत्रकार जब अपने पुराने पाले को दूर से देख रहा होता है तो उसके चेहरे पर सच की रेखाएं उभरने लगती हैं। पहले का उदाहरण आज टाइम्‍स नाउ पर प्राइम टाइम पैनल में बैठी सबा नक़वी रहीं तो दूसरे का उदाहरण दस तक में पुण्‍य प्रसून वाजपेयी रहे। सबा ने अरविंद केजरीवाल का जैसे बचाव किया, वह बहुत शर्मनाक था जबकि प्रसून ने कुमार विश्‍वास के स्‍वराज पर दिए बयान को तीन बार दिखाकर पार्टी पर जो कटाक्ष किया, वह ज्‍यादा विश्‍वसनीय लगा। वैसे, दस तक के बैकग्राउंड में जो लिखा था वही पूरी कहानी बताने के लिए काफी था- ''क्रिकेट खत्‍म, खेल शुरू''।

  • 'राय साहब भी कभी संघी नहीं रहे, वे नामवरजी की बहुत कद्र करते हैं'

    Abhishek Srivastava : क. पता है, अगले महीने नामवरजी नब्‍बे साल के हो जाएंगे!
    ख. तो इसमें खास क्‍या है भाई... बहुत लोग नब्‍बे साल के हुए और निपट गए।
    क. अरे, 28 जुलाई को उनका जन्‍मदिन त्रिवेणी सभागार में इंदिरा गांधी राष्‍ट्रीय कला केंद्र की ओर से मनाया जाएगा। मामला ये है...
    ख. हां, तो अच्‍छी बात है... सरकारी संस्‍था को इतने बड़े लेखक का सम्‍मान करना ही चाहिए।

  • 'लाल रंग' में हुड्डा का अभिनय अपनी मिट्टी और भाषा में खिलकर जवान हो गया है

    Abhishek Shrivastava : पहली झलक Randeep Hooda की मुझे आज तक याद है. रीगल में 'D' लगी थी. अपनी-अपनी बिसलेरी लेकर मैं और Vyalok शाम 7 बजे के शो में घुसे. संजोग से मैंने उसी वक्‍त 'सीनियर इंडिया' पत्रिका ज्वाइन की थी. 'D' का विशेष आग्रह इसलिए भी था क्‍योंकि Alok जी ने पहला अंक धमाकेदार निकालने को कहा था। प्‍लान था कि छोटा राजन का इंटरव्‍यू किया जाए। 'D' की रिलीज़ का संदर्भ लेते हुए स्‍टोरी और इंटरव्‍यू जाना था। पहले अंक के आवरण पर छोटा राजन की आदमकद तस्‍वीर के साथ एक्‍सक्‍लूसिव इंटरव्‍यू छपा, लेकिन मेरे लिए खबर ये नहीं थी।

  • 2009 में कांग्रेस जीती थी तो बीजेपी के बड़े नेताओं ने EVM का रोना रोया था, देखें सुबूत

    Abhishek Srivastava : सबसे ऊपर बीजेपी के प्रवक्ता जी वी एल नरसिम्हा राव हैं जिन्हें आप दिन रात टीवी पर देखते हैं। नीचे एक किताब का कवर है जो इन्होंने लिखी है और उस किताब की भूमिका लालकृष्ण आडवाणी ने, जो अब मार्गदर्शक मंडल का हिस्सा हैं पार्टी में।

  • अखिलेश यादव को चेग्‍वारा बताने वाले 'सोशलिस्‍ट फैक्‍टर' के संपादक फ्रैंक हुजूर का अब क्या होगा!

    Abhishek Srivastava : पेड़े कटहर ओठे तेल...! अभी मुख्‍यमंत्री तय हुआ नहीं और जनता सेटिंग-गेटिंग में जुट गई। लखनऊ में मार मची है पत्रकारों की। कोई मनोज सिन्‍हा की उम्‍मीद में डेरा डाले हैं तो कोई राजनाथ रामबदन का बगलगीर होने की फि़राक़ में है। किसी को ज़मीन छ़ुड़वानी है, किसी को ज़मीन लिखवानी है, किसी को विज्ञापन लेना है, किसी को ठेका चाहिए, कोई गैस एजेंसी और पेट्रोल पंप का मारा है तो कोई अपने स्‍कूल की मान्‍यता के लिए छटपटा रहा है।

  • अनुराग कश्यप इस समाज को ज्‍यादा विद्रूप, जघन्‍य, असंवेदी, हिंसक, असहिष्‍णु और मनोविकारी बनाने के लिए याद किए जाएंगे

    Abhishek Srivastava : Raman Raghav 2.0 को अगर उसके दार्शनिक आयाम में समझना हो, तो Slavoj Žižek को पढि़ए। इसे अगर आप कमर्शियल सिनेमा मानकर देखने जा रहे हों तो बीच के मद्धम दृश्‍यों में सोने के लिए तैयार रहिए। इस फिल्‍म में रमन का किरदार Badlapur (film) में लियाक़ के किरदार का एक्‍सटेंशन है। लोकप्रियता के लिहाज से भले ही इसे साइको-थ्रिलर का नाम दिया जा रहा हो, लेकिन यह बुनियादी तौर पर एक राजनीतिक फिल्‍म है जो एक आदतन अपराधी को हमारे समाज में मौजूद तमाम किस्‍म के अपराधियों के ऊपर प्रतिष्‍ठापित करती है। इस हद तक, कि फिल्‍म के अंत में रमन बोधिसत्‍व की भूमिका में आ जाता है- बोधिसत्‍व यानी निर्वाण का वह चरण जहां आपका कुकर्म कोई बुरी छाप नहीं छोड़ता, बल्कि आप दूसरे के कुकर्मों से उनको बरी करने की सलाहियत हासिल कर लेते हैं।

  • अनुशासन के मामले में लखनऊ का सचिवालय अब गोरखनाथ मठ की फ्रेंचाइज़ी बन जाएगा : अभिषेक श्रीवास्तव

    Abhishek Srivastava : 'उत्‍सव के नाम पर उपद्रव नहीं होना चाहिए' - बतौर भावी मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ का यह पहला निर्देश प्रशासन के लिए आया है। रामगोपाल वर्मा की फिल्‍म 'रक्‍तचरित्र-1' का आखिरी सीक्‍वेंस याद करिए जब मुख्‍यमंत्री बनने के बाद रवि ने सभी बाहुबलियों को अपने घर खाने पर बुलाकर ज्ञान दिया था कि जंगल का राजा केवल एक होता है और राजा चूंकि वो है, इसलिए बाकी जानवर अब हुंकारना बंद कर दें। इस हिसाब से सोचिए तो उम्‍मीद बनती है कि अगला निर्देश मुख्‍यमंत्री पद पर शपथ ग्रहण के बाद उन लोगों के लिए आएगा जो प्रशासन को अपनी जेब में रखने का शौक पालते हैं यानी गुंडे, बदमाश और माफिया।

  • अरनब गोस्‍वामी ने अपने शो में Rakesh Sinha को ''आरएसएस का इकलौता सोचने वाला आदमी'' (RSS's only thinking man) कह कर संबोधित किया

    Abhishek Srivastava : टाइम्‍स नाउ के अरनब गोस्‍वामी आज बिहार चुनाव पर अपने शो में Rakesh Sinha को ''आरएसएस का इकलौता सोचने वाला आदमी'' (RSS's only thinking man) कह कर संबोधित कर रहे थे। अरनब शायद एबीपी न्‍यूज़ नहीं देखते, वरना वे इस निष्‍कर्ष पर पहुंचते कि संघ में एक भी आदमी सोचने वाला नहीं है। शाम को जब मुनव्‍वर राणा ने एबीपी के लाइव शो में साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार लौटाया, तब सिन्‍हाजी ने खीझ में कह डाला कि इस पुरस्‍कार वापसी के पीछे प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्‍कृति मंच हैं। अव्‍वल तो उदय प्रकाश से लेकर नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी लगायत तमाम लेखक इनमें से किसी संगठन से नहीं जुड़े हैं।

  • अरुंधती रॉय और दिलीप मंडल से लोग इतना नफरत क्यों करते हैं?

    Abhishek Srivastava : अरुंधती रॉय तीन साल समाधि लगाकर एक उपन्‍यास लिखती रहती हैं, फिर भी लोग उन्‍हें रह-रह कर गरिया देते हैं। दिलीप मंडल फेसबुक स्‍टेटस से ही उत्‍पात मचाए रहते हैं। एक अंग्रेज़ी जगत का वासी और दूसरा हिंदी जगत का। दोनों से लोग बराबर नफ़रत करते हैं। आप नौकरीशुदा मीडियावालों के बीच जाइए और थोड़ा परिष्‍कृत हिंदी में बस दो वाक्‍य बोल दीजिए। फिर देखिए, कैसे 'बुद्धिजीवियों' के प्रति उनकी घृणा तुरंत जुबान पर आ जाएगी। मैं शाम से सोच रहा था कि क्‍या हमारे यहां ही बुद्धिजीवी इतना पोलराइजि़ंग यानी बांटने वाला जीव होता है या कहीं और भी? आखिर 'बुद्धिजीवी' शब्‍द समाज में इतना घृणित क्‍यों बना दिया गया है?

  • आईआईएमसी से निकलते ही होनहार पत्रकार हिमांशु ने 'सही' समय पर 'सही' कदम उठा लिया!

    Abhishek Srivastava : स्‍वागत कीजिए Indian Institute Of Mass Communication(IIMC) से निकले इस होनहार पत्रकार Himanshu Shekhar का, जिसने 'सही' समय पर 'सही' कदम उठाते हुए पूरे साहस के साथ ऐसा काम कर दिखाया है जो अपनी शर्म-लिहाज के कारण ही सही, बड़े-बड़े पुरोधा नहीं कर पा रहे। मैं हमेशा से कहता था कि संस्‍थान में पत्रकारिता के अलावा बाकी सब पढ़ाया जाता है। बस देखते रहिए, और कौन-कौन हिंदू राष्‍ट्र की चौखट पर गिरता है।

  • आवारा पूंजी प्रायोजित साहित्य मेलों में सत्यानंद, विनीत, पुरुषोत्तम, राहुल जैसों का दौड़ पड़ना

    Abhishek Srivastava : आवारा पूंजी प्रायोजित साहित्‍य मेलों की सूची में दो साल पहले जुड़े Kalinga Literary Festival ने इस बार सुब्रमण्‍यम स्‍वामी के उस बयान के कारण ध्‍यान खींचा है कि साहित्‍य को वामपंथ से मुक्‍त होना चाहिए। इस बयान को यदि आप किसी लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्‍सा मान रहे हैं तो गलती कर रहे हैं। ज़रा इस आयोजन के आयोजकों पर भी निगाह डाल लें। सारे मौसेरे भाई एक साथ यहां उपस्थित हैं।

  • आशुतोष के ज्ञान और कुमार विश्वास के आखेट का किस्सा सुना रहे अभिषेक श्रीवास्तव

    Abhishek Srivastava : कुछ महीने पहले आशुतोष गुप्‍ता से मुलाकात हुई थी। आम आदमी वाले। पूर्व पत्रकार। बात होने लगी तो किशन पटनायक का जि़क्र आया। बोले- ''कौन किशन पटनायक? आखिर किशन पटनायक हैं कौन? एक पत्रिका ही तो निकालते थे?'' मैंने कहा भाई साब, ऐसा न कहिए, आप मुझे शर्मिंदा कर रहे हैं। मैंने उन्‍हें गंधमार्दन के ऐतिहासिक आंदोलन की याद दिलाई। इस पर वे बोले- ''अभिषेकजी, ये सब छोटे-छोटे बुलबुले हैं।''

  • उफ्फ... अमर उजाला के अधिकारी ने अपने ग्रामीण पत्रकारों के साथ किया कितना घटिया आचरण, पढ़ें शिकायती पत्र

    ये शिकायती पत्र कई ग्रामीण पत्रकारों ने अपने नाम पहचान और मोबाइल नंबर के साथ संपादक और मालिक को भेजा है. अमर उजाला लखनऊ संस्करण के अधीन आता है फैजाबाद ब्यूरो. यहां ग्रामीण पत्रकारों के साथ बैठक में अमर उजाला के एक अधिकारी ने ग्रामीण पत्रकारों को विज्ञापन लाने के लिए किस तरह दबाव में लिया और कैसे कैसे अपशब्दों का प्रयोग किया गया, यह सब कुछ इस शिकायती पत्र में है.

  • ओम थानवी ने रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव में कुछ लेखकों के जाने को डिफेंड किया!

    Abhishek Srivastava : {''जो बुद्धिजीवी रायपुर में लेखकों के जाने भर को मुद्दा बना रहे हैं, क्या वे बुद्धिजगत में एक किस्म का खापवाद प्रतिपादित नहीं कर रहे?'' - Om Thanvi}...आइए, ज़रा जांचते हैं कि साहित्‍य में खाप कैसे बनता है। आज ओम थानवी ने रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव में कुछ लेखकों के जाने को डिफेंड करते हुए एक स्‍टेटस लिखा। इसे Maitreyi Pushpa और Purushottam Agrawal समेत कुछ लोगों ने साझा किया। यह मोर्चे की पहली पोजीशन है। मोर्चे की दूसरी सीमा पर डटे Vineet Kumar और Prabhat Ranjan ने महोत्‍सव की तस्‍वीर और भाषण पोस्‍ट किए। यह प्रचार मूल्‍य है। मोर्चे की तीसरी पोजीशन जनसत्‍ता में खोली गई जहां Ashok Vajpeyi ने महोत्‍सव में लेखकों को मिली आज़ादी पर एक निरपेक्ष सी दिखने वाली टिप्‍पणी 'कभी-कभार' में की। यह नेतृत्‍व की पोजीशन है, बिलकुल निरपेक्ष और धवलकेशी।

  • केजरीवाल ने छात्रों, मजदूरों, शिक्षकों को पिटवाकर बहुत गलत काम किया है

    Abhishek Srivastava : कल दिल्‍ली सचिवालय के बाहर छात्रों, मजदूरों और शिक्षकों को पिटवाकर, उन पर आपराधिक मुकदमे लगाकर और जेल में डालकर आपने बहुत गलत काम किया है Arvind Kejriwal... मैं आपको निजी तौर पर कायदे का आदमी समझता था। अब ये मत कहिएगा कि दिल्‍ली पुलिस केंद्र के पास है, आपके पास नहीं।

  • ग्राउंड रिपोर्ट : अतुल सक्‍सेना की मौत इसलिए हुई क्‍योंकि लुधियाना जागरण के सारे पत्रकार उनसे पहले ही मर चुके थे

    अतुल सक्‍सेना की मौत इसलिए हुई क्‍योंकि लुधियाना जागरण के सारे पत्रकार उनसे पहले ही मर चुके थे। कल कोई उनके घर नहीं पहुंचा। जो पहुंचे, वे सभी गैर-पत्रकार थे जो खुदकुशी के कगार पर खड़े हैं। एक मशीनमैन बताते हैं कि दो कर्मचारियों का तो सुसाइड नोट फाड़ कर उन लोगों ने जबरन दोनों को उनके गांव भेजा है ताकि उनकी जिंदगी बची रह सके।

    इस मौत में झांकने के लिए एक दरवाज़ा खुला है...

    -अभिषेक श्रीवास्तव-

    कल देर रात लुधियाना से लौटा। जाना बदा था नव करन की मौत का जायज़ा लेने, ले‍किन जाने का सबब बनी परसों शाम हुई एक और मौत- दैनिक जागरण के कर्मचारी अतुल सक्‍सेना की मौत। पुलिस रिकॉर्ड में यह खुदकुशी दर्ज है, नवकरन की ही तरह। रोहित वेमुला की राष्‍ट्रीय खुदकुशी के बाद इस मामूली स्‍थानीय मौत की चर्चा कोई नहीं करने वाला, सिवाय उनके जो अतुल को जानते थे या जो उनकी मौत के पीछे की वजह को समझते हैं। मेरे पास इस पर लिखने को एक छोटे उपन्‍यास जितनी सामग्री है, लेकिन लिखूंगा उतना ही जितना तात्‍कालिक और सार्वजनिक रूप से ज़रूरी है।

  • जनसत्‍ता में सब कुछ ठीक नहीं जान पड़ता है... कुछ तो गड़बड़ है...

    Abhishek Srivastava : दिल्‍ली के मोतीलाल नेहरू कॉलेज में चल रही मीडिया संगोष्‍ठी के एक सत्र में कल जनसत्‍ता के पत्रकार मनोज मिश्र और डॉ. राजेंद्र धोड़पकर वक्‍ता थे। दोनों लोगों ने भाषा के मामले में प्रभाष जोशी और जनसत्‍ता को याद किया। मनोज मिश्र ने बताया कि कैसे जनसत्‍ता में प्रभाषजी ने पत्रकारिता की एक नई भाषा गढ़ी जिसकी बाद में सारे इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया ने नकल मार ली। आप आज का और 23 तारीख का जनसत्‍ता उठाकर देखिए, समझ में आ जाएगा कि पत्रकार खुद अपना अखबार क्‍यों नहीं पढ़ते हैं और अतीत के गौरव में जीना क्‍यों पसंद करते हैं।


    अखबार या परचा? प्रधानमंत्री की कही बात को अपने मुंह में डाल लेना कौन सी समझदारी है भाई?

    कौन नामजद- बाप या बेटा?