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प्रदेश में नंबर वन का दावा करने वाले अखबार के पहले कॉलम में छपे एक लेख का शीर्षक है- त्राहिमाम् ! लेख में पत्रकारिता के स्वयंभू पुरोधा कहलाने वाले इन महोदय ने जिस प्रकार से सरकार और सरकारी कर्मचारियों पर तंज कसे हैं, काबिले तारीफ है। 

तंज कसें भी क्यों न ? मामला जो न्यायालय की अवमानना का है। लेख में उनकी लेखनी ने बड़ी बड़ी बातें कही हैं। कहीं वे कर्मचारियों की पूरी जमात को डूब मरने की सलाह देते नजर आ रहे हैं तो एक जगह लिखते हैं- "छोटी अदालतों के फ़ैसले तो सरकार पान की तरह चबा जाती है।" 

मगर ज़नाब आप तो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को भी पान में डालने वाली सुपारी से ज्यादा नहीं समझते। क्या मैं गलत कह रहा हूँ ? इसलिए आपकी कलम से ऐसी बातें शोभा नहीं देती हैं। सभी अखबारों सहित आपके संस्थान ने भी अभी तक मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को आज तक लागू नहीं किया है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को एक साल से ज्यादा का समय हो गया है। आप जिस प्रकार से कर्मचारियों का दमन कर रहे हैं, जिस दिन जनता को पता चला और न्यायालय का चाबुक चला, आप भी त्राहिमाम्, त्राहिमाम् करते नज़र आयेंगे।

कुलदीप सिद्धू के एफबी वाल से

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