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दोस्तों,

मैं जो कहने जा रहा हूं, वह कु्द्द लोगों को नागवार लग सकता है। लेकिन यह सत्य है कि हिन्दुस्तान वाराणसी में स्थानीय सम्पादक की प्रताड़ना ने एक और पत्रकार साथी की जान लेने में अहम भूमिका निभाई। कोई शक नहीं कि मंसूर माई अस्वस्थ चल रहे थे, फिर भी यथासम्भव काम कर रहे थे।

लेकिन इसी बीच सम्पादक की प्रताड़ना से वह अंदर तक हिल गये थे। अपना यह दर्द उन्होंने परिवार सहित कई मित्रों से शेयर किया था, उनमें मैं भी था।

दोस्तों,

आप यह भी भूल गये होंगे कि लगभग एक दशक पहले इसी सम्पादक की प्रताड़ना से पीड़ित विनय पुरी पाण्डेय जी की भी जान गयी थी। रात साढ़े आठ बजे दफ्तर से दुखी होकर निकली थीं और बेनिया बाग व गेदौलिया के बीच हार्ट अटैक से उनकी सांस सदा के लिए थम गयी थी। ईश्वर, ऐसी सम्पादक प्रजाति का भला करे।

लेखक योगेश गुप्त पप्पू वाराणसी के निवासी हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे हिंदुस्तान अखबार समेत कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे हैं.

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