12वां राष्ट्रीय मीडिया संवाद सेवाग्राम में करने का फैसला

गांधी : एक माध्यम या संदेश

17 से 19 अगस्‍त 2018, सेवाग्राम, महाराष्ट्र

वि‍कास संवाद पिछले ग्‍यारह सालों से लगातार राष्ट्रीय मीडिया संवाद का आयोजन कर रहा है। इसका मकसद जनसरोकारों के मुद्दों पर पत्रकारों के बीच एक गहन संवाद स्थापित करना है। पचमढ़ी से शुरू होकर संवाद का यह सिलसिला बांधवगढ़,चित्रकूट, महेश्वर, छतरपुर, पचमढ़ी, सुखतवा,चंदेरी, झाबुआ, कान्‍हा, ओरछा तक का सफर तय कर चुका है।

इन ऐतिहासिक जगहों पर आयोजित सम्मेलनों में हमने, पत्रकारिता, कृषि, आदिवासी, सूखा, वि‍कास, स्‍वास्‍थ्‍य, बाल अधि‍कार और असहिष्‍णुता आदि विषयों पर केन्द्रित बातचीत की है। इस कॉन्‍क्‍लेव का मकसद मीडिया के साथियो के साथ एक मंच के तले बैठकर कुछ मुद्दों पर नया जानने, आपसी समझ बनाने, एक—दूसरे के विचारों को जानने—समझने, अपने रूटीन के काम से अलग हटकर मैदानी इलाकों में जाकर आम लोगों की जिंदगी में झांकने, बातचीत करने और विकास के तमाम आयामों पर एक बेहतर संवाद स्थापित करना है। इस बार कान्‍क्‍लेव सेवाग्राम कलेक्टिव और वि‍कास संवाद के साझा बैनर तले ‘गांधी-150’ के तहत कि‍या जा रहा है।

सेवाग्राम में ही क्‍यों –

गांधी जी ने सेवाग्राम में 10 वर्ष बिताए हैं। मोनिया से मोहन, मोहनदास, मोहनदास करमचंद गांधी, महात्मा गांधी और राष्ट्रपिता बापू तक की उनकी यात्रा का चरम पड़ाव हमें सेवाग्राम में महसूस होता है। यहां बसने के दो वर्ष पूर्व गांधी जी वर्धा आ गए थे। इसके बाद उन्होंने अपने आश्रम के लिए इस स्थान का चयन किया। यह स्थान सेगांव नामक गांव का हिस्सा है। आज से करीब 84 वर्ष पूर्व जब उन्होंने इस स्थान का चयन किया जो कि महाराष्ट्र के उत्तरपूर्व में, विदर्भ में स्थित है, एक शुष्क और बंजर इलाका था। यहां कुछ छोटी नदियां, जंगल और पहाड़ियां थीं। केवल बंजर जमीनें थीं, जिन पर ग्रामीण छोटी- मोटी फसलें अपने और अपने पशुओं के लिए उपजाते थे। यहां बेहद गरीबी थी और पहुंचने के लिए कोई सड़क तक नहीं थी। गुजराती भाषी गांधी गुजरात जैसे समृद्ध राज्य में स्थित अपने साबरमती आश्रम को छोड़कर यहां बसने क्यों आए?

कुछ का कहना है कि यह भारत के मध्य में स्थित है, इसलिए वे यहां आए। परन्तु क्या यही एकमात्र कारण रहा होगा ? निश्चित तौर पर इसका उत्तर ‘‘नहीं’’ ही है। गांधी जी और उनके सहयोगियों ने अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण प्रयोग यहीं किए हैं। गांधी ‘‘नयी तालीम’’ को अपना सर्वश्रेष्ठ अविष्कार और भारत को सर्वोत्‍तम देश मानते थे। वह उन्होंने यहीं विकसित की है। ग्रामीण उद्योगों में उनके साथ जे.सी. कुमारप्प यहीं जुड़े। विनोबा से उनका जुड़ाव तो जग जाहिर है ही।

बहरहाल गांधी ने 30 अप्रैल 1936 को वर्धा से सेवाग्राम की ओर पैदल कूच किया, क्योंकि यहां तब तक सड़क भी नहीं थी। यह दूरी करीब 10 किलोमीटर है। इसके अगले ही दिन यानी 1 मई 1936 को डॉ. अम्बेडकर और श्री नामवर उद्योजक वालचन्द हीराचन्द् भी पैदल ही गांधी से मिलने यहां पहुंचे। बाद में गांधीजी के दफ्तर में ब्रिटिश वायसराय ने ‘‘हॉट लाइन’’ की पेशकश की। गांधी ने इंकार किया, तो वायसराय ने कहा कि ”मैं आपसे सम्पर्क में रहना चाहता हूँ।” यह फोन आज भी यहां है। गांधी की इसी राजधानी में वायसराय लिगलिनथो ने उनके साथ खुले में सोकर रात बिताई थी। यह साधारण या असाधारण स्थान या भूमि नहीं है, यह एक अभय स्थान या भूमि है।

गांधी एक माध्‍यम या संदेश –

वैसे तो गांधी जी ने जनगणना में अपना धंधा, राजनीति बताया था, परन्तु वास्तविकता तो यही है कि सन् 1903 से लेकर सन 1948 तक वे जिस एक काम में सतत जुड़े रहे वह पत्रकारिता ही थी। गांधी जी के शब्दों में ‘‘पत्रकारिता एक सेवा है।’’ गांधी जी ने अपना पहला समाचार पत्र दक्षिण अफ्रीका में 4 जून 1903 को ‘इंडियन ओपिनियन’निकाला। उन्होंने लिखा भी है, ‘‘ मेरा ख्याल है कि ऐसी कोई भी लड़ाई जिसका आत्मबल हो, अखबार की सहायता के बिना नहीं चलाई जा सकती। अगर मैंने अखबार निकालकर दक्षिण अफ्रीका में बसी हुई भारतीय जनता को उसकी स्थिति न समझायी होती और दुनिया में फैले हुए भारतीयों को दक्षिण अफ्रीका में क्या हो रहा है, इसमें ‘‘इंडियन ओपिनियन’’ के सहारे अवगत न रखा होता तो मैं अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकता था। इस तरह मेरा भरोसा हो गया है कि अहिंसक उपायों से सत्य की विजय के लिए अखबार एक बहुत ही महत्वपूर्ण और अनिवार्य साधन है।’’

गांधीजी के बहुआयामी व्यक्तित्व को समेटना वह भी कम में, कमोबेश असंभव ही है। जीवन का शायद ही ऐसा कोई आयाम हो जिस पर गांधी जी ने टिप्पणी न की हो। उनके बारे में गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा था, ‘‘संभव है गांधी असफल हो जाएं, उसी तरह जैसे बुद्ध असफल हैं या ईसा-मसीह असफल हैं। हमारे ये महापुरूष भी तो ज्यादातर लोगों को तरह-तरह के भेदभावपूर्ण विचारों के ऊपर उठाकर नहीं रख सके। फिर भी आज याद आते हैं और याद किए जाते रहेंगे।“

गांधी ने अपना जीवन एक संदेश के रूप में में दिया। शिक्षा, अर्थव्यवस्था, जीवनशैली, ग्रामीण जीवन, सहिष्णुता, भाईचारा, राजनीति सभी में गांधी एक व्यक्ति नहीं, विचार की तरह से हमारे सामने है। गांधी 150 के मौके पर उनके उन्हीं विचारों का मथना प्रासंगिक लगता है।

सेवाग्राम कलेक्टिव क्या है?

यह कोई संस्था, संगठन या नेटवर्क नहीं; यह प्रश्न-विशेष पर काम करनेवाला अभियान (इश्यू-बेस्ड कैम्पेन) नहीं; यह चुनाव को मद्दे-नज़र रख कर किया गया गठबंधन भी नहीं है। यह केवल गांधीजनों का समूह भी नहीं। यह समता, स्वतन्त्रता, न्याय और बंधुता में विश्वास करने वाले लोगों के जमात है, जो अपने मतभेदों के साथ इकठ्ठा काम करने में विश्वास करती है। इसकी शुरुवात महात्मा गांधी तथा कस्तूरबा गांधी की 150 वी जयंती (गांधी-150) को लेकर हुई थी, लेकिन अब वह उस से बढ़ कर सभी प्रगतिशील विचार धाराओं के बीच सेतु का काम करना चाहता है।

कब- यह आयोजन 17 से 19 अगस्‍त 2018 को सेवाग्राम आश्रम वर्धा में आयोजि‍त कि‍या जाएगा। वर्धा नागपुर से 70 कि‍लोमीटर की दूरी पर है। वर्धा और सेवाग्राम ये दोनों पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण रेल लाइनों पर, देश के केंद्र में बसे जंक्शन स्टेशन हैं, कुछ ट्रेने (ज़्यादातर उत्तर-दक्षिण) सेवाग्राम रुकती हैं, और ट्रेने वर्धा। सेवाग्राम आश्रम वर्धा स्टेशन से लगभग 8 किलोमीटर और सेवाग्राम स्टेशन से 4-5 किमी दूरी पर हैं, जहां से ऑटो रिक्शा से आश्रम आना संभव है।

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