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15 लाख करोड़ तक जमा हो गए बैंकों में, 97 प्रतिशत 1000 और 500 के खारिज किए नोट पहुंचे रिजर्व बैंक के पास, मात्र 47 हजार करोड़ ही बचे : खाया-पीया कुछ नहीं, गिलास फोड़ा बारह आना... ये कहावत मोदी सरकार की नोटबंदी पर पूरी तरह चरितार्थ होती है। खबरों की पुष्टि इन आंकड़ों से हो जाती है कि 30 दिसम्बर तक देशभर की बैंकों में 14.97 करोड़ रुपए मूल्य के 1000 और 500 के खारीज किए नोट जमा हो गए। नोटबंदी के वक्त रिजर्व बैंक ने वैसे तो साढ़े 14 लाख करोड़ के नोट चलन से बाहर करने का दावा किया था, जो बाद में बढ़कर 15.44 लाख करोड़ बताया गया। इस आंकड़े के मुताबिक भी मात्र 47 हजार करोड़ रुपए के नोट ही ऐसे रहे जो बैंकों में जमा नहीं हो पाए। हालांकि अभी भी कई लोग रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के बाहर अपने नोट बदलवाने के लिए खड़े हैं। इतना ही नहीं एक बड़ी राशि लोगों ने महंगा सोना खरीदने और प्रॉपर्टी सहित अन्य जगह खपा दी। इसका मतलब यह हुआ कि 97 प्रतिशत नोट जहां जमा हुए, वहीं बचे 3 प्रतिशत का भी बड़ा हिस्सा लोगों ने अपनी जुगाड़ के जरिए अलग-अलग तरीकों से खपा डाला।

8 नवम्बर को जब नोटबंदी की घोषणा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने की, तब यह अनुमान लगाया गया था कि 4 से 5 लाख करोड़ रुपए ऐसे होंगे जो बैंकों में किसी सूरत में जमा नहीं हो सकेंगे। यानि इतना कालाधन पूरी तरह से कागज साबित हो जाएगा और रिजर्व बैंक को इतने रुपयों की देनदारी नहीं रहेगी और यह पैसा मोदी सरकार को प्रतिभूति के रूप में प्राप्त हो जाएगा। यही कारण है कि शुरुआत में मीडिया सहित मोदी भक्तों ने नोटबंदी का जोरदार समर्थन किया। हालांकि तब ही यह अंदेशा लगाया जा चुका था कि 30 दिसम्बर तक इसमें से अधिकांश पैसा जमा हो जाएगा और हुआ भी यही। नवम्बर अंत और दिसम्बर के पहले पखवाड़े तक ही लोगों ने अपने 1000 और 500 के नोट ठिकाने लगा दिए और हालत यह हुई कि बाद के 15 दिनों में तो कैश इन हैंड वालों को पुराने नोट ही प्रीमियम चुकाने के बावजूद हासिल नहीं हुए। नोटबंदी के वक्त मोदी सरकार और रिजर्व बैंक की ओर से दावा किया गया था कि लगभग साढ़े 14 लाख करोड़ के 1000 और 500 के नोट चलन से बाहर किए गए हैं। बाद में यह आंकड़ा बढ़कर 15.44 लाख करोड़ बताया गया। जब बैंकों में बड़ी मात्रा में पैसा जमा होने लगा तो 10 दिसम्बर के बाद रिजर्व बैंक ने अधिकृत रूप से आंकड़े जारी करना बंद कर दिए। यहां तक कि 31 दिसम्बर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो राष्ट्र के नाम संदेश दिया उसमें उन्होंने आधा बजट भाषण तो पढ़ दिया, मगर नोटबंदी का लेखा-जोखा प्रस्तुत ही नहीं किया।

आज तक रिजर्व बैंक ने अधिकृत रूप से यह नहीं बताया कि कुल कितने मूल्य के खारिज किए नोट उसके पास जमा हो चुके हैं। अभी आर्थिक मामलों की प्रतिष्ठित ब्लूमबर्ग न्यूज एजेंसी ने जरूर यह आंकड़ा जाहिर कर दिया है। उसकी रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी के बीच यानि 30 दिसम्बर तक देशभर की बैंकों और डाक घरों में 97 प्रतिशत  1000 और 500 के नोट जमा हो गए थे। 15.44 लाख करोड़ में से 14.97 यानि 15 लाख करोड़ रुपए तक के नोट जमा हो गए। इसके हिसाब से सिर्फ 47 हजार करोड़ रुपए के नोट ही ऐसे बचे जो बैंकों में जमा नहीं हो सके हैं। पहले तो मोदी जी सहित वित्त मंत्री और रिजर्व बैंक ने स्पष्ट घोषणा की थी कि 30 दिसम्बर तक पुराने नोट बैंकों में जमा होंगे और उसके बाद 31 मार्च 2017 तक रिजर्व बैंक इन नोटों को बदलकर देगी, लेकिन रिजर्व बैंक ने 60 से अधिक नियमों में नोटबंदी के दौरान ही बदलाव किए और अभी भी सिलसिला जारी है, जिसके चलते 30 दिसम्बर के पूर्व यह निर्णय लिया कि सिर्फ एनआरआई या विदेश यात्रा पर गए लोग ही 31 मार्च तक अपने नोट बदलवा सकेंगे।

इस फैसले के कारण देश के ही कई लोग परेशान हो रहे हैं और कल भी मुंबई स्थित रिजर्व बैंक मुख्यालय के बाहर बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ लगी रही, जिनमें सामान्य वर्ग के लोग ही रहे और एक महिला ने तो गुस्से में आकर अपने कपड़े तक उतार दिए। अभी 31 मार्च तक और भी बचे हुए पुराने नोट जमा होंगे। यानि नोटबंदी का पूरा अभियान ही बोगस साबित हो गया और शत-प्रतिशत ही नोट जमा हो गए या बचे हुए अन्य तरीकों से खपा दिए गए।

13 हजार करोड़ मप्र के डाकघरों में जमा

बैंकों के अलावा डाकघरों में भी ये पुराने नोट जमा किए गए और बदले में नए नोट भी बांटे। अभी तक बैंकों और डाकघरों के माध्यम से रिजर्व बैंक ने लगभग 8 लाख करोड़ रुपए मूल्य के नए और पुराने 50, 100 के नोट तथा सिक्के बंटवा दिए हैं। इंदौर सहित मध्यप्रदेश के डाकघरों में लगभग 13 हजार करोड़ रुपए के पुराने नोट जमा हुए हैं। 30 दिसम्बर तक मध्यप्रदेश के 43 मुख्य डाकघरों और 979 उप डाकघरों में यह राशि जमा हुई है। इंदौर में भी जीपीओ स्थित मुख्यालय के अलावा अन्य उप डाकघरों में भी 8 नवम्बर के बाद 30 दिसम्बर तक पुराने नोट जमा किए गए  और नए नोट भी लोगों को बांटे। डाकघरों में जमा हुई यह राशि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और सेंट्रल बैंक तथा बैंक ऑफ इंडिया के करंसी चेस्टों में जमा कराई गई। शुरुआत में 24 नवम्बर तक तो डाकघरों में नोट बदले गए और 25 नवम्बर से सिर्फ उन लोगों के नोट बदले और जमा किए जिनके खाते डाकघरों में खुले हुए हैं।

एसबीआई ने कर डाला पेटीएम को ब्लॉक

अभी जोर-शोर से पेटीएम द्वारा विज्ञापन दिए जा रहे हैं और शुरुआत में तो प्रधानमंत्री का भी इस्तेमाल विज्ञापनों में किया गया, जिसके लिए अच्छी-खासी आलोचना भी हुई। अभी तो पेटीएम के जरिए इंदौर में फिरौती मांगने का मामला भी सामने आ गया है। यह भी खुलासा हुआ कि पेटीएम में चीन की कम्पनी अलीबाबा का एक बड़ा हिस्सा है, लिहाजा उसके जरिए किया जाने वाला लेन-देन सुरक्षित और गोपनीय नहीं है। यही कारण है कि देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया यानि एसबीआई ने पेटीएम के अलावा ऐसे ही अन्य ई-वॉलेट्स को ब्लॉक कर दिया है, जिसमें एयरटेल मनी, मोबीक्वीक सहित अन्य ई-वॉलेट शामिल हैं। यानि जिनका खाता एसबीआई में है अब वे अपने खातों से सहित इन ब्लॉक किए ई-वॉलेट में राशि ट्रांसफर नहीं कर पाएंगे। अलबत्ता डेबिट और क्रेडिट कार्ड के जरिए ही उनकी राशि इन ई-वॉलेट्स में ट्रांसफर होगी। एसबीआई ने यह निर्णय सुरक्षा कारणों और साइबर अपराधों को रोकने के लिए की है।

5 हजार करोड़ का तो सोना ही खरीद लिया

अभी आयकर विभाग के अलावा प्रवर्तन निदेशालय देशभर में नोटबंदी के दौरान बिके सोने की जांच-पड़ताल में जुटा है। 500 से अधिक बड़े ज्वेलर्स के ठिकानों पर तो जांच-पड़ताल भी की गई और एक अनुमान के मुताबिक 5 हजार करोड़ से अधिक मूल्य का लोगों ने सोना खरीद लिया। इंदौर में ही 400 किलो से अधिक सोना खरीदे जाने की जानकारी सामने आई थी। 30 हजार रुपए प्रति तोले का सोना लोगों ने हड़बड़ी में 55 हजार रुपए प्रति तोले तक खरीद लिया और वे अब पछता रहे हैं। अभी जो आंकड़े सामने आए, जिसमें बताया गया कि 14.97 लाख करोड़ रुपए बैंकों में जमा हो गए और सिर्फ 47 हजार करोड़ ही बचे, जबकि इसमें से भी एक बड़ा हिस्सा लोगों ने सोना खरीदने के अलावा प्रॉपर्टी में डालने और अन्य तरीकों से इस्तेमाल कर लिया, जिसके मुताबिक यह कहा जा सकता है कि 2 प्रतिशत भी कालाधन कागज नहीं हो पाया।

(लेखक राजेश ज्वैल इंदौर के सांध्य दैनिक अग्निबाण में विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत् और 30 साल से हिन्दी पत्रकारिता में संलग्न एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया पर भी लगातार सक्रिय)

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