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वरिष्ठ पत्रकार कृष्णन दुबे नहीं रहे

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कृष्णन दुबे: एक इंसान का जाना उर्फ दुबे जी आप सुबह बहुत याद आओगे : मौत हमारे लिए खबर होती है। कई बार तो मौत ही हमारे लिए खबर होती है। दुबे जी के साथ भी यही हुआ। कृष्णन दुबे जी के साथ। दुबे जी अब नहीं रहे। इसके पहले के कुछ दिनों में वे क्या सोच रहे थे?

दुनिया को किस ढंग से देख रहे थे? कितने उदास थे और कितने ऊर्जावान, इसकी कोई खबर नहीं है। बीते पांच सालों में उनसे कम ही मुलाकातें हुई, लेकिन वे हर बार ऊर्जा और अपनत्व से भरे हुए मिले। उनका न रहना अपूरणीय क्षति नहीं है, क्योंकि वे महान नहीं थे। इंसान थे। गलतियों से सीखने वाले और हर समय नये नये सपनों में रंग भरने वाले इंसान। वे कहते थे- हर कोई पत्रकार, नेता, डॉक्टर, इंजीनियर होना चाहता है, लेकिन इसके लिए जरूरी शर्त इंसान होना है। यह शर्त दुबे जी पूरी करते थे। वे भरपूर इंसान थे। सुख में हंसने और दुख में रोने वाले इंसान।

पहली मुलाकात रांची में हुई थी। 'पब्लिक एजेंडा' मैगजीन के प्रकाशन से पूर्व संभावनाओं और योजनाओं को जमीनी स्तर पर टटोलने के लिए वे हैन्सन जी के साथ पहुंचे थे। महाराजा होटल में। पशुपति जी ने फोन पर बताया था कि उनसे मिल लेना। शाम को फोन किया तो बोले कि झारखंड के विभिन्न इलाकों में घूमने और अखबारी साथियों से मिलने का प्रोग्राम है। साथ चलने का प्रस्ताव रखा तो मना नहीं कर सका और दूसरे दिन सुबह सबेरे उनसे मिलने पहुंचा। मेरी सेहत पर नर्म टिप्पणी करते हुए नाश्ता मंगवाया और चल दिये। 8 बजे हम डाल्टेनगंज यानी मेदिनीनगर के लिए निकले। गर्मी खासी थी सो एसी चल रहा था। रातू रोड पार करते करते उन्होंने कार की खिड़की खोल ली। ताजी हवा के लिए। सिगरेट भी सुलगा चुके थे।

76 वर्षीय दुबे जी किस्सों के साथ ताजा राजनीतिक घटनाओं का मार्क्सवादी विश्लेषण करते जाते थे। उनकी जानकारी और अध्ययन प्रवृत्ति के बारे में सुन रखा था लेकिन वे सुने से कहीं ज्यादा पढ़ाकू थे। हर विषय पर स्पष्ट राय और उत्साहित करने वाली जानकारी उनके पास थी। मेरे लिए यह मजेदार सफर होने वाला था। उन्होंने रोडमैप तैयार कर रखा था। किस शहर में किससे मिलना है, क्या बात करनी है? कौन सी इन्फारमेशन निकालनी है? कहां कितना रुकना है और अगले शहर तक पहुंचने के लिए कम से कम कितने बजे निकलना है से लेकर कहां नाश्ता और कहां खाना-खाना है तक को वे मोटे तौर पर निर्धारित कर चुके थे।

डाल्टेनगंज, गढ़वा, गुमला, राउरकेला, सिमडेगा के हालात पर चर्चा होती रही। कई खबरों के बारे में और रांची के अखबारों के बारे में भी। प्रभात खबर में छपने वाली छोटी-छोटी खबरों के बारे में उनकी मायनीखेज टिप्पणी आज भी नहीं भूलती कि-''अखबार को रोजनामचा होने से बचना चाहिए। कौन सी खबर पढ़ानी है इसकी समझ संपादकीय साथियों को जरूर होनी चाहिए। पेज पर ज्यादा खबरें देना संपादकीय अयोग्यता ही है।"

हम शाम तक लातेहार और डॉल्टेनगंज का काम निपटा कर गढ़वा पहुंच चुके थे। इस बीच मांडर, चान्हो, कुडू, मनिका में भी रुके। सिगरेट और राजनीतिक बातचीत चलती रही। अखबारी दुनिया पर टिप्पणी के साथ वनस्पितियों के बारे में भी दुबे जी बताते जा रहे थे। हैन्सन शाम की 'व्यवस्था' के लिए परेशान थे। गढ़वा के राज होटल में रुके थे हम। मच्छरों ने सारी रात परेशान किया और सुबह सुबह बिना चाय पिये ही हम सरगुजा की ओर चले। रंका पहुंचकर चाय नाश्ता किया और आगे बढ़े। रामानुजगंज से छत्तीसगढ़ शुरू हो जाता है। हम रामानुजगंज से तकरीबन 10-15 किलोमीटर आगे तक निकल गये थे। यहां एक गांव था, नाम याद नहीं आ रहा। वहां जाम लगा था सो लौट लिये।

दुबे जी की इच्छा थी कि रुककर इंतजार करते हैं जाम खुलने का। पता चला गांव ग्रामीणों ने लगाया है। कोई ट्रक किसी पशु को टक्कर मारकर चला गया था, जिसके विरोध में जाम लगा था। धूप बढ़ती जा रही थी और जाम खुलने के आसार नहीं थे। सो लौट लिये। गढ़वा की ओर। रास्ते में तय हुआ कि नेतरहाट चलते हैं। गढ़वा के पहले ही कोलिबिरा जाने वाली रोड पर मुड़ गये और तकरीबन पांच बजे शाम को हम नेतरहाट की पहाड़ी पर थे। झारखंड की खूबसूरती का एक शानदार नमूना। यहां के प्रभात होटल में रुके। शाम आठ बजे तक पहाड़ी से दूर तक फैले खेत और पहाड़ों को ताकते हुए हमने कई सिगरेटें सुलगाई और बातचीत का सिलसिला लगातार चलता रहा।

नक्सलवाद पर हैन्सन और दुबे जी के बीच थ्योरिटीकल बातचीत होती रही। बीच-बीच में मैंने स्थानीय हकीकतों को जस्टीफाई किया तो दुबे जी तकरीबन भड़क गये। वे मानने को तैयार नहीं थे कि नक्सल पॉलिटिक्स में आपराधिक तत्व हो सकते हैं। उन्हें गुरिल्ला वॉरफेयर के चेक्स एंड कंट्रोल पर पूरा भरोसा था। दरहकीकत वे अपनी खीज मिटा रहे थे। चांदनी रात में शराबनोशी के साथ उन्होंने सीपीआई और सीपीएम की पॉलिटिक्स को जमकर लताड़ा। हिंदुस्तान में रेवोल्यूशनरी पॉलिटिक्स की कमी और टैक्टिस पॉलिटिक्स की हालिया खामियों पर बोलते रहे।

10 बजते बजते वे तकरीबन एकालाप की स्थिति में थे। यह गुस्सा था जो निकल रहा था। वे करीब 12 बजे सोये। सुबह-सबेरे वे जागे और हैन्सन व मुझे जगाया। घूमने निकले और स्थानीय लोगों से बातचीत की शुरुआत की। दोपहर के खाने से पहले तक यह सिलसिला चलता रहा। आदिवासियों के बीच हनुमान की मूर्तियों को लेकर दुबे जी खासे आतंकित थे। वे इस रूपांतरण के आर्थिक और राजनीतिक आधार देख रहे थे। चर्च की भूमिका और हिंदू संगठनों के कार्यों से वे साथ-साथ नाराजगी जाहिर कर चुके थे।

इसी दिन शाम में हम गुमला पहुंच चुके थे। बीच में छऊ नाच की एक मंडली से यादगार भेंट, सिमडेगा में जनी शिकार पर निकली महिलाओं के फोटो और खेतों में घूमने की रंगतों के बीच देर रात को हम राऊरकेला में थे। यहां की झारखंडी पॉपुलेशन, सर्कुलेशन और खबरों के रिवाज को परखते परखते रात के तीन बज गये थे। हम सो गये। दूसरे दिन ताजा दम हो तकरीबन दस बजे फिर निकले इस बार बिरमित्रपुर होते हुए हमें कोलिबिरा पहुंचना था। रास्ते में ग्रामीणों से बातचीत और मुकेश के गानों पर भी बातचीत होती रही। ओपी नैयर की धुनों के दीवाने दुबे जी भारतीय संगीत के अच्छे श्रोताओं में से एक थे। वे गीतों को गुनगुनाते हुए लय और ताल का पूरा ख्याल रखते थे। अपनी उम्र को छकाते हुए वे जबरदस्त स्टेमिना के साथ गाते थे।

उनकी स्टेमिना का दूसरा नमूना पूर्णिया में मिला। पशुपति जी की शादी में। बारात पूर्णिया से रायगंज, पश्चिम बंगाल जानी थी। हम कुछ दोस्त एक गाडी में बैठ गये। दुबे जी को छोड़ दिया तो बीच में जब नाश्ते के लिए रुके तो वे हमारे साथ हो लिये। जब मैंने कहा कि दुबे जी आपको बुजुर्गों के साथ रहा चाहिए। तो बोले- वहां खतरा ज्यादा है। मैंने कहा कि- लौंडों की सोहबत में ढेले की सनसनाहट भी सुननी पड़ती है। तो मुस्कुराते हुए बोले- ढेले हमने भी फेंके हैं और यकीन मानो तुम लोगों से ज्यादा सनसनाहट पैदा की है।

पूरे कार्यक्रम के दौरान वे उत्साह से भरपूर रहे। शादी के बाद जब हम कुछ मित्र भागलपुर गये तो वे पूर्णिया में ही रुक गये। दूसरे दिन मैं लौटा तो उपाध्याय जी और वे भिडे हुए थे। उपाध्याय जी खांटी संघी थे और दुबे जी क्लासिकल मार्क्सवादी। दोनों ने एक साथ पूरा दिन कैसे गुजारा होगा यह मैं अनुमान लगा सकता था, लेकिन इनके साथ मुझे दिल्ली तक की यात्रा करनी थी। यह सोचकर मैं सिहर गया। पूरी यात्रा के दौरान दुबे जी चालू रहे। संघी सोच के तर्कों को उदाहरणों और यकीनी जनवाद से रौंदते हुए वे थोड़े पजेसिव भी लगे। लेकिन उनका माक्र्सवाद में विश्वास ताकत देता था।

बाद में छुटपुट मुलाकातें उनके घर और पूसा रोड स्थित पब्लिक एजेंडा के ऑफिस में होती रही। खाने और पीने के शौकीन दुबे जी के साथ पब्लिक एजेंडा ऑफिस में हुई मुलाकात मेरे लिए अपनी सबसे अच्छी दोपहरों में से एक रही है। अब अंधेरी कोठरी का वह रोशनदान बंद हो चुका है, लेकिन जो रोशनी उन्होंने फैलायी वह यकीनन भरोसा देते है, उजाले का। इस रात में जब हर तरफ रोशनी की दरकार शिद्दत से महसूस की जा रही है, दुबे जी याद आते हैं। उन्हे यकीन था कि सुबह होगी। वे सुबह का इंतजार कर रहे थे। रोशनी को बचाने की जुगत भी कर रहे थे। अफसोस वे सुबह के पहले ही चले गये, इस काली रात में। सुबह जब रोशनी होगी, तब आप बहुत याद आओगे दुबे जी।

लेखक सचिन श्रीवास्तव युवा व प्रतिभाशाली पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग 'नई इबारतें' से साभार लिया गया है.

कृष्णन दुबे के बारे में अगर किसी को और ज्यादा जानकारी हो तो वह डिटेल भड़ास4मीडिया तक पहुंचा सकता है, This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए. जितनी बातें पता चली हैं, वे इस प्रकार हैं- ''कृष्णन दुबे की उम्र 80 साल के आसपास थी. उन्होंने पत्रकारिता का अपना करियर आगरा के 'सैनिक' अखबार से शुरू की थी. वे यूपी के इटावा के रहने वाले थे.  सक्रिय पत्रकारिता से उन्होंने रिटायर होने की घोषणा कर दी थी. दैनिक भास्कर समेत कई अखबारों में लिखते रहते थे.  एनडीटीवी और डिस्कवरी समेत कई जगहों पर काम किया. कानपुर में ट्रेड यूनियनिस्ट रहे. वामपंथी विचारधारा से गहरे प्रभावित थे.''

Comments (7)Add Comment
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written by Natasha Singh, August 03, 2010
I have known him for the past 5 years only....but i do feel that he was a part of my family....a great man whome i can never forget....he has inspired me so much so that i want to live my life the way he did....Krishnan uncle you will always always be in my heart....i wish i could have met with you earlier.....
May god bless your soul...

Your loving daughter
Natasha
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written by dharmendra, mahanagar kahaniyan, July 31, 2010
bhagawan unaki aatma ko shanti tatha parijano ko himmat wa dhairya pradan kare.
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written by अनिल यादव, July 30, 2010
कृष्णन जी शानदार आदमी और हमारे दुर्गा दादा के बाल सखा थे। उन्हें श्रद्धांजलि।
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written by Girish Mishra, July 29, 2010
I came into contact with Krishnan Dubey in the 1950s when he was working for the daily Vishwamitra in Patna and I was a student of Patna College. we had the same ideological orientation and political affiliations. Our friendship continued though sometimes we did not meet frequently because of his being away from Delhi. He went to HEC, Ranchi as an officer and in recent times to the USA.
He always showed affection to me and we along with other friends of olden days like Prof. Arjun Dev, formerly of NCERT and Jitendra Sharma, a senior advocate of the Supreme Court discussed various topics of interest and talked of the days and comrades of the yore for hours together.
He was a committed Marxist and devoted journalist, and, above all, a fine human being. It was at his insistence that I agreed to write for Public Agenda though by the time it came out, he left it and joined Samkal but it could not last long. I wrote for it too because he could not take a no from me.
I am extremely sad that I have lost a friend of 55 years.
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written by ravishankar vedoriya, July 29, 2010
bade dukh ki baat hai iswer unki atma ko shanti pradan kare
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written by sanjay swadesh, July 29, 2010
shardhanjali
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written by ravi, July 29, 2010
very sad i respect him very much

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