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सरकार को निर्देश दे कोर्ट कि किंगफिशर को चवन्नी भी न मिले... याचिका दायर

इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच में मैंने आज एक रिट याचिका दायर की है. इसके जरिए हाईकोर्ट से यह निवेदन किया है कि वह भारत सरकार को किंगफिशर एयरलाइन कंपनी को किसी भी प्रकार की ऐसी सहायता देने से रोके जाने के निर्देश दे जिससे सरकारी धन का किसी भी प्रकार से नुकसान हो. ऐसा भारत सरकार के उच्चपदस्थ लोगों जैसे प्रधानमंत्री, नागरिक उड्डयन मंत्री आदि द्वारा मीडिया में दिये गए उन बयानों के परिप्रेक्ष्य में किया गया है जिसमे इन लोगों द्वारा किंगफिशर एयरलाइन को विभिन्न प्रकार से वित्तीय एवं गैर-वित्तीय सहायता दिये जाने की बात कही गयी है जिनसे सरकारी धन की हानि की पूर्ण संभावना होगी.

मैंने उच्च न्यायालय से यह निवेदन किया है कि भारत सरकार को यह निर्देशित किया जाए कि किसी भी वर्तमान वित्तीय, मौद्रिक, आर्थिक या विधिक नियमों, कानूनों एवं नीतियों को किंगफिशर एयरलाइन को मदद पहुंचाने के उद्देश्य से इस प्रकार से नहीं परिवर्तित करें जिससे शासकीय धन की कोई भी हानि हो.

मेरे द्वारा अपनी याचिका में कहा गया है कि एक तो किंगफिशर एयरलाइन एक निजी संस्था है जिसका एकमात्र उद्देश्य लाभ कमाना है, दूसरे किंगफिशर एयरलाइन के चेयरमैन डॉ विजय माल्या की छवि अतीव उपभिक्तावाद, भोगवादी और विलासितापूर्ण जीवन से जुडी हुई है जिसमें आम तौर पर गरीब और साधारण जनता के लिए कोई स्थान नहीं है. इससे पूर्व भी 25 नवंबर 2010 को किंगफिशर एयरलाइन ने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज को एक डेट रिकास्ट पॅकेज (डीपीआर) के सम्बन्ध में सूचित किया था जिसमे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के दिशानिर्देशों के तहत ऋण दर में छूट दी गयी थी.

इसके अलावा स्वयं किंगफिशर ने रिट याचिका संख्या 3028/2011 (डॉ नूतन ठाकुर बनाम भारत सरकार एवं अन्य) में इसी उच्च न्यायालय में अपने काउंटर एफिडेविट में यह कहा था कि वह एक निजी संस्था है और उस पर भारत सरकार द्वारा किसी भी प्रकार का नियंत्रण न्यायसंगत नहीं माना जाएगा. ऐसे में अब स्वयं किंगफिशर द्वारा अपनी तरफ से भारत सरकार से सहयोग की अपेक्षा रखना कदापि उचित नहीं प्रतीत होता है.

मैंने मैकडोवेल क्रेस्ट नामक एक एनबीएफसी का भी हवाला दिया जिसके सबंध में पूर्व में यह आरोप लगे थे कि डॉ माल्या ने यूबी ग्रुप के तहत बनाए गए इस कंपनी में जनता से पैसे ले कर उन्हें वापस नहीं किया, बाद में उस कंपनी का नाम क्रेस्ट फिनलीज़ कर दिया और उसे दिवालिया घोषित कर के उसके पैसे हड़प लिए.

इन सभी तथ्यों के दृष्टिगत मैंने उच्च न्यायालय से यह निवेदन किया है कि वे भारत सरकार को निर्देशित करे कि वह किंगफिशर को कोई भी ऐसी वित्तीय सहायता ना प्रदान करें जिससे सरकारी धन की क्षति हो. याचिकर्ता के रूप में मेर्रे अधिवक्ता अशोक पाण्डेय हैं. याचिका पर सुनवाई परसों (16/11/2011) किया जाना है.

डॉ नूतन ठाकुर

सामाजिक कार्यकर्त्री एवं कन्वेनर

नेशनल आरटीआई फोरम

लखनऊ

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