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व्यास लिखेंगे ही या धनुष भी संभालेंगे

महाभारत की भूमिका तैयार है। सेनाएं आमने-सामने हैं। सभी अपने-अपने घात में। अपने-अपने हथियारों से लैस। किसी के पास जाति का अग्निवाण है तो किसी के पास बाहुबल का ब्रह्मास्त्र। किसी के पास धनबल का फरसा है तो किसी के पास संप्रदाय की ढाल। कोई अपने परिवारपोषक रथ पर सवार है तो कोई शकुनिकीर्ति ध्वज के साथ चलायमान। कोई अपनी अधम चौर्य लालसा को हृदय के भीतर दबाये ग्राम-ग्राम परम गुटवादी महाथिरों से विजय का प्रणत निवेदन कर रहा है तो कोई संकर बर्बरीक पराजितसंभवा  शक्तियों की सहायता के संकल्प से संचालित संपूर्ण परिदृश्य पर दृष्टि गड़ाये भविष्य को देख रहा है।

कौरव संख्या और बल में अधिक हैं। वहाँ दुर्योधन है, दुशासन है, जयद्रथ है। सभी अपनी अपराजेय दुराशाओं के साथ शत्रु से दो-दो हाथ करने को तैयार। वहाँ अनेकानेक चतुर, सुजान, द्युतज्ञान संपन्न, राक्षसी बुद्धि के खल नायक हैं। वे पराजित होकर भी जीतने की कला जानते हैं। वे साम, दाम, दंड और भेद में निपुण और विकट स्वार्थ शास्त्रज्ञ है। उनमें कई छल, प्रपंच की अकाट्य क्षमता में सिद्धहस्त हैं। पांडवों की शक्ति न्यून है। वे वंचना के शिकार हैं। उनका अधिकार बार-बार अतिक्रमित हुआ है। उनसे उनकी जमीन भी छीन ली गयी है। उन्हें छलपूर्वक पराजित करने और मार डालने की कोशिशें होती रही हैं। उनकी संपदा पर दुष्टों ने अराजनीतिक कौशल से अधिकार जमा लिया है। उनके निर्धन और नेक समर्थकों को भी येन-केन-प्रकारेण हतवीर्य और मनोबलशून्य करने के षड्यंत्र किये जाते रहे हैं। उनकी द्रोपदियाँ अरक्षित रही हैं। उनका चीरहरण होता रहा है। कई बार नेपथ्य में तो कई बार राजसभा में। अपराध करने वाले राजधर्माधिकारियों के हाथों पुरस्कृत होते रहे हैं।

धृतराष्ट्र बहुत चिंतित हैं। उन्हें दिखता नहीं। उनकी आँखें काम नहीं करती। उनके हृदय में संवेदन शेष नहीं है। वह यांत्रिक धड़कनों के अलावा कुछ नहीं रह गया है। उनका मोहांधकार और बढ़ा है। मोह न्याय को मार देता है। उनमें न्याय और निष्पक्षता की भावना भी नहीं रह गयी है। व्यास जानते हैं उनकी कठिनाई। वे वुद्धिजीवित हैं, इसलिए ध्यानस्थ चिंतनमग्न हैं। क्या परिणाम होगा, जनाकांक्षाओं का क्या होगा। व्यास कभी मैदान में नहीं आते। वे केवल सोचते हैं और लिखते हैं। गहराई तक, गहनता के साथ। उन्हें पता है राजनीतिक पतन के कारण, छल-छद्म के महाकारण, इंद्रप्रस्थ और लक्ष्मणपुरी की त्रस्त, अभावग्रस्त प्रजा की नियति। उन्हें सब पता है। वे धृतराष्ट्र की विषयाकुलता से भी परिचित हैं। ध्यायतो विषयान् पुंस: संगस्तेषूपजायते। संगात संजायते काम:, कामात क्रोधोपजायते क्रोध से सम्मोह और मोह से स्मृतिभ्रंश हो जाता है।

धृतराष्ट्र का मोह जन-जन में व्याप्त है। निष्पक्षता और तटस्थता की सीमारेखा बहुत क्षीण होती है। युद्ध में निष्पक्ष रहना सार्थक नहीं होता। किसी का पक्ष तो लेना ही पड़ेगा। जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध। मोहग्रस्तता जिस विस्मृति में ले जाकर खड़ा कर देती है, वहाँ तटस्थता नहीं होती पर किस पक्ष में खड़ा होना है, इसका निर्णय कर पाना भी संभव नहीं रह जाता है। पक्ष और विपक्ष तो हैं परंतु पक्षधर बहुत कम हैं। जो सही हैं, जो अन्यायग्रस्त हैं, जो पीड़ित हैं, जिनका अधिकार छीना गया है, जिनकी संपदा पर, जिनकी वधुओं, बेटियों, भगिनियों पर कुत्सित दृष्टि डाली गयी है, जिनकी पत्नियों को अपमानित किया गया है, जिनसे जीने का अधिकार ही छीन लिया गया है, उनको इस युद्ध से क्या मिलेगा। यह तो अहंकार का, वासना का, भोग का, लाभ का युद्ध है। यहाँ तो अधिकांश प्रजा भी धृतराष्ट्र की तरह है।

सभी मोह में हैं। दुर्योधनों के आग्रह को टाल पाना उनके सामर्थ्य में नहीं है। भय भी है, लोभ भी है। उन्हें अपना संत्रास भी याद नहीं रहता, जब कौरवों में से कोई बख्तरधारी रथारूढ़ उनके ग्राम में दाखिल होता है। कभी वह सबका कुशलक्षेम पूछता है, कभी वह सबको करबद्ध प्रणाम करता है, कभी कुछ सिक्के उछाल देता है, कभी जाति, धर्म, संप्रदाय की महिमा का उद्घोष करता है, उसकी रक्षा का अनंतिम आह्वान करता है। महाबली को अपने सामने देखकर प्रजा की स्मृति जाग उठती है। अपने कुल की, जाति की, उसके गौरव की स्मृति। अकिंचनों पर इस अयाचित और विरल कौरव स्नेह से अभिभूत प्रजा पक्ष-विपक्ष की सार्थकता को त्याग कर उसके गुणगान में जुट जाती है। निर्बल क्या कर सकता है, बलशाली है तो सहायता करेगा।

इस महाभारत में अर्जुन और कृष्ण अनुपस्थित हैं। वे अगर हैं भी तो उनके तरकश खाली हैं, उनका ज्ञान काम नहीं कर रहा। उनके पक्ष में बहु मत नहीं है। उनकी कोई सुन नहीं रहा। तो क्या कौरव बिना लड़े ही जीत जायेंगे? उन पर कोई अंकुश नहीं है? व्यास से पूछना पड़ेगा। क्या होगा, इस महाभारत का। व्यास अपने कक्ष में समाधि में हैं। वे नये कथानक को समझ रहे हैं। वे कुछ चैतन्य और पक्षधर महारथियों की भूमिका तलाश रहे हैं। वे समझना चाहते हैं कि इस दृश्य परिवर्तन की दिशा क्या हो सकती है, इसमें उनकी भूमिका क्या हो सकती है। कहीं यह मोहग्रस्तता व्यास के मनन कक्ष तक तो नहीं जा पहुँची? क्या व्यास समझ पायेंगे कि महाभारत के पुनर्पाठ की जरूरत है, क्या वे स्वयं धनुष संभालेंगे, मैदान में उतरेंगे?  

कुटिलकुमार का घोषणापत्र

यह मेरा घोषणापत्र है। इसमें आप के लिए बहुत कुछ है। सोचता हूँ, आप के आस-पास सब कुछ बदल दूँ। सड़कें ठीक करा दूँ। पानी का इंतजाम करा दूँ। स्कूल खुलवा दूँ। हर बार सब ठीक-ठाक ही सोचता हूँ। इस बार भी ठीक-ठाक सोच रहा हूँ। करा नहीं पाता हूँ तो इसमें मेरा कोई कुसूर नहीं, मेरी कोई गलती नहीं। बहुत सारे काम होते हैं। आप समझ नहीं सकते, मैं बता भी नहीं सकता। आप मुझे चुनते हैं तो कुछ अपेक्षाओं के साथ चुनते हैं। मैं कुबूल करता हूँ। सच से भागना मेरे स्वभाव में नहीं है। सच ये है कि मैं आप की अपेक्षाएं पूरी नहीं कर पाता हूं। ये आप का हक बनता है कि आप मुझसे पूछें, क्यूँ? क्योंकि तभी आप मेरी सचाई और ईमानदारी पर यकीन कर पायेंगे। मैं वो भले न कर पाऊँ, जो आप चाहते हैं या जो मैं आप के लिए चाहता हूँ।

परंतु मैं जो कुछ करता हूँ, वह भी आप की भलाई के लिए ही करता हूँ। मुझे कानून बनाने होते हैं, प्रदेश की नयी तस्वीर बनानी होती है। सरकार बनानी होती है, कई बार बनाकर गिरानी भी होती है। ध्यान रखना होता है कि सत्ता में कैसे बना रहा जाये। वहाँ रहकर ही कुछ करने का मौका होता है। आप समझदार है। क्या समझाना। देखिये, जो लोग सरकारों में कुछ साल रह लेते हैं, उनके चेहरे पर किस तरह लुनाई आ जाती है, उनके भाई, भतीजे, रिश्तेदार, नातेदार, सगे-संबंधी किस तरह मालामाल हो जाते हैं, उनके परिजन, बेटे-बेटियाँ, पत्नी या पत्नियाँ किस तरह चाँदी-सोने के चम्मच मुँह में लगाये घूमते हैं, कई बार सियासत में बड़े मौके भी हासिल कर लेते हैं।

यह सब बहुत आसानी से नहीं होता है। बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं, बड़ी जहमतें उठानी पड़ती हैं, खुद का करियर, जिंदगी खतरे में डालनी पड़ती है। भय बना रहता है, पता नहीं कौन सी गलती, कब तकलीफदेह बन जाय। बड़ी मारामारी रहती है। बचपन में अच्छे विद्यार्थी के कुछ जरूरी लक्षण पंडितजी बताया करते थे। कोई श्लोक कहते थे। पूरा तो याद नहीं रहा लेकिन अपने काम का हिस्सा नहीं भूला है। काकचेष्टा, बकोध्यानम्। कौवे और बगुले की ये खासियत अच्छे राजनेता के चरित्र में होनी ही चाहिए। वह घात लगा सके और पूरे ध्यान से, पूरी चालाकी से घात लगा सके तो सफलता तय है। सरकार जनता के लिए बहुत पैसा खर्च करती है। मैं दिल से चाहता हूँ कि लोगों को उसका लाभ मिले लेकिन अब चुनाव पहले जैसा तो रहा नहीं कि पैदल प्रचार कर लो, साइकिल से घूम लो। अगर कोई ऐसा करता है तो लोग उसकी हैसियत समझ लेते हैं और दुत्कार देते हैं। आखिर जनता को भी तो कुछ चाहिए। संतई से तो काम नहीं चलेगा। पाँच साल तो कुछ कर नहीं पाये। कोई बात नहीं, अब चुनाव के वक्त भी कुछ नहीं करें तो काहे लोग पास आयेंगे। और जनहित में कुछ करना है तो पैसा चाहिए।

देखिये किसी और को न कहियेगा। टोल फ्री नंबर न घुमाइयेगा, सीबीआइ को भी न बताइयेगा। बेवजह आप का चाहने वाला परेशान होगा। ये जो भी मैं हूँ, जो भी मेरी हैसियत है, जो भी शानो-शौकत है, गाड़ी, घोड़ा, बंगला है, यह सब आप के ही प्रसाद का परिणाम है। ठेका, कमीशन, सरकारी पैसे की बंदरबाँट से जो कुछ मुझे हासिल हुआ है, वह अकेले मेरा तो है नहीं। सो चिंता न करिये, अभी तक चाहे कुछ भी न किया हो, लेकिन अब भागूँगा नहीं। यह सब आप का ही है, आप पर निछावर। त्वदीयं वस्तु गोविंदम तुभ्यमेव समर्पयेत। मैं बाहुबली हूं, बदमाश हूँ, लुच्चा हूं, धोखेबाज हूँ, जो भी हूँ, आप का हूँ, आप की वजह से हूँ और अब आप की शरण में हूँ।

इस दीन पर कृपा कीजिए, मेरा कल्याण कीजिए। आप परम कृपालु हैं, भोले हैं, अवढर हैं। अगर मैं भस्मासुर बना तो आप के ही आशीर्वाद से। अब देखिये, मैं हर बार आप के हाथ-पाँव जोड़कर, आप को खिला-पिलाकर, आप की मुट्ठी गरम करके आप को खुश कर ही लेता हूँ। इस बार भी आप को खुश होना ही पड़ेगा, मतदाता प्रभो। मेरे पाप भूल जाइये, अपने पुण्य याद करिये। नेकी कर दरिया में डाल। आप जनता हैं माई-बाप। अब देखिये, मुझे रुदन के लिए विवश न करिये। दूरदर्शी, तीरंदाज और मायावी नारदों की मंडली चारों तरफ अपना हरबा-हथियार लिये घूम रही है। मेरी आँख नम हुई नहीं कि वे संजय की तरह सारी दुनिया को मेरा दुखड़ा सुनाना शुरू कर देंगे। मैं अब और शर्मिंदा नहीं होना चाहता।

बुरा न लगे तो मेरी इसी बात को मेरा घोषणापत्र मान लीजिए। वैसे तो आप भरोसा करें तो भी आप का कुछ  बनता नहीं, न भरोसा करें तो मेरा कुछ बिगड़ता नहीं। वोट देना आप का अधिकार है और लेना मेरी मजबूरी। वोट तो आप देंगे ही, आप को देना पड़ेगा। देंगे नहीं तो जायेंगे कहाँ। अगर नहीं भी देंगे तो मुझे आप का वोट लेना आता है। देखिये मैं मदद करने से

कहाँ भागता हूं। कभी भी आइये, मेरा घर खुला है खुला ही रहेगा, तुम्हारे लिए। आप का अपना, कुटिलकुमार।

लेखक डा. सुभाष राय वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक के रूप में कार्यरत हैं.

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