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बिहार तो बिहार है, हर फन में अलखनिरंजन। वहीं के थे भिखारी ठाकुर। वहां जेपी जैसे आंदोलनकारी और लालू जैसे नेता ही नहीं हुए, आज भी आला-निराला कुछ न कुछ आए दिन वहां सुनने-देखने को मिल ही जाता है। गया जिले में भिखारियों ने अपना 'मंगला बैंक' खोल लिया है तो पटना में खुद की नाटक मंडली बनाकर जगह जगह भिखारी नुक्कड़ मंचन कर रहे हैं।

'शांति कुटीर' के संरक्षण में सात भिखारियों ने भिक्षाटन से निजात दिलाने के लिए ये नाटक मंडली बनाई है। वे अपने नाटक - 'जिसे कल तक देते थे बददुआ, उसे आज देते हैं दुआ' का शहर के कई नुक्कड़ों पर मंचन कर चुके हैं। ज्यादातर मंचन उन स्थानों पर करते हैं, जहां भिखारियों का जमावड़ा रहता है। बिहार सरकार की भिखारियों को मुख्यधारा में लाने की पहल का एक उपक्रम बताया जाता है। दिग्विजय उनको प्रशिक्षित करते हैं। सभी कलाकार अनपढ़ हैं तो खुद ही अपना संवाद बना लेते हैं।

गया शहर में भिखारियों के एक समूह ने अपना एक बैंक खोल लिया है, जिसे वे ही चलाते हैं और उसका प्रबंधन करते हैं, ताकि संकट के समय उन्हें वित्तीय सुरक्षा मिल सके। गया शहर में मां मंगलागौरी मंदिर के द्वार पर वहां आने वाले सैकड़ों श्रद्धालुओं की भिक्षा पर आश्रित रहने वाले दर्जनों भिखारियों ने इस बैंक को शुरू किया है। भिखारियों ने इसका नाम मंगला बैंक रखा है। इस अनोखे बैंक के 40 सदस्य हैं। बैंक प्रबंधक, खजांची और सचिव के साथ ही एक एजेंट और बैंक चलाने वाले अन्य सदस्य  सभी भिखारी हैं। हर एक सदस्य बैंक में हर मंगलवार को 20 रुपए जमा करता है। इसकी स्थापना छह माह पहले हुई है। बैंक आपात स्थिति आने पर भिखारियों की मदद करता है। बैंक के रुपए डूबने से बचाने के लिए कर्ज पर दो से पांच प्रतिशत तक ब्याज देना अनिवार्य होता है।

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