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कुछ लोग ठीक कहते हैं कि आजकल की बाजारू पत्रकारिता के दौर में किसी पत्रकार के लिए कलर महत्वपूर्ण नहीं है. उसके लिए महत्वपूर्ण है सत्ता सिस्टम से नजदीकी. अगर यह काम हो रहा है तो वह किसी भी रंग में रंगने को तैयार हैं. यही कारण है कि जब मायावती यूपी में सीएम होती हैं तो ज्यादातर पत्रकार नीले रंग से रंगे होते हैं. सपा का दौर होता है तो पत्रकार अचानक से समाजवादी विचारधारा के नजदीक खुद को मानने लगते हैं. अब भाजपा की सरकार यूपी में है तो पत्रकारों का रंग भगवा हो गया है.

इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देखने को मिला लखनऊ में सीएम रेजीडेंस 5, कालिदास मार्ग पर. यहां यूपी और राजस्थान सरकारों के बीच एक समझौता हुआ, रोडवेज बसों का आपसी नेटवर्क मजबूत करने को लेकर. इसी को लेकर प्रेस कांफ्रेंस बुलाई गई थी. इस पीसी में पत्रकारों को भगवा दुपट्टा दिया जाने लगा तो पत्रकारों में इस गमछे के लिए भी होड़ मच गई. कुछ ने तो कई कई गमछे-दुपट्टे हथियाने की कोशिश की. ज्यादातर ने ये दुपट्टा गले में लपेटा और गर्व से पीसी में बैठ गए. इस तरह 5, कालिदास मार्ग में मौजूद मीडिया भगवा दुपट्टामय हो गया.

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