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लखीसराय (बिहार) : बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के दो दिवसीय राज्य सम्मलेन विभूति नारायण राय ने कहा कि हम साहित्य को समाज से जोड़कर देखते हैं. पिछ्ला सौ वर्ष असाधारण समय रहा. दुनिया में नास्तिकता चौथे सबसे बड़े धर्म के रूप में उभरी है. पहले ईश्वर निर्विरोध होते थे. पिछले सौ वर्षों में ईश्वर के साथ-साथ परिवार को भी चुनौती मिली है. आज दुनिया के बहुत से देशों में समलैंगिकता को मान्यता मिल रही है. कुछ वर्ष पहले जिसे स्वीकारा नहीं जाता था, उसे स्वीकारा जा रहा  है.  संस्थाएं बनाना कठिन होता है, उसे तोड़ना आसान। बड़े सपने देखना राज्यविरोधी हो रहा है। राजनीति को मनुष्य के पक्ष में काम करने की जरूरत है.

वरिष्ठ आलोचक डॉ. खगेन्द्र ठाकुर ने 09 अप्रैल की ऐतिहासिकता को रेखांकित करते हुए कहा कि आज के दिन ही लखनऊ में प्रेमचंद और सज्जाद ज़हीर ने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की थी। पं.  राहुल सांकृत्यायन का जन्म दिवस भी आज ही है। प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. अली जावेद ने कहा की इतिहास को वैज्ञानिकता की कसौटी पर लिखा जाना चाहिए. इस्लाम में इस बात की पाबंदी है कि औरतें अपना चेहरा ढंक कर रखे. राम के नाम पर  लोगों को गुमराह किया जाता है. प्रलेस उस परम्परा को मानता है जिसमें सूर, तुलसी, मीर और ग़ालिब एक चश्मे से देखे जाते हैं। 

बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव राजेन्द्र राजन ने अपने प्रतिवेदन में कहा कि आज वैश्विक पूंजी देश के कारपोरेट पूंजी के साथ सहमेल बनाकर उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ा रही है जिससे मनुष्य बाजार  में बिकनेवाला माल बन गया है। आज आप बौद्धिक प्रतिभासम्पन्न हैं लेकिन बाजार में बिकाऊ माल नहीं बन सकते तो आपकी कोई कीमत नहीं है। मनुष्य और मनुष्यता की जगह अर्थ ने अनर्थकारी स्थान हासिल कर लिया है। आज पद, पैसे, सुख एवं ऐश्वर्य के  के चुम्बकीय शक्ति से कमजोर होने वाले खासकर नामधारी एवं पदधारी लेखकों की संख्या कम नहीं है।  ऐसे होशियार लेखक छद्म  क्रांतिकारी बनाने  के लिए संगठन को लिवास की तरह धारण करते हैं।  वे प्रतिरोध की संस्कृति को कुशलतापूर्वक तर्कजाल से  कमजोर बनाते हैं।

सम्मलेन में आये प्रतिनिधियों एवं अतिथियों का स्वागत करते हुए प्रो. विजयेंद्र नारायण सिंह ने कहा कि हम तमाम साहित्यप्रेमियों के शुक्रगुजार हैं. यह धरती राहुल सांकृत्यायन, पं जगन्नाथ चतुर्वेदी, डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, बाबा नागार्जुन, रामधारी सिंह दिनकर आदि से प्रभावित रही है।  आचार्य विनोबा भावे, आचार्य नरेंद्र देव, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद आदि कर्मयोगी का भी प्रभाव क्षेत्र रहा है।  मगही कवि मथुरा प्रसाद नवीन, साहित्यकार कुमार विमल, नंदन शास्त्री एवं अख्तर उरैनवी की तो जन्म एवं कर्मस्थली ही है, जिन्होंने भाषा साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया है। 

बिहार प्रलेस के अध्यक्ष डॉ. ब्रजकुमार पाण्डेय एवं कॉ. सत्यनारायण सिंह ने प्रलेस की भूमिका पर प्रकाश डाला. इस अवसर पर अतिथि साहित्यकारों ने बिहार प्रलेस की पत्रिका 'रोशनाई' एवं 'दखल' का लोकार्पण भी किया. संध्याकालीन सत्र में 'सांस्कृतिक यात्रा' के अंतर्गत राहुल सांकृत्यायन  विचार 'भागो नहीं  दुनिया को बदलो'  शीर्षक बैनर तले राज्य के विभिन्न हिस्सों से आए  साहित्यकार एवं रंगकर्मियों ने नगर में भ्रमण किया. 

सम्मलेन में सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल पतंग का एकल नाट्य 'डेविड की डायरी' का मंचन किया गया. तत्पश्चात जमुई जिला प्रलेस की ओर से ईशा और साक्षी कुमारी ने नृत्य पेश किया। सत्र का संचालन अरविन्द श्रीवास्तव ने किया.

सम्मलेन के प्रथम दिवस का महत्वपूर्ण सत्र 'कवि सम्मलेन' था, कवि शहंशाह आलम की अध्यक्षा एवं राजकिशोर राजन के संचालन में दर्जनों कवियों  ने अपनी कविता का पाठ किया. बक्सर से पधारे कुमार नयन ने सुनाया - खौलते पानी में डाला जाएगा, यूँ हमें धोया  खंगाला जाएगा, लुटाने में लड़ पड़े आपस में हम, इस तरह सिक्का उछाला जाएगा.

जमुई के शायर पैगाम सादिक ने कहा - तुम सजा तो देते हो हौसला नहीं देते, आजतक न जाने किस कसमकस में है मुंसिफ, बहस रोज सुनते फैसला नहीं देते।  ए. दिव्या ने सुनाया - वो कैसी फिजां होती, वो कैसा जहां होता, मैं होती बेगम मुमताज, तू मेरा शाहजहाँ होता।  पूर्णिया से नूतन आनंद ने अपनी -साइकिल चलाती लड़की, बक्सर के शशांक शेखर ने जलाते शहर को देखकर, पटना के श्रवण कुमार ने - माँ शीर्षक कविता का पाठ किया। कवियों में अरुण हरलीवाल (गया) , विभूति कुमार (पटना), कुमार  विजय गुप्त ( मुंगेर), गंगादयाल सिंह (गोपालगंज), राजेन्द्र राज (सूर्यगढ़ा), सौरभ शाण्डिल्य (गया), सुधाकर राजेन्द्र (जहानाबाद) , उमेश पंडित उत्पल (पूर्णिया), सुरेन्द्र भारती (त्रिवेणीगंज), शशिबाला रानी (लखीसराय) , अरविन्द श्रीवास्तव (मधेपुरा)  आदि ने अपनी-अपनी  कविताओं का पाठ किया।

सम्लेन के दूसरे दिन 'प्रगतिशील आंदोलन परम्परा और चुनौतियाँ' विषयक सेमीनार में  प्रो. रवीन्द्रनाथ राय ने कहा कि प्रगतिशीलता का प्रथम बीज कबीर ने डाला था.  प्रेमचंद सौंदर्य को श्रमिकों के पास ले जाना चाहते थे. सदगत, ठाकुर  का कुआं , पूस की रात में जो शोषित वर्ग थे वे प्रेमचंद के नायक बने।  निराला ने अपने प्रतिरोध की मशाल को जलाए रखा।  बिहार के लेखकों को भी प्रेमचंद जागृत करते रहे।  सज्जाद जाहिर, मुल्कराज आनंद और प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ की नींव रखी।  जब सोज़ेवतन 1909 में प्रकाशित  हुआ, सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। फैज पाकिस्तान की जेलों में वर्षों बंद रहे।  प्रगतिशील आंदोलन नें प्रतिरोध को शक्ति दी। आज हम देखते हैं कि इतिहास और मिथक को एक बताया जा रहा है।

उप्र प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव डॉ. संजय श्रीवास्तव ने प्रगतिशील आंदोलन की भूमिका एवं लेखकों की प्रतिवद्धता को रेखांकित किया।  डॉ शचीन्द्र महतो ने कहाकि हमारी महान परम्परा हमें चेतावनी देती है.

प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. अली जावेद  ने स्पष्ट किया कि तसलीमा नसरीन हो या  सलमान रुश्दी,  हम किसी पर अंकुश लगाने का विरोध करते हैं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के गला घोंटने का विरोध करते हैं लेकिन वे हमारे आदर्श नहीं हैं. हम लेखन के जरिए वैज्ञानिक सोच बढ़ाने की बात करते हैं, धर्म को हथियार बनाकर सत्ता हासिल करना गलत मानते हैं.

इस सत्र की अध्यक्षा करते हुए डॉ. खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि साहित्य का स्रोत जनता ही है. आधुनिक युग चेतना के प्रवर्तक भारतेंदु थे, भारतेंदु ने समाज के नए लक्षण को पहचाना..  हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है कि हमें अपने समय को पहचानना चाहिए.  आज समाज में उनका वर्चस्व बढ़ रहा है जो प्रगतिशीलता के विरोधी हैं जनतंत्र के विरोधी हैं. सम्मलेन में जिला इकाईयों  द्वारा लगाया गया कविता-पोस्टर, पुस्तक प्रदर्शनी आदि भी आकर्षण में रहे. इस  यादगार  आयोजन के लिए प्रतिभागियों ने लखीसराय की जनता का आभार व्यक्त किया.

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