
अब और चौकन्ने हो गए उदय प्रकाश बोले- मैं किसी का समर्थन नहीं करता : हर तरह की राजनीति, सरकारी तंत्र और मीडिया ने उदय प्रकाश को पहले से ही बहुत निराश-उदास कर रखा था, 'पुरस्कार प्रकरण' के बाद रचना जगत के साझा विरोध-बहिष्कार के फतवे ने उन्हें और अंदर तक झकझोर दिया है। वह जितने खिन्न, उतने ही विचलित-से लगते हैं। भड़ास4मीडिया के कंटेंट हेड जयप्रकाश त्रिपाठी से बातचीत में उदय प्रकाश ने अपनी राजनीतिक निर्लिप्तता की घोषणा कर रचनाजगत में फिर अपने लिए संदेह की गुंजाइश बढ़ा दी है क्योंकि जो निर्लिप्त होता है, वह भी किसी न किसी तरह की राजनीति के पक्ष में जरूर होता है। बातचीत में उदय प्रकाश कहते हैं- 'लेखक को हर तरह की राजनीतिक तानाशाही से मुक्त कर देना चाहिए। मेरा किसी भी तरह से कोई राजनीतिक सरोकार नहीं, न किसी ऐसे दल से कोई संबंध है। कभी रहा भी नहीं। रहना भी नहीं चाहिए। किसी को मेरा समर्थन करना हो, करे, अथवा मत करे, मैं किसी का समर्थन नहीं करता।'






हमारा हीरो : हरिवंश (प्रधान संपादक, प्रभात खबर) : भाग-2 : मीडिया ने लोगों का विश्वास अब खो दिया है : मीडिया में गैर-जिम्मेदारी बहुत बढ़ गई है : लोग समझ गए हैं कि खबरे खरीदी-बेची जाती हैं : ताकतवर हो चुके मीडिया पर नियंत्रण की कोई बॉडी नहीं हैं : ऐसा पोलिटिकल सिस्टम कमजोर होने से हुआ : मीडिया से ज्यादा ब्लैकमेलर पालिटिक्स हो गई है : जिस दिन राजनीति में विचार अहम होंगे, मीडिया भी रास्ते पर आ जाएगा : प्रभात खबर टिका हुआ है तो सिर्फ अपनी साख के दम पर : आज जब आस-पास देखते हैं तो हम सोच नहीं पाते कि किससे प्रेरणा लें : मैं वह व्यवस्था अवश्य देखना चाहता हूं, जिसमें इक्वल डिस्ट्रीब्यूशन हो : हम मशीन की तरह चल रहे हैं और मशीन की तरह खत्म हो रहे हैं

त्रिवेणी ग्रुप के न्यूज चैनल वायस आफ इंडिया के नए कर्ता-धर्ता हैं अमित सिन्हा। निदेशक और सीईओ के रूप में अमित वीओआई को पटरी पर लाने, इसके कंटेंट को सुधारने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की कवायद में जुट गए हैं। कौन हैं ये अमित सिन्हा? त्रिवेणी ग्रुप के साथ इनकी किस तरह की सहमति बनी है? किसने लगाया है वीओआई में पैसा? वीओआई का क्या है भविष्य? अमित की क्या है रणनीति? त्रिवेणी के मालिक मित्तल बंधु वीओआई के रोजाना के कामधाम में कितना करेंगे हस्तक्षेप? इन कई सवालों को लेकर भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह ने वीओआई के निदेशक अमित सिन्हा से बातचीत की। पेश है इंटरव्यू के कुछ अंश-
मुलाकात : आनलाइन हिंदी न्यूज पोर्टलों में बेहद प्रतिष्ठित और विश्वसनीय बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम की संपादक सलमा जैदी का आनलाइन जर्नलिज्म के बारे में मानना है कि यह अभी पूरी तरह जमीनी स्तर से नहीं जुड़ पाया है और तकनीक महंगी होना भी इसमें बड़ी बाधा है। जितनी जल्दी ब्रॉडबैंड कनेक्शनों का प्रसार बढ़ेगा और कंप्यूटर सस्ते होंगे, ऑनलाइन जर्नलिज्म उतना अधिक फैलेगा। उनक कहना है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया से ऑनलाइन पत्रकारिता को चुनौती जरूर मिल रही है। न्यूज एजेंसी, अखबार, टीवी, रेडियो और वेबसाइट यानी पत्रकारिता के सभी माध्यमों में वरिष्ठ स्तर पर कार्य कर चुकीं सलमा जैदी हिंदी मीडिया के लिए जानी-मानी नाम हैं। पर घमंड उन्हें कहीं से छू नहीं सका है। वे स्वभाव से बेहद विनम्र और सहयोगी हैं। टीम वर्क को सफलता के लिए जरूरी मानने वाली सलमा से बीबीसी के दिल्ली स्थित आफिस में धीरज टागरा ने कई मुद्दों पर खुलकर बातचीत की।
हमारा हीरो : रामबहादुर राय (भाग- दो)
हमारा हीरो : रामबहादुर राय (भाग- एक) : हिंदी पत्रकारिता का बड़ा और सम्मानित नाम है- रामबहादुर राय। जनसत्ता और नवभारत टाइम्स फेम रामबहादुर राय उन चंद वरिष्ठ पत्रकारों में शुमार किए जाते हैं जो सिद्धांत, सच, सरोकार, समाज और देश के लिए जीते हैं। पत्रकारिता इनके लिए कभी पद व पैसा पाने का साधन नहीं रहा। पत्रकारिता को इन्होंने देश व समाज को सच बताने, दिशा दिखाने और बदलाव की हर संभव मुहिम को आगे बढ़ाने का माध्यम माना और ऐसा किया-जिया भी। छात्र राजनीति में सक्रिय रहे रामबहादुर राय चाहते तो राजनीति में जा सकते थे और आराम से सांसद-विधायक बन सत्ता सुख भोग सकते थे लेकिन एक्टिविज्म की राह पर निकले युवा रामबहादुर राय को राजनीति में जाना लक्ष्य से समझौता करने जैसा लगा। उन्होंने राजनीति में जाने की बजाय सक्रिय पत्रकारिता की राह का वरण किया। चुनाव लड़ने का बहुत ज्यादा दबाव बढ़ा तो झोला उठाकर हरिद्वार निकल पड़े। 