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पत्रकारिता जगत में अभी आनंद पांडे का नईदुनिया से इस्तीफा गंभीर चर्चा का विषय बना हुआ है। जिसने भी इस खबर को सुना, चौंक गया। आनंद पांडेय के फ़ोन घनघनने लगे। जो उन्हें सीधे कॉल नहीं कर सकते थे, वो करीबियों से पर्दे के पीछे की कहानी समझने की कोशिश करते रहे। अफवाहों का बाजार गर्म हो गया। लेकिन हकीकत किसी को पता नहीं कि आखिर इस्तीफा हुआ क्यों? इसके लिए थोड़ा बैक ग्राउंड जानना जरूरी है। नवंबर 2014 में पांडे जी ने दैनिक भास्कर से इस्तीफा दिया था। उस वक़्त वो भास्कर ग्रुप में शिखर पर थे। उनकी तेज तर्रार कार्यशैली के भास्कर के एमडी सुधीर अग्रवाल और डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल इतने प्रभावित हुए कि उनका प्रमोशन पर प्रमोशन होता गया। एडिटोरियल से लेकर ब्रांड और अवार्ड organising कमिटी के वो मेंबर बन गए। हर महत्वपूर्ण इवेंट के लिए उनकी राय ली जाने लगी। पांडेजी के बढ़ते कद से ग्रुप एडिटर कल्पेश याग्निक तक को अपनी कुर्सी का खतरा महसूस होने लगा।

सुधीरजी ने पांडे जी के काम को देखते हुए उन्हें गुजरात की बड़ी जिम्मेदारी दी। भाषायी प्रॉब्लम के कारण आनंदजी जाना नहीं चाहते थे और खुलकर इस बात को सुधीरजी के समाने रख भी नहीं पा रहे थे। इसी दौरान उन्हें नईदुनिया से आफर आया। एडिटर इन चीफ संजय गुप्ता से 2-3मीटिंग के बाद उन्होंने नईदुनिया जॉइन कर लिया। पद-पैसा दोनों की तरक्की हुई। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि श्रवण गर्ग के कार्यकाल में पहले से ही कमजोर हो चुका नईदुनिया रसातल में जा चुका था। पांडे जी ने challenge स्वीकारा। उन्हें काम करने की पूरी आजादी दी गई। वो भास्कर संस्थान के ही महत्वपूर्ण व्यक्ति मनोज प्रियदर्शी को नईदुनिया लाने में कामयाब रहे।

सीनियर न्यूज़ एडिटर प्रियदर्शी को महत्वपूर्ण सेंट्रल डेस्क (एमपी-सीजी) की जिम्मेदारी उन्होंने दी। शुरुआती विरोध के बाद पांडे जी ने अपनी कार्य योजना को अंजाम देना शुरू किया। नए-नए आईडिया पर काम शुरू हुआ। अखबार चर्चा में आने लगा। चूंकि पांडे और प्रियदर्शी, दोनों भास्कर को बखूबी समझते थे, इसलिए अनेकों बार लोग फ्रंट पेज पढ़कर आश्चर्य में पड़ जाते थे कि भास्कर और नईदुनिया लगभग एक जैसा न्यूज़ कंटेंट और पैकेज कैसे दे रहे हैं? इसके बाद रुमनी घोष के काम से संतुष्ट नहीं होने के कारण सिटी की जिम्मेदारी प्रमोद त्रिवेदी को दी गई। उससे पहले भोपाल का संपादक भी बदल दिया गया और भास्कर के ही सुनील शुक्ला को वहां बैठाया गया। नईदुनिया ने अपने कामों से मुकाम हासिल करना शुरू किया। 'निःशब्द ' वाली तस्वीर हो या रेत-शराब के ठेके जैसी खबरें... सरकार हिलने लगी। जागरण के मालिकों को ये सूट नहीं कर रहा था।

इस बीच संजय शुक्ला ने बतौर सीओओ जॉइन किया। उन्हें भी पांडेजी की तेज-तर्रार कार्यशैली से परेशानी होने लगी। वे खुद की मनमानी नहीं कर पा रहे थे, इसलिए उन्होंने मालिकों के कान भरने शुरू किए। पांडेजी अखबार को आगे ले जाना चाहते थे। लेकिन संजय शुक्ला के हर बात में टांग अड़ाने से वो इसे अंजाम नहीं दे पा रहे थे। कई कोशिशों के बाद भी रायपुर संपादक का प्रिंट लाइन में नाम नहीं दिया गया। जागरण ग्रुप के संजय गुप्ता ने कई दफे संजय शुक्ला को फटकार लगाई, चेतावनी दी, लेकिन उसके बावजूद वो एडिटोरियल और उनके खिलाफ साजिश करता रहा। लोग कहते हैं कि स्थानीय संपादक आशीष व्यास भी इसमें पर्दे के पीछे शामिल हो गए।

इस बीच अचानक बिना जानकारी दिए जागरण मैनेजमेंट ने वाराणसी यूनिट प्रभारी आलोक मिश्र को रायपुर में राज्य संपादक बनाकर बैठा दिया। तीन ब्यूरो बंद कर दिए गए। पांडेजी जो सोचकर आए थे, उसमें उन्हें निराशा हाथ लगी। काम से ज्यादा सियासत होने लगी। इस बात को संजय गुप्ता भी नहीं समझ सके। इस बीच भास्कर ग्रुप से हर दो-तीन महीने में पांडेजी का बुलावा आने लगा। एमडी हर हाल में चाहते थे कि आनंद पांडे जल्द से जल्द जॉइन करें। चूंकि नईदुनिया और जागरण ग्रुप से उनका नेचर जेल नहीं कर रहा था और सियासत भी तेज हो गई थी, लिहाजा उन्होंने नईदुनिया को छोड़ना ही बेहतर समझा। भास्कर की भी कोशिश है कि नईदुनिया के सिर्फ 4-5 प्रमुख लोगों को वो तोड़े, जिससे इस अखबार का बचा-खुचा अस्त्तित्व भी खत्म हो जाए। इसके लिए वह इन्हें मुँह मांगी कीमत भी देने को तैयार है।

वैसे ये चर्चा आम हो चली है कि पांडे जी के जाने के बाद नईदुनिया सामान्य अखबार बन जायेगा। उनके साथ जुड़े लोगों के साथ ही 2-3 और लोगों के भी नईदुनिया छोड़ने की अफवाह है। इसमें सबसे फायदे में आशीष व्यास हैं, जो लंबे वक्त से बड़ी कुर्सी पर नजर गड़ाए हैं। लोगों का कहना है कि श्रवण गर्ग को हटाने और आनंन्द पांडे का संबंध मैनेजमेंट से बिगाड़ने में उनकी बड़ी भूमिका हैं।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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