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शराब के कारण होने वाली सड़क-दुर्घटनाओं को कम करने की मंशा से उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये हालिया फैसले के बाद जिस प्रकार शराब-लॉबी के दबाव में उत्तराखण्ड की प्रदेश सरकार ने आनन-फानन प्रदेश के राष्ट्रीय राज-मार्गों को राज्य और राज्य-स्तरिय सड़कों को जिला-मार्ग घोषित कर दिया उससे निश्चित रूप से न्य़ायालय का मान घटा है। इससे न केवल न्याय का मूल भाव ही समाप्त हो गया, बल्कि न्यायालय की सारी प्रतिष्ठा ही धूल-धूसरित कर दी गई। आश्चर्य की बात तो यह है कि उच्चतम न्यायालय भी इस मनमानी को मूक-दर्शक बन आँख-कान मूँद कर अनदेखा-अनसुना कर रहा है। क्या सरकार का यह कृत्य न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं है?

क्या सड़कों के नाम व स्तर बदल देने से उन पर चलने वाला यातायात कम हो जायेगा अथवा उन पर दुर्घटनाएं कम हो जायेंगी? उत्तराखण्ड की पूरी कैबिनेट में कितने बुद्धिहीन या शराब लॉबी के ज़र-खरीद भरे हुए हैं, यह घोषणा इसका जीता-जागता उदाहरण है। कांग्रेस से भाजपा में आकर वर्तमान प्रदेश-कैबिनेट में शामिल एक वरिष्ठ नेता ने एक बार मुझसे कहा था--"इस दुनिया मे सब लोग बिकाऊ हैं लेकिन कीमत सबकी अलग-अलग है।" उनकी उस बात से अब साफ हुआ कि उन्होंने भी शराब-लॉबी से अपनी कीमत वसूल ली है।

किसी ने सच कहा है--"अति सर्वत्र वर्जयेत्" अर्थात् अति सब जगह हानिकारक है। लोकतंत्र में जरूरत से अधिक जन-समर्थन डिक्टेटरशिप को जन्म देता है। हालिया चुनाव में हासिल ऐतिहासिक जन-समर्थन के बाद मुख्यमंत्री बने त्रिवेन्द्रसिंह रावत इस तरह का निर्णय जनता पर थोप देंगे, इसकी उम्मीद किसी को भी नहीं थी। सरकार का यह निर्णय न केवल जन-सरोकारों की, बल्कि देश की न्याय-व्यवस्था के प्रति उनकी सोच-समझ को भी प्रदर्शित करता है।

न्यायालय के आदेश-निर्देशों को सरकार द्वारा अपनी सुविधानुसार कभी संविधान संशोधन तो कभी मन्त्रिमण्डलीय सहमति से उलट-पलट देने का खेल देश में बहुत पहले से होता आया है। जिसे न्यायालय चुपचाप देखते रहे। राजीव गांधी के शासनकाल में इंदौर (मप्र.) के एक वकील की 62 वर्षीय पत्नी और पाँच बच्चों की माँ शाहबानो को चालीस साल के वैवाहिक जीवन के बाद दिये गये तलाक के चर्चित मामले ने तो देश की मुख्यधारा की राजनीति का चरित्र ही बदल कर रख दिया। वह कांग्रेस की मुस्लिम-तुष्टिकरण का एक ऐतिहासिक मामला था, जिसके लिए 1986 में संविधान में संशोधन कर उसे न्यायालय के निर्णय की तारीख से भी पहले के दिन से लागू करने की घोषणा कर दी गई थी।

न्याय-प्राप्ति के लिए पीड़ित पक्ष न्यायालय में गुहार लगाता है, जिस पर न्यायालय समुचित प्रक्रिया का पालन कर विधि-सम्मत निर्णय देता है। अब राष्ट्रीय राजमार्गों के निकटवर्ती शराब बिक्री केन्द्रों को एक निश्चित दूरी तक हटाने के उच्चतम न्यायायालय के निर्णय को लेकर जिस तरह के हालात बना दिये गये हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं। सरकार ने इस फैसले को दुर्घटनाएं रोकने के एक उपाय के तौर पर न लेकर इसे अपनी आमदनी पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव के नजरिये से देखा।

एर्नाकुलम (केरल) के एक शराब व्यवसायी ने सड़क के किनारे स्थित अपनी दुकान हटाने की अपेक्षा उसके चारों तरफ छः फीट ऊंची दीवार बना कर सीधे रास्ते को भूल-भुलैया की तरह टेढ़ा-मेढ़ा कर दिया। इससे उस दुकान तक पहुंचने का रास्ता लंबा हो गया। इस पर वहां के निगम व प्रशासन के अधिकारियों का तर्क था कि हम सड़क से दुकान का रास्ता वायु-मार्ग से नहीं उसकी धरातलीय दूरी से नापते हैं। यह देश की न्याय व प्रशासनिक व्यवस्था के साथ कितना बड़ा क्रूर मजाक है।

सोचने की बात है कि क्या सरकार 'जनता पर कुछ लोगों द्वारा शासन करने की प्रणाली' है या जनता को स्वच्छ तथा ईमानदार व्यवस्था उपलब्ध कराने वाली जन-संस्था है ! न्याय का तकाजा है कि वह न केवल होना चाहिये, बल्कि होता दिखना भी चाहिए। लेकिन इस मामले में न्याय तो हुआ लेकिन जब उसके धरातल पर उतरने की बारी आई तो उसे लागू करने को जिम्मेदार सरकार ने ही उसकी गर्दन मरोड़ दी। अब ऐसे में कोई कैसे मान ले कि न्याय हुआ ही क्योंकि न्यायालय भी तो अपने फैसले की धज्जियां उड़ते चुपचाप देख-सुन रहा है।

लेखक श्यामसिंह रावत उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क के जरिए किया जा सकता है.

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