Category: पालिटिक्स-इलेक्शन Published Date Written by महीर उद्दीन खान
समाज और बिरादरियों में एक परंपरा है कि जब कोई व्यक्ति समाज या बिरादरी के नियमों को नहीं मानता, उन की अवहेलना करता है या उन्हें भंग करता है तो समाज के लोग ऐसे आदमी को टाट बाहर कर देते हैं। टाट बाहर को समाज में हुक्का पानी बंद करना यानि समाज से तब तक बहिष्कृत करना होता है जब तक वह आदमी अपने कृत्य के लिए समाज से माफी नही मांग लेता। आजकल उप्र में भाजपा की स्टार प्रचारक बनी साध्वी उमा भारती के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। मप्र भाजपा से इन्हें टाट बाहर कर दिया गया है। पाबंदी यहां तक है कि उमा भारती मध्य प्रदेश में अपने घर टीकमगढ़ तक भी नहीं जा सकतीं। कम से कम जब तक मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार है तब तक उमा भारती का मध्य प्रदेश में प्रवेश वर्जित रहेगा।
उस के बाद ही भाजपा नेतृत्व उन की मध्य प्रदेश वापसी के बारे में सोचेगा। तब तक उमा भारती को उत्तर प्रदेश में ही रहना होगा भाजपा नेतृत्व चाहेगा तो कहीं और भी उनका उपयोग कर सकता है। कुल मिला कर हालत यह है कि भाजपा की यह स्टार प्रचारक अब अपनी मर्जी की मालिक भी नहीं है। कानून व्यवस्था की भाषा में इसे तड़ी पार करना भी कहते हैं। कोई आदमी जब किसी इलाके की कानून व्यवस्था के लिए खतरा बन जाता है तो इलाका पुलिस उसे इलाके से बाहर कर देती है और कुछ समय के लिए उस के इलाके में आने पर पाबंदी लगा देती है ऐसा ही उमा भारती के साथ हो रहा है भाजपा को राज्य में उन से खतरा उत्पन्न हो गया था, इस लिए उन्हें मध्य प्रदेश से तड़ी पार कर दिया गया है।
साध्वी उमा भारती की संक्षेप में कहानी यह है कि राम मंदिर आंदोलन से भाजपा के पक्ष में हवा बन गई थी, इस आंदोलन में उमा भारती साम्प्रदायिक भावनाएं भड़काने के लिए काफी कुख्यात हो गई थीं। मध्य प्रदेश के चुनावों में भाजपा सत्ता में आई तो उमा भारती को मुख्यमंत्री बना दिया गया। इस से उमा भारती को गुमान हो गया कि मध्य प्रदेश की सत्ता भाजपा को उनके कारण ही मिली है, मगर एक मामले में गिरफ्तार होने पर इन से मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री पद छिन गया था। बाद में यह मामला निपटने पर उमा भारती ने पुन: मुख्यमंत्री बनना चाहा तो भाजपा नेतृत्व ने इन की मांग नहीं मानी। इस पर उमा भारती बौखला गईं और नेतृत्व से पंगा लेने लगीं। भाजपा के शीर्ष नेता लाल कृष्ण आडवाणी की बैठक का बहिष्कार कर उमा भारती ने उन्हें सरे आम अपमानित किया था तो इनके प्रति भाजपा के तेवर काफी तीखे हो गए थे। उन की ऐसी ही हरकतों के चलते उन्हें भाजपा से अलग होना पड़ा था। भाजपा से अलग हो कर उमा भारती इधर-उधर भटकती रहीं और अंतत; उन्होंने अपनी अलग पार्टी बना ली। इस बीच मध्य प्रदेश विधान सभा के चुनाव आ गए तो उमा भारती ने सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार कर भाजपा के सामने चुनौती पेश करने का प्रयास किया। उमा भारती को इस बात का भी घमंड था कि वह मंदिर आंदोलन की एक बड़ी नेता हैं। उन्हें यह भी गुमान हो गया था कि मध्य प्रदेश में भाजपा उन्हीं की लोकप्रियता के चलते सत्ता में आई थी। उमा भारती के अलग दल बनाने और भाजपा के सामने चुनाव मैदान में आने से एकबारगी तो भाजपा भी सकपका गई थी। मगर धीरे-धीरे जैसे जैसे चुनाव की गर्मी बढ़ती गई उमा भारती का जो भी जादू रहा हो वह फेल होता दिखने लगा।
मध्य प्रदेश विधान सभा चुनावों के दौरान इन पंक्तियों का लेखक भी एक चैनल के लिए मध्य प्रदेश में ही था। वहां देख गया कि अपनी सभाओं में भीड़ जुटती न देख उमा भारती हर समय बौखलाई रहती थीं। ऐसी ही एक चुनावी सभा में कम भीड़ देख कर उमा भारती इतनी बौखला गईं कि अपनी पार्टी के एक जिला पदाधिकारी को सरे आम कैमरों के सामने तड़ाक से चांटा जड़ दिया। किसी नेता और वह भी महिला नेता का अपने दल के एक पदाधिकारी को चांटा मारना खबरिया चैनलों के लिए टीआरपी बढ़ाने के लिए एक बिकाउ और सनसनीखेज मामला था इस लिए खबरिया चैनल हफ्तों तक इस चांटे को भुनाते रहे। रोजाना किसी न किसी बुलेटिन में यह चांटा भुनाया जाता रहा यहां तक कि चुनाव पीरणामों की घोषणा के समय भी इस चांटे की फुटेज बार-बार दिखाई गई। इस चांटे के बाद उमा भारती की पार्टी में भी विद्रोह का बिगुल बज गया। हालत यह हो गई कि उमा भारती मुंह छुपाती फिरने लगी। मगर पत्रकार कहां मानने वाले थे वह जब भी उमा भारती से मिलते उन्हें इस चांटे की याद अवश्य दिला देते, नतीजा यह हुआ कि उमा भारती पत्रकारों से भी पंगा लेने लगीं। चुनाव के नतीजों ने उमा भारती का सारा घमंड चूर-चूर कर दिया। उन की पार्टी तो बुरी तरह हारी ही वह स्वयं भी चुनाव हार गईं। मध्य प्रदेश के मतदाता ने उमा के मुकाबले शिवराज सिंह चौहान को पसंद किया। इन चुनाव नतीजों के बाद उमा भारती को महसूस हुआ कि भाजपा जैसे बड़े दल से टकरा कर उन्होंने भारी भूल की थी। उन्हें लगने लगा कि वह जो भी थीं भाजपा के कारण ही थीं। अतः उनका मन भाजपा में जाने के लिए पुनः छटपटाने लगा और वह भाजपा में पुनः प्रवेश के लिए इधर-उधर भटकने लगीं, मगर जब बात बनती नही दिखी तो संघम् शरणम् गच्छामि हो गईं। अब भाजपा में इतना साहस तो है नहीं कि वह संघ की इच्छा के विपरीत चल सके, अतः उमा भारती को भाजपा में प्रवेश की अनुमति मिल ही गई।
मगर उमा भारती का भाजपा में प्रवेश इतना आसान नहीं था। उमा के भाजपा में प्रवेश को ले कर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अड़ गए। उन्होंने शर्त लगा दी कि उमा भारती मध्य प्रदेश के मामलों में न तो दखल देंगी और न ही मध्य प्रदेश आएंगी। भाजपा नेतृत्व को शिवराज की यह शर्त माननी पड़ी और उमा भारती को उप्र भेज दिया। अब शिवराज सिंह चौहान चाहते हैं कि यह कांटा हमेशा के लिए निकल जाए तो इस के लिए आवश्यक है कि उमा भारती चुनाव जीत जाएं इसी लिए अब शिवराज सिंह चौहान उमा भारती को जिताने के लिए उनके चुनाव क्षेत्र चरखारी में चुनाव प्रचार कर मतदाताओं से उमा भारती को जिताने की अपील करेंगे। वैसे भी इस बार भाजपा ने एक नई परंपरा आरंभ की है। अब तक राज्य के लिए एक संभावित उम्मीदवार का नाम मुख्यमंत्री के रूप में घोषित किया जाता था, मगर इस बार भाजपा ने चार पांच नेताओं -कलराज मिश्र, उमा भारती, राजनाथ सिंह, सूर्य प्रताप शाही और विनय कटियार को भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया है। राजनाथ सिंह उप्र की जमीनी हकीकत को जानते हैं इस लिए उन्होंने अपने आप को इस दौड़ से बाहर कर लिया है। मुख्यमंत्री के रूप में उमा भारती का नाम उप्र के भाजपा नेताओं को रास नहीं आ रहा है। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी को यह आभास तो है ही कि उप्र में भाजपा की सरकार नहीं बन सकेगी। अतः चार पांच नेताओं को मुख्यमंत्री के रूप में पेश करने में क्या नुकसान है। उमा भारती भी प्रसन्न हैं कि भले ही मुख्यमंत्री न बने इस पद की दावेदार तो बन ही गई हैं।
भाजपा द्वारा उमा भारती को चरखारी से उम्मीदवार बनाने का मतलब उमा भारती के कद को कम करना है। अब तक उमा भारती की इमेज एक तेज तर्रार हिंदुत्व की कमान संभालने वाली नेता के रूप में रही है। पत्रकारों ने थोड़ा आगे बढ़ कर उन्हें फायर ब्रांड बना रखा है। मगर जिस जातीय समीकरण के चलते भाजपा ने उन्हें उम्मीदवार बनाया है उस से वह हिंदुत्व की ध्वज वाहक न रह कर जातीय नेता बन कर रह जाएंगी। राज्य में जातीय गणित के चलते भाजपा उन्हें पिछड़ों की नेता बना कर पेश करना चाहती है, क्योंकि कल्याण सिंह के बाद भाजपा के पास राज्य में पिछड़ों का कोई कद्दावर नेता नहीं है। भावी मुख्यमंत्री के रुप में उनका नाम यही सोच कर पेश किया गया है ताकि वह नाराज न हों अब उमा भारती की मजबूरी यह है कि अगर उन्हें भाजपा में रहना है तो नाराजगी का नाम अपने शब्द कोश से निकालना ही होगा।
राहुल गांधी ने उमा के उप्र से चुनाव लड़ने पर छींटा कसा तो उमा ने फौरन जवाब दिया कि वह रोम से नहीं आईं बल्कि भारत से ही हैं, इस प्रकार उन्होंने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के बासी मुद्दे को फिर से ताजा करने का प्रयास किया, मगर वह यह भूल गईं कि सोनिया गांधी कहीं से निष्कासित हो कर भारत नहीं आईं बल्कि वह तो राजीव गांधी से शादी कर स्थापित परंराओं के अनुसार अपनी ससुराल आईं थीं, न कि उमा भारती की भांति कहीं से तड़ी पार होकर आई हैं।
लेखक महीर उद्दीन खान वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा कई अखबारों में संपादक रह चुके हैं.