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Vineet Kumar : ये संबित पात्रा का अपमान नहीं, टीवी में भाषा की तमीज बचाने की कोशिश है... कल रात के शो में निधि राजदान (NDTV 24X7) ने बीजेपी प्रवक्ता और न्यूज चैनल पैनल के चर्चित चेहरे में से एक संबित पात्रा से सवाल किया. सवाल का जवाब देने के बजाय संबित ने कहा कि ये एनडीटीवी का एजेंडा है, चैनल एजेंडे पर काम करता है. निधि राजदान को ये बात इतनी नागवार गुजरी कि उसके बाद आखिर-आखिर तक सिर्फ एक ही बात दोहराती रही- ''प्लीज, आप इस शो से जा सकते हैं. आप प्लीज ये शो छोड़कर चले जाएं. ये क्या बात हुई कि आपसे कोई सवाल करे तो आपको वो एजेंडा लगने लग जाए.''

संबित इसके बावजूद शो में बने रहे और कहा कि वो चैनल को एक्सपोज करेंगे, निधि ने आगे जोड़ा- ''आपको दूरदर्शन की तरह जो चैनल ग्लोरिफाय करके दिखाते हो, वहीं जाएं, एनडीटीवी पर मत ही आएं.''

इस पूरी घटना के कई पाठ हो सकते हैं. इसे संबित पात्रा सहित देश की सबसे बड़ी पार्टी का अपमान के साथ जोड़कर देखा जा सकता है. दूसरी तरफ निधि राजदान की बतौर एक एंकर ताकत का भी अंदाजा लगाया जा सकता है. उनकी हीरोईक प्रेजेंस को सिलेब्रेट किया जा सकता है और विरोधी पार्टी के लोग रात से ही शुरु हो गए हैं. ये भी कहा जा सकता है कि एक एंकर जब अपने काम को ठीक-ठीक समझ पाए तो वो बहस के नाम पर कुछ भी बोलने नहीं दे सकते. लेकिन इन बहुस्तरीय पाठ के बीच जो सबसे जरुरी चीज है कि निधि राजदान ने जिस अंदाज में संबित पात्रा को शो से जाने कहा और एजेंड़े शब्द पर आपत्ति दर्ज की, वो इस बात की मिसाल है कि टीवी में तेजी से खत्म होती भाषा के बीच उसे बचाने की जद्दोजहद और तमीज बनाए रखने की कोशिश है. तथ्य के बदले पर्सेप्शन या धारणा, सहमति-असहमति के बजाय खुली चुनौती और देख लेंगे के अंदाज में जो नुरा कुश्ती चलती रहती है, उससे अलग निधि का इस तरह टोका जाना इस बात का संकेत है कि आप कहने के नाम पर कुछ भी नहीं कह सकते.

व्यावसायिक स्तर पर एनडीटीवी ग्रुप के अपने कई पेंच हो सकते हैं और उन्हें वैधानिक स्तर पर चुनौती मिलती रही है लेकिन एक एंकर जब सतर्कता से अपने पैनलिस्ट को पर्सेप्शन बनाने से रोकते हैं तो इसका एक अर्थ ये भी है कि वो अपने चैनल ब्रांड को लेकर कॉन्शस है. उन्हें पता है कि जब एजेंडा शब्द को पचा लिया जाएगा तो इसकी ब्रांड वैल्यू पर बुरा असर पड़ेगा. इसे सुनकर रह जाना खुद की क्रेडिबिलिटी पर बड़ा सवाल है.

आज जबकि हर दूसरे-तीसरे चैनल के एंकर ब्रांडिंग और वीरगाथा काल में फर्क करना तेजी से भूलते जा रहे हों, निधि राजदान का ये हस्तक्षेप टीवी में भाषा की तेजी से खत्म होती तमीज की तरफ इशारा है. एक मीडिया छात्र के नाते हमें इस सिरे से भी सोचना होगा कि एक तरफ जब एंकर खुद बेलगाम होते जा रहे हों, वो खुद ऐसे शब्दों का प्रयोग करते आए हों जिन्हें सुनकर आपकी उम्मीदें घुट-घुटकर दम तोड़ दे रही हों, निधि राजदान का ये अंदाज न्यूज चैनल की एक दूसरी परंपरा जो तेजी से खत्म होती जा रही है, याद करने की बेचैनी है, उसे बचाए रखने की कोशिश है.

आनेवाले समय में बहुत संभव है संबित सहित पूरी तरह उनकी पार्टी भी इस चैनल का बायकॉट कर दे लेकिन इससे पहले इस वीडियो से गुजरा जाएं तो आप इस बात से असहमत नहीं हो सकेंगे कि भाषा की ध्वस्त परिस्थिति में एक एंकर ऐसा करके दरअसल खुद को, अपने पेशे की गरिमा बचाने की कोशिश कर रही हैं. अपने सालों की उस मेहनत को जो नौकरी से कहीं आगे की चीज हैं. एक मीडियाकर्मी यदि भाषा के स्तर पर समझौते कर लेता है तो इसका मतलब है कि बाकी का उसका पूरा काम व्याकरण ठीक करते रहने में निकल जाएगा. भाषा व्याकरण से कहीं आगे एक बेहतर समाज की परिकल्पना है.

वीडियो के लिए चटकाएं.

https://www.youtube.com/watch?v=mhSKGOEHM9A

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार की एफबी वॉल से.

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