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...जब संपादक राजेंद्र माथुर ने ब्यूरो चीफ पद पर तैनाती करते हुए रामशरण जोशी की तनख्वाह अपने से ज्यादा तय कर दी थी!

Raghvendra Dubey : एक स्टेट हेड (राज्य संपादक) की बहुत खिंचाई तो इसलिए नहीं करुंगा क्योंकि उन्होंने मुझे मौका दिया। अपने मन का लिखने-पढ़ने का। ऐसा इसलिए संभव हो सका क्योंकि मैंने उन्हें 'अकबर' कहना और प्रचारित करना शुरू किया जो नवरत्न पाल सकता था। उन पर जिल्ले इलाही होने का नशा चढ़ता गया और मैं अपनी वाली करता गया।

(मुगल बादशाहों ने अपने रुतबे के लिये यह संबोधन इज़ाद किया था)

उन्होंने बहुतों को नौकरियां दीं।

लेकिन अपने गृह नगर से ऐसे लोगों को भी संपादकीय टीम में लेते आये जिनमें से एक ऑटो के लिये सवारियां चिल्लाता था--- एक सवारी.. एक सवारी...।

एक किसी साईं भरोसे चिट फंड कम्पनी में काम करता था। एक किसी निजी प्राइमरी स्कूल में ठेके पर मास्टर था।

एक को दारोग़ा बनना था। यह उसके जीवन की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा थी। उसके बाप भी दारोगा थे।

एक किसी अखबार में स्ट्रिंगर था और उसके दो सैलून थे।

दोनों उस राज्य संपादक की मेहरबानी से आज संपादक हैं।

दारोग़ा बनने का सपना रखने वाला जो अब संपादक है, सत्य कथाएं पढ़ता है और शहर के एक बुजुर्ग और नामी जेवर व्यवसायी के पैर छूता है। इसलिये कि दीवाली पर उसे चांदी की गिन्नियां मिल जायें। वह हर दीवाली लाखों की गिफ्ट लेकर घर जाता है। कार्यकारी संपादक का बहुत खास है और स्टेट हेड चूंकि रिटायर हो गए, इसलिये उनको कभी फोन तक नहीं करता। तोता चश्म है या फूल सूरजमुखी का, नहीं जानता।

स्टेट हेड के लिये वे दिन, जब वे जिसे चाहें, किसी को सड़क से उठा कर सितारों की पांत में बिठा सकते थे, अब गहन अंधेरे की स्मृतियां हैं। अपनों से मिले घाव अबतक रिसते हैं।
उन्हें सेवा विस्तार न मिल सके, इसकी सुपारी दूसरे कार्यकारी संपादक ने ली। जो मरकजी हुकूमत और संस्थान के बीच अच्छे रिश्तों की सेतु हैं।

एक बिल्डर उनका बड़ा प्रसंशक है।

एक बात याद आती है।

यशस्वी पत्रकार स्व. जयप्रकाश शाही को गोरखपुर में उनके गांव के लोगों ने, तब काबिल पत्रकार माना, जब उनकी बाइलाइन पढ़ी-- 'सुखोई विमान से जयप्रकाश शाही'।
तब मुलायम सिंह यादव जी रक्षा मंत्री थे।

गांव वाले कहते थे-- ''बाप रे, जहजिए से खबर लिख दे ता।''

जब मैं लखनऊ में था, देवरिया-गोरखपुर के लोग किसी न किसी काम से आते रहते थे।

--कहां क्वाटर बा?

--अमीनाबाद में लेले बानी एगो कोठरी

--सरकारी रऊवां के ना मिलल?

--अब्बे ना

और मेरे ना कहते ही गांव-जवार में सफल पत्रकार होने की मेरी रेटिंग गिर जाती थी।

अब सफल पत्रकार वह माना जाता है जो अफसरों से अपने घर में एयर कन्डीशन लगवा ले। फ्रीज पा ले।

वो और ज्यादा बड़े पत्रकार हैं जो भूखंड खरीद रहे हैं, मॉल बनवा रहे हैं।

समाज भी खासा बदला है। क्या अपना समाज ही पत्रकारों को करप्ट होने के लिए नहीं विवश कर रहा।

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एक बार, बक्सर (बिहार) में शिवपूजन सहाय स्मृति व्याख्यानमाला में, मैं भी एक प्रमुख वक्ता था। इस तरह की व्याख्यानमाला, संगोष्ठियों और सेमिनार में (पटना, भोपाल, कोलकाता तक) कई यशस्वी लेखकों और पत्रकारों के साथ मंच साझा करने का अवसर मिला है।

बक्सर में मैं, आदरणीय राम शरण जोशी जी के साथ था। शाम को फुर्सत में वह अपनी पत्रकारीय यात्रा बताने लगे।

जंगल-जंगल अपनी फरारी के खासे दिनों बाद, उन्हें राजेन्द्र माथुर जी का संदेश मिला।

तब माथुर जी नई दुनिया के संपादक थे। अब जोशी जी से ही सुनें-- .... ब्यूरो चीफ के पद के लिये मेरा इंटरव्यू लेने कुल पांच लोग और सभी दिग्गज, बैठे थे। मलकानी, राहुल वारपुते और खुद माथुर जी। मुझसे दो घण्टे तक तो मेरी राजनीतिक रुझान और वैचारिक प्रतिबद्धता के बारे में जाना गया। यह भी पूछा गया कि मैं कम्युनिस्ट क्यों हूं। घण्टों बातचीत के बाद मेरा चयन हुआ और माथुर जी ने मेरा वेतन, खुद से कुछ ज्यादा निर्धारित कर दिया। अब एक दूसरी बहस शुरू हो गई । ब्यूरो चीफ का वेतन संपादक से ज्यादा कैसे हो सकता है।

माथुर जी ने मुस्कराते हुए कहा था-- ''जोशी जी किसी तरह तो अरण्य से लौटे हैं। मैं नहीं चाहता ये फिर वहीं लौट जायें। फिर मैं इन्हें बुर्जुआ बना रहा हूं, इन्हें बांध रहा हूं। मुझे ऐसा कर लेने दीजिये।''

तब बाकी लोग चुप हो गये।

अब न माथुर जी नहीं रहे और रामशरण जोशी जी किसी अखबार में नहीं हैं।

मालिक के तलुवे चाटने वाले आज के संपादकों को अगर किसी में स्पार्क दिख गया तो वे कसाई हो जायेंगे। अव्वलन तो नौकरी नहीं देंगे, और देंगे भी तो ऐसी जगह बिठा देंगे जहां से आप अपना श्रेष्ठ दे ही नहीं सकते। फिर आपको नाकारा घोषित कर देंगे।

संपादक बनने और बनाने की पूरी प्रक्रिया ही उलट चुकी है।

संपादक पद के लिए संपादन, उत्कृष्ट लेखन, अखबार को हर वर्ग आम, बौद्धिक, किसान, मजदूर और ब्यूरोक्रेट के लिए भी जरूरी पठनीय सामग्री से सजा सकने की क्षमता, अब कोई कसौटी नहीं रही।

माने-जाने जन बुद्धिधर्मी अभय कुमार दुबे, आलोक तोमर, यशस्वी पत्रकार स्व. जय प्रकाश शाही का व्यक्तित्व आज के या कभी के किसी समूह संपादक से बहुत बड़ा रहा है।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना या श्रीकांत वर्मा भी संपादक नहीं थे।

दिनमान का वह दिन भी याद है जब उसके लिए कालजयी कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु, पटना में बाढ़ की त्रासद कथा लिखते थे।

हिन्दी की आधुनिक पत्रकारिता ने बीते दशकों में जो उर्ध्व यात्रा की, अब ढलान पर है। तेजी से अपने पतन की ओर। और ढाबे के बुझे चूल्हे में फायर झोंक कर जला देने वाले संपादकों के बूते।

अरे गुंडा हैं तो गैंगवार में उतरें।

पोलैंड में तानाशाही के दिनों में अखबार और दृश्य मीडिया पर सरकार और वर्चस्वशील समूहों का कब्जा हो गया।

टीवी सरकारी भोंपू हो गये। तब लोगों ने टीवी का मुंह अपने घर की खिड़की की ओर कर दिया था। वे टीवी को उधर ही चलने देते और घर छोड़कर सड़क पर आ जाते थे।
भारत में भी ऐसा हो सकता है।

शायद ऐसा न भी हो। क्योंकि सुरेन्द्र प्रताप सिंह के बाद टीवी मीडिया में आम और परेशान लोगों के भरोसे की एक शख्सियत तो है। रवीश कुमार।

थू... गोदी मीडिया पर।

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--किसानी और किसान से कितना पैसा आता है अखबार को?

--जी ..

--जी क्या ?

--और ये साईंनाथ....?

--जी ... 'द हिन्दू' के एडिटर रूरल अफेयर ...

--कितना बिकता है यह अखबार यहां? हम लार्जेस्ट सरकुलेटेड....

--तुम्हारी तनख्वाह कहां से आती है? पता है?

--उस पूंजी और उसके स्रोत की इज्जत करना सीखो...।

संपादक की मौजूदगी में मालिक / डाइरेक्टर उस विशेष संवाददाता को समझा रहा था जो, राज्य में भूमि सुधार न लागू होने से सामंती क्रूरता के सीधे-सीधे और वीभत्स वर्ग विभाजन पर रिपोर्ट तैयार कर रहा था। कई किस्तों के लिये तैयार इस रिपोर्ट में असल किसानों की जोत घटने और खेती बहुत घाटे का उद्यम होते जाने से पलायन की बात थी।

गुनाह इस रिपोर्टर का यह भी था कि वह पी. साईंनाथ को अपना आदर्श मानता था।

-- भैया जो कह रहे हैं समझा करो। तुम्हारे ही भले की बात कह रहे हैं।

(स्थानीय संपादक ने कहा)

मुझे लगता है जिस दिन मुर्गा बनकर, हर उस शख्स ने जिसने कसम ली होगी कि वह आइंदा उस पूंजी का हित पोषण करेगा जिससे उसे तनख्वाह मिलती है, समाचार संपादक के लायक हो गया।

जिसने यह कसम ले ली होगी कि देश और समाज के व्यापक सन्दर्भों से जुड़ने की बैचैनी का वह गला घोंट देगा, संपादकीय प्रभारी होने के अर्ह हो गया।

अब यह न पूछियेगा, तब स्टेट हेड कौन हुआ होगा?

एक संपादक से मैंने कहा भी-- बाहर किसी को अपना पद मत बताइयेगा। केवल पत्रकार कहियेगा। वरना जिसे आप अपना पद बताएंगे, वह जान जायेगा कि आपका लिखने-पढ़ने से कोई ताल्लुक नहीं है।

(कुछ अखबारों के संपादकों के बारे में यह सामान्य अवधारणा है। हां एक-दो अपवाद भी हैं। जो सन्दर्भ समृद्ध और पढ़े-लिखे थे। इसीलिये कहीं 10 साल नहीं रह सके। बस दो या तीन साल अधिकतम)

इन अखबारों के संपादक यह जान गए हैं-- ''अबे भो... अच्छा-बुरा तय करने वाले हम कौन होते हैं? हम वह हर चीज परोसेंगे जिसकी मार्केट डिमांड है।''

ऐसे ही अखबार में एक बार बड़ा बवाल मचा।

हिन्दी पत्रकारिता के शलाका व्यक्तित्व परम आदरणीय प्रभाष जोशी जी का देहावसान हुआ था।

एक भावुक पत्रकार ने इसपर अच्छी खबर बनाई। तब तक इस अखबार के दिल्ली स्थित मुख्यालय से तत्काल मेल और फोन आया। प्रभाष जी के देहावसान की खबर नहीं जायेगी। अगर जाये भी तो भीतर के पन्नों में कहीं संक्षेप में।

यह खबर सबसे पहले वाले डाक एडिशन में जा चुकी थी। हजार कॉपी छपी थी। मशीन रुकवाई गई।

यह बात दिल्ली तक पहुंच ही गयी।

वहां से बार-बार पूछा जा रहा था-- कौन है अपने यहां प्रभाष जोशी का चेला?

स्थानीय संपादक पसीने-पसीने

--नहीं सर, कोई उनका चेला नहीं है। गलती हो गई। दिल्ली का मेल थोड़ी देर से मिला.

यह अखबार प्रभाष जोशी जी के पेड न्यूज के खिलाफ अभियान चलाने से बहुत नाराज था। जोशी जी ने इस अखबार को इंगित भी किया था।

वह रिपोर्टर जिसने उनके देहावसान की खबर लिखी थी, अखबार की कैंटीन में फफक-फफक कर रो रहा था।

मेरी भी आंख डबडबा आयी।

हिन्दी के कई अखबारों में सम्पादक होने की पहली और बुनियादी शर्त अमानवीय होना है।

तभी तो कोई सम्पादक होटल मैनेजर क्या, किसी को झापड़ मार सकता है।

दैनिक जागरण, लखनऊ और पटना में लंबे समय तक सेवारत रहे वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे उर्फ भाऊ की एफबी वॉल से.


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