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अरे भई जब हजार किलोमीटर दूर से ही किसी को पटकना था तो लोकल स्तर पर पत्रकार ढूंढने का ड्रामा क्यों किया? या सीधे शब्दों में कहें कि भास्कर प्रबंधन को पूरे छत्तीसगढ़ में कोई काबिल वेब जर्नलिस्ट ही नहीं मिला जो ठप्प पड़े भास्कर डॉट कॉम के सेटअप को सुचारु रुप से चला सके? खैर जिस जगह का काम डिजाईनर टाईप हो वहां ऐसे नजारे ही मिलते हैं।

बहरहाल आपको बता दें कि रायपुर दैनिक भास्कर में कम इंक्रीमेंट, अव्यवस्था और तेरा सगा-मेरा सगा के फेर में डॉट कॉम में जहां तीन मीडियाकर्मी होने थे वहां एक ही मीडियाकर्मी पूरा सेटअप देख रहा था। और, इस एक के भी चले जाते ही सेटअप ठप्प हो गया था। खबरें भोपाल से लगाई जा रहीं थीं। वर्तमान में भी राजस्थान से अकेले ब्रजेश उपाध्याय को भेजा गया है। 3 कर्मियों के सेटअप वाले डॉट कॉम का भार पहले भी लम्बे समय से एक ही कर्मी के ऊपर था।

असल में यहां काबिलियत नहीं, कुछ और तलाशा जाता है। इस कारण काबिल पत्रकारों का रिज्यूम ही भोपाल नहीं भेजा जाता है। तो भई बाहर से बन्दा भेजने का मतलब तो यही हुआ कि डिजाईनर सम्पादकों को कोई काबिल पत्रकार ही नहीं मिला। अब ऐसा कैसे हुआ यह शोध का विषय है।

आशीष चौकसे
पत्रकार और ब्लॉगर

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