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सहारा प्रबंधन ने दिनेश सेमवाल पर लगाया 22 हजार का जुर्माना

राष्ट्रीय सहारा, देहरादून में किसी तरह विधानसभा चुनाव तक अपनी कुर्सी बचाने में जुटे संपादक एलएन शीतल को एक और करारा झटका लगा है। उनके सबसे प्रिय और गढ़वाल डेस्क प्रभारी दिनेश सेमवाल पर प्रबंधन ने 22 हजार रुपये का अर्थदंड ठोका है। इतना ही नहीं उनके अगले दो साल तक प्रमोशन और इनक्रीमेंट पर भी रोक लगा दी गई है। आदेश में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि अगर पुन: इस प्रकार की गलती हुई तो उन्हें बिना चेतावनी के निकाल बाहर कर दिया जाएगा।

दरअसल, यह कार्रवाई करीब दो माह बाद उस घटना पर हुई है, जो किसी और संस्‍थान में हुई होती तो शायद नौकरी गंवानी पड़ती। वस्तुत: यह राष्ट्रीय सहारा की विलंब से निर्णय लेने की शैली में हुई कार्रवाई है। ज्ञातव्य है कि इस वर्ष अक्टूबर के अंत में प्रदेश की खंडूरी सरकार ने अपने प्रचार के लिए राष्ट्रीय सहारा को आठ पेज का सप्लीमेंट छापने के लिए विज्ञापन दिया था। दिनेश के निर्देशन में जब यह परिशिष्ट प्रकाशित हुआ तो दो पेजों में विज्ञापन का शीर्षक गया- प्रदेश सरकार के भ्रष्टाचार के ओर बढ़ते कदम। इस के छपने के बाद राज्य के सूचना विभाग के अधिकारी अपने बाल नोचने लगे। इस घटना से सारा मीडिया जगत और सरकार स्तब्ध हो गई थी। लोग इस शीर्षक को लेकर यह भी कह रहे थे कि सहारा ने ठीक ही प्रकाशित किया है क्योंकि वह खुद को सच कहने की हिम्मत वाला बताता है।

इस प्रकरण से राष्ट्रीय सहारा की खूब थुक्का फजीहत हुई। वरिष्ठों ने कनिष्ठों पर गलती थोपने के भरपूर प्रयास किए। यह तक कहा गया कि परिशिष्ट छापा तो गया किंतु बांटा नहीं गया। सरकार के दबाव में विज्ञापन के पैसे रुक जाने के भय से राष्ट्रीय सहारा को अपनी गलती सही करने के लिए इस परिशिष्ट को दोबारा छापना पड़ा। इस मामले में संपादक एलएन शीतल साफ बच गए क्योंकि वह उस दिन अवकाश पर थे। जैसा कि सहारा में होता है, जांच बैठी और दो माह बाद उनके सबसे प्रिय दिनेश दोषी सिद्ध हुए। रोचक बात यह है कि विगत कुछ समय से संपादक एलएन शीतल ने दैनिक समीक्षा में पाई जाने वाली डेस्क की छोटी-छोटी वर्तनी दोष की गलतियों को नाम के साथ नोटिस बोर्ड में टांगने की परंपरा शुरू की है। परंतु दिनेश की इतनी भारी गलती को वो पचा गए। यह भी आश्चर्य का विषय है कि सहारा में प्रबंधन द्वारा दिए जाने वाले हर नोटिस एवं आदेश को को नोटिस बोर्ड में चिपकाने की पंरंपरा रही है परंतु सहारा के कर्मचारियों को अपने ही संस्थान में हुई इस कार्रवाई की सूचना से वंचित रखा गया है। यह अलग विषय है कि सभी को अनाधिकारिक रूप से इस बारे में पता है।

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