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मित्रों,

मैं इसे सौभाग्य मानता हूं कि मैंने प्रिंट पत्रकारिता की पहली खबर ही मीडिया प्रतिरोधी निर्भीक लेखन से की। यह लेखन तत्कालीन अखबार "हिंदवी" के प्रधान संपादक, गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी और गोरखपुर सदर सीट से सांसद योगी आदित्यनाथ जी से ही सीखने को मिला। दरअसल यह प्रतिरोधी लेखन स्थानीय मीडिया (गोरखपुर के कुछ मीडिया संस्थानों) की एक भ्रामक खबर के खिलाफ था। स्थानीय मीडिया की भ्रामक खबर के खिलाफ जो रिपोर्ट मैंने लिखी उसकी हेडिंग कुछ यूं थी- "पुलिस और मीडिया के गठजोड़ ने ही सुनील सिंह को कराया तड़ीपार"।

यह खबर हिंदवी साप्ताहिक में चौड़े से छपी भी। और जहां तक मुझे याद है यह खबर मेरे प्रिंट पत्रकारिता के जीवन की पहली खबर थी। आज मुझे लगता है कि अगर मीडिया में रहते हुये भी कुछ मीडिया संस्थानों द्वारा कभी-कभी की जाने वाली शरारतों के खिलाफ निष्पक्ष और बिना डरे लिख पाता हूं तो यह ताकत अब के सीएम और मेरी पहली खबर को अनुमोदित करने वाले मेरे तत्कालीन प्रधान संपादक, महंत योगी आदित्यनाथ जी की पहली व्यावहारिक पाठशाला में मिली सीख से ही मिल पाती है।

बात वर्ष 2007 में दीपावली के त्योहार के आसपास की है। हिंदवी साप्ताहिक अखबार (जिसके प्रधान संपादक योगीजी ही थे) में मेरा पहला दिन था। मैं संपादक डा प्रदीप राव के निर्देशन में काम कर रहा था। शाम का समय था। तब हिंदवी का दफ्तर गोरखनाथ मंदिर में ही था। अचानक योगीजी दफ्तर में आए और उस खबर को बनवाने का निर्देश डाक्टर प्रदीप राव को दिया। डा. राव ने कहा कि खबर पाठक जी से बनवा लेते हैं। फिर हेडिंग को लेकर चर्चा होने लगी। योगीजी भी चर्चा में शामिल हुए और खबर की हेडिंग व भाषा तय हो गई। इसके बाद मैंने पूरी खबर लिखी।

प्रकरण कुछ यूं था। गोरखपुर के जिला प्रशासन ने एक हिस्ट्रीशीटर सुनील सिंह को तड़ीपार करने का आदेश कर दिया था। हिन्दू युवा वाहिनी के अध्यक्ष का नाम भी सुनील सिंह ही था। स्थानीय मीडिया में खबर ऐसी आई जैसे कि हियुवा के प्रदेश अध्यक्ष ही तड़ीपार हो गए हों। जबकि तड़ीपार कोई और हुआ था। इस भ्रामक कवरेज के खिलाफ योगीजी ने अपने अखबार हिंदवी के जरिये आवाज बुलंद की। हिंदवी का प्रकाशन अब नहीं होता है लेकिन यह साप्ताहिक अखबार जब तक छपा, अपनी निर्भीक भाषा और शैली के लिये मशहूर रहा।

यह भी एक तथ्य है कि योगीजी उन जनसेवकों में से नहीं हैं जो मीडिया की भ्रामक रिपोर्ट पर शांत रहें। वह मीडिया को खूब सम्मान देते हैं, मीडियाकर्मियों की पूरी मदद भी करते हैं लेकिन गलतियों पर संवैधानिक तरीके से कड़ा प्रतिरोध जताने से कभी नहीं चूकते हैं। लिहाजा मीडिया को अब और सतर्कता से रिपोर्टिंग करते हुये यूपी में किसी भी प्रकार की भ्रामक पत्रकारिता से हमेशा बचना होगा। और यही आगामी वर्षों में सूबे और देश की मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। क्योंकि अब जो शख्सियत सीएम के कुर्सी पर बैठी है वह सिर्फ साधु या जनसेवक नहीं, बल्कि एक निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकार भी रही है।

वेद प्रकाश पाठक

(पूर्व संवाददाता, हिंदवी)

स्वतंत्र पत्रकार (गोरखपुर, उत्तर प्रदेश)

मोबाइल और वाट्स एप्प नंबर-8004606554

ई-मेल :  

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  • Guest - A. P. Bharati

    bahut khoob. yogi ko aise hi chelon ki jarurat hai

  • Guest - चरण सिंह राजपूत

    प्रिय वेदप्रकाश पाठक जी,
    मैंने आपका लेख भड़ास फोर मीडिया पर पढ़ा, आपने लिखा है कि आपने निर्भीक पत्रकारिता योगी आदित्य नाथ जी से सीखी है। कृपया एक या दो खबर ऐसी प्रकाशित कीजिये, जिससे लगे कि आज भी निर्भीक पत्रकारिता हो रही है। निर्भीक पत्रकार वह होता है जो जनता की समस्याएं उठाता है न कि नेताओं या फिर सरकार की की महिमामंडित करता है। योगी जी के संसद में रोने के वक्त यदि आप सपा सरकार की अराजकता को लेकर कुछ लिखते तो वह होती निर्भीक पत्रकारिता। यदि लिखा हो तो कृपया दिखाइए। अब योगी जी मुख्यमंत्री बन गए हैं तो अब वह संपादक भी हो गए। नायक भी हो गए। शिक्षक भी हो गए। सब कुछ हो गए।
    सपा सरकार में तो कितने निर्भीक पत्रकार उनके लिए कट्टर हिंदुत्व, साम्प्रदायिक व्यक्ति पता नहीं कैसे-कैसे शब्द इस्तेमाल करते थे। मुख्यमंत्री बनते ही उनकी सभी बुराइयां दूर हो गई और अच्छाइयां आ गईं। सच्चाई तो यह है कि आज की तारीख में यदि रवीश कुमार, प्रसून वाजपेई, यशवंत सिंह जैसे कुछ पत्रकार और कुछ सोशल मीडिया पर लिखने वाले पत्रकारों को छोड़ दें तो निर्भीक शब्द अब पत्रकारों के लिए शोभा नहीं देता। जो लोग निर्भीक पत्रकार होने का दावा कर रहे हैं कृपया बताएं ? मजीठिया वेजबोर्ड को लेकर कितनी बार आवाज बुलंद की। विभिन्न मीडिया समूहों में जो शोषण-दमन का खेल चल रहा है। उसके खिलाफ कितना लिखा ? किसान- मजदूर के शोषण पर कितना लिखा ? निजी कम्पनियों में हो रहे कर्मचारियों के शोषण पर कितना लिखा ? योगी सरकार के खिलाफ कितना लिखा ? यह जो आपने लिखा है इसे मैं निर्भीकता तो नहीं कह सकता। निर्भीक पत्रकारिता वह थी कि मुख्यमंत्री संपादक से मिलने खुद जाता था। वह नहीं कि किसी पत्रकार से मुख्यमंत्री से यदि धोखे से भी हाथ मिला लिया तो महीने भर तक वह अपना हाथ नहीं धोता है। बिल्कुल, देश और समाज को निर्भीक पत्रकारिता की जरूरत है। ऐसी पत्रकारिता कि वोटबैंक की राजनीति करने वाले नेताओं, लूटखसोट मचाने वाले नौकरशाह और स्वार्थी लोगों को आइना दिखाए। काले कारनामों को छिपाने के लिए ढाल के रूप में मीडिया का इस्तेमाल कर पूंजीपतियों को आइना दिखाए। आज सबसे अधिक यदि कहीं सुधार की जरुरत है तो वह पत्रकारिता ही है। दूसरों के हक़ की लड़ाई लड़ने का दंभ भरने वाले पत्रकार अपनी लड़ाई नहीं लड़ पा रहे हैं और आप निर्भीक पत्रकारिता की बात कर रहे हैं। कीजिये निर्भीक पत्रकारिता आपको बोलना नहीं पड़ेगा। दूसरे लोग लिखेँगे। हम लोग भी लिखेँगे।

  • Guest - Ved Prakash Pathak

    Aap dono Mitron AP Bharti aur Charanjeet ji se yahi kehna hai ki thoda sa positivity bhi layen. Sirf Negativity insaan ko khatma kar deti hai. Sabhdon ka chunav karte samay dhyan dein ki aap padhe likhe Jinda admi hain tabhi Bhadas ko Padhte hain. Charanjeet bahi, aap to Nirbhikta ka praman aise mang rahe hain jaise wo deshbhakti ka praman manga karte hain. Charanjeet bhai apko jo mail per jawab diya tha use bhi post kar diya hota to thik rehta.