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Nitin Thakur : जब एक पत्रकार कोई सवाल करता है तो वो इस उम्मीद में नहीं करता कि सामनेवाला चुप हो जाए। वो वाकई चाहता है कि जवाब आए। जवाब आता है और अगर जवाब देनेवाला नेता हो तो बड़े जुमलों और भारी भाषा के साथ पूरी सफाई पेश करता है। इसके बाद पत्रकार अगले सवाल की तरफ बढ़ता है क्योंकि उसका काम हो चुका होता है। इसे कुछ चिंटू ये कह कर प्रचारित करते हैं कि वाह अमुक नेता ने पत्रकार की क्या बोलती बंद कर दी.. चिंटू जी, पत्रकार बोलने के लिए नहीं बुलवाने के लिए ही होता है।

वो चुभते सवाल ही इसलिए करता है ताकि आप को वो जवाब मिल सके जो नेता जी सीने में दबाए बैठे हैं, इसलिए अगली बार जब कोई पत्रकार सवाल करे और सामने से जवाब आए तो उसे पत्रकार की हार नहीं उपलब्धि समझिए। मुझे मालूम है कि देश में कहीं भी ठीक ठीक पत्रकारिता नहीं पढ़ाई जाती तो इस बेसिक समझ का अभाव इस लाइन में आने की कोशिश कर रहे ''डूड जर्नलिस्ट्स'' में भी है। उनकी धारणा है कि पत्रकार सामनेवाले से बहस करने के लिए होता है।

फेसबुक के चर्चित लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से. उपरोक्त पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं....

सुशांत शर्मा Han. Bahut sahi . Youtube pe rajdeep aur modi ji ke kuchh videos hain jinme rajdeep modi ji ke truck me baithe hain 2012 gujarat chunaav ke. Usme modi ji ne kuchh ulta seedha bola aur video ke caption hai, modi insulted rajdeep sardesai. Little do they know ki video as it play karwana bhi rajdeep ke hath me hi tha. Insult karwa ke bhi poora video sab log ko dikhaya hai. Aise hi patrakaaron ko bika hua kah dene se kaam nahi chalega desh ka !

Nitin Thakur सुशांत शर्मा बेशक। पत्रकार गाली खाकर, कारों के पीछे दौड़कर, नीचे बैठकर सिर्फ इसलिए जानकारियां जुगाड़ता है ताकि लोगों तक पहुंचा सके। टीवी ही नहीं, चाहे प्रिंट हो या फिर वेब या फिर कोई भी दूसरा माध्यम पत्रकार के पास जानकारी पाने के ये ही तरीके हैं। राजदीप सरदेसाई जितने बड़े घर से ताल्लुक रखते हैं उन्हें ये सब करने की ज़रूरत ही नहीं थी। उन्हें रोज़ी रोटी जैसा कोई संकट ही नहीं। उनके पिता की एकेडमी में सचिन तेंदुल्कर जैसे खिलाड़ियों ने क्रिकेट का ककहरा सीखा था। माना कि इन लोगों में लाख बुराइयां होंगी जो सबमें होती हैं पर इन्होंने खबर जुगाड़ने के लिए सिर्फ फोनबाज़ी नहीं की बल्कि जोखिम लेकर स्पॉट पर पहुंच रिपोर्ट्स दर्ज की। आज दौर चला है सवालों पर लगाम लगाने का। विपक्ष वगैरह को तो चुनाव में हराकर आप संख्या में कम कर सकते हो, बिकने वालों को खरीद सकते हो लेकिन ईमानदार और प्रतिबद्ध पत्रकार को खत्म करने का तरीका यही खोजा गया कि चार बेइमानों के नाम लेकर पूरे पेशे की विश्वसनीयता खत्म कर डालो। अब नेताओं से किया गया कोई आम और सहज सवाल भी दलाली से निकला सवाल आसानी से बनाया जा सकता है। इस पेशे को रगेदने में जितने ज़िम्मेदार पत्रकारिता संस्थान चलानेवाले हैं, उससे बहुत ज़्यादा वो हैं जिन्होंने पत्रकारों की क्रेडिबिलिटी को अपने लाभ के लिए भोथरा बनाया। अस्पतालों में शूटिंग मना होती है, सरकारी कार्यालयों में भी इजाजत नहीं होती लेकिन एक पत्रकार कैमरा छिपाकर और कानून तोड़कर वहां ये शूट करने के लिए पहुंचता है कि देखिए कानून तोड़ा जा रहा है। उस चैलेंज और रिस्क का सामना कोई नहीं कर सकता जब आप किसी चुने हुए नेता के क्षेत्र में पहुंचकर उसके वोटर्स से ही पूछ रहे होते हैं क्या आपके नेता ने आपकी परेशानी हल कर दी?

Pradeep Balbir Singh Negi बोलती बंद का कांसेप्ट इसलिए आया क्योंकि आजकल पत्रकार रह ही कहाँ गए है वो तो पार्टी की एजेंट्स हो गए है इसलिए जब वो अपनी पार्टी जी ओर से सवाल दागते है तो सामने वाले का जवाब कम और चुप्पी ज्यादा चाहते है । पत्रकारिता कम और शह और मात का खेल ज्यादा चलता है।

Manish Chandra Mishra सही बात...और टीवी वालों ने ऑन कैमरा कुछ ज्यादा ही एक्टिंग सिखा दी नेताओं को. ये एंकरानियां जब जबरदस्ती का कड़ा रुख अपनाती है तो बड़ी फनी लगती है. आजकल देवगन तो जबरदस्ती के साथ भी जबरदस्ती कर रहा है.

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