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Punya Prasun Bajpai : शाह को शह देकर योगी के आसरे संघ का राजनीतिक प्रयोग.... ये बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को संघ की शह-मात है। ये नरेन्द्र मोदी की कट्टर हिन्दुत्व को शह-मात है। ये मुस्लिम तुष्टीकरण राजनीति में फंसी सेक्यूलर राजनीति को संघ की सियासी समझ की शह-मात है। ये मोदी का हिन्दुत्व राजनीति के एसिड टेस्ट का एलान है। ये संघ का भगवा के आसरे विकास करने के एसिट टेस्ट का एलान है। ये हिन्दुत्व सोच तले कांग्रेस को शह मात का खेल है, जिसमें जिसमें योगी आदित्यनाथ के जरीये विकास और करप्शन फ्री हालात पैदा कर चुनौती देने का एलान है कि विपक्ष खुद को हिन्दू विरोधी माने या फिर संघ के हिन्दुत्व को मान्यता दे।

यूपी के नये सीएम के एलान के साथ कई थ्योरियों ने जन्म तो ले ही लिया है। हर थ्योरी पहली बार उस पारंपरिक राजनीति से टकरा रही है, जिसे अभी तक प्रोफेशनल माना गया। लेकिन योगी आदित्यनाथ के जरीये राजनीतिक बदलाव की सोच पहली बार उसी राजनीति को शह मात दे गई जिसके दायरे में लगातार बीजेपी के कांग्रेसीकरण होने से संघ परेशान था। संघ के भीतर सावरकर थ्योरी से हेडगेवार थ्योरी टकराने की आहट से बीजेपी परेशान रहती थी। तो जरा योगी आदित्यनाथ के जरीये इस सिलसिले को समझें कि आखिर बीजेपी अध्यक्ष ने ही सबसे पहले गवर्नेंस के नाम पर केन्द्रीय मंत्री मनोज सिन्हा के नाम पर मुहर लगायी।

संघ के पास सहमति के लिये मनोज सिन्हा का नाम भेजा। ये मान कर भेजा कि संघ मनोज सिन्हा के नाम पर अपना मूक ठप्पा लगा देगा क्योंकि संघ राजनीतिक फैसलों में दखल नहीं देता। लेकिन इस हकीकत को अमित शाह भी समझ नहीं पाये कि जिस तरह की सोशल इंजीनियरिंग का चुनावी प्रयोग यूपी में बीते तीन बरस के दौर में शामिल हुये बाहरी यानी दूसरे दलों से आये करीब सौ से ज्यादा नेताओं को बीजेपी का टिकट दिया गया और यूपी के आठ प्रांत प्रचारकों से लेकर दो क्षेत्रवार प्रचारको की भी नहीं सुनी गई उसके बावजूद स्वयंसेवक यूपी में बीजेपी की जीत के लिये जुटा रहा तो उसके पीछे कहीं ना कहीं संघ और सरकार के बीच पुल का काम कर रहे संघ के कृष्ण गोपाल की ही सक्रियता रही, जिससे उन्होंने राजनीतिक तौर पर स्वयंसेवकों को मथा और चुनावी जीत के लिये जमीनी स्तर पर विहिप से लेकर साधु-संतों और स्वयंसेवकों को जीत के लिये गाव गांव में तैयार किया।

ऐसे में मनोज सिन्हा के जरीये दिल्ली से यूपी को चलाने की जो सोच प्रोफनल्स राजनेताओं के तौर पर बीजेपी में जागी उस शह-मात के जरीये संघ ने योगी आदित्यनाथ का नाम सीधे रखकर साफ संकेत दे दिये सफलता संघ की सोच की है। और जनादेश जब संघ से निकले नेताओं की सोच में ढल रहा है तो फिर संकेत की राजनीति के आसरे आगे नहीं बढा जा सकता है और यूपी के जो तीन सवाल कानून व्यवस्था, करप्शन और मुस्लिम तुष्टिकरण के आसरे चल रहे है, उसे हिन्दुत्व के बैनर तले ही साधना होगा। अमित शाह के प्रस्ताव को संघ ने खारिज किया तो मोदी संघ के साथ इसलिये खड़े हो गये क्योंकि मंदिर से लेकर गौ हत्या और मुस्लिम तुष्टीकरण से लेकर असमान विकास की सोच को लेकर जो सवाल कभी विहिप तो कभी संघ के दूसरे संगठन या फिर सांसद के तौर पर साक्षी महाराज या मनोरंजन ज्योति उठाते रहे उन पर खुद ब खुद रोक आदित्यनाथ के आते ही लग जायेगी या फिर झटके में हिन्दुत्व के कटघरे से बाहर मोदी हर किसी को दिखायी देने लगेंगे।

इसी के सामानांतर जब ये सवाल उठेंगे कि मुस्लिम तो हिन्दु हो नहीं सकता लेकिन दलित या अन्य पिछड़ा तबका तो हिंदू है तो फिर उसके पिछडे़पन का इलाज कैसे होगा। तो विकास के दायरे में केशव प्रसाद मोर्य को डिप्टी सीएम बनाकर उसी राजनीति को हिन्दुत्व के आसरे साधा जायेगा जैसा राम मंदिऱ का शीला पूजन एक दलित से कराया गया था। यानी हिन्दुत्व के उग्र तेवर उंची नहीं पिछडी जातियों के जरिये उभारा जायेगा।

जो सवाल आरएसएस के भीतर सवारकर बनाम हेडगेवार के हिन्दुत्व को लेकर उग्र और मुलायम सोच तले बहस के तौर पर लगातार चलती रही उसपर भी विराम लगा जायेगा क्योंकि योगी आदित्यनाथ की पहचान तो हिन्दु महासभा से जुडी रही है। एक वक्त कट्टर हिन्दुत्व के आसरे ही योगी आदित्यनाथ ने बीजेपी की राजनीति को चुनौती अलग पार्टी बनाकर दी थी। 50 के दशक में तो गोरखपुर मंदिर तक नानाजी देशमुख को इसलिये छोड़ना पडा था क्योकि तब गोरखपुर मंदिर में हिन्दू महासभा के स्वामी दिग्विजय से वैचारिक टकराव हो गया था और तभी से ये माना जाता रहा कि हिन्दुत्व को लेकर जो सोच सावरकर की रही उससे बचते बचाते हुये ही संघ ने खुद का विस्तार किया। लेकिन राम मंदिर का सवाल जब जब संघ के भीतर उठा तब तब उसके रास्ते को लेकर सावरकर गुट के निशाने पर बीजेपी भी आई।

यानी मोदी की योगी आदित्यनाथ के नाम पर सहमति कही ना कही सरसंघचालक मोहन भागवत को भी शह मात है। इन तमाम राजनीतिक धाराओं का सच ये भी है कि जिस तरह मोदी-संघ ने यूपी की राजनीति को जनादेश से लेकर विचार के तौर पर झटके में बदल दिया है उसमें अगर कोई सामान्य तौर पर ये मान रहा है कि पिछड़ी जातियों की राजनीति या मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति में उभार आ जायेगा। तो फिलहाल कहा जा सकता है कि ये भूल होगी। लेकिन इतिहास के गर्त में क्या छुपा है और आने वाला वक्त कैसे यूपी को सियासी प्रयोगशाला बनाकर मथेगा, इसका इंतजार हर किसी को करना ही होगा क्योंकि यूपी सिर्फ सबसे बड़ा सूबा भर नहीं है बल्कि ये संघ की ऐसी प्रयोगशाला है जिसमें तपकर या तो देश की राजनीति बदलेगी या फिर हिन्दुत्व की राजनीति को मान्यता मिलेगी।

आजतक में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी की एफबी वॉल से.

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