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दो युवा पत्रकारों ने ठुकरा दिया दैनिक जागरण का 'कंगाली' ऑफर

: अब इस अखबार को खोजे नहीं मिल रहे योग्‍य पत्रकार : अपनी तुच्‍छ नीतियों के लिए प्रख्‍यात दैनिक जागरण के बुरे दिन शुरू हो गए हैं. हाल ही में कई युवा पत्रकारों ने जागरण के ऑफर को लात मारकर जनसंदेश जैसे नए समाचार पत्र को चुनना ज्‍यादा बेहतर समझा, इससे जागरण प्रबंधन बुरी तरह बौखलाया हुआ है, उसे इस बात का भी डर सताने लगा है कि कुशल पत्रकारों के अभाव में कहीं सालों पुरानी साख मिट्टी में ना मिल जाए. लेकिन जागरण मालिकान अभी भी अपनी कंजूसी छोडने को तैयार नहीं है. वो खुद तो लाखों की सैलरी उठाना चाहते हैं लेकिन पत्रकार तीन हजार वाले ही चाहते हैं. स्‍थानीय संपादकों और जागरण के सभी वरिष्‍ठ संपादकों ने मालिक संजय गुप्‍ता को इस बाबत संकेत भी दे दिए हैं.

बात बरेली संस्‍करण के लिए चुने गए दो पत्रकारों की है. इन्‍हें जागरण ने बरेली के लिए चुना था जिस पर संजय गुप्‍ता ने भी हामी भर दी थी लेकिन इन दोनों पत्रकारों ने जागरण को ज्‍वॉइन करने से बेहतर जनसंदेश में ही थोडे़ पैसे ज्‍यादा लेकर टिके रहना उचित समझा. सम्‍पादकों के लाख मनाने के बाद भी ये लोग जागरण आने को तैयार नहीं हुए. स्‍थानीय संपादकों ने हिंदुस्‍तान के पत्रकारों का भी मन टटोला लेकिन कोई भी आने को तैयार नहीं हुआ, जिसकी वजह जागरण का कम पैसे देना ही था.

भड़ास पर प्रकाशित जागरण के हस्‍ताक्षर अभियान की खबरों ने नवयुवक पत्रकारों की आंखें खोल दी हैं. अमर उजाला और हिंदुस्‍तान जैसे अखबारों में निचले स्‍तर पर काम करने वाले (योग्‍य) पत्रकार भी जागरण आने में कतरा रहे हैं. क्‍योंकि यदि मजीठिया बोर्ड की सिफरिशें लागू हुई तो जागरण को छोड़कर बाकी सभी अखबारों के पत्रकारों को लाभ मिल जाएगा. हाल ही में जागरण में हुई जूनियर सब एडिटर की नियुक्तियों के परीक्षा और साक्षात्‍कार के परिणाम को भी इसीलिए रोक दिया गया है, क्‍योंकि उन्‍हें डर है जिन काबिल छात्रों ने जागरण की परीक्षा और साक्षात्‍कार को पास किया है, क्‍या वह दस हजार रुपए में काम करने के लिए तैयार होंगे. कहीं ऐसा ना हो कि छात्र उनके इस ऑफर को ठुकरा दें और उन्‍हें अपने मुंह की खानी पडे़.

इस खबर से एक बात तो स्‍पष्‍ट है कि जो योग्‍य हैं, वह अब अपनी जीविका के साथ समझौता नहीं करने वाले और यह बात जागरण और जागरण जैसे उन सभी अखबारों को समझ लेनी चाहिए जो पत्रकारों को मानक के अनुरूप पैसे नहीं देते. अगर ऐसा ही रहा तो काबिल लोग पत्रकारिता में आने के बजाए सरकारी नौकर बनना ज्‍यादा पसंद करेंगे और पत्रकारिता काबिल लोगों के अभाव में गर्त में चली जाएगी.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आध‍ारित.

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