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हिंदी दिवस, Berserk और आज का टेलीग्राफ अख़बार

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संजय कुमार सिंह-

हिन्दी दिवस पर Berserk शब्द का पोस्टमार्टम
पगलाई जनता पार्टी ने शहर में हंगामा किया

Berserk के लिए मैं पागल ही लिखता रहा हूं और इस लिहाज से द टेलीग्राफ के आज के लीड का अनुवाद यही होगा। पर जनता पार्टी के लिए पगलाई लिखना खटका तो मैंने सबसे पहले गूगल किया – पहला शब्द निडर आया, दूसरा नार्वे का प्रचंड योद्धा और जुझारू भी मिला पर इस शीर्षक में ये तीनों शब्द फिट नहीं होते हैं। वैसे भी, अपनी मांग के समर्थन में आंदोलन और उसका विस्तृत या अनियंत्रित रूप तोड़फोड़ करने वालों का नाम जब डबल इंजन वाले राज्य में चौराहे पर टांगा जा चुका है, नुकसान की वसूली हो चुकी है तो मामला निडर या जुझारू होने का नहीं पगलाने की ही लगता है। आज हिन्दी दिवस पर लगा कि मेरे प्रिय अंग्रेजी अखबार ने आज गोबर पट्टी के लिए गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। जनता पार्टी को पगलाई कहा जा सकता है?

फादर कामिल बुल्के की डिक्सनरी में इसके लिए उन्मत लिखा गया है। अरविन्द लेक्सिकन में इसके लिए उन्मादग्रस्त शब्द है। हरदेव बाहरी में योद्धा, आपे से बाहर होना जैसे शब्द हैं। उन्मादग्रस्त और आपे से बाहर होना – पगलाने के करीब जरूर है पर विद्वानों में मतभेद हो सकता है। आंदोलन, तोड़फोड़ आग लगाने को पागलपन कहा जाए तो वसूली से माफी मिल जाएगी। वसूली कैसे होगी? ऐसी स्थिति में मैं अक्सर अंग्रेजी से अंग्रेजी डिक्सनरी की शरण लेता हूं।

कैम्ब्रिज इंटरनेशनल इंग्लीश डिक्सनरी के अनुसार, Berserk अनियंत्रित और हिंसक होना है। सत्ता के नशे में या विरोध में ऐसी स्थिति को पगलाना कहा जा सकता है। उदाहरण है, दर्द से पगलाया घोड़ा Berserk हो गया और अस्तबल की दीवार को दुलत्ती मारने लगा। इससे लगता है कि Berserk पगलाने से आगे की स्थिति है। हालांकि, दूसरा उदाहरण इसका उपयोग कम गंभीर अर्थ में भी करने का है। मेरी मां को पता चलेगा कि मैंने उनके सबसे अच्छे ड्रेस को बर्बाद कर दिया है तो Berserk हो जाएंगी। कोष्ठक में बेहद नाराज होना लिखा है। हालांकि हम संस्कारी लोग किसी भी हालत में नहीं कहेंगे कि मां पगला गई हैं या पगला जाएंगी। हालांकि इसका मतलब यही है कि गुस्से में पागल होने को भी Berserk होना कहते हैं।


टेलीग्राफ के मेरे एक मित्र ने बताया कि कल बंगाल में हिंसा फैलाने की बीजेपी की साज़िश के बारे में ममता सरकार को पहले से पूरी जानकारी थी। तृणमूल के बहुत से भेदी बीजेपी में घुसे हुए हैं- ये बात मैंने अपनी खबर में भी लिखी है।अब बीजेपी का सारा दांव उल्टा पड़ गया। ज़माने भर में किरकिरी हुई सो अलग। –सौमित्र रॉय

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