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ग़ाज़ीपुर के प्रिंस!

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यशवंत सिंह-

ये हमारे ग़ाज़ीपुर के मित्र सुजीत सिंह प्रिंस की बिटिया हैं। पूजा घर का नाम है इनका। अपराजिता स्कूल का। बेहद संवेदनशील। कलाकार हृदय। चित्रकारी पेंटिंग में इनकी दुनिया बसती है।

और आज ये अपने पैशन को जीती हुईं अपने एक बड़े पड़ाव पर पहुँच गईं। निफ़्ट भुवनेश्वर!

बतौर बाप, सुजीत सिंह प्रिंस भाई का हृदय गदगद है!

प्रिंस भाई हमारे ग़ाज़ीपुर के कबीर हैं। जो घर फूंके आपने… वाला! मित्रसेवा, समाजसेवा और सरोकार इनकी ज़िंदगी का अहम हिस्सा है। इस चक्कर में ये इतने गाफ़िल हो जाते हैं कि घर परिवार इन्हें खुद तलाशता है कि जनाब हैं किधर, कब दिन आवेंगे!

अस्पताल शमशान कचहरी में मदद दिलाते मुफ़्त सेवा प्रदान कराते हुए ये मानव सेवा संघ समेत बहुत सारे मंचों के साथ जुड़कर ग़रीबों की आँख बनवाने, बेघरों को व्यवस्थित कराने, अनाथगृहों-बुजुर्गघरों में फल भोजन प्रेम बाँटते इतने तल्लीन जो जाते हैं कि हम जैसे दूरस्थ मित्र भी सोचने लगते हैं कि ये आदमी अपना घर कैसे चलाता है।

पॉकेट में जो है, वो किसी पर खर्च हो जाएगा, किसी की मदद में चला जाएगा, किसी माँगने वाले को फ़ौरन दे दिया जाएगा, ये जानते हुए कि कुछ वापस न आएगा! आएगा भी तो जाने कब और कितना आएगा, कुछ न पता।

हमारे चाचा एडवोकेट Ram Nagina Singh जी गुरु हैं प्रिंस भाई के। चाचा मेरे लिए पिता तुल्य तो हैं हीं, जिन्होंने मुझे जीवन की राह दिखाई, वे मेरे गुरु सरीखे भी हैं। बाबा की सात्विक सकारात्मक परंपरा को चाचा ही आगे बढ़ाए हैं। उनसे हम सबने पॉज़िटिव होना सीखा है। धैर्य रखना सीखा है। बड़े बड़े ग़मों दुखों को यूँ किसी भोले निश्छल मज़ाक़ के माध्यम से ख़त्म करते देखा है। गहन दुखों को शिव की तरह बिना बोले कहे खुद के गले के भीतर निगलते और फिर अंतहीन पड़े रखने को महसूसा है।

तो ऐसे गुरु के हम दोनों चेले, गुरु भाई भी हुए। प्रिंस भाई ने सगे बड़े भाई से भी ज़्यादा मान सम्मान देते हैं। कर्तव्यनिष्ठ यूँ कि वे हमसे पहले महसूस कर लेते हैं कि भैया क्या चाह सोच रहे होंगे।

आज के दौर में प्रिंस भाई जैसा दोस्त मिलना मुश्किल है।

वे भड़ास के दिल्ली दरियागंज आफिस में रह कर लम्बी ट्रेनिंग ले चुके हैं। वे भड़ास के हीरे हैं। मेरे गृह जनपद के हैं, मेरे गुरु भाई हैं, इससे प्यार रिश्ता स्नेह तीन गुना हो जाता है।

प्रिंस भाई के लिए आज का दिन ख़ुशी का दिन है।

बिटिया जो पढ़ना चाहती थी, वो पढ़ाई करने एक दूर प्रदेश के सुंदर कैम्पस में पहुँच चुकी हैं।

अब हैं उनके सुपुत्र पिंकेश भाई जो मिनी प्रिंस हैं और मेरे अच्छे दोस्त। देखते हैं पूजा के घर से निकल जाने के बाद की आज़ादी और ख़ालीपन को वो किस तरीक़े से लेते हैं। उनके लिए ये मस्ती का मौक़ा रहेगा या पूजा से बड़े संस्थान में पढ़ने जाने की चुनौती का अवसर होगा, ये तो अबकी ग़ाज़ीपुर जाकर उनका इंटरव्यू लेने पर ही पता चलेगा।

आख़िर में, प्रिंस भाई की ज़िंदगी को नया जीवन दिलाने वाले और नई दिशा देने वाले जो शख़्स हैं, वे आदरणीय Rupesh Singh जी हैं। रूपेश जी मुझसे उम्र में छोटे हैं लेकिन उनकी आदतें उनकी सोच उनका स्वभाव बहुत ऊँचा है इसलिए मैं भी उन्हें आदरणीय मानता कहता हूँ। रूपेश जी चर्चाओं प्रचारों से दूर रहने वाले शख़्स हैं और पुलिस सेवा में बेहद संवेदनशील दायित्व के लिए पदस्थ हैं इसलिए उन पर कोई चर्चा फिर कभी!

आज प्रिंस जी का दिन है। आज पूजा का दिन है। इन दोनों बेटी बाप को बधाई। भुवनेश्वर में एक लोकल गार्जियन की तलाश है। कोई हो तो बताइएगा।

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