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अपने क़सबे फलोदी (राजस्थान) आया हुआ हूँ। 47 डिग्री की रेगिस्तान की गरमी मुझे यहाँ उतना नहीं झुलसाती जितना अख़बारों की बदलती तासीर। अजीबोग़रीब हिंदूकरण हो रहा है। जैसे देश में बाक़ी समाज हों ही नहीं। एक बड़े इलाक़े की ख़बरों के लिए तय पन्ने पर (आजकल पन्ने इसी तरह बँटे होते हैं) आज एक अख़बार में हर एक "ख़बर" किसी-न-किसी हिंदू मंदिर की गतिविधि - मूर्तियों की प्राणप्रतिष्ठा, कलश की स्थापना, दान-पुण्य - या संतों के प्रवचनों से  लकदक है। वह पूरा का पूरा पन्ना (पृष्ठ नौ) एक ही धर्म की श्रद्धा में/से अँटा पड़ा है।

देश का 'पाकिस्तानीकरण' (अख़बार के आज के ही अंक में मित्रवर जयप्रकाश चौकसे की टिप्पणी में प्रयुक्त आशंका) किए जाने में मीडिया की यह नई 'ग्रासरूट' सक्रियता भी क्या कम भूमिका निभा रही है? धर्म (और उनके लिए धर्म का मतलब हिंदू धर्म है या कथित 'राष्ट्रधर्म') को जगह देना हिंदी अख़बारों जाने कैसी मजबूरी बन गया है। पहले भी देते थे। अब तो बाढ़ आ जाती है। अठारह साल पहले जब दिल्ली में जनसत्ता का काम सम्भाला, सबसे पहले "धर्म-संस्कृति" पन्ना बंद किया था। मुट्ठीभर पन्नों में संस्कृति के नाम पर सिर्फ़ हिंदू धर्म का पन्ना किस काम का। पर आज दुनिया के इतना आगे निकल आने पर भी हमारे यहाँ, जहाँ/तहाँ, अख़बारों में अलग-अलग पन्नों पर संस्कृति की कुछ वैसी ही संकीर्ण समझ फैली है - फैलाई जा रही है।

लेखक ओम थानवी देश के जाने माने पत्रकार हैं और जनसत्ता अखबार के संपादक रहे हैं.

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