अपने-अपने युद्ध (2)

भाग-1 से आगे…. खैर, अजय अलका को लेकर बाहर आया। बाहर आकर अलका ने अपने घुंघरू उतारे। और दूसरे दिन उसने कथक नृत्य को तो नहीं पर कथक केंद्र को अलविदा कहने की सोची। अजय को उसने रोते-रोते यह बात बताई। जो अजय को भी नहीं भाई। अजय ने उसे ढांढस बंधाया और कहा कि महाराज कोई ठेकेदार तो नहीं है कथक नृत्य का। और यह कथक केंद्र उसके बाप का नहीं है। फिर भी अलका तीन दिन तक नहीं गई कथक पढ़ने-सीखने। कमरे ही में गुमसुम पड़ी लेटी रहती। चौथे दिन सुबह-सुबह अजय उससे हॉस्टल में मिलने आया। उसने फिर हौसला बंधाया। अलका कथक केंद्र जाने लगी। कथक केंद्र क्या जाने लगी, अजय से भेंट बढ़ने-बढ़ाने लगी। यह एन. एस. डी. में शायद पहली बार हो रहा था कि कोई लड़का एन. एस. डी. में इतर लड़की के साथ जोड़ा बनाकर घूम रहा था। नहीं ऐसे तो कुछ मामले जरूर थे जिनमें एन. एस. डी. के बाहर का नाम पर एन. एस. डी. रेपेट्री के साथ खास कर किसी लड़की ने जोड़ा एडॉप्ट किया हो। पर इससे कहीं और नहीं।

अजय को इधर एन. एस. डी. में और उधर अलका को कथक केंद्र में यह आपत्ति एक नहीं कई बार मजाक-मजाक में झेलनी पड़ी। पर शायद लोकेंद्र त्रिवेदी ही नाम था उस लड़के का। उसने एक दिन अचानक ही यह आपत्ति खारिज कर दी कि, ”एन. एस. डी. से बाहर अजय ने पेंग जरूर मारी है पर है कैम्पस के भीतर ही। यानी बहावलपुर हाउस के भीतर सो अबजेक्शन ओवर रूल।” कहते हुए उसने दिया सलाई की डब्बी कैरम की गोटी की तरह ऐसे उछाली कि वह गिलास में घुस गई। यह खेल उन दिनों एनएसडियनों के बीच आम था।

अलका-अजय अब दो जिस्म और एक जान थे। इत्तफाक से दोनों यू.पी. के थे। तो यह लगाव भी काम आया। पर दोनों विजातीय थे। सो दोनों ने अचानक जब शादी की ठान ली तो जाहिर है कि दोनों के परिवार वालों ने विरोध किया। पर विरोध को भाड़ में डाल कर शादी कर डाली उन्होंने। अलका-अजय से अब वह अजय-अलका हो गए थे। अब तक अजय एन. एस. डी. से एन. एस. डी. रेपेट्री आ गया था। अलका ने कथक केंद्र बीच में ही छोड़ दिया। जाहिर है कि महाराज जी ही अंततः कारण बने। पर अलका को कभी इसका पछतावा नहीं हुआ। बल्कि कभी-कभी तो वह इस घटना को अपने लिए शुभ भी मानती। कहती, ” नहीं अजय कैसे मिलते।”

संजय जब अलका-अजय से मिला तब तक अजय एन. एस. डी. रेपेट्री भी छोड़-छाड़ बिजनेस के जुगाड़ में लग गया था। एक लैंब्रेटा स्कूटर सेकेंड हैंड लेकर उसी पर दौड़ता रहता था। नाटक-वाटक उसके लिए अब उतना महत्वपूर्ण नहीं रह गया था। एन. एस. डी. की डिग्री उसे बेमानी जान पड़ती। और अंततः अलका ही की तरह वह भी एन. एस. डी. और नाटक को ”यों ही” मानने के बावजूद महत्वपूर्ण इसलिए मानता था कि इसी वजह से उसे अलका मिली थी।

अलका-अजय ने, ओह सारी, अजय-अलका ने शादी भले ही पारिवारिक विरोध के बावजूद की थी। पर अब दोनों परिवारों की स्वीकृति की मुहर भी लग गई थी और दोनों पक्षों का बाकायदा आना-जाना शुरू हो गया था। अजय को बिजनेस के लिए उसके पिता ने ही उकसाया था और कुछ हजार रुपए भी इस खातिर उसे दिए थे।

एक रोज संजय अचानक ही अजय-अलका के घर पहुंचा तो दोनों कहीं गए हुए थे। पर उसी समय अजय के पिता भी पहुंचे हुए थे। छूटते ही संजय से बोले, ”तुम भी नाटक करते हो?” उनके पूछने का ढंग कुछ अजीब-सा था। ऐसे जैसे वह पूछ रहे हों, ” तुम भी चोरी करते हो?”

पर जब संजय ने लगभग उसी अंदाज में कि, ”क्या तुम भी चोर हो?” कहा कि, ”नहीं।” और बड़ी कठोरता से दुहराया,”नहीं, बिलकुल नहीं।” तो उसके पिता थोड़ा सहज हुए और बताया कि वह अजय के पिता हैं। तो संजय ने उन्हें आदर और विनयपूर्वक नमस्कार किया।

वह बहुत खुश हुए।

फिर बात ही बात में जब उन्होंने जाना कि संजय पत्रकार है तो वह कुछ अनमने से हुए और जब यह जाना कि वह नाटकों आदि की समीक्षाएं भी लिखता है तो फिर से संजय से उखड़ गए। जिस संजय के लिहाज और संस्कार की वह थोड़ी देर पहले तारीफ करते नहीं अघा रहे थे उसी संजय में उन्हें अब अवगुण ही अवगुण दिखने लगे थे। वह धाराप्रवाह चालू हो गए थे,”आजकल के छोकरों का दिमाग ही खराब है। काम-धंधा छोड़कर नौटंकी में चले जाते हैं।” वह हांफने लगे थे, ” और तुम पेपर वाले इन छोकरों का छोकरियों के साथ फोटू छाप-छाप, तारीफ छापछूप कर और दिमाग खराब कर देते हो। जानते हो, इस नौटंकी और अखबार में छपी फोटू से कहीं जिंदगी की गाड़ा चलती है।” वगैरह-वगैरह वह गालियों के संपुट के साथ बड़ी देर तक उच्चारते रहे थे। फिर जब वह थककर चुप हो गए तो संजय उनसे लगभग विनयपूर्वक आज्ञा मांगते हुए चला तो वह फिर फूट पड़े, ” नौटंकी वालों के साथ रहते-रहते तुमको भी एक्टिंग आ गई है। मैं इतना भला बुरा तबसे बके जा रहा हूं और तुम फिर भी चरण चांपू अंदाज में इजाजत मांग रहे हो।”

”नहीं मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगा। और फिर आप बुजुर्ग हैं। अजय के पिता हैं। मैं ऐक्टिंग क्यों करूंगा। आती भी नहीं मुझे।” संजय बोला तो वह फिर सामान्य हो गए। बोले, ”ऐक्टिंग नहीं आती तो ऐक्टरों के बारे में लिखना छोड़ दो। बहुतों का भला होगा।” संजय हंसते हुए चल पड़ा। फिर उसने सोचा अजय रंगकर्म कैसे निबाहता है?

और आज प्रेस क्लब जाते हुए अजय के पिता की यह बात सोच कर फिर हंसी आ रही थी कि ऐक्टिंग से छोकरे बरबाद होते हैं। फिर उसने खुद सोचा, क्या ऐक्टिंग से भी छोकरे बरबाद होते हैं? बिलकुल पाकीजा फिल्म के उस संवाद की तर्ज पर कि ”अफसोस कि लोग दूध से भी जल जाते हैं।” फिर अचानक उसने सोचा कि ऐक्टिंग करने वाले छोकरे बरबाद होते हैं कि नहीं, इसपर वह बाद में सोचेगा। फिलहाल तो उसे यह सोचना है कि ऐक्टिंग सीखने वाले छोकरे आत्महत्या क्यों करते हैं? वह भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में। कभी पेड़ पर फांसी लगाकर, कभी छत के पंखे से फांसी लगाकर। तो कुछ नाखून ही उंगली से निकाल कर काम चला लेते हैं। और आत्महत्या पर विराम लगा देते हैं।

तो क्या यह एन. एस. डी. के डायरेक्टर पद से इब्राहिम अल्काजी के चले जाने का गैप था, या कारंत की निदेशकीय क्षमता का हास था। या कि कारंत और अल्काजी के बारी-बारी चले जाने की छटपटाहट की आंच थी, अनुशासन की, प्रशासन की नपुंसकता की थाह लेते समय की चाल थी, या एनएसडियनों की टूटती महत्वाकांक्षाओं का विराम थीं ये आत्महत्याएं ? या नये निदेशकों की अक्षमताओं और अनुभवहीनता का नतीजा?

कुछ ऐसा वैसा ही सोचते, सिगरेट फूंकते जब दूसरे दिन वह एन. एस. डी. की कैंटीन में पहुंचा तो विभा वहा दियासलाई की डब्बी कैरम की गोटी की तरह उछाल कर गिलास में गोल करने वाला खेल खेलती हुई चाय पीती जा रही थी। आज वह खुश भी थी। उसने संजय को विश भी किया और नमस्कार भी। बोली, ”चाय पिएंगे?”

”नहीं, मैं चाय नहीं पीता।”

”अजीब बात है सिगरेट पीते हैं और चाय नहीं।” और कंधे उचकाती हुई बोली, ”कुछ और मंगाऊं क्या?”

”नो थैंक्यू। शाम को कभी।”

”तो वह शाम कभी नहीं आने वाली।” कहती हुई वह इतराई और उठ खड़ी हुई। संजय ने टोका तो वह बोली, ”डायलॉग्स याद करने हैं और रूम रिहर्सल भी।”

संजय आज विभा का खुश मूड देखते हुए कल की तरह फिर से उसे मिस नहीं करना चाहता था। सिगरेट जो वह कैजुअली पीता था, फूंकते-झाड़ते उसके साथ-साथ हो लिय़ा।

चलते-चलते विभा बोली, ”सुना है आप एन. एस. डी. पर फीचर लिख रहे हैं?”

”हां।”

”क्या-क्या फोकस कर रहे हैं?”

”फोकस क्या प्रॉब्लम फीचर है। मेनली सुसाइड।”

”क्या मतलब?” कहते हुए विभा लगभग बिदकी।

”कुछ मदद करेंगी?”

”मतलब?”

”कुछ जानकारी….।”

”सॉरी। मुझे माफ करिए। इस बारे में मैं कुछ मदद नहीं कर सकती आपकी।”

”देखिए आप लखनऊ की हैं….।”

”तो?” उसने अजीब-सी नजरों से घूरा और बोली, ”आप को ऐक्टिंग, नाटक स्क्रिप्ट वगैरह के बारे में, यहां की पढ़ाई-लिखाई, रिहर्सल एटसेक्ट्रा आई मीन एकेडमिक प्वाइंट्स, डिटेल्स जानना हो तो जरूर बताऊंगी। फालतू बातें नहीं बताऊंगी।”

”आप के साथी मर रहे हैं। और आप इसे फालतू बता रही हैं।”

”हां।” कह कर वह चलते-चलते रूक गई। बोली, ”मेरे लिए यह फिर भी फालतू है। मैं यहां पढ़ने आई हूं। एन. एस. डी. की पॉलिटिक्स डील करने नहीं।”

”पर मुश्किल क्या है?”

”मुश्किल यह है कि मैंने आपको गंभीर किस्म का पत्रकार मानने की भूल की। आपकी कुछ रिपोर्टे और समीक्षाएं पढ़ी हैं मैंने। पर आप मनोहर कहानियां ब्रांड रिपोर्टिंग भी करते हैं, यह नहीं जानती थी। कहते-कहते वह चलने को हुई और बोली, ”गु़डबाई कहें?”

संजय के साथ एक दिक्कत यह भी हमेशा से रही कि अगर उससे कोई जरा भी तिरछा होकर बोलता था उससे वह और तिरछा होकर कट जाता था। चाहे वह लड़की ही क्यों न हो, चाहे वह संपादक ही क्यों न हो। उसका बाप ही क्यों न हो। सो, जब विभा ने उससे कहा कि, ”गुडबाई कहें?” तो हालांकि उसके इस कहने में भी मिठास तिर रही थी पर संजय फिर भी फैल गया और ”यस, गुड बाई” कहने की जगह, ”हां, गुडबाई।” कहकर फौरन पलटा और सिगरेट फेंकते हुए ऐसे चल दिया, गोया उसने सिगरेट नहीं विभा को फेंका हो और उसे रौंदता हुआ चला जा रहा हो। जाहिर है विभा को ऐसी उम्मीद नहीं थी।

”सुनिए।” वह जैसे बुदबुदाई।

पर संजय-चिल्लाया, ”फिर कभी।” लगभग कैंटीन वाले अंदाज में। पर उसकी बोली इतनी कर्कश थी कि दो तीन एनएसडियन जो उधर से गुजर रहे थे अचकचा कर ठिठके और उसे घूरने लगे।

विभा सकपका गई। और कमरे में भाग गई। संजय ने ऐसा रास्ता मुड़ते हुए कनखियों से देखा। संजय फिर एन. एस. डी. नहीं गया। चार-पांच दिन हो गए तो उस पत्रिका के संपादक ने उसे फोन पर टोका कि, ”एन. एस. डी. वाली रिपोर्ट तुमने अभी तक नहीं दी?”

संजय को बड़ा बुरा लगा।

दूसरे ही क्षण वह खुद फोन घुमाने लगा। उसने सोचा अब वह टेलीफोनिक रिपोर्टिंग क्यों न कर डाले। उसने फटाफट एन. एस. डी. के चेयरमैन, डायरेक्टर समेत दो तीन लेक्चरर्स को फोन मिलाए। पर कोई भी फोन पर तुरंत नहीं मिला। लेकिन वह फोन पर जूझता रहा। आखिर थोड़ी देर बाद डायरेक्टर मिले और एक दिन बाद का समय देते हुए कहा कि, ”आप समझ सकते हैं फोन पर डिसकसन ठीक नहीं है। इत्मीनान से मिलिए।”

संजय को निदेशक का इस तरह बतियाना अच्छा लगा। निदेशक शाह जो खुद भी एक अच्छे अभिनेता, निर्देशक तो थे ही कुछ नाटक भी लिखे थे उन्होंने। मिले भी वह बड़े प्यार और अपनेपन से। आधे घंटे की तय मुलाकात बतियाते-बतियाते कब दो घंटे से भी ज्यादा में तब्दील हो गई। दोनों ही को पता नहीं चला। बिलकुल नहीं।

शाह बड़ी देर तक स्कूल की योजनाओं, परियोजनाओं, सिस्टम, इतिहास, तकनीक, रंगकर्मियों की विवशता, बेरोजगारी, दर्शकों की घटती समस्या, अल्काजी, शंभु मित्रा और कभी-कभार निवर्तमान निदेशक कारंत के बारे में बड़े मन और पन से बतियाते रहे। संजय उनकी बातों में इतना उलझ गया कि मेन प्वाइंट छात्रों की आत्महत्या का सवाल बावजूद बड़ी कोशिश के वह बातचीत में शुमार नहीं कर पा रहा था।

तो क्या विभा का मनोहर कहानियां वाला तंज उसे तबाह किए हुए था? या कुछ और था? या कि शाह के वाचन से वशीभूत वह आत्महत्या वाले सवाल को बाहर लाने के बजाय भीतर ढकेलता जा रहा था? आखिर क्या था? शायद यह सब कुछ था-गड्डमड्ड। पर तभी अनायास ही सवाल छात्रों की समस्याओं पर आ गया था तो शाह तौल-तौल कर कहने लगे कि, ”मैं खुद चूंकि इस स्कूल का कभी छात्र रह चुका हूं। पढ़ाया भी यहां। चिल्ड्रन एकेडमी के बावजूद जिंदगी यहां गुजारी है, सो छात्रों की समस्याओं से भी खूब वाकिफ हूं। और आप देखिएगा, जल्दी ही कोई समस्या नहीं रहा जाएगी। बिलकुल नहीं। बस बजट इतना कम है कि क्या बताऊं?” वह कह ही रहे थे कि संजय पूछ ही बैठा,”पर आप के छात्र आत्महत्या क्यों करते जा रहे हैं?”

शाह बिलकुल अचकचा गए। उन्होंने जैसे इस सवाल की उम्मीद नहीं की थी। शायद इसीलिए अकादमिक बातों को ही वह अनवरत फैलाते जा रहे थे। लेकिन आत्महत्या के सवाल पर वह सचमुच जैसे हिल से गए थे, ”हमारे तो बच्चे हैं ये।” शाह जैसे छटपटा रहे थे। और संजय ने नोट किया कि उनकी इस छटपटाहट में अभिनय नहीं कातरता थी, असहायता थी, और वह कठुआ से गए थे। साथ ही दहल भी। वह भाववेश में संजय के और करीब आ गए। और, ”ये मेरे ही बच्चे हैं। मैं इनके बीच बैठ रहा हूं। उन्हें सुन रहा हूं, समझ रहा हूं वन बाई वन।” जैसी भावुकता भरी बातें करते-करते अचानक जैसे उनका निदेशक पद जाग बैठा, ”देखिए मुझे अभी दो महीने ही हुए हैं यह जिम्मेदारी संभाले। और यह आत्महत्याएं हमारे कार्यकाल में नहीं हुईं।” वह जरा रूके और संजय के करीब से हटते हुए कुर्सी पीछे की ओर खींच ली और बोले, ” फिर भी मै देखता हूं। आई विल डू माई बेस्ट।” कह कर उन्होने भी चाहा कि अब वह फूट ले। पर इसी बीच दुबारा काफी आ गई थी। और ”नहीं-नहीं” कहते हुए भी उसे काफी पीने के लिए ऱुकना पड़ा। इस काफी का फायदा यह हुआ कि आत्महत्या प्रकरण से गंभीर और कसैले हुए माहौल को औपचारिक बातचीत ने कुछ सहज किया। इतना कि निदेशक महोदय उसे बाहर तक छोड़ने आए। हां, जो व्यक्ति उसे बाहर तक छोड़ने आया था, वह शाह नहीं, निदेशक ही आया था।

यह आत्महत्या प्रसंग की त्रासदी थी।

संजय बाहर आया तो उसने देखा कि कुछ एनएसडियन निदेशक के कमरे के बाहर जमघट लगाए पड़े थे और संजय को देखते ही वह सब के सब खिन्नता से भर उठे। पता लगा कि वह सभी कोई एक घंटे से वहां खड़े थे और निदेशक से मिलने का उनका एप्वाइंटमेंट था। सो उनकी खिन्नता संजय की समझ में आई। उसने उन सब से माफी मांगी तो वह सब बड़ी हिकारत से बोले, ‘जाइए-जाइए।’ और इस भीड़ में वानी और उपेंद्र भी थे। सो संजय को थोड़ी तकलीफ हुई। उसने दुबारा, ‘सॉरी, वेरी सॉरी’ कहा और बहावलपुर हाऊस से बाहर आ गया। बाहर निकलते-निकलते उसने फिर पलट कर रिपोर्ट का मरा सा शीर्षक भी सोचा ‘बहावलपुर हाऊस के भीतर का सच’ साथ ही उसने सोचा कि शीर्षक तय करने वाला वह साला कौन होता है?

सोचते-सोचते उसका मन इतना कसैला हुआ कि बस स्टाप जाने के बजाय बगल से गुजर रहे आटो को रोक कर बैठ गया। पहले तो उसने आटो वाले से आई.टी.ओ. चलने को कहा पर गोल चक्कर तक आते-आते बोला, ‘नहीं, यहीं बंगाली मार्केट।’ आटो का ड्राइवर, जो सरदार था भुनभुनाया। और एक भद्दी-सी गाली बकी। तो संजय ने उसे डपटा, ‘गाली क्यों बक रहे हो?’ तो वह ख़ालिस पंजाबी लहजे में बोला, ‘तेरे को थोड़े दे रहा, अपने नसीब को दे रहा। नसीब ही खोट्टा है जी अपना।’ भुनभुनाया संजय भी अपने आप पर कि दो कदम की दूरी के लिए आटो लेने की क्या जरूरत थी। ख़ामख़ा पैसा बरबाद करने के लिए।

अलका-अजय के यहां जब वह पहुंचा तो अजय नहीं था। पर अलका थी। गजरा बांधे, इत्र लगाए चहकी, ‘भीतर आ जाइए। अजय अभी आते ही होंगे।’ वह भीतर जा कर सोफे के बजाय मोढ़े पर बैठ गया। अलका ने काफी के लिए पूछा तो संजय ने मना कर दिया। जब दुबारा उसने काफी की रट लगाई तो बोला, ‘नहीं अभी पी कर आ रहा हूं।’ तो भी अलका नहीं मानी शिकंजी बना लाई। शिकंजी पीते हुए संजय चहकती अलका से पूछ ही बैठा, ‘आज कोई ख़ास बात है क्या?’

‘नहीं तो !’ कहते हुए उसने चोटी से लटकता गजरा हाथों में ले लिया।

‘नहीं, कुछ तो बात है।’

‘नहीं, कुछ ख़ास नहीं।’ कहते हुए वह तनिक सकुचाई।

‘ख़ास न सही। यूं ही सही?’

‘आप तो बस पीछे ही पड़ जाते हैं।’ कहते हुए वह उठी तो कलफ लगी उसकी साड़ी फड़फड़ा उठी। अलका की साड़ी का रंग, उस पर कलफ, गजरा फिर इत्र और इस सबसे ऊपर उसकी मोहकता- सब मिलजुल कर ऐसा कोलाज रच रहे थे कि सब कुछ सामान्य नहीं लग रहा था। हालांकि अलका की मोहकता में हरदम सौम्यता झलकती थी, उसकी सुंदरता में सादगी समाई रहती और चाल में सलीका, आज भी यह सब कुछ था पर इस सबके साथ हाशिए पर ही सही भावुक-सी, कामुक-सी शोखी भी आज अलका के अंगों से ऐसे फूट रही थी कि नीरज का लिखा वह फिल्मी गीत संजय की जुबान पर आ गया तो उसने अपनी आंखों में इसरार भरा और अलका से कहा, ‘आज मदहोश हुआ जाए रे मेरा मन ! गीत तो आपने सुना ही होगा?’

अलका को संजय से ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं थी तो चिहुंकते हुए बोली, ‘क्या?’ और लजा गई। बोली, ‘असल में हम और अजय आज ही के दिन मिले थे।’

‘तो आज मैरिज यूनिवर्सरी है?’

‘नहीं, नहीं।’ वह इठलाई, ‘मतलब पहली बार मिले थे।’

‘अच्छा-अच्छा।’ कहते हुए संजय ने आंखें चौड़ी कीं और होंठ गोल।

‘पर आप प्लीज’ अजय से इसका जिक्र मत करिएगा।’

‘क्यों? आज तो बीयर क्या, काकटेल उसकी ओर से।’

‘नहीं, आज यह सब नहीं। और देखिए फिर कह रही हूं कि अजय से इसका जिक्र नहीं करेंगे आप।’ अलका आदेशात्मक लहजमें बोली।

‘पर क्यों?’ संजय उदासी का रंग जमाते हुए बुदबुदाया।

‘वो इसलिए कि देखना चाहती हूं कि अजय को भी यह दिन याद है कि नहीं।’

‘ओह ! तो मुझे फूटना चाहिए।’

‘क्यों?’ वह अचकचाई।

‘अरे भाई महाराज जी वाला हश्र मुझे याद है।’

‘धत्, आप भी क्या बात ले बैठे। और आप वैसे थोड़े ही हैं।’ कहते हुए जैसे वह अपने आप को निश्चिंत कर रही थी।

‘हूं तो नहीं। क्योंकि मुझे नृत्य नहीं आता। और कथक की मुद्राएं तो बिलकुल नहीं। पर यह मत भूलिए अलका जी कि मैं भी पुरुष हूं। और पुरुष की मानसिकता कोई बदल नहीं सकता।’ कहते हुए संजय गंभीर होने लगा। वह आगे अभी और पुरुष मानसिकता पर अलका को ज्ञान देना चाहता था, पर अलका ने ही ब्रेक लगा दिया, ‘बस-बस ! अजय नहीं हैं सो आप अपनी रजनीशी फिलासफी पर विराम लगाइए। क्योंकि मैं इस पुरुष मानसिकता वाली बहस में उलझ कर मूड नहीं ऑफ करना चाहती।’

‘आखिर महिला मनोविज्ञान काम कर गया न ! और कर गई पलाबो।’

‘ये पलाबो क्या है।’ वह जरा खीझी।

‘पलाबो !’ वह बोला, ‘क्या है कि एक चुटकुला है।’

‘तो इसे सुनाइए। कि मूड साफ हो। सारा मूड आफ कर दिया।’

‘हद हो गई। मैं आप की सुंदरता की तारीफ कर रहा हूं। और आप का मूड फिर भी आफ हो रहा है। तो मैं तो चलूंगा।’ कहते हुए संजय उठने लगा तो अलका लगभग नृत्य मुद्रा में आ गई। जैसे शिव का तांडव करने जा रही हो। पर दूसरे क्षण जाने क्या हुआ कि उसने बड़ी नरमी से संजय का हाथ पकड़ कर उसे बिठा दिया और बोली, ‘यस पलाबो!’

उसके स्पर्श में इतनी मादकता थी कि संजय का मन हुआ कि वह अलका को पकड़ कर चूम ले। पर उसे अजय का ख़याल आ गया। नैतिकता का ख़याल आ गया। एक पुरानी कहावत याद आ गई कि ‘डायन भी सात घर छोड़ देती है।’ हालांकि अलका भी उसकी दोस्त थी। पर अजय भी दोस्त था। और संजय इतनी नैतिकता तो निभाना जानता था। हालांकि वह देह संबंधों के मामले में ऊपरी तौर पर इस तरह की नैतिकता का मापदंड नहीं स्वीकारता था और रजनीश दर्शन का कायल था पर भीतरी और पारिवारिक संस्कार फिर भी आड़े आ जाते थे। यहां भी आ गया। फिर उसने सोचा कि अलका आज उसे सुंदर लग रही है और अगर उसे चूमने की उसकी इच्छा इतनी ही प्रबल है तो अभी जब अजय आ जाएगा तो वह अजय से कह देगा कि भई आज अलका बहुत ही सुंदर लग रही है और मैं उसे चूमना चाहता हूं। बिलकुल नैसर्गिक सौंदर्य की तरह। और वह यह जानता था कि अजय सहर्ष उसे चूमने देगा, मना नहीं करेगा। सपने में भी नहीं।

पर क्या अलका भी इस तरह उसे चूमने देगी?

संजय ने सोचा। उसने इस पर भी सोचा कि क्या जैसाकि वह अभी जैसे सोच रहा है, वैसे ही निश्छल हो कर अजय से सचमुच यह कह सकेगा कि ‘मैं अलका को चूमना चाहता हूं।’ और कि क्या सब कुछ वैसे ही हो जाए जैसा कि वह सोच रहा है तो इस बात की क्या गारंटी है कि कल को उसकी इच्छा अलका के साथ सोने की न हो जाए? परसों कहे कि, ‘चलो तुम हटो, कहीं और जा कर रहो। अब यहां मैं अलका के साथ रहना चाहता हूं।’

क्या पता?

कुछ भी हो सकता है। और सहसा संजय को अपने पर, अपनी इस सोच पर इतनी शर्म आई कि उसे लगा कि फिलहाल तो उसे कहीं चिल्लू भर पानी ढूंढ़ना चाहिए और उसमें डूब मरना चाहिए। वह यह सब सोच ही रहा था कि अलका पहले उदास होकर फिर बिंदास होकर बोली, ‘यस-यस पलाबो।’ और सोफे से उठ कर दूसरा मोढ़ा लेकर संजय के एकदम सामने आ कर बैठ गई। व्यंग्य के लहजे में बोली ‘लेबिल बराबर कर दिया है। अब तो कोई दिक्कत नहीं है।’ वह बेफिक्र-सी हंसती हुई फिर उच्चारने लगी ‘यस-यस पलाबो।’ उसने दुहराया, और जरा जोर से ‘ओह यस !’ बिलकुल ठसके के साथ। उसके हाथों में उस के बालों में गुंथा गजरा फिर खेलने लगा था। और वह रह-रह कर, ‘यस-यस पलाबो’, ‘ओह यस’ जैसे शब्द उच्चारती हुई कहती जा रही थी, ‘अब तो लेबिल में आ गए हैं भई।’

‘लेबिल’ और ‘ओह यस’, ‘ओह यस’ कह-कह वह जैसे संजय का मन सुलगाए दे रही थी। मन के भीतर ही भीतर उसकी नैतिकता की दीवार रह-रह ढह रही थी, रह-रह गिर रही थी बतर्ज दुष्यंत कुमार, ‘मैं इधर से बन रहा हूं, मैं इधर से ढह रहा हूं।’

‘लेबिल’ में तो ऐसी कोई बात नहीं थी। अक्सर संजय और अजय पीते-पीते चौथे-पांचवें पेग के बाद इस ‘लेबिल’ पर आ जाते थे। संजय कभी अजय से कहता कि, ‘तुम्हारी कम है,’ तो कभी अजय संजय से कहता, ‘तुम्हारी कम है।’ तो ‘लेबिल’ में लाने की बात चल पड़ती। और अंतत: ‘लेबिल’ दोनों गिलासों को मिला कर अलका तय करती। क्योंकि दोनों एक-दूसरे से कहते, ‘तुम्हें चढ़ गई है, तुम साले बदमाशी कर रहे हो।’ और एक बार तो अजय ने हद ही कर दी। उसने चीख़ कर कहा, ‘अलका ! तू संजय का फेवर कर रही है।’ सुन कर संजय तो चौंका ही आम तौर पर बातचीत में अंगरेजी नहीं बोलने वाली अलका भी चीख़ पड़ी, ‘व्हाट यू मीन?’ तो अजय आधे सुर पर आ गया, ‘जरा तुम भी आधा सुर कम कर लो और लेबिल में आ जाओ।’ कह कर वह हंसा, ‘संजय के गिलास में कम है और तुम लेबिल में बता रही हो।’

अलका फिर भी नहीं मानी और कहती रही कि ‘लेबिल में है !’ लेकिन अजय भी नहीं मानने वाला था। उसने चम्मच मंगवाई और चम्मच-चम्मच ह्विस्की नपवाई। सचमुच संजय के गिलास में चार कि पांच चम्मच ह्विस्की कम निकली। और अजय ने घूरते हुए अलका की ओर देखा और बोला, ‘यस मैडम?’

अलका जैसे सफाई देने पर उतर आई। कहने लगी, ‘वो तो इसलिए कि मैं जानती हूं इनको दूर जाना है। सही सलामत घर पहुंच जाएं और क्या?’ वह बिफरी, ‘तो इसमें फेवर क्या हो गया?’

संजय ने देखा, जरा-सी बातचीत दोनों में झगड़े में बदल रही थी। उसने पहले सोचा कि अब फूट ले। लेकिन जाने क्या हुआ कि बोल पड़ा, ‘तुम लोगों की चिक-चिक से मेरा सारा नशा काफूर हो गया। अब एक पटियाला और बनाते हैं।’

फिर तो उस दिन जो पटियाला पैग चला तो रात के दो बज गए। और वह दोनों तभी उठे जब बोतल ने दगा दे दिया। मतलब पूरी डेढ़ बोतल दोनों ने डाकर ली थी।

‘तो चलते हैं भई।’ कह कर संजय उठा और दरवाजे पर पहुंचते-पहुंचते लुढ़क कर गिर गया। अलका ने उसे दौड़ कर उठाया और बुदबुदाई, ‘इतनी पीने की क्या जरूरत थी?’ वह जैसे नाराज थी। संजय लाख नशे के बावजूद बड़ा शर्मिंदा हुआ अपने इस लुढ़कने पर। वह जल्दी से जल्दी भाग लेना चाहता था वहां से। पर पैर थे कि भागना ही नहीं चाहते थे। या कि शायद चाह कर भी भाग नहीं पा रहे थे। जो भी हो वह थोड़ी दूर ही चला कि पीछे से अजय, ‘संजय-संजय’ पुकारता मिला। संजय रुक कर वहीं सड़क पर बैठ गया। पालथी मार कर। अजय हांफता हुआ आया और वह भी वहीं पालथी मार कर बैठ गया। संजय कुछ नशे में, कुछ भावुकता में बोला, ‘क्या बात है डियर?’

‘तुझे अकेले नहीं जाने दूंगा। तुम्हारी हालत ठीक नहीं है। मैं पहुंचा आता हूं। उठ!’ अजय बांह पकड़ कर संजय को उठाने लगा।

‘नहीं मैं चला जाऊंगा।’

‘मैं छोड़ आता हूं। तू एक मिनट घर चल।’

‘एक पेग और नहीं मिल सकती कहीं से?’ वह वापस अजय के घर जा कर बोला, ‘बस एक पेग !’ कहते हुए वह फिर ढप से फर्श पर ही बैठ गया। अब तक अलका पूरी तरह बोर हो गई थी। और अजय उससे लैंबरेटा की चाबी पूछ रहा था, ‘कहां है, बता तो सही।’ और अलका का कहना था कि एक तो छोड़ने मत जाओ। दूसरे जो जाओ तो स्कूटर से कतई नहीं। नहीं दोनों मर जाओगे। पर अजय नहीं मान रहा था। अचानक अलका धम-धम करती संजय के पास आई और जाहिर है धम-धम करती हुई किसी नृत्य मुद्रा में नहीं आई और धम-धम स्टाइल में ही बुदबुदाई और बौराई हुई, ‘तुम तो कुंवारे हो पर मुझे क्यों विधवा बनाने पर तुले हो?’ सुनते ही जैसे सांप सूंघ गया संजय को। और उसने मुगले आजम के पृथ्वीराज कपूर स्टाईल में ऐलान कर दिया कि ‘वह अजय के साथ नहीं जाएगा। और जाएगा भी तो स्कूटर से कतई नहीं।’ अजय पर इस ऐलान का असर पड़ा। और उसने पायज़ामा उतार कर जींस पहनते हुए हवाई चप्पल उतार कर कोल्हापुरी पहनी और बाहर आ गया। दरवाजा बंद करते हुए अलका ने कहा, ‘संजय तुम यहीं क्यों नहीं सो जाते? इस तरह जाने से तो अच्छा ही था !’ पर संजय अलका की बात अनसुनी करते हुए अजय से पूछ रहा था, ‘एक पेग कहीं से और नहीं मिल सकती।’ कहते हुए वह लगभग लहरा रहा था और बोल रहा था, ‘प्लीज” ! एक पेग !’ उसके एक-एक शब्द में नशा था। और अजय बोले जा रहा था, ‘मिलेगा डियर, मिलेगा एक नहीं दो पेग।’

‘जाओ, अब तुम दोनों लेबिल में हो।’ कहते हुए अलका ने भड़भड़ा कर दरवाज़ा बंद कर लिया। हालांकि उस रात तुरंत वहां कोई सवारी नहीं मिलने के कारण वह दोनों कहीं गए नहीं। पास ही सड़क पर एक बिजली के खंभे से पीठ टिका-टिका कर दोनों बैठे सिगरेट फूंकते रहे और नाटक, शायरी, सेक्स, बचपन और अंतत: अपनी-अपनी बेचारगी बतियाते-बतियाते दोनों ने वहीं सुबह कर दी थी।

…जारी…

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