अपने-अपने युद्ध (3)

भाग-2 से आगे…. उस रात अजय बड़ी देर तक मैकवेथ के डायलाग्स सुनाता रहा कई-कई अंदाज में। डायलाग्स सुनते-सुनते संजय दुष्यंत कुमार के शेर सुनाने लग गया। फिर जाने कब फिल्मी गानों पर बात आ गई और दोनों गाने गुनगुनाने लगे। एक बार हेमंत के गाए किसी गीत पर झगड़ा हो गया कि साहिर ने लिखा है कि शैलेंन्द्र ने। झगड़ा निपट नहीं रहा था कि संजय ने फिर एक गीत छेड़ दिया, “न हम तुम्हें जाने न तुम हमें जानों मगर लगता है कुछ ऐसा, मेरा हमदम मिल गया।” लेकिन इस गाने पर भी झगड़ा बना रहा कि फीमेल वायस सुमन कल्याणपुर की है कि लता मंगेशकर की? और बात सेक्स पर आ गई।

दोनों अपने-अपने किस्से बताने लगे। जाहिर है अजय के पास सेक्स का अनुभव ज्यादा था। एक अफसर की बीबी के बारे में बताने लगा। उसे ऐक्टिंग का शौक था। कैसे जब उसका हसबैंड बाहर टूर पर जाता था तो वह उसे बुलवा भेजती। और उस तीन चार घंटे में ही जब तक तीन चार बार सवार नहीं होता वह नहीं छोड़ती थी। चूस लेती थी साली पूरी तरह।

संजय इस पर बिदका, “बड़े चूतिया हो। तुम तीन चार घंटे मे तीन चार बार उस पर क्या चढ़ते थे लगता है जैसे एहसान करते थे। अरे मुझे कहते मैं एक घंटे में ही तीन चार बार चढ़ जाता।”

सुन कर अजय बोला, “बेटा जब शादी हो जाएगी तब समझेगा। अभी जवानी-जवानी एक घंटे में तीन चार बार जो करता है वह तीन चार दिन में एक बार हो जाएगा।”

पर संजय मानने को तैयार नहीं था। उसने अपना अनुभव बखाना कि, “आधे घंटे में ही वह तीन अटेंप्ट ले चुका है। और कम से कम ऐसा छ-सात चांस।”

अजय हंसा, “तो बस कबड्डी-कबड्डी। गवा और आवा।”

वह थोड़ा रुका और बोला, “वह कब की बात कर रहा है तू? पंद्रस-सोलह साल की उम्र की तो नहीं?”

“एक्जेक्टली।”

“हां, वही कहूं। तो अब करके दिखा।”

“कोई मिले तब न।”

“अच्छा तो इसीलिए एन.एस.डी. के फेरे मार रहा है?” घूरते हुए अजय हंसा।

“नहीं, नहीं वहां तो बस प्रोफेशनली।”

“तो ठीक है। नहीं मर जाएगा साले।” फिर जाने क्या उसे सूझी कि वह ब्लू फिल्मों के फ्रेमों के बारे में बतियाते-बतियाते बताने लगा कि वह दो तीन बार अलका को भी ब्लू फिल्में दिखा चुका है। घर पर ही वी.सी.आर. किराए पर लाकर। और वह बड़े डिटेल्ड ब्योरे में चला गया कि शुरू में अलका कैसे सुकुचाई। शुरू में तो उसने चद्दर से मुंह ढक लिया। फिर धीरे-धीरे देखने लगी। देखते-देखते अमल भी करने लगी। पहले “सक” नहीं करती थी अब “सकिंग” में मुझसे ज्यादा उसे मजा आता है। और तो और क्लाइमेक्स के क्षणों में ब्लू फिल्मों की औरतों की तरह वह बाकायदा “ओह यस ओह बस,” भी करती रहती है। बताते-बताते अजय कहने लगा, “सच डियर सेक्स लाइफ का मजा ही बढ़ गया है।”

“अच्छा !” संजय ने ठेका लगाया।

“पर यार, एक झंझट हो गई एक बार।”

“क्या?” संजय ने चकित होकर पूछा।

“एक दिन अलका पूछने लगी तुम्हारा छोटा क्यों है?”

“क्या मतलब”

“पेनिस।”

“अच्छा-अच्छा। तो सचमुच छोटा है तुम्हारा?”

“नहीं भाई।” वह जरा रुक कर पीठ खुजलाने लगा और बोलता रहा “पहले तो उसका सवाल सुन कर मैं भो चौंका। पर दूसरे ही क्षण ठिठोली सूझी और पूछ लिया कि कितना बड़ा-बड़ा झेल चुकी हो। तो वह लजा कर मुझसे लिपट गई और बोली, “धत्।”

“फिर क्या हुआ?” संजय ने उत्सुकतावश पूछा।

“होना क्या था। बहुत कुरेदने पर वह कसमें खाने लगी कि किसी का नहीं देखा, न ही ऐसा कोई अनुभव उसे है।” अजय अब जांघे खुजलाने लगा था, “तो मैंने डपट कर पूछा कि फिर तुम्हें कैसे पता चला कि मेरा छोटा है?”

वह रुका और संजय की निंदिवाई, अलसाई और नशाई आंखों में झांक कर कहा, “जानते हो उसने क्या जवाब दिया।”

“क्या?”

“वह एकदम मासूम हो गई और शरमाती सकुचाती हुई बोली, ब्लू फिल्मों से। उसने किसी हव्शी का देखा था।”

“ओह यस !” जोर से बोलते हुए संजय ने तब ठहाका लगाया था।

संजय के ठहाके के साथ ही पौ फट गई थी।

“बहुत दिनों बाद ऐसी सुबह देख रहा हूं।” संजय बोला तो अजय ने भी हामी भरी, “मैंने भी।”

चलते-चलते संजय ने अजय से ठिठोली की, “घबराओ नहीं। ऐसा होता है और इत्तफाक से बड़ा है।” कहते हुए वह मजाकिया हुआ, “जरूरत पड़े तो बोल देना। बंदा तैयार मिलेगा।”

अजय ने भी संजय की बात को मजाक में ही लिया, “भाग साले कबड्डी-कबड्डी। तेरी तो….।”

संजय ने मजाक जारी रखा और अजय से कहा “ज्यादा मायूस मत हो। ऐसा बहुतों के साथ होता है। ले इसी बात पर एक सरदार वाला चुटकुला सुन।”

“सुना क्या है?”

“सच।”

“हां, सुना डाल।” कहते हुए अजय ने बड़ी जोर से हवा खारिज की। गोवा कोई कपड़े का थान फाड़ रहा हो। संजय का मूड आफ हो गया। क्योंकि रात भर तो रह-रह कर अजय थान फाड़ ही रहा था, अब चलते-चलते भी उसने सुबह खराब कर दी थी। हालांकि रात भर तो रह-रह कर या तो अजय हवा खारिज कर मूड आफ करता था तो कभी आती-जाती रेलगाड़ियां। अजय तो खैर यहीं घर होने के नाते इन रेलगाड़ियों के आने-जाने का आदी था पर संजय को रह-रह कर वह आती जाती रेलगाड़ियां बहुत डिस्टर्व करती रही। इतना कि उसे अनायास ही एम.के. रैना के उस करेक्टर की याद आ गई जो उन्होंने रमेश बक्षी की कहानी वाली ’27 डाऊन फिल्म’ में किया था। जिसमें वह करेक्टर अपनी भैंस जैसी पगुराती बीवी से पिंड छुड़ाने की गरज से लगातार भागता रहा है और उसका सारा तनाव चलती रेलगाड़ी की गड़गड़ाहट में गूंजता रहा है। फिल्म का वह पूरा फ्रेम इतना बढ़िया बन पड़ा था कि सचमुच दर्शक भी उस तनाव की आंच उसी शिद्दत से महसूस कर सकता था। पर बंगाली मार्केट में रेल पटरी के पास की इस सुनसान सड़क पर आती-जाती रेलगाड़ियां तनाव नहीं मन में खीझ भर रही थीं। तिस पर अजय की रह-रह यह हवा खारिज करने की आदत! संजय सोचने लगा कि लोग इस बेशरमी से सबके सामने कैसे हवा निकाल लेते हैं? और अजय की यह आदत बेचारी अलका कैसे बर्दाश्त करती होगी? उसे अपने से ज्यादा अलका की परेशानी की चिंता हुई कि उसे इस कमबख्त के साथ रात-दिन गुजारना रहता है। दाढ़ी तो बेचारी झेल लेती होगी पर हवा निकालना? अभी संजय इस चिंता में दुबला हुआ ही जा रहा था कि अजय ने उसे टिपियाया, “अरे सरदार वाला किस्सा सुना न?”

“किस्सा नहीं चुटकुला! पर है नानवेज।”

“वही। वही। तो प्रोसीड !”

“तो सुन” कह कर उसे मन हुआ कि वह भी जोर से हवा निकाल दे। पर ऐसा वह नहीं कर सका। कर भी नहीं सकता था।

सो बोला, “एक सरदार जी की शादी हुई। विदाई के बाद सुबह दुलहन लेकर घर आए। घर में भीड़ बहुत थी पर बीवी से मिलने को बेताब सरदार जी ने युक्ति यह निकाली की बीवी को बाजार घुमा लाएं। बाजार में बीवी के हाथ में हाथ डाले घूम रह थे। एक जगह जरा उन्हें मजाक सूझा। पैंट की दोनों जेबें ब्लेड से काट डालीं। और सरदारनी से जेब में हाथ डालने को कहा। सरदारनी ने जेब में हाथ डाला तो जेब फटी थी तो सीधे “वही” हाथ में आ गया। सरदार जी को मजा आ गया। फिर सरदार जी को सरदारनी पर रौब गालिब करने की सूझी। उन्होंने शरमाते हुए दूसरी जेब में डलवा दिया। और फिर वही “घटना” घटी। सरदार जी ने सरदारनी पर रौब जमाते हुए कहा, “देखो, दो-दो हैं।” सरदारनी शरमा कर चुन्नी होंठों में दाब ली। इस तरह सरदार जी ने सरदारनी पर रौब तो गालिब कर लिया। पर दूसरे ही क्षण उन्हें रात की चिंता सताने लगी। कि रात को वह सरदारनी को कहां से दो-दो दिखाएंगे?”

“फिर क्या हुआ?” अजय ने जम्हाई लेते हुए पूछा।

“साले, सुन तो सही। अब तेरा वाला मामला आ रहा है।”

“क्या मतलब?”

“पूरा चुटकुला सुनना हो तो सुन, नहीं मैं चलूं।” संजय ने अजय पर धौंस जमाई।

“नहीं-नहीं, सुना। अब नहीं बोलूंगा।”

“तो सरदार जी परेशान थे कि रात को कहां से दो-दो दिखाएंगे सरदारनी को। कि तब तक उनका दोस्त एक दूसरा सरदार बाजार में दिख गया। उसे उन्होंने बुलाया। उसने कुछ पैसा पहले ही से सरदार जी से उधार ले रखा था। सो सरदार जी के रौब में भाग-भागा आया। सरदार जी उस दूसरे सरदार को सरदारनी से थोड़ी दूर एक कोने में ले गए और उसे लगे हड़काने। वह हाथ पैर जोड़ने लगा। सरदार जी का काम हो गया था। सो वह उसे बख्श कर सरदारनी के पास आ गए। सरदारनी ने पूछा, “कि गल है?” सरदार जी ने बड़ी मासूमियत से सरदारनी को बताया, “अपना यार है। हमारे पास जो “दो” हैं उसके पास “एक” भी नहीं है। सो एक मांग रहा था।”

तो सरदारनी ने पूछा, “तुमने क्या किया?”

सरदार जी बोले, “यार है मदद कर दी उसकी। एक उसको दे दिया।”

सरदारनी बोली, “बड़े रहमदिल हो जी आप।” और मुसकुरा कर चुन्नी फिर होंठो से दबा ली।”

कह कर संजय जरा रूका तो अजय कहने लगा, “इसमें चुटकुला क्या हुआ?”

“अबे अभी खत्म कहां हुआ?” संजय बोला।

“बड़ा लंबा हा?”

“हां। और चुपचाप सुन अब खत्म होने वाला है। बोलना नहीं।”

“हां, सुना भई।”

“तो सरदार जी का बिजनेस था।” वह रुका और बोला, “तेरी तरह।” और दोनों हंसे। फिर संजय बोला, “सरदार जी एक बार बिजनेस टूर पर गए। काफी दिन हो गए, लौटे नहीं। ऊपर से फोन कर-कर के सरदारनी को सताते रहते। सरदारनी को सरदार जी की तलब लगने लगी। इसी बीच एक दिन वह दूसरे सरदार जी जो पहले बाजार में मिल गए थे, इनके घर आए। सरदारनी को लगा मौका अच्छा है। और इनके पास भी जो है वो भी अपने सरदार जी का ही है। कोई हर्ज नहीं। सो वह दूसरे सरदार के साथ स्टार्ट हो गईं। अब दूसरे सरदार जी सरदारनी की सेवा में रोज आने लगे। कुछ दिन बाद सरदारनी के असली सरदार बिजनेज टूर से वापस आ गए। रात में सरदारनी से इधर-उधर की जब हांकने लगे तो सरदारनी से रहा नहीं गया।

वह सरदार से बोली, “जी तुम निरे बेवकूफ हो। बिजनेस क्या करोगे?”

सरदार जी भौंचक्के रह गए। बोले, “हुआ क्या?”

सरदारनी बोली, “तुमसे बड़ा बेवकूफ कौन होगा जी। तुम अपना बड़ा सामान तो दोस्त को दे देते हो और छोटे से अपना काम चलाते है।”

“ओह यस।” सुन कर अजय झूम गया। बोला, “मजा आ गया।”

“तो चलूं?” कि अभी एकाध बम बाकी है तुम्हारा?”

“नहीं-नहीं जाओ।” अजय झेंपते हुए बोला, “सुबह भी हो गई है।” सुबह सचमुच हो गई थी।

“ओह यस !” जब अलका फिर बोली तो संजय के मुंह से अनायास ही निकल गया, “ह्वाट?”

“यस पलाबो।” वह चहकी।

“अच्छा-अच्छा।” कह कर उसने कहा, “पहले एक शिकंजी और हो जाए?”

“हां, हां बिलकुल।” और अलका शिकंजी बनाने में लग गई।

संजय सोचने लगा कि अलका को हो क्या गया है। जो बार-बार “ओ यस, ओह यस,” उच्चार रही है बेझिझक और उसी ब्लू फिल्म वाले अंदाज में। क्या वह उसे आमंत्रण दे रही है? उसने सोचा। लेकिन उसको अपनी सोच पर एक बार फिर शर्म आई और घिन भी। उसने मन ही मन में कहा, नहीं अलका ऐसी नहीं है। चीप और चालू नहीं है। उसने सोचा। फिर यह भी सोचा कि क्या पता अजय का सचमुच “छोटा” हो, बहुत छोटा। हो सकता है। कुछ भी हो सकता है। पर अलका फिर भी ऐसी नहीं हो सकती।

“लीजिए”

“आयं।” संजय चिहुंका। अलका शिकंजी का गिलास लिए खड़ी थी। संजय ने गिलास ले लिया और अलका “ओह यस” या “यस पलाबो” कहती कि संजय ने चुटकुला शुरू कर दिया, “मिलेट्री में सिख रेजीमेंट का नाम तो सुना ही होगा।” वह कह ही रहा था कि अलका पीछे मुड़ी और संजय की नजर उसके नितंबो पर अनायास ही पड़ गई। अब तो वह बिलकुल ही पीछे से ही पकड़ कर चूम लेना चाहता था पर अलका तब तक फिर पलट कर मोढ़े पर बैठने लगी। बैठती हुई बड़े बेमन से बोली, “सरदारों वाला चुटकुला है तो रहने दीजिए।” अजय को ही सुनाइएगा।”

“क्यों?” संजय की आखों में इसरार था।

“वैसे ही।” वह झिझकती हुई बोली।

“नहीं-नहीं घबराइए नहीं। यह नानवेज नहीं है। और सरदारों वाला मिजाज भी नहीं है।”

संजय ललचाती नजरों से उसे देखते हुए बोला। वह यह तो समझ ही गया था कि अजय अलका को वह सरदार जी वाला चुटकुला सुना चुका है। और यह भी समझ गया था कि अजय ने यह भी बता रखा है कि संजय ने सुनाया है। इस बीच उसने देखा अलका कुछ असुरक्षित-सी महसूस करते हुए बार-बार पल्लू खींचती जा रही थी। उसका गजरा भी इस फेर में गड़बड़ाता जा रहा था। संजय समझ गया कि अलका उसकी ललचाई नजरों का अर्थ समझ गई है। सो अपनी गंभीरता की सर्द खोल में वापस आ गया।

निर्विकार भाव से उसने चुटकुला शुरू किया, “बीच लड़ाई में सिख रिजीमेंट का कमांडर अपनी सिख बटालियन से बिछड़ गया। खोजते-खोजते वह बंगाल रेजीमेंट से जा मिला। उधर बंगाल रेजीमेंट से भी उसका कमांडर बिछड़ गया था तो तय हुआ कि सिख रेजीमेंट का कमांडर बंगाल रेजीमेंट की कमान संभाल ले। और लड़ाई में अमूमन कमांडर बटालियन के पीछे रहता है। और आगे की पोजीशन पूछता हुआ जरूरी आदेश देता रहता है। यहां भी यही हुआ।

सिख रेजीमेंट का कमांडर पीछे से लगातार दुश्मन की पोजीशन पूछता था। “बंगाल रेजीमेंट के जवान लगातार दुश्मन की पोजीशन बताते और पूछ लेते, “पलाबो?” सिख रेजीमेंट के कमांडर को बंगाली नहीं आती थी। सो उसने मन ही मन सोचा कि हो न हो ‘पलाबो’ का मतलब फायरिंग से हो। सो जब जवान बताते, “दोसमन दोसमन एक हजार मीटर! पलाबो?” तो कमांडर बोलता, “नो पलाबो।” दोसमन दोसमन पांच सौ मीटर पलाबो?” जवान बताते और कमांडर कहता, “नो पलाबो।” सिलसिला चलता रहा। अंतत: जवानों ने जब कहा कि “दोसमन सो मीटर पलाबो?” तो कमांडर बोला, “यस पलाबो !” और कमांडर का “यस पलाबो !” बोलना था कि सारे के सारे जवान पीछे की ओर भाग लिए। ‘पलाबो’ बंगला का शब्द है और ‘पलाबो’ मतलब भाग लेना। तो उन जवानों की योजना ही शुरू से भाग लेने की थी।” चुटकुला सुनते ही अलका खिलखिला कर हंस पड़ी बोली, “मजा आ गया।” वह बिलकुल अजय की तरह बोली।

“मजा क्या खाक आ गया?” संजय ने अलका से कहा कि, “अपने देश में ज्यादातर पढ़ी लिखी औरतों का भी यही हाल है कि ‘पलाबो’।”

“नहीं मैं नहीं मानती।” अलका बिलकुल किसी फिलासफर की तरह बोली। और गंभीर हो गई।

“अब देवी जी आप मानिए न मानिए। कोई जबरदस्ती तो नहीं। पर दरअसल हकीकत यही है कि औरतें चीजों को फेस करने के बजाय, जाने क्यों भाग लेने में ही भलाई समझती हैं।”

“नो। बिलकुल नही।”

“कैसे नहीं?” संजय बोला, “आप अपने ही को ले लीजिए। दिल्ली आईं कथक सीखने के लिए। और नृत्य के एक ठेकेदार को नहीं झेल सकीं। न झुक सकीं, न लड़ सकीं। ‘पलाबो’ कर गईं।”

“संजय ! क्या ले बैठे?” वह रुआंसी सी हुई और बोली, “आप भी !”

“नहीं, अपने देश की महिलाओं का इतिहास ही यही रहा। रानी पद्मावती का ही किस्सा ले लीजिए।” संजय अब चालू हो गया था, “बीस हजार रानियों के साथ जौहर व्रत लिया और चिता में कूद कर जल मरीं।” संजय खीझ रहा था, “अरे मरना ही था तो जल कर क्यों? लड़ कर क्यों नहीं मर सकती थी? और हो सकता था लड़ कर मरती नहीं तो मार देती उस आक्रमणकारी को।”

“वीर रस में आने की जरूरत नहीं है प्रभु ! आधे सुर में भी काम चल सकता है।” कहते हुए अलका बोली, “औरतों पर आपेक्ष लगाना और बात है, परिस्थितियों को जानना और बात है।” कहकर अलका जरा रुकी और बोली, “पर मैं अभी डिबेट के मूड में नहीं हूं। फिर कभी।”

“फिर कभी क्या, कभी नहीं। हरदम ‘पलाबो’।” वह अलका को एक बार फिर भरपूर नजरों से देखता हुआ बोला, “शायद इसीलिए लोहिया ने औरतों को दलित कहा है।”

“यह लोहिया कौन है?” अलका बिसूरती हुई पूछ बैठी, “जो औरतों को दलित कहता है।” सुनकर संजय ने माथा पीट लिया और हाथ जोड़ते हुए कहा, “आप मार्क्स को जान सकती हैं माओ, लेनिन और मैक्सिम गोर्की को जान सकती हैं। उनकी किताबें पढ़ सकती हैं। पर लोहिया का नाम भी नहीं जान सकती। धन्य हैं आप नृत्यांगना जी। धन्य हैं।” कह कर संजय ने अलका से आज्ञा मांगते हुए कहा, “तो मैं अब चलूं?”

“नहीं रुकिए। अजय आते होंगे।”

“नहीं अब चलूंगा।” कहकर संजय चलने लगा तो अलका बोली, “अबकी रक्षा बंधन पर आप मुझसे राखी बंधवा लीजिए।”

“क्या मतलब।” संजय भड़का।

“नहीं, आदमी तो आप अच्छे हैं, पूरा विश्वास भी है आप पर। लेकिन कभी-कभी देखती हूं कि आप भी पुरुष मानसिकता से संचालित होने लगते हैं तो ठीक नहीं लगता।” सुन कर संजय लजा गया। बोलो, “सॉरी।”

“नहीं कोई बात नहीं। प्लीज, आप माइंड नहीं करिएगा।”

“अरे नहीं, नहीं।” कहता हुआ संजय बाहर आ गया। बाहर क्या आ गया, उसे लगा जैसे वह भहरा गया। सोचने लगा कि कोई औरत लोहिया को जाने न जाने, पुरुष की आंखों में छुपे अर्थ जरूर जान जाती है। फर्क यही है कि कहीं चुप रहती और कहीं कह देती है।

और लोहिया? गांधी? लोहिया और गांधी? कि गांधी और लोहिया? लोहिया ने तो औरतों की स्थिति के बारे में लिखा, पर अपनी “औरतों” के बारे में कहीं लिखा नहीं। इलाहाबाद की उन श्रीमती पूर्णिमा बनर्जी के बारे में भी नहीं। जिनसे कहते हैं कि उनका विवाह होते-होते रह गया था ! हालांकि लोहिया के प्रति आकर्षित स्त्रियों की संख्या अच्छी खासी थी। फिर भी वह ‘अविवाहित’ रहे। तब जब कि वह सुंदरता के तलबगार थे। सुंदरता के रसिक पुजारी! हां, गांधी ने अपनी पत्नी, अपने सेक्स के बारे में टाफी-टोकन जैसा ही सही, जरूर लिखा। फिर उसने सोचा कि क्या गांधी भी एकाधिक औरतों के फेर में पड़े होंगे? हो सकता है पड़े हों। फिर वह अचानक रजनीश पर आ गया और जैसे अपने आप से ही कहने लगा कि रजनीश जैसा विद्वान और स्पष्ट वक्ता होना कितना कठिन है। इस सदी का इतना बड़ा विद्वान दार्शनिक। पर अफसोस कि उसे ठीक से पहचाना नहीं गया। और मन ही मन उसने उच्चारा कि एक बार गांधी होना आसान है, लोहिया होना आसान है, मार्क्स-लेनिन और माओ होना आसान है पर रजनीश होना आसान नहीं है। ठीक उसी तर्ज पर जैसे रजनीश कहते हैं कि एक बार बुद्ध और महावीर होना आसान है, पर मीरा होना आसान नहीं है। और फिर रजनीश की यह स्थापना कि मीरा तो एक शराब है, एक नशा है। यह कहना भी आसान है क्या किसी के लिए? गांधी ने राम के बारे में बहुत कहा, लोहिया ने राम, कृष्ण पर खूब लिखा, राधा और मीरा के बारे में ज्यादा नहीं जिक्र भर का लिखा। पर गांधी? गांधी मीरा को गा सकते थे, मीरा पर लिखना उनके वश का नहीं था। पर लोहिया ने मीरा की भक्ति को एक नया आयाम दिया। द्रौपदी के साथ मीरा का तुलनात्मक विश्लेषण करते हुए नारी के तीन रूप बताए- भोग्या, सती और सहचरी। कहा कि मीरा फैंटेसी में कृष्ण को जीती है और द्रौपदी साक्ष्य में। और सच भी है कि द्रौपदी की ओर कृष्ण का झुकाव ज्यादा है। मीरा के बारे में रजनीश जैसा लोहिया या गांधी क्यों नहीं कह पाए? ठीक है कि तीनों का कैनवस, तीनों का सोच और एप्रोच अलग-अलग थी। पर और भी कई मामलों पर रजनीश जितना बेलाग, बेलौस और बेहतरीन अंदाज से बातों को क्यों नहीं कह पाए लोहिया? क्यों नहीं कह पाए गांधी? और शायद इसीलिए वह अपने कहानीकार दोस्तों से कहता भी रहता है कि कहानी कहने की कला अगर सीखनी हो तो रजनीश से सीखो।

सहसा उसने सोचा कि “गांधी, लोहिया, जयप्रकाश” पर तो बहुत लिखा गया है और तय किया कि “गांधी, लोहिया और रजनीश” पर एक तुलनात्मक किताब न सही, एक लेख तो वह लिखेगा ही। फिर उसने सोचा कि कौन इसे पढ़ेगा? और हर बार की तरह उसने फिर सोचा कि क्या वह इस विषय पर जैसे सोच रहा है, वैसे ही लिख भी सकेगा? बिलकुल शास्त्रीय ढंग से क्यों, सर्रे से क्यों नहीं? कहीं ज्यादा शास्त्रीय हो जाए और संपादक के ही सिर से ऊपर निकल जाए तो? पर वह मूल सवाल पर फिर आ गया कि क्या वह अपने इस लेख “गांधी, लोहिया और रजनीश” में तीनों के साथ निष्पक्षता बरत पाएगा? फिर उसने जैसे खुद को ही जवाब दिया, क्यों नहीं? क्योंकि वह तो तीनों का भक्त है, गांधी का भी, लोहिया का भी, और रजनीश का भी।

फिर उसने जैसे अपने आप को कटघरे में खड़ा कर लिया और पूछा कि क्या सचमुच वह इन तीनों के साथ निष्पक्ष रह पाएगा? और फिर जवाब दिया कि, हां। पर सवाल फिर उठा कि वह तो रजनीश का कायल है। और अभी-अभी कुछ देर पहले खुद ही कह रहा था कि एक बार गांधी और लोहिया होना आसान है रजनीश होना आसान नहीं है। फिर उसने एक वाक्य और जोड़ा कि क्या रजनीश भी एक शराब नहीं हैं। और खुद से ही पूछा कि तो फिर अगर रजनीश शराब हैं तो गांधी और लोहिया क्या स्नैक्स हैं? जो शराब के साथ चुगे जा सकें? नहीं। उसने अपने आप को धिक्कारा ! कि गांधी और लोहिया के बारे में उसे ऐसा नीच खयाल आया कैसे?पर उसके भीतर से कही आवाज आई कि बेटा बेवकूफी ही में सही बात तूने मार्के की कही है कि रजनीश एक शराब है और गांधी, लोहिया स्नैक्स। सच, स्थिति यही है कि गांधी, लोहिया स्नैक्स की तरह हर जगह फिट हो जाते हैं पर रजनीश शराब की तरह ज्यादातर छुप-छुपा के शुमार हैं।

पर यह तो उथली सोच है। उसने अपने मन को समझाया कि ऐसी स्थापनाए उसे कही का नहीं छोड़ेंगी। और उसने तय किया कि गांधी नेता, लोहिया विचारक और रजनीश दार्शनिक। पर यह प्रतिमान भी उसे बासी जान पड़ा और खुद से ही फिर कहा कि बेटा, अगर यही सब कुछ लिखना है तो मत लिखो। इससे बेहतर तो वह तुम्हारी शराब और स्नैक्स वाली एप्रोच है।

उसने तय किया कि कोई हंसे, चाहे उसका मजाक उड़ाए पर वह लिखेगा जरूर “गांधी, लोहिया और रजनीश !” दो सवाल फिर संजय के मन में लगभग दौड़ कर घुस आए। एक तो लेख के शिर्षक को लेकर कि बार-बार गांधी का ही नाम पहले क्यों वह लेता है कि “गांधी, लोहिया और रजनीश !” “लोहिया, रजनीश और गांधी” या फिर “रजनीश, गांधी और लोहिया” या “लोहिय, गांधी और रजनीश” वगैरह-वगैरह जैसा कुछ क्यों नहीं। पर यह सवाल उसे आगे कि बेवजह ही उसने उठा दिया। इस सवाल में कोई वजन नहीं था। पर दुसरा सवाल उसकी इस समूची सोच पर पानी फेरे जा रहा था। सवाल यह था कि क्या रजनीश पर निरपेक्ष ढंग से कलम चला भी सकेगा?

जब-तब, जिस-तिस लड़की या महिला को देख कर चूमने की हसरत जाग जाए, उसके साथ सोने की ललक मन ही मन अंकुआ जाय, और तो और राह चलती जिस-तिस महिला, लड़की को दुर्घटना होने की हद तक मुड़-मुड़ कर देखने की जिसकी आदत हो, डी.टी.सी. की बसों में महिलाओं के साथ रगड़ घिस्स और किसी लड़की के स्पर्श भर के लिए बेकल रहना, पीछे से सट कर खड़े हो जाने जैसी ओछी हरकतों तक से बाज नहीं आते आप, सपनों में जॉघिया खराब कर डालें, यानी कि हर समय महिला रोग में मरते रहेंगे आपर और लिखेंगे रजनीश पर ! उसका वश चलता तो इस सवाल के साथ अपने आप को चांटा मार लेता। पर नहीं वह पान की दुकान में बाहर जल रही रस्सी से सिगरेट सुलगाने लगा।

बाहर सिगरेट सुलग रही थी और भीतर वह खुद सुलग रहा था। झुलस रहा था उसके लेख का शीर्षक “गांधी, लोहिया और रजनीश !” उसने एक बार अपने को तसल्ली दी। माथे के बाल सहलाते हुए अपने मन को समझाया कि इस मामले में अपने को अपराधी समझने की कोई जरूरत नहीं और कि यह सब कुआरेपन की समस्या है। और अभी-अभी तो उसने टीनएज की दीवार फांदी है तो इस जवानी में लड़कियों के बारे में वह नहीं सोचेगा तो कौन सोचेगा? जिस-तिस लड़की को चूमने या उसके साथ सोने के सपने वह नहीं देखेगा तो क्या उसका बाप देखेगा? डी.टी.सी. की बसों में महिलाओं के साथ अगर आंख मूंद कर थोड़ी बहुत बेशरमी वह कर लेता है तो यह भी कोई ऐसा अपराध नहीं है जिस पर वह अपने आप को जेल में बैठा ले। ज्यादा से ज्यादा इस बेशरमी पर लगाम लगा ले। बस ! रही बात सपने में जॉघिया खराब कर लेने की तो इसका भी इलाज है कि ढूंढ-ढांढ कर किसी पेटीकोट वाली इंतजाम कर ले और अपनी जॉघिया की बजाय किसी का पेटीकोट खराब करे।

फिर उसने सोचा कि जरूरी तो नहीं है कि किसी पर लिखने के लिए उसको जीवन में उतार भी लिया जाए। अब जो वह भ्रष्ट या फ्राड लोगों के खिलाफ तमाम लिखता रहता है तो ऐसा तो नहीं है कि उनके बारे में लिखने से पहले उनके ही जैसा हो जाता है। तो क्या जरूरी है कि रजनीश वगैरह पर लिखने के लिए उनके दर्शन को पूरी तरह जिंदगी में उतार ही लिया जाए? माना कि समूचा रजनीश दर्शन इसी पर मुन:सर करता है कि चाहे सेक्स हो या पानी उसको संपूर्णता में पाए बिना या उससे अघाए बिना आप उसके बारे में एथारिटी नही हो सकते है। तो फिर गांधी और लोहिया के बीच विचारों का ही तो वह भक्त है। उनको भी जीवन में वह पूरी तरह कहां उतार पाया है।

या उनको भी उसने पूरा-पूरा पढ़ा या गुना कहां है? और आखिर लेखन के लिए, अपनी बात कहने के लिए यह जरूरी भी नहीं। फिर उसने तय किया कि बहुत सोच चुका इस मसले पर। अब और नहीं सोचेगा। और अब सीधे लिखेगा, “गांधी, लोहिया और रजनीश।”

…जारी…

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