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भोपाल नगर निगम में जबसे तेजस्वी नायक के बाद छवि भारद्वाज के आयुक्त बनने की खबर आई है भोपाल के मीडिया का फोकस उन पर आ गया है। उनकी तैनाती की खबर फोटो के साथ छपी और अगले दिन फोन पर लिया गया मिनी इंटरव्यू फोटो के साथ छपा। इसके अगले दिन उनके कार्यभार ग्रहण करने के दिन की सूचना देने वाली खबर फिर फोटो के साथ छपी और फिर कार्यभार संभालने की खबर भी फोटो.

इस प्रकार का महिमामंडन अफसरों का दिमाग खराब करने और उन्हे अहंकारी तथा प्रचारप्रेमी बनाने मे भरपूर योगदान देता है। क्या आयुक्त का पद ग्रहण करना इतना बड़ा कार्यक्रम था कि उसमें महापौर मौजूद रहते। क्या यह वाकई खबर थी? तब तो हर चीफ़ सेक्रेटरी के पद ग्रहण करते समय मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक के पद ग्रहण करते समय गृहमंत्री के मौजूद ना रहने पर भी सवाल उठाए जाने चाहिए. नोट कर लीजिए, ऐसी ही मीडियाबाजी होती रही तो वह दिन भी दूर नहीं.

ऐसा नहीं है कि भास्कर और अन्य अखबारों द्वारा नए आयुक्त की बेजा पब्लिसिटी की वजह उनका महिला होना या कोई विशेष उपलब्धि उनके खाते में दर्ज होना है। दरअसल राजधानी का नगर निगम और उसके आयुक्त का पद है ही ऐसा है जहां कारोबारियों और धंधेबाजों को आए दिन हाजरी बजानी पड़ती है। भोपाल के लगभग सभी पुराने मीडिया मालिक दूसरे कारोबारों मे उतर कर उसे प्रमोट करने के लिए अपने रुतबे का बेजा इस्तेमाल करते रहते हैं। यह बात दीगर है की कुछ कामयाब हैं तो कुछ बिकने की हद तक बर्बाद हो चुके हैं। जो कामयाब हैं वे सौ करोड़ गरीबों के देश में सकारात्मक खबरों के नाम पर हकीकत से मुँह चुराते नजर आते हैं।     

इन कामयाब मालिकों की देखा-देखी भोपाल के बहुत से बिल्डर आदि कारोबारी पत्रकारिता का दोहन करने के लिए मीडिया मे घुस आए हैं। इसलिए भोपाल के सभी छोटे-बड़े दैनिक और लोकल चैनल अब पत्रकारिता तो क्या खाक करते, बस ये मालिकों के कारोबारी हितों का मुखौटा भर बन कर रह गए हैं। उनके लिए तेजस्वी नायक या छवि भारद्वाज के बजाय आयुक्त का पद ज्यादा माने रखता है। जब तेजस्वी नायक से उल्लू सीधा नहीं हुआ तो नेताओं की आड़ में उनके खिलाफ हो गए थे।

भोपाल से श्रीप्रकाश दीक्षित की रिपोर्ट.

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