देश के चप्पे चप्पे तक
पहुचने के लिए
खबरिया चैनलों के हाथों कठपुतली हैं हुजूर
स्ट्रिंगर हूँ हुजूर
जब एसी वाले
हमारे राजधानी के पत्रकार
जाते हैं डर
जाने को जंगलों में
खदानों में बीहड़ो में
हमारे बाइट्स बिकते हैं
मुफ्त या कौड़ियों में हुजूर
स्ट्रिंगर हूँ हुजूर
देश की गहरी समझ रखने वालो को
नहीं पता है
खोरठा , संथाली , नागपुरी जैसी
कोई भाषा भी होती है हुजूर
लोग नंगे पाँव
पच्चीस पच्चीस मील जाते हैं
नदी नाले जंगल पार करके
या बिना पानी बिजली भी
इस देश में रहती है
बड़ी आबादी
देश की सही तस्वीर तो
रहती है हमारे पास हुजूर
स्ट्रिंगर हूँ हुजूर
हुजूर
हमारे फ़ोन नहीं उठाये जाते हैं
दिल्ली में
लोग मीटिंग्स में होते हैं वहां
लेकिन जब
'किसनजी' की बाइट्स लेनी होती है
रेल की पटरी उड़ जाती है
नजदीकी शहर से २०० किलोमीटर दूर
किस्मत खुल जाती है हमारे मोबाइल की
और घनघनाते हैं हमारे भी फ़ोन हुजूर
स्ट्रिंगर हूँ हुजूर
हुजूर
जब छिनता है
हमारा कैमरा माफिया के द्वारा
उठा कर ले जाती है पुलिस
बेबुनियाद आरोप में
जब आर्थिक परेशानी में
झूल जाता हूँ मैं पंखे या पेड़ से
नहीं बनती कोई खबर हुजूर
स्ट्रिंगर हूँ हुजूर
-दिलीप कुमार, धनबाद

written by t.n.manish, July 28, 2010
"EEN PAHADO KO NA HO JAAYE BULANDI KA GURUR
PATTHRO TUMME AKAL HO TO LUDHAKTE RAHANA"
TAB KYA HOGA....... T.N.MANISH (GWALIOR)
written by ANKUR , July 27, 2010
written by Pradip Kumar, July 27, 2010
written by ravi mishra, July 27, 2010
written by sunil , July 26, 2010
written by dinesh mansera, July 26, 2010
written by ajai srivastava, July 24, 2010
written by dev shrimali, July 24, 2010
Dev shrimali PRESIDENT GRAMEEN PATRKARITA VIKASH SANSTHAAN GWALIOR
written by Ajay Golhani, Nagpur, July 23, 2010
written by parth soni, July 23, 2010
written by deepak, gorakhpur, July 23, 2010
written by ATUL, July 23, 2010
written by anmol, July 23, 2010
मेरे कई दोस्त रिपोर्टर है ,इसलिए मैने देखा है कि किसी बड़ी खबर पर यदि उसके चैनल से कोई रिपोर्टर आता है तो वो अपने स्ट्रिंगर से दारू ,मीट.सिगरेट की मांग करते है . इतना ही नहीं होटल के कमरे का किराया तक स्टिंगर को चुकाना पड़ता है /स्ट्रिंगर के उत्पीडन की हद तो यह है की आईबीएन ७ जैसे चैनल तो अपने स्ट्रिंगरो को अपनी आई.डी (लोगो )तक नहीं देता है.किसी वीआईप़ी की कवरेज में इस चैनल के स्ट्रिंगर को कितनी परेशानी उठानी पड़ती होगी यह सोचा जा सकता है पर चैनल के ऐसी कमरों में बैठने वालो को स्ट्रिन्गेर कि इस समस्या से कोई सरोकार नहीं है .
दिलीप तुमने लिखा तो सच है पर दोस्त नक्कार खाने में तुती कि आवाज सुनाई नहीं देती है
written by manav, July 23, 2010
thanks,
for the explanation of hard core problem of stringer in such easy way, your poem is worth to say JAI HOOO.
manav
written by saleem malik, July 23, 2010
written by Mazhar Husain, July 23, 2010
written by pandey ajay, July 23, 2010
written by aditya kumar, July 23, 2010
written by mittal saurabh, July 23, 2010
| < Prev | Next > |
|---|


















व्यथित पत्रकार