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मीडिया के रुतबे, दंभ और दबंगई की भोपाल में भोंडी नुमाइश...  भोपाल के एक अखबारी छायाकार के कैमरे के साथ एक रंगरूट पुलिस अफसर द्वारा कथित तोड़फोड़ की घटना पर जो हंगामा बरपा उससे और कुछ हुआ हो या ना हुआ हो पर वह अफसर रातों रात मशहूर हो गया. एक छोटी सी घटना, जिसका जिले के पुलिस कप्तान के स्तर पर निपटारा होना था, मीडिया के ईगो और अहंकार के चलते कई दिनों तक अखबारों में छाई रहीं. इसी कारण मुख्यमंत्री से लेकर नेता प्रतिपक्ष तक सब अपने शब्दबाणों से एक अदने से अफसर पर हमला करने लगे..!

इस घटना और इसके फालोअप में जिस प्रकार अख़बारों का दुरूपयोग किया गया उसकी कड़े शब्दों में निंदा होनी चाहिए. इस समूचे एपिसोड का मुख्य किरदार एक ट्रेनी आईपीएस अफसर है, सरकारी नौकरी में जिसके दूध के दांत अभी नहीं टूटे हैं. इसीलिए उसे मैदानी हकीकत से रूबरू कराने के लिए एक थाने का इंचार्ज बनाया गया है. ऐसी ट्रेनिंग आईपीएस और राज्य पुलिस सेवा सभी के अफसरों को दी जाती है. इसलिए उसने गलती की भी थी तो निपटारा जिले के अफसरों के साथ मिल बैठ कर किया जाना था. आखिर मीडिया और जिले के अफसरों का दिन रात का साथ जो ठहरा..! सुबह से ही मीडिया का,जिसमे छायाकारों की तादाद ज्यादा होती है,पुलिस कंट्रोल रूम पर जमावड़ा लग जाता है.   

इसके बरक्स बयानबाजी और जलसा जुलूस का दौर शुरू हो गया और उस थाने के अपराधों का गुणगान अखबारों में होने लगा जहाँ यह अफसर तैनात है. मीडिया की प्रताड़ना भोपाल के कुछ स्वयंभू पत्रकार संगठनों और उनके स्वयंभू पदाधिकारियों के लिए एक मौक़ा होता है अपनी झांकी जमाने का. मै जब पुलिस का जनसंपर्क अधिकारी हुआ करता था तब प्रदेश में कहीं भी पत्रकारों को प्रताड़ित करने की कथित घटना की भनक लगते ही ये स्वयंभू पदाधिकारी डीजीपी से मिलने का समय मांगने लगते थे. राजधानी के संजीदा मीडिया को इस प्रकार की दबंगई को हतोत्साहित करना था जिसके बरक्स वह एकजुटता दिखाने में जुट गया था.

भोपाल से वरिष्ठ पत्रकार श्रीप्रकाश दीक्षित की रिपोर्ट.

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