अपने-अपने युद्ध (5)

भाग (4) से आगे… शाम को उसका मन हुआ कि आज वह नाटक देखने न जाए। पर चूंकि पंजाबी लेखिका अजीत कौर की आत्मकथा “खानाबदोश” का मंचन था सो वह जाने का लोभ छोड़ नहीं पाया। खानाबदोश वैसे भी उसने पढ़ रखी थी। खानाबदोश के पहले उसने दो और महिला लेखिकाओं की आत्मकथा पढ़ी थी। एक अमृता प्रीतम की रसीदी टिकट और दूसरी कमला दास की मेरी कहानी। पहले पहल जब उसने रसीदी टिकट पढ़ी तो उसे वह लाजवाब लगी। खास कर अमृता की वह साफगोई कि मेरे बेटे पूछते हैं कि मम्मी हम इमरोज पापा के बेटे हैं कि साहिर अंकल के? ऐसे ही और भी कई प्रसंग उसे कुलबुला गए थे। फिर जब उसने कमला दास की मेरी कहानी पढ़ी तो अमृता प्रीतम की बोल्डनेस फीकी हो गई।

जो महिला तमाम सेक्स संबंधों समेत अपने बेटे के दोस्त के साथ संबंध स्वीकार सकती है वह कितनी ईमानदार होगी, उसने तब सोचा था। बल्कि कमला दास की मेरी कहानी दरअसल उनकी आत्मकथा नहीं उनकी सेक्स कथाओं का पिटारा थी। जब कि रसीदी टिकट सिर्फ संबंधों का खुलासा करती थी। प्याज की परत दर परत। पर खानाबदोश जब संजय ने पढ़ी तो रसीदी टिकट और मेरी कहानी बहुत फीकी लगी। खानाबदोश की कैफियत ही कुछ और थी। पति के जुल्मों, सताई हुई औरत के अकेलेपन और प्रेमी (?) द्वारा निरंतर देह शोषण रेखांकित करती कथा। अकेलेपन का संत्रास औरत को कैसे तार-तार करता है यह तो सभी जानते हैं पर अजीत कौर जब उसे अपने “पन” से पेश करती हैं, बिलकुल नंगे सच की तरह तो सांघातिक तनाव का एक तंबू सा तन जाता है।

पर अफसोस कि जिस हेमा ने कल भुवनेश्वर की कहानी में पति, प्रेमी और स्त्री के जिस तनाव को बड़े मन से जी कर स्त्री-पुरूष संबंधों का बासीपन, टटकापन, देह का द्वंद्व और मन का अंतद्वंद्व जिस सहजता से परोसा था आज उसमें वही सहजता नदारत थी। शायद इसलिए भी कि अजीत कौर की आत्मकथा में संवाद बड़े-बड़े थे। पर संजय को लगा कि बात संवादों के लंबा होने भर की ही नहीं थी। हेमा के वाचन में वह तरलता भी नहीं थी जो खानाबदोश के संवादों को दरकार थी। उलटे उसके वाचन में एक अजीब सा कसैलापन तिर रहा था। और वह सर्रे से ऐसे बोले जा रही थी गोया संस्कृत का कोई रूप रट रही हो। वह जो तीव्र अनुभूति, संवेग मन का उद्वेग और आकुलता अजीत कौर के संवादों में, आत्मकथा में उपस्थित थी हेमा के अभिनय में उभरने के बजाय दबती जा रही थी। संवादों में जो मेह, मीठे मेह की तरह बरसना चाहिए था, हेमा की जबान पर आते ही वह बादलों की तरह गड़गड़ा कर गुजर जाता था। वह लयात्मकता, वह सुर और वह संत्रास छूट-छूट जाता था। घना नहीं हो पाता था। तिस पर ओमा का किरदार निभा रहे वागीश के संवादों में “हैगा” जैसे कई शब्द और पंजाबी शब्दों का बेशुमार इस्तेमाल आत्मकथा में वर्णित तनाव को उद्घाटित करने के बजाय एक अजीब सा हास्य रचा जाता था। संजय ने भी खानाबदोश आत्मकथा पढ़ी थी, हिंदी में। उसमें सिवाय तनाव, अकुलाहट और एक बेधड़क सच के साथ प्यार की तपिश महसूस की जा सकती थी, अकेलेपन की आग और उसकी आंच ही दहकती मिली थी संजय को। पर यहां तो लोग रह-रह कर ओमा वाले चरित्र-संवादों को सुन-सुन हंस रहे थे। जब कि ओमा आत्मकथा में कहीं-कहीं स्वार्थ तो गुनता था पर हास्य हरगिज नहीं बुनता था।

संजय को भी इस प्रस्तुति से उम्मीद थी और शायद जरूरत से ज्यादा, उस पर पानी फिर गया था। वह घर से यह भी सोचकर आया था कि नाटक में सखाराम बाईंडर या हयबदन टाइप कुछ बोल्ड दृश्यबंध भी देवेंन्द्र ने रचे ही होंगे। जिसकी पूरी-पूरी गुंजाइश थी। रंडियों के कोठे, कैबरे सब कुछ वाचन में गुजर गए। ओमा, अजीत कौर के कुछ भावुक क्षण भी दृश्यबंध के बजाय सर्रे से वाचन में कब गुजर गए पता ही नहीं चला। पर जब नाटक खत्म हुआ तो लगभग सबके सब विभोर थे, “बहुत अच्छा” “बहुत बढ़िया” जैसे जुमलों में लोग बतिया रहे थे, “गजब कर दिया आपने।” एक स्थानीय रंगकर्मी देवेन्द्र से कहते हुए भावुक हुए जा रहे थे। उनकी भावुकता में और भी कई लोग बस चुके थे। और देवेन्द्र निर्विकार मुसकुराते जा रहे थे। जब सबको नाटक अच्छा लगा तो संजय को क्यों नहीं जमा? उसने अपने आप से पूछा। फिर सोचा कि शायद इसलिए कि उसने खानाबदोश पढ़ रखी थी सो उस कथा और इस प्रस्तुति में वह लय खोजता रहा। यही बात उसने देवेंन्द्र से भी कही, “आत्मकथा वाली लय इस प्रस्तुति में नहीं आ पाई।” वह बुदबुदाया “शुरुआत में ही कथा और अभिनय का सुर गड़बड़ा गया। आपको नहीं लगा?”

“हो सकता है।” देवेंन्द्र पेशेवर अंदाज में बोले, “मैंने देखा नहीं। मैं बाहर था।”

“हद है।” उसने कहना चाहा पर संकोचवश कह नहीं पाया। बात बदल कर बोला, “हमारा ख्याल है आपने शायद पहली बार कोई बायग्राफी उठाई है।”

“आटो बायग्राफी!” देवेंन्द्र उसकी बात काटते हुए बोले। संजय को लगा देवेंन्द्र ने “आटो बायग्राफी” नहीं कहा उसे सड़ाक से छड़ी मारी है। पर वह पुराने संबंधों का ख्याल कर मन मसोस कर रह गया। फिर उससे गलती भी तो हुई थी आटो बायग्राफी को बायग्राफी कह गया था। उसने बात फिर से संभाली, “हां-हां, आटो बायग्राफी पर उठाई तो पहली ही बार है!”

“हां।” संक्षिप्त सा उत्तर देकर देवेंन्द्र जब चुप हो गए तो उसने फिर पूछा, “कल क्या कर रहे है?” वह सोच रहा था कि घर पर खाने को बुलाए। पर वह बोले, “कल तो सुबह ही चला जाऊंगा।”

“गोमती से?”

“नहीं बाई रोड। शाहजहांपुर। रात को वहीं से लखनऊ मेल पकड़ूंगा दिल्ली के लिए।”

“आपका नया पता क्या है?”

“अभी तो स्कूल ही है।”

“मतलब एन.एस.डी.।”

“हां। पर अगले महीने से साल भर के लिए बेंगलूर।”

“ठीक है चिट्ठी लिखूंगा।” हालां कि वह और भी कई बातें देवेंन्द्र से करना चाहता था। बहुत सी यादें ताजा करना चाहता था। बहुत से लोगों के बारे में जानना चाहता था। पर जाने क्यों उसका मन उचट गया। और “ठीक है, चिट्ठी लिखूंगा।” कह कर चल तो दिया पर उसने देखा देवेंन्द्र के चेहरे पर तब जो भाव उभरा था, जो लकीरें खींचीं थी उससे लगा कि संजय के इस व्यवहार की उन्हें भी उम्मीद नहीं थी। उसने फिन उन्हें आंखों ही आंखों जैसे तसल्ली सी दी गरदन और सिर हिलाया और चल दिया।

बाहर आकर उसने स्कूटर की किक ऐसे मारी जैसे देवेंन्द्र और अपने परिचय, जान-पहचान को किक मार रहा हो। और जैसे अपने आप से पूछने लगा, “आदमी इतना अजनबी कैसे हो जाता है?” इतना संवेदनहीन क्यों हो जाता है?

हो जाता है, होना ही पड़ता है। उसने अपने मन को समझाया।

लोगों की संवेदनहीनता का एक उदाहरण उसने अभी बीच नाटक में भी देखा। हेमा एक दृश्य में बाल झटक कर कुछ बोलने को जैसे मुड़ी उसके बालों में गुंथी एक चिमटी छिटक कर स्टेज से नीचे आ गिरी। जिसका उसे गुमान भी नहीं हुआ। पर नीचे आगे की लाइन में बैठी उसकी बूढ़ी दादी ने उसकी चिमटी गिरते, बाल खुलते देख लिया। और उस मद्धिम सी रोसनी में भीर उनकी बूढ़ी आंखों ने उठ कर हेमा की चिमटी ढूंढी और जाकर धीरे से स्टेज के सामने चिमटी लिए खड़ी हो गईं। खड़ी तो वह हो गईं चिमटी लिए पर हेमा को डिस्टर्व भी नहीं करना चाहती थीं। संजय ने गौर किया कि हेमा ने उन्हें एक क्षण तो कनखियों से देखा। पर दूसरे ही क्षण व उन्हें अनदेखा कर अपने संवादों में, अभिनय में डूब गई। बिलकुल किसी प्रोफेशनल की तरह। पर वह बेचारी वृद्धा, दादी मां उसे अपलक निहारती चिमटी देने के लिए असहाय खड़ी रहीं। तब तक पीछे से कुछ लोग बोले, “अरे इन्हें हटाओ।” कोई बोला, “शायद मेंटली डिस्टर्व हैं।” तो किसी ने बात पूरी करते हुए कहा, “ऐसे लोगों को यहां लोग क्यों ले आते हैं।” और ऐसे-वैसे ही कुछ और जुमले लोग बोलते रहे। संजय के बाएं बाजू बैठा एक पत्रकार भी बुदबुदाया, “ये हैं कौन?” तो संजय ने फुसफुसाते हड़काया, “चुप बैठो, इस लड़की की दादी हैं?”

“किस लड़की की?” वह भी फुसफुसाया।

“जो स्टेज पर है।”

“पर यह तो दिल्ली से आई है।”

“पर ओरिजिन है लखनऊ की।”

“अच्छा!” वह निढाल होकर ऐसे बोला जैसे उसकी जिज्ञासा शांत हो गई हो। पर दूसरे ही क्षण वह फिर फुसफुसाया, “क्या मेंटली डिस्टर्व हैं?”

“नहीं।” संजय ने उसे धौसियाया, “भगवान के लिए अब चुप रहो।” और वह चुप हो गया था। इसी बीच संजय के दाएं हाथ की और बैठे हुए आदमी ने जो एक कथक नृत्यांगना के साथ आया था, आगे बढ़कर हेमा की दादी को धीरे से उनकी जगह ला कर बिठा दिया। वापस आकर उसने बताया कि वह उसे उसकी गिरी चिमटी देना चाहती थीं ताकि वह अपने खुले बाल बांध ले। पर उस दादी की वेदना, निश्छलता और निजता पर लोगों ने “क्रेक” की मुहर लगा दी थी।

तो कोई क्या कर सकता था?

लोग क्यों नहीं समझते हैं किसी की भावनाओं को? उसने खिन्न होते हुए सोचा! क्या समझें लोग! जब हेमा जैसी समर्थ अभिनेत्री अजीत कौर का चरित्र नहीं समझ पाती, उस चरित्र का मर्म, उसके दु:ख और उसका दंश नहीं समझ पाती, उसके अकेलेपन की आह और संत्रास अपने अभिनय में नहीं उकेर पाती, और देवेंन्द्र जैसा नामी-गिरामी सजग निर्देशक उस आत्मकथा की मछली सी छटपटाती लेखिका का चरित्र बाजार में बिकती निस्पंद निर्जीव मछली के मानिंद बना देता है, उसका मन नहीं थाह पाता, ओमा जैसे चरित्र को हास्य में ढकेल देता है, उसका सुत्र नहीं पकड़ पाता तो बाकियों की क्या बिसात?

और संजय भी सबको, सबकी भावनाओं को समझ लेता है भला? अगर समझ लेता तो चेतना उससे बार-बार क्यों कहती रहती है, “आप मुझे क्यों नहीं समझते?”

बेचारी चेतना!

चेतना जब पहली बार उससे मिली थी तो वह बंडी लुंगी पहने बैठा था। प्रकाश उसे संजय के घर ले आया था। वह किसी प्राइवेट कंपनी में काम करती थी। नौकरी से निकाल दी गई थी। कंपनी वाले उसे रख लें या कम से कम उसका बकाया उसे दे दें। ऐसा वह चाहती थी। प्रकाश जानता था कि संजय यह काम करवा सकता है। प्रकाश उससे इस बारे में पहले भी बात कर चुका था। मामला चूंकि लड़की का था इसलिए संजय ने दिलचस्पी ले ली। नहीं आज कल अक्सर सबसे कहने लगा था कि “समाज सेवा अब बंद!” क्यों कि बहुतेरे लोग किसिम किसिम काम लेकर आते। काम करवाते और काम निकलते ही पहचानना भूल जाते। ऐसा एक नहीं अनगिनत बार हो चुका था। कुछ लोग तो बकायदा सिर पर सवार आते, काम करवाते और बीच में दलाली भी वसूल लेते। संजय को पता तक नहीं चलता। और बाद में जब उसे यह सब पता चला तो वह हतप्रभ रह गया। बंद कर दी उसने समाज सेवा। उसने शुरू-शुरू में प्रकाश से भी यही कहा कि, “समाज सेवा बंद कर चुका हूं। तुम तो जानते ही हो।”

“पर अबकी समाज सेवा नहीं अपनी सेवा करो!”

“मतलब?”

“एक लड़की है। उसकी मदद कर दो। हो सकता है तुम्हारी बात बन जाए। साले बड़ा भुखाए घूमते हो।”

“ठीक है, ठीक है। पहले ले तो आओ। संजय ने कह तो दिया। पर चेतना पर रौब गालिब करने के लिए प्रकाश ने पहले खुद ही मामला सुलझाने की कोशिश की और रह-रह कर चेतना की तारीफ कर-कर कहता रहा, “आपका चेहरा बड़ा फोटेजनिक है। आप माडलिंग क्यों नहीं करती?” लड़कियां फसाने का यह उसका पुराना ट्रिक था। और अक्सर लड़कियां उसके इस ट्रिक में आ जातीं। शादी के इंतजार और रोजगार की लताश में लगी लड़कियां। प्रकाश ने ऐसी कितनी लड़िकयों को पार किया था। पर चेतना उसके ट्रैक पर नहीं आई तो नहीं आई। वह उसका काम भी नहीं करवा पाया था। पर जब उसने चेतना को संजय से मिलवाया तो जाने क्यों वह उसके साथ तुरंत खुल गई। प्रकाश चकित था। पर संजय ने चेतना से दुबारा मिलने की कोशिश कभी नहीं की। पर एक दिन प्रकाश ने पूछा, “पिकनिक पर चलोगे?” उसने अनिच्छा जताई तो वह बोला, “चेतना भी चल रही है।” तो संजय तुरंत तैयार हो गया। पर ऐन वक्त पता चला कि चेतना नहीं आई तो वह गाड़ी से उतर गया। बोला, “तुम लोग जाओ। मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही।” और वापस आकर उसने बेतहाशा पी। जाने क्यों?

इसका जवाब वह आज तक ढ़ंढ नहीं पाया है।

पर अचानक चेतना एक दिन उसके घर आई। बोली, “अभी मेरे साथ चल सकेंगे?”

“क्यों? क्या बात है?”

“बात बाद में बताउंगी। पहले चलिए।” वह साधिकार बोल रही थी। ऐसे कि जैसे वह बरसों से उसे जानती हो। और संजय कपड़े पहन कर उसके साथ निकल पड़ा था, “चलना कहां है?”

“किसी बड़े पुलिस अफसर के पास!”

“बात क्या है?”

“टाइम नहीं है। समय बहुत कम है। पहले चलिए, रास्ते में सब बताती हूं।” रास्ते में जो उसने बताया वह मुख्तसर यह था कि लखनऊ से थोड़ी दूर एक गांव में दहेज के फेर में सुशीला नाम की एक औरत जला दी गई थी। वह औरत कुछ पढ़ी लिखी थी और दहेज विरोधी एक संस्था को उसने चिट्ठी लिख कर अपने ऊपर हो रहे अत्याचार की सूचना दी थी। तो उस दहेज विरोधी संस्था की कुछ अति उत्साही लड़कियां उसके घर पहुंच गईं। बताया कि उसकी सहेलियां हैं। पर उस औरत की अनपढ़ सास तड़ गई। उसने सुशीला की जगह अपनी बेटी को उनसे मिलवा दिया। और यह दहेज विरोधी संस्था की लड़कियां उसकी बेटी से तुरंत खुल बैठीं कि तुम्हारी चिट्ठी मिली थी। तुम घबराओं नहीं। तुम्हारे ऊपर अब और अत्याचार नहीं होने दिया जाएगा। वगैरह-वगैरह। भीतर बैठी सुशीला को जब इसकी भनक मिली तो उसका हाड़ कांप गया। वह समझ गई जो वह अभी भी चुप रही तो उसकी खैर नहीं। रोज-रोज की पिटाई से वह पुख्ता हो गई थी। पर अब तो उसकी जान पर बन आई। घूंघट काढ़े, गठरी बनी वह दरवाजे पर आकर धप्प से बैठ गई और चिल्चाई, “सुशीला यह नहीं मैं हूं। यह तो मेरी ननद है।” आगे वह कुछ और बोलती इसके पहले उसे सास ढकेल कर घर में बंद कर चुकी थी। और यह शहरी लड़कियां कुछ प्रतिवाद करतीं, कुछ समझ पाती, इसके पहले चार मुस्टंडे उन्हें गालियां दे-दे कर गांव से बाहर भगा आए। इन लड़कियों के साथ इन मुस्टंडों ने ब्लाउज में हाथ डालने जैसी अभद्र हरकतें भी कीं और वार्निंग दी, “अब जो हियां अइहो तो सुहाग रात मनावे अइहो।” घबराई लड़कियां कुछ दूर पर स्थित संबंधित थाने पर गईं तो वहां भी उनके साथ छेड़खानी हुईं। मदद मिलने की बात तो दूर की कौड़ी थी। दुबारा वह कुछ पुरुष सदस्यों के साथ थाने गईं। सी.ओ. के आदेश के साथ जो उन्होंने इस दहेज विरोधी संस्था के आवेदन और साथ में नत्थी सुशीला की चिट्ठी पर दे दिए थे। आदेश क्या था टालू मिक्सचर था, “जांच कर उचित कार्रवाई करें।” यह आवेदन भी एस.एस.पी. के नाम था। एस.एस.पी ने सी.ओ. को मार्क किया था। और सी.ओ. ने थानाध्यक्ष को “जांच कर उचित कार्रवाई करें।” लिख दिया था। पर थाने में दुबारा जाकर उनके उत्साह पर फिर पानी पड़ गया। दरोगा ने वह आदेश एक तरफ फेंकते हुए कहा, “ठीक है आप लोग जाइए। हम देख लेंगे।” और खुद कहीं चल दिया। यह लोग फिर से सुशीला के गांव गए। पर बेकार गया। सुशीला से फिर मिलने नहीं दिया गया। उसकी सास ने बताया, “नइहर गई। भाई आवा रहा लइ गवा।” पर जब यह लोग गांव से बाहर आ रहे थे तब कही एक कोने में दुबकी खड़ी घूंघट काढ़े एक औरत बुदबुदाई, “नइहर वइहर कहीं ना गई। सब जलाई डारे हैं। घर ही मा है। मर रही बेचारी।” कह कर वह अचानक ओझल हो गई।

दहेज विरोधी कार्यकर्ता फिर थाने आईं और बताया कि वह जला दी गई है। पर थाने वालों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा। सब लाचार वापस आ गईं। चेतना को जब पता पड़ा तो उसने जाने किस आस पर उनको भरोसा दिलाया और भागी संजय के पास चली आई। बात जब खत्म हुई तो संजय ने उसे घूरते हुए पूछा, “तो आजकल दहेज विरोधी संस्था में हो?”

“नहीं।” वह बोली, “मेरी एक सहेली है।” और उसे जैसे लगा कि संजय उसकी बात को गंभीरता से नहीं ले रहा वह बोली, “बोलिए, आप मदद करेंगे कि नहीं?”

“मदद क्यों नहीं करूंगा?” संजय बिफरा, “पर यह बात तुम घर पर भी बता सकती थी।”

“यहां बताने से क्या नुकसान हो गया?”

“बहुत ज्यादा।” वह स्कूटर वापस मोड़ता हुआ बोला, “घर से फोन करता। फोन से काम ज्यादा आसान हो जाता। ऐसे किस-किस के यहां भागते फिरेंगे?”

“फोन से काम हो जाएगा?”

“बिलकुल किसी एक से बात करने भर से तो काम चलने वाला है नहीं। और फिर पता नहीं कौन मिले, कौन न मिले।”

“सॉरी। वेरी सॉरी।” वह बीच में ही बोल पड़ी।

“कोई बात नहीं।” उसने जैसे उसे तसल्ली दी। घर आते ही उसने पुलिस महानिदेशक का फोन मिलाया। वह नहीं मिले। फिर वह आई.जी. जोन का फोन मिलाने लगा। फोन नहीं मिल रहा था तो वह भुनभुनाने लगा और सोचा कि एस.एस.पी. से ही बात कर लें। जाने क्या उसे सूझा कि वह चेतना से पूछ बैठा, “आखिर लोकल पुलिस क्यों नहीं सपोर्ट कर रही। दहेज के खिलाफ तो बहुत सख्त कानून है। सुशीला की चिट्ठी काफी है उसके परिवार वालों को अंदर करने के लिए।”

“अब यह तो मैं नहीं जानती कि बात क्या है। पर मेरी सहेली बता रही थी कि सुशीला का हसबैंड कहीं सब इंस्पेक्टर तैनात है। शायद इसीलिए।”

“ओह!”

“अब अगर वह सचमुच जला….।” वह बोल रही थी कि संजय ने इशारे से चुप रहने के लिए कहा। आई.जी. जोन का फोन मिल गया था। संजय ने सर्रे से सारा किस्सा बताया और बोला, “प्लीज हेल्प मी।” आई. जी. जोन को फोन करना काम आया। उन्होंने फौरन स्पेशल स्क्वाड एक डी.एस.पी. स्तर के अधिकारी के नेतृत्व में भेजने का वादा किया और संजय से कहा कि, “चाहे तो आप भी साथ जा सकते हैं। पर ज्यादा से ज्यादा आधे घंटे के अंदर आप आ जाइए।”

“नो थैंक्यू।” आप मेरे लिए इंतजार मत करिए। मैं सीधे पहुंच जाऊंगा।

“ओके।” आई. जी. ने कहा तो फोन रखते हुए उसने सोचा क्यों न एक एंबुलेंस भी ट्राई कर लें। क्या पता वह औरत ज्यादा जल गई हो। और उसने हड़बड़ी में स्वास्थ्य महानिदेशक को फोन मिला दिया। वहां से टका-सा जवाब मिला, “अस्पताल फोन कीजिए।”

“पर आप इंस्ट्रक्ट तो कर सकते हैं अस्पताल को।”

“नो। इट्स नाट पार्ट आफ माई ड्यूटी।” सुन कर संजय का दिमाग खराब हो गया और डपटते हुए बोला, “शट अप! तुम्हें किसने डाइरेक्टर जनरल हेल्थ बना दिया? कह रहा हूं कि समय कम है। और मानवीय आधार पर मेरी ओर से आप फोन कर दीजिए। और शायद मामूल नहीं कि एंबुलेंस के फोन नंबर सिर्फ कहने के लिए होते हैं। डफर!” कहते हुए वह फोन रख ही रहा था कि उधर से डाइरेक्टर जनरल हेल्थ कुत्ते की तरह गुर्रा रहा था, “रास्कल, यू शट अप।”

संजय समझ गया कि गलत जगह फोन कर दिया उसने। वह बड़ी देर तक टेलीफोन डाइरेक्टरी में छपे एंबुलेंस फोन नंबर मिलाता रहा। पर हर नंबर पर घंटी बजती रहती। कोई फोन उठाने वाला नहीं मिला। फिर उसे अपने एक डॉक्टर दोस्त की याद आई। वह फोन पर मिल तो गए पर एंबुलेंस की बात पर कतराने लगे। सारी बातचीत का उनका उत्साह जैसे खत्म हो गया था। संजय डॉक्टर पर भी बिगड़ पड़ा, “मानवता की सेवा वाली कसम क्या आप की सारी कौम ने घोल कर पी लिया है?” डॉक्टर साहब फिर भी न पिघले। बोले, “क्या बेवकूफी की बात करते हैं आप? कैसी मानवता और कहां की मानवता?” फिर संजय को अचानक याद आया कि एक उसका परिचित डॉक्टर ऐसा है जो अखबरों में अपना नाम छपा देख कर बड़ा खुश होता है। और उसने फौरन इस डॉक्टर का फोन बीच बात में काट कर उस डॉक्टर को मिलाया। बात बन गई थी। उसने पता लिखवाया तो डॉक्टर बोला, “यह तो रूरल एरिया है। हम कैसे भेज सकते हैं एंबुलेंस वहां?” संजय ने चेतना से पूछा, “क्यों गाड़ी वहां पहुंच जाती है? सड़क वड़क है वहां?”

“हमें क्या मालूम?”

“बात सड़क की नहीं एरिया की है।” डॉक्टर उधर से बोला तो संजय उसे छेड़ते हुए बोला, “बात न सड़क की है न एरिया की। बात मानवता की है डॉक्टर साहब। अब आप पुलिस वालों की तरह मत बोलिए कि वहां तो फलां थाना पड़ता है।” डॉक्टर साहब मान तो गए पर बोले, “है तो मुश्किल। फिर भी देखता हूं। सुपरिटेंडेंट साहब से स्पेशल परमिशन लेनी पड़ेगी।”

“अब यह आपका काम है। मैं निश्चित होता हूं।” कह कर उसने फोन काट दिया। फिर उसने चेतना से कहा, “जाओ अपनी दहेज विरोधी सहेली से बता दो कि वह भी वहां पहुंच जाए अपने साथियों को लेकर। फिर जैसा हो बताना।”

“क्यों आप नहीं चलेंगे?” चेतना सकुचाती हुई बोली।

“हम क्या करेंगे जाकर?”

“प्लीज चले चलिए। क्या पता वहां फिर कोई गड़बड़ हो। आप रहेंगे तो ठीक रहेगा। जैसे इतना किया है थोड़ा सा और प्लीज!” वह बार-बार इतना “प्लीज, प्लीज” कहने लगी कि संजय को उसके साथ जाना पड़ा। जाते समय अपने दफ्तर भी फोन करता गया कि क्या पता वापस आने में लेट हो जाए या न आ पाए।

यह बैशाख की दोपहर थी। बिलकुल देह जला देने वाली।

सुशीला के गांव जब वह पहुंचा तो न तो पुलिस पहुंची थी, न ही एंबुलेंस! संजय बड़ा परेशान हुआ। दहेज विरोधी फोरम की लड़कियां तो जैसे वहां से तुरंत भाग लेना चाहती थीं। संजन ने उन्हें समझाने की कोशिश की तो वह सब लगभग एक साथ बोल पड़ीं, “आप नहीं जानते यहां के लोगों को।” उनके चेहरे पर जैसे आतंक की दुहरी-तिहरी इबारतें अपने आप लिख गई थीं। इतनी साफ कि एक बार संजय भी घबराया। पर भीतर से साहस बटोर कर बोला, “आइए पहले सुशीला के घर चलते हैं।”

“ना बाबा।” वह सब फिर एक साथ बोल पड़ीं।

“आओ चेतना हम दोनों चलते हैं।” वह जैसे चेतना में हिम्मत भरता हुआ बोला, “घबराओ नहीं मैं भी गांव का ही रहने वाला हूं।” सुन कर चेतना चल तो दी पर अचानक ठिठक गई। एक लड़की की ओर देखती हुई बोली, “आओ तुम लोग भी चलो न सुनीता!”

“नहीं तुम इन गांव वालों को नहीं जानती। बिना पुलिस फोर्स के जाने लायक नहीं है।”

“हां, जैसे पुलिस फोर्स बड़ी शरीफ होती है।” संजय ने चुटकी लेते हुए बोला।

“आपको तो मजाक सूझ रहा है। यहां जान सूख रही है। आप पुरुष हैं, आप क्या समझें। स्त्री होते हो जानते कि अपमान क्या होता है?” दहेज विरोध फोरम की एक दूसरी लड़की बोली। संजय ने सोचा शायद पिछली बार गांव के गुंडों ने उसी के ब्लाउज में हाथ डाला होगा। संजय का मन हुआ कि कुछ बोले पर गांव की तरफ से कुछ गांव वालों को आता देख चुप रह गया। गांव वालों को आता देख सभी लड़लियां चीखीं, “ओ माई गाड!” संजय ने देखा चेतना भी उनके साथ हो गई थी। वह पछताया कि नाहक ही इन मोपेड चलाने वाली चार लड़कियों के साथ वह यहां आ गया। आई.जी. का कहा उसे मान लेना चाहिए था। पुलिस फोर्स के साथ ही आना चाहिए था।

गांव वाले करीब आ गए थे। करीब सात आठ थे। दो के हाथ में लाठियां थीं। और लग रहा था जैसे एक लड़का कमर में कट्टा या चाकू जैसा कुछ खोंसे हुए था। आते ही सबके सब लड़कियों की ओर बढ़ गए। एक लाठी लिए संजय की ओर बढ़ा। बोला, “का बात है। हियां काहें मजमा बाधे हो इन रंडियों को लेकर। संजय का जैसे खून खौल उठा। पर मौके की नजाकत देख वह चुप ही रहा। पर वह लाठी वाला लगातार उसे घुड़पता जा रहा था। और जब वह कई बार, “का बात है?” करता रहा और संजय फिर भी जब कुछ नहीं बोला तो उसने खींच कर एक थप्पड़ संजय को मारा और बोला, “अबे तुमही से पुछित हैं।” थप्पड़ खाते ही संजय आवाक रह गया। मिमियाता हुआ बोला, “देखिए भाई साहब हम तो आपको जानते तक नहीं फिर आप क्यों….?” वह अभी बोल ही रहा था कि एक घूंसा उसके पेट में मारते हुए वह लठैत बोला, “अबहीं बतावत हैं तुमका कि हम कवन हईं!”

पेट में घूसा खाते ही संजय गश खाकर बैठ गया। बैठते-बैठते उसने देखा उधर लड़कियों को भी गांव के गुंडे मार रहे थे और एक लड़की जो साड़ी पहन कर आई थी उसकी साड़ी दो गुंडे ऐसे खींच रहे थे गोया दुशासन हों। और वह बेचारी भी बिलकुल द्रौपदी की ही तरह अपनी लाज बचाती गुहार लगा रही थी, “बचाओ-बचाओ।” पर यहां कौन सुनने वाला था। एक संजय था जो एक थप्पड़ और एक घूसे में ही पेट पकड़ कर बैठ गया था। पर गुस्से और खीझ से तमतमाया। शायद उसके पास पिस्तौल होती इस समय तो वह कानून की ऐसी तैसी करता हुआ इन सालों को गोली मार देता। बिलकुल किसी फिल्म में अमिताभ बच्चन की तरह। पर यह मात्र एक कल्पना थी। हकीकत में तो वह गुंडे लड़कियों के साथ नोचा-नोची, ब्लाउज में हाथ डालने और करीब करीब शील भंग करने की हरकत पर उतारू थे और दूसरी तरफ संजय अभी श्याम बेनेगल की किसी फिल्म के नायक की तरह एक घूंसे में ही कांप रहा था। शायद ठीक वैसे ही जैसे आक्रोश में गुंडों के आक्रमण के समय वकील बना नसीरूद्दीन शाह कांप रहा होता है। इधर संजय थरथरा रहा था उधर वह लड़की टूटती हुई आवाज में “बचाओ-बचाओ” की जगह “बस करो, बस करो” कहती हुई बिलबिला रही थी।

संजय ने सोचा कि अब या तो वह मर जाए या मार डाले। पर अपनी नपुंसकता को मार कर, एक बार ललकार कर कम से कम खड़ा हो जाए! और उसने बिलकुल यही किया। उठकर अचानक खड़ा हुआ और बोला, “मारो सालों को!” सुनते ही मार खा पस्त पड़ी लड़कियां भी उठ खड़ी हुईं और सचमुच वह गुंड़ों से जूझ पड़ी। कि तभी उसने देखा एंबुलेंस गाड़ी आकर अचानक खड़ी हो गई। डॉक्टर उसमें से निकलते हुए बोला, “संजय यह क्या हो रहा है। कौन है ये गुंडे?” बिलकुल फिल्म अभिनेता शफी इनामदार स्टाइल में डॉक्टर का गरजना था कि गुंडे सकपका कर खड़े हो गए। हालांकि डॉक्टर खुद भी उन सब गुंडों को देख कर डर गया था। उसके चेहरे का रंग उड़ गया था और कांपने लगा था पर आवाज उसकी बुलंद थी, “कौन हो तुम लोग?”

वह सबके सब निरूत्तर थे। तब तक एंबुलेंस के भीतर से दो वार्ड ब्वाय स्ट्रेचर लेकर बाहर निकले। इतने में गुंडों की हवा निकल गई। संजय समझ गया कि बात डॉक्टर की आवाज का नहीं एंबुलेंस का था। सरकारी गाड़ी देखकर उनकी हक्की-बक्की बंद हो गई थी। साफ था कि सब गांव लेबिल के दादा थे। वरना गुंडे कहीं एंबुलेंस देखकर भी डरते हैं? डॉक्टर अभी गुंडों को पाठ पट्टी पढ़ा ही रहा था कि पुलिस भी आ गई। डी.एस.पी. से संजय ने तुरंत अपना परिचय बताया और कहा कि “आप लोग देर से आए और देखिए हम पिट गए और लड़कियां भी।” डी.एस.पी. संजय और लड़कियों की ओर ध्यान दिए बगैर बोला, “पकड़ लो माधर चोदों को। पीट कर बैठा दो गाड़ी में भोंसड़ी वालों को। हाथ पैर तोड़ दो गांडुओं का।”

डी.एस.पी. के पास जितनी गालियां थीं जब सब खाली कर चुका तो संजय से बोला, “एक्सट्रीमली सॉरी!” असल में हम लोग रास्ता भूल गए थे। फिर लोकल पुलिस स्टेशन गए। वहां से एक सिपाही लिया। फिर यहां आ पाए।”

“कोई बात नहीं।” संजय बोला, “आप आए तो सही।”

“ठीक है तो गांव में चलें? ” आई मीन सुशीला के घर।”

“हां, हां।” कहते हुए संजय ने देखा दहेज विरोधी संस्था की लड़कियों के चेहरे मार खाने के बावजूद फूल से खिल उठे थे। उसने देखा चेतना का भी होंठ उसके होंठों की तरह सूज गया था। पर वह पुलिस के आ जाने से इतनी खुश थी कि सुनीता के साथ गांव के भीतर बिलकुल आगे-आगे चल रही थी। पुलिस का आना था कि समूचे गांव मे सरे शाम सन्नाटा छा गया था। उसने सोचा पुलिस की इमेज ही ऐसी है। पर है बड़े काम की। उसने यह भी सोचा। और कम से कम इस समय तो काम की थी ही। नहीं उन सबकी जाने क्या गति बना देते यह साले गुंडे!

सुशीला के घर पहुंचते ही उसकी सास और ननद ने रोने-पीटने का वो ड्रामा रचा कि संजय भी एक बार द्रवित हो गया। सास, ननद दोनों यही रट लगाए पड़ी थीं कि, “सुशीला मायके चली गई है।” जितना रो सकती थीं, दोनों रोती रहीं और सबके पांव पकड़-पकड़ रहम की भीख मांगती रहीं। पर डी.एस.पी. खुर्राट था। सास से बोला, “देख, भोंसड़ी अभी डंडा डाल-डाल के तुम्हारी और तुम्हारी बेटी की भतियान फाड़ दूंगा। चुपचाप सीधे से निकाल अपनी बहू को।”

पर सास, ननद दोनों घाघ थीं। दोनों डी.एस.पी. के पांव पकड़ कर बैठ गईं। लगी रोने। संजय को लगा कि दोनों सचमुच सच बोल रही हैं। उसने डी.एस.पी. से कहा, “जाने दीजिए। जब वह घर में है ही नहीं तो बेचारी कहां से लाएंगी?”

“हां, बचवा!” सुशीला की सास बोली।

“आप चुप रहिए।” डी.एस.पी. ने संजय को डांटते हुए कहा, “इन छिनारों का छछत्र मैं जानता हूं।” कहते हुए उसने सास, ननद दोनों को पैर से ऐसे झटका कि दोनों दूर जा गिरीं। और कहने लगीं, “साहब हमरो बेटा दारोगा है। हमरो इज्जत है।”

“चुप भोंसड़ी!” डी.एस.पी. ने गोली दी। कहा, “अब वह भोंसड़ी वाला दरोगा भी नहीं रह जाएगा।” फिर रुक कर पूछा, “इस समय तुम्हारे घर में कोई मर्द है?”

“नाहीं हजूर!” सुशीला की सास कांपती हुई बोली।

“काहे तेरा छोटा लौंडा कहां है?”

“रिश्तेदारी में गया है हजूर!”

“गांव के प्रधान को बुलावो।” डी.एस.पी. ने साथ आए सब इंस्पेक्टर से कहा। सब इंस्पेक्टर जब जाने लगा तो डी.एस.पी. फिर बोला, “गांव के चौकीदार को भी लाना। साथ में दो तीन आदमी और।”

“सर!” कह कर सब इंस्पेक्टर चला गया तो डी.एस.पी. बोला, “देख बुढ़िया बहू को घर में से निकाल दे। नहीं तो घर की तलाशी लूंगा और तुम्हें बंद कर दूंगा।”

बुढ़िया फिर भी टस से मस नहीं हुई।

पूरे घर की तलाशी ली गई पर सचमुच सुशीला कहीं नहीं थी। सब लोग बाहर आ गए। कड़क डी.एस.पी. भी ढीला पड़ गया। और संजय को सवालिया निगाह से टटोलने लगा। संजय को लगा कि कहीं अब यह डी.एस.पी. उसे भी न गाली दे दे सो वह उठ कर लड़कियों के बीच में आ गया। पर डी.एस.पी. उसे वहां भी घूरता रहा।

इस बीच ग्राम प्रधान ‘हजूर-हजूर’ करता पुलिस पार्टी के चाय पानी के इंतजाम में लग गया था। जाने कहां से कुछ और चारपाइयां, चारपाइयों पर रंगीन चादरें बिछ गईं थी। पर संजय और दहेज विरोध लड़कियां बैठने के बजाय खड़े रहे। गांव वाले पुलिस वालों की तो ताबेदारी कर रहे थे पर संजय और उसके साथ की लड़कियों को ऐसे घूर रहे थे जैसे उन्होंने उनके गांव में आग लगा दी हो।

“बहुत शरीफ गांव है हजूर। और ई दारोगा जी का परिवार तो बहुत शरीफ।” ग्राम प्रधान डी.एस.पी. को ब्रीफ कर रहा था। और डी.एस.पी. संजय को ऐसे घूर रहा था जैसे किसी अपराधी को वाच कर रहा हो। और इधर संजय चेतना को ऐसे घूर रहा था जैसे कह रहा हो कि कहां लाकर फंसा दिया। शाम भी घिरती जा रही थी।

“चौप्प!” डी.एस.पी. अब ग्राम प्रधान को डांट रहा था, “तभी से चपड़-चपड़ किए जा रहा है साला! एक मिनट सोचने का मौका ही नहीं दे रहा।”

“छिमा सरकार। गलती हो गई।” ग्राम प्रधान मिमियाया।

“पर भाई साहब, सुशीला है इसी घर में।” जिस लड़की की साड़ी गुंडे खींच रहे थे वह लड़की संजय से बोली, “मेरे खयाल से पुलिस वालों से कहिए कि एक बार तलाशी और ले लें।” वह रुकी और बोली, “पिछली बार हम लोग आए थे तब भी बढ़िया इसी तरह घड़ियाली आंसू बहा रही थी।” संजय अभी इस लड़की जिसका नाम शायद वीरा था, बात कर ही रहा था कि अचानक उसकी नजर एक ऐसी औरत पर पड़ी जो बिल्कुल पागलों की तरह उसे देखते ही उंगली हिला जैसे कुछ इशारा सा करने लगती। संजय ने जब ऐसा तीन-चार बार करते उस औरत को देखा और देखा कि वह अनायास नहीं सायास उंगलियां भांज रही है और पैर के अंगूठे के नीचे पड़ा भूसा कुरेद रही है। तो वह उस औरत का इशारा फौरन समझ गया। वह भाग कर डी.एस.पी. के पास गया और हड़बड़ाता हुआ बोला, “सुशीला इसी घर में है।”

“कौन सुशीला?” डी.एस.पी. ने अचकचा कर पूछा।

“वही औरत जो इन लोगों ने जला दी है।”

“मिस्टर संजय! आप खुद घर का चप्पा-चप्पा छान आए हैं। फिर यह क्या हांक रहे हैं। यहां खबर थोड़े लिखनी है कि बे-सिर पैर की जो चाहा लिख दिया।”

“अच्छा आप मत चलिए। सिर्फ एक सिपाही दे दीजिए। मैं तलाश लूंगा।”

“मुझे जो करना है मैं खुद करूंगा। आप चुपचाप बैठ जाइए। और सिपाही क्यों दे दूं? क्या मतलब है आपका?”

“मतलब पानी की तरह साफ है। मेरी पक्की सूचना है कि सुशीला इसी घर में है। और भगवान के लिए इस वक्त बहस में मत पड़िए। क्योंकि सुशीला के लिए अभी एक-एक मिनट कीमती है। मैं जानता हूं वह जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही है। प्लीज!”

“ठीक है आइए। जब इतनी दूर आए हैं तो एक बार फिर झख मार लेते हैं।” कहते हुए डी.एस.पी. खड़ा हो गया। पीछे-पीछे लड़कियां भी आ गईं और वह सब इंस्पेक्टर भी एक सिपाही के साथ। पूरा घर फिर छान मारा। एक-एक कोना, कूडा, गद्दा, रजाई, चारपाई सब कुछ उलट-पलट कर देख लिया गया और कहीं ज्यादा चौकन्नी नजर से। पर सुशीला कहीं नहीं थी।

सभी उदास वापस आने लगे और डी.एस.पी. फिर गालियों पर उतर आया था, “माधरचोद ने पता नहीं किस भोंसडे में घुसेड़ लिया है।” डी.एस.पी. की गाली से लड़कियां बिदक रही थीं पर सुनते रहना लाचारी थी।

“पता नहीं किस भोंसड़े में घुसेड़ रखा है।” डी.एस.पी. ने फिर यही बात दुहराई तो जैसे संजय का सिक्स्थ सेंस जागा और उस औरत द्वारा पैर के अंगूठे से भूसा कुरेदना उसे याद आया। वह डी.एस.पी. से बोला, “एक मिनट!”

“क्या है?”

“जरा इस कमरे को भी देख लें?”

“क्या बेवकूफी है?” डी.एस.पी. खीझा, “आप देख रहे हैं भूसा भरा है।” वह बिदकते हुए बोला, “कैसे पत्रकार हैं आप?”

“पर एक बार आप मेरा कहा तो मानिए। आखिर धरती तो नहीं लील गई सुशीला को?” संजय ने जैसे विश्वास जमाते हुए कहा, “मुझे याद है जब मैं छोटा था तो हमारे गांव मे एक बार किसी के घर डाका पड़ा। डाकुओं के डर से घर की औरतों ने अपने जेवरों वाले बक्से भूसे में ही छिपाए थे। आप मान जाइए एक-बार प्लीज!”

“तो मैं अब भूसा पलटवाऊ?”

“आफ कोर्स।” संजय बिलकुल पक्का होता हुआ बोला।

“क्या है!” बिदकते हुए डी.एस.पी. ने सब इंस्पेक्टर से कहा, “लाओ भाई टार्च और दो सिपाहियों को डंडा सहित बुलाओं।”

भूसे वाले कमरे में टार्च पड़ते ही भूसे के ऊपर कोई चीज जैसे हिली। हिलता देखते ही डी.एस.पी. की आंखें चमकीं और होंठ पर गाली फूटी, “हे भोंसड़ी वालों तुम ऊपर चढ़ो।” वह दोनों सिपाहियों से बोला। सिपाही भूसे पर गिरते फिसलते ऊपर चढ़ गए। वह हिलती हुए चीज कोई और नहीं, सुशीला ही थी जो गुदड़ी में लिपटी भूसे पर पड़ी-पड़ी छटपटा रही थी। पर मुंह बंधा होने के नाते बोल नहीं पा रही थी। वहीं भूसे के ढूहे पर ही एक कोने में उसका देवर भी ढुका बैठा था। उसे भी मारते हुए पुलिस वाले नीचे लाए।

सुशीला की देह लगभग अस्सी प्रतिशत जल गई थी। मवाद, बदबू और भूसा अलग उसकी देह में जहां-तहां चिपक गया था। डॉक्टर उसकी हालत देखते ही हरकत में आया। डी.एस.पी. से बोला, “आप को एतराज न हो ते मरीज को हम तुरंत ले जाएं। कानूनी कार्रवाई आप आकर कर लीजिएगा।”

“इट्स ओ.के।” यह पहली बार था जब डी.एस.पी. शराफत की जबान बोल रहा था। उधर वीरा डॉक्टर से पूछ रही थी, “सुशीला बच जाएगी सर?”

“कोशिश तो यही रहेगी।” उसने जैसे वीरा को ढाढस बंधाया, “बच भी सकती है।”

“थैंक गाड!” लगभग एक साथ सब लड़कियां बोल पड़ीं।

“आपमें से कोई चाहे तो एंबुलेंस में भी साथ आ सकता है।” डॉक्टर ऐसे में भी लड़कियों से लाइनबाजी पर उतर आया था।

“हां, हां। क्यों नहीं।” वीरा और सुनीता कहती हुई सुशीला के स्ट्रेचर के साथ चल पड़ीं।

इधर गांव जैसे भक हो गया था। हर किसी का चेहरा धुआं। और डी.एस.पी. पूरे गांव को गाली देता सब इंस्पेक्टर से कह रहा था, “इन तीनों को भी जीप में बिठाओ।”

संजय ने डी.एस.पी. को धन्यवाद देते हुए कहा, “आपने बड़ी मदद की।”

“कुछ नहीं हमने तो नौकरी की। मदद तो आप लोगों ने हमारी की।” कहते हुए वह लड़कियों को घूरने लगा, “और मार खाकर भी। घबराए नहीं उन सालों की आज गांड़ तोड़ दूंगा!” किसी फिल्म सरीखी इस सारी कथा का अंत यह हुआ कि बड़ी मुश्किल से सही, पर सुशीला बच गई थी। पर उसके बयान ने उसकी सास, ननद, देवर और पति सबको बचा लिया था। संजय ने एक दिन चेतना से पूछा, “ऐसा क्यों किया सुशीला ने?”

“वीरा बता रही थी कि उसकी पांच साल की बेटी उन्हीं लोगों के पास थी।”

“ओह! पर थी कहां वह। उस दिन तो वहां नहीं थी उसकी बेटी?”

“हां, उस बुढ़िया ने सुशीला को जलाने के बाद उसकी बेटी को अपने मायके भेज दिया था। वह क्या करती भला? मरती क्या न करती!”

“चलो संतोष इसी बात का है कि एक जान बच गई।”

“हां, ये तो है। पर एक नहीं दो-दो जान। सुशीला और उसकी बेटी दोनों की।” चेतना बोली। बाद में संजय चेतना के साथ सुशीला से मिला और कहा कि, अगर आप अब से चाहें तो अपना बयान बदल सकती हैं। कह दिया जाएगा कि आपने पहला बयान दबाव में और बेटी को बचाने के इरादे से दिया था। और फिर आपके पति, सास सभी को जेल हो जाएगी। इस पर सुशीला का जवाब संजय को सकते में डाल गया। वह बोली, “यह पाप मुझसे मत करवाइए।” वह बोली, “पति को जेल भिजवा कर ऊपर जाकर भगवान को क्या जवाब दूंगी? मुझे नरक मे मत डालिए।”

“पर यह तो बेवकूफी है। अंधविश्वास है।” संजय बिफरा।

“जो भी है। पर आप चलिए!” चेतना बोली, “अब इसके बाद न कोई सवाल बनता है, न जवाब!”

चेतना और संजय अब अक्सर किसी न किसी बहाने मिलने लगे। ऐसा भी नहीं था कि जैसे दोनों के बीच प्यार अंकुआ रहा हो। पर बेवजह ही सही वह मिलने लगे थे। काफी दिनों तक वह सचमुच बेमतलब ही मिलते रहे। संजय को कई बार ऐसा लगा जैसे वह उसका हाथ चूम लेना चाहता है या फिर उसे चूम लेना चाहता है। पर जाने क्यों उसमें कभी यह इच्छा बहुत तीव्र ढंग से नहीं उठी। एक दिन उसे जाने क्या सूझा कि उसने चेतना से पूछा, “तुम्हें गाना गाने आता है?” पर चेतना कुछ बोली नहीं। फिर किसी दिन उसके बड़े इसरार पर एक पार्क के चबूतरे पर बैठ कर चेतना तीन, चार गाने सुना गई। सबके सब फिल्मी थे। आवाज उसकी बहुत अच्छी नहीं थी पर दर्द में डूबी हुई थी। उसने गाने भी इसी शेड के चुने थे। “रजनीगंधा” फिल्म का “यूं ही महके प्रीत पिया की मेरे अनुरागी जीवन में।” गीत जब वह गा रही थी तो संजय ने देखा उसकी आंखों की कोरें नम हो गई थीं। चलते समय संजय ने उसे कुरेदा भी, “लगता है प्यार में बहुत मार खाई हुई हो?” पर वह बहुत संक्षिप्त सा “नहीं” कह कर मुसकुराने लग पड़ी। संजय ने फिर उससे कहा, “अच्छा लाओ जरा तुम्हारा हाथ तो देखूं।” वैसे, संजय को हाथ देखने का क, ख, ग भी नहीं मालूम था।

उसने मन ही मन उसका हाथ अपने हाथ में लेने की तरकीब निकाली थी पर चेतना ने उसकी वह बात भी ठुकरा दी, और बोली, “आइए चलते हैं।”

“कुछ खाओगी?” अवध बाजार की ओर से गुजरते हुए उसने पूछा तो वह फिर संक्षिप्त सा, “नहीं।” बोलकर चुप हो गई।

“पर मैं तो खाऊंगा।” चेतना की आंखों में झांकता हुआ द्विअर्थी संवाद बोलता हुआ फिर बोला, “बहुत भूख लगी है।”

“आप खा लीजिए। पर मैं नहीं खाऊंगी।” पर संजय नहीं माना। दो डोसा मंगा लिया। और फिर बात ही बात में बिना रजनीश का नाम लिए वह रजनीश दर्शन पर उतर आया। डोसा खाने के बीच अपने कई रजनीश उवाच चेतना को सुना डाले। पर चेतना बिना कही कोई आपत्ति जताए “हूं” “हूं” “ना” जैसे संक्षिप्त उत्तर देती जा रही थी पर किसी बात पर आपत्ति नहीं जताई। जब कि कई बाते आपत्तिजनक भी थीं। लेकिन आपत्ति उसे आपत्तिजनक बातों के बजाय डोसा खाने पर हुई।

“पर अब तो आ गया है।” संजय ने जैसे उसकी खुशामद की। पर वह बोली, “दोनों आप खा लीजिए।” उसने सफाई दी, “मैं बाहर का कुछ नहीं खाती पीती।”

“पंडित मैं हूं कि तुम?” कह कर जब संजय ने बहुत जोर दिया तो किसी तरह वह डोसा चुगने लगी। संजय को आज जाने क्या हो गया था वह चेतना से सेक्स और देह की चर्चा पर बिना किसी प्रसंग के अचानक उतर आया। बिलकुल किसी दार्शनिक की तरह। संजय की यह दार्शनिकता भी उस पाकिस्तानी मौलवी की तरह “नाड़ा खोल” अंदाज में थी। वह इस बहाने चेतना का मन थाह लेना चाहता था। उसका मन थाहते-थाहते वह सीधे रजनीश के एक किस्से पर आ गया। कि एक संन्यासी था। सुबह-सुबह वह घर से बाहर निकलते ही तैयारी में था कि अचानक उसका एक बहुत पुराना संन्यासी मित्र आ गया। अब संन्यासी बड़े धर्म संकट मे पड़ गया। कि मित्र को छोड़े, कि जिन लोगों से आज मिलना तय है, उनसे मिलना छोड़े। अंतत: उसने मित्र से कहा कि, “तुम भी मेरे साथ चले चलो।”

“पर मेरे कपड़े मैले हो गए हैं। दूसरा है नहीं। और इसे धोने, सुखाने में समय लगेगा।”

“तुम इसकी चिंता छोड़ो। तुम बस नहा धो लो। मेरे पास एक नया वस्त्र है तुम उसे पहन लेना।”

उसका मित्र जब नहा धोकर तैयार हुआ तो उसने वह कपड़ा जो कहीं से उसे उपहार में मिला था मित्र को पहनने के लिए दे दिया। मित्र जब वह नया कपड़ा पहनकर उसके साथ चला तो संन्यासी उसे देख कर बड़ी मुश्किल में फंस गया। उसने देखा कि नये कपड़ों में वह उससे ज्यादा जम रहा है। कहीं भी जाएगा तो लोग उसके मित्र को ही देखेंगे, उसका क्या होगा?

रास्ते भर वह इसी उहापोह में रहा। पहली जगह जब वह गया तो उसने अपने मित्र का परिचय कराया और बताया कि, “रही बात कपड़ों की सो ये इनके नहीं मेरे हैं।” मित्र को यह सुनकर तकलीफ हुई। पर चुप रहा। लेकिन बाहर आकर उसने कहा, “यह कहने की क्या जरूरत थी कि कपड़े इनके नहीं मेरे हैं। ले लो अपने कपड़े। अब तुम्हारे साथ कहीं नहीं जाना।”

संन्यासी ने इस पर अपने संन्यासी मित्र से माफी मांगी। कहा कि, “क्या बताऊं गलती हो गई। पर अब आगे ऐसी बात नहीं होगी।”

मित्र मान गया और साथ चल पड़ा। दूसरी जगह पहुंच कर संन्यासी ने अपने मित्र का परिचय कराया और कहा, रही बात कपड़ों की सो वे मेरे नहीं इन्हीं के हैं। बाहर आकर मित्र ने संन्यासी को फिर लताड़ा। कि, “यह कहने की क्या जरूरत थी कि कपड़े मेरे नहीं इन्हीं के हैं।” संन्यासी ने फिर गलती स्वीकार की, मित्र से क्षमा मांगी और कहा कि अब हरगिज ऐसा नहीं होगा।

पर रास्ते भर संन्यासी के दिमाग में मित्र का पहना कपडा़ ही घूमता रहा। तीसरी जगह भी संन्यासी ने मित्र का परिचय कराया और कहा कि, “रही बात कपड़ो की सो उसके बारे में कोई बात चीत नहीं होगी।” मित्र फिर हैरान।

“तो असल में जैसे उस संन्यासी के दिमाग में हर वक्त कपड़ा ही घूम रहा था ठीक वैसे ही आदमी के दिमाग में सेक्स घूमता रहता है। पर वह उसे दबाता रहता है। और मौका मिलते ही सेक्स की बात करता रहता है।”

संजय ने यह रजनीश दर्शन चेतना पर थोपते हुए यह अंदाजना चाहा कि कहीं वह इस कथा का बुरा तो नहीं मान गई है? पर चेतना ने जब कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो संजय का माथा ठनका कि कहीं यह किस्सा चेतना के सिर के ऊपर तो नहीं गुजर गया। उसके पल्ले ही नहीं पड़ा?

इस बात को थाहने के लिए वह बड़ी देर तक सेक्स के इर्द गिर्द ही बाते करता रहा। पर कोई थाह नहीं मिली उसे। बात ही बात में वह मीरा और मीरा के भजनों पर आ गया। उसने चेतना से पूछा, “तुम क्या मीरा की भजनें भी गाती हो?”

“नहीं पर वह मेरी बहन है।”

“कौन बहन है?”

“मीरा!” वह बेचैन सी हुई। बोली, “मै मीरा जैसी जिंदगी जीना चाहती हूं।” वह रुकी और बोली, “और जो कुछ तभी से आप हमें बताए जा रहे हैं वह मीरा की जिंदगी में नहीं है।”

“क्या बेवकूफी की बात करती हो?” संजय सुलगता हुआ बोला, “मीरा की जिंदगी जीना इतना आसान समझती हो।”

“आसान तो नहीं है। पर मै जिऊंगी।” कह कर वह चली गई। संजय छटपटा कर रह गया।

कहीं यह लड़की पागल तो नहीं है? उसने सोचा। और कि बेवजह ही इस पर वह अपना समय खराब करता जा रहा है। रजनीश का भाष्य बेमतलब उससे भाखता रहा है।

मीरा!

मीरा मन जीती थी, देह नहीं। पर त्रासदी यह थी कि संजय इस चेतना रूपी “मीरा का मन नहीं उसकी देह जीना चाहता था, उसकी देह भोगना चाहता था। तो क्या वह राजा भोज की गति को प्राप्त होने की ओर उन्मुख था?”

कि उसे राधा बना कर कान्हा सा सुख लूटना चाहता था?

उसे कुछ भी पता नहीं था!

संजय ने सोचा कि शायद चेतना अब उससे नहीं मिले। उसने कुछ जल्दबाजी कर दी थी, इसका उसे थोड़ा मलाल तो था पर उसे इसका कोई बहुत पछतावा नहीं था। वह इस तरह मिलके ही क्या करती! यह सोचते ही अचानक उसे आलोक की याद आ गई। बरबस।

दिल्ली में जब उस नए-नए दैनिक में ढेर सारे नए-नए लोग इकट्ठा हो गए थे। और पूरे संपादकीय में सिर्फ एक लड़की थी। वह भी अप्रेंटिस। सो सब उसी पर रियाज मारते रहते। जब कि वहीं साथ के अंग्रेजी वाले दोनों दैनिकों में महिलाओं की भरमार थी। एक से एक माड, हसीन और दिलफेंक। दो तीन महिलाएं तो बाकायदा चेन स्मोकर थीं। इनमें भी एक अक्सर बुरी तरह पीकर कभी-कभार देर रात गए दफ्तर की सीढ़ियों पर यूं ही बैठी या उलटियां करती दिख जाती। चीफ सब थी। बाद में वह एक फोर्ट नाइटली में कोआर्डिनेटर होकर चली गई। और वही से एक कंप्यूटर विशेषज्ञ के साथ शादी कर लिया। जैसे फर्राटे से सिगरेट पीती थी उसी फर्राटे से काम भी करती थी। पेजमेकिंग में उसका जवाब नहीं था। लंबी, छरहरे बदन वाली वह चीफ सब जब लंबे-लंबे नाखूनों वाली, लंबी-लंबी उंगलियों में लंबी-सी सुलगती सिगरेट पकड़े जब लंबा सा कश खींच कर उससे भी लंबा धुआं फेंकती तो कई लोगों को अनायास ही लंबा कर देती। टेलीप्रिंटर के तार छांटते समय उसकी उंगलियों में दबी सिगरेट से हमेशा अंदेशा बना रहता कि कहीं खबरें जल न जाएं, कहीं आग न लग जाए। पर न खबरें जलती थीं, न आग लगती थी। अलबत्ता नए-नए आए लोगों के दिल जल जाते थे, आग लग जाती थी उनके मन में कहीं, यह सब देख कर। पर वह सिगरेट, शराब और सांस सब कुछ अंग्रेजी में लेती थी। जब वह रिजाइन कर फोर्ट नाइटली जाने लगी तो अपने फेयरवेल में वह इतना पी गई पी कर इतनी भावुक हो गई, भावुक होकर इतना सरल हो गई, और सरल होकर इतने शानों पर उसने सिर रखा कि संजय तो क्या आलोक भी ठीक से नहीं गिन पाया। हां, आलोक ने दूसरे दिन अपनी बड़बोली स्टाइल में खुलासा किया, “शानों की तो गिनती नहीं है, पर शानों पर उसके सिर रखते समय कितनों ने उसकी रानों को “टच” किया, कितनों ने उसकी हिप टच की और कितनों ने हाट किस, कितनों ने फ्लाई किस किया, उसका आंकड़ा मेरे पास जरूर है।”

“पर इसमें तुमने क्या-क्या किया?” संजय ने उससे पूछा।

“आकंड़ा इकट्ठा किया!” उमेश ने चुटकी ली।

“एक्जेक्टली यही किया।” उसने शेखी बघारी, “चौबीस कैरेट का खबरची जो ठहरा!”

“पर मैंने तो देखा कोई पौने ग्यारह बजे वह फ्लैट हो गई थी। और ग्यारह बजे बेसिन पर खड़ी उलटियां कर रही थी।” सुरेश ने अतिरिक्त जानकारी देने की कोशिश की।

“पर जब बेसिन पर खड़ी उलटियां कर रही थी तो उसकी पीठ कौन सहला रहा था? मालूम है किसी को?” वह इठलाया, “मुझे मालूम है। और यह भी कि जब वह अचानक रोने लग गई तो कार में बिठा कर उसे कौन चिपटा-चिपटा कर बड़ी देर तक चुप कराता रहा। और जब वह कार से बाहर निकली तो उसकी अस्त व्यस्त साड़ी किसने ठीक की, ब्लाउज और ब्रा के हुक किसने लगाए।”

“क्या बोल रिया है?” सुजानपुरिया पायजामा खोंसते हुए आश्चर्य चकित आंखे फैला कर बड़ी जोर से बोले। ऐसे जैसे कोई अनहोनी हो गई हो।

“सुजानपुरिया जी आप चुप रहिए। देख रहें हैं “एडल्ट” बातचीत हो रही है।” आलोक ने कहा, “जब आपके लाइन की बात हो तब बोलिएगा।”

“ठीक है भइया।” कहते हुए सुजानपुरिया फिर से पायजामा खुंसियाते हुए सरक लिए, “अब तुम लौडों से कौन मुंह लगे।”

“क्या?”

“कुछ नहीं कुछ नहीं।” कहते हुए सुजानपुरिया एकदम ही गायब हो गए।

“और वह नंदा?” आलोक उचक कर मेज पर बैठता हुआ बोला, “न्यूज एडीटर ने उसकी हिप पर इतनी बार हाथ फेंके कि वह भी एक रिकार्ड है।”

“क्या यार मम्मी की बात करने लगे।”

“मम्मी? और साले जब वह शाम को बैडमिंटन खेलती है तो कटोरा जैसी आंखे फाड़ मुंह बाए खड़े रहते हो तब?”

“अच्छा उसकी बात कर रहे हो। मैं समझा सर्कुलेशन वाली नंदा।”

“क्या जायका खराब कर दिया। उसका जिक्र छेड़ कर।” अभी बैठकबाजी चल रही थी कि चपरासी ने संजय को आकर बताया कि उसका फोन आया है। वह जाने लगा तो आलोक ने कहा, “उसका हो तो हमें भी बुलाना। नहीं, जल्दी आना।”

“ओ.के.।” कह कर तो गया संजय। पर तुरंत वापस नहीं गया। थोड़ी देर बाद पता चला कि आलोक की किसी अंग्रेजी वाले से हाथापाई हो गई। मामला वही था। रात की पार्टी पर जुमलेबाजी। आलोक बैठा गपिया रहा था कि उस अंग्रेजी वाले ने आलोक पर तंज किया, “तुम साले मीन मेंटेलिटी हिंदी वाले।” इतना कहना था कि आलोक उस पर टूट पड़ा। आलोक का कहना था कि, “उसे जो कहना था, मुझे कहता। ये “हिंदी वाले” का क्या मतलब था उसका। मेरी मातृभाषा को गाली देगा और मैं उस दोगले अंग्रेजी की औलाद को छोड़ दूंगा?” वह बिफरा, “सवाल ही नहीं।”

असल में हुआ क्या था कि हिंदी प्रदेशों की राजधानियों, जिलों से दिल्ली गए आलोक जैसे लोगों के लिए दिल्ली की महिलाओं का इस हद तक खुलापन या तो विभोर कर देता था या फिर झकझोर देता था। सहजता से वह सब कुछ मान नहीं पाते थे। और चुंकि वह चीजें, वह सुख उनसे बहुत दूर था तो जुगुप्सा उपजनी स्वाभाविक ही थी। ऐसी ही जुगुप्साओं का शिकार था आलोक। आलोक जोशी। हरदम खुश रहने वाला पर बड़बोलेपन का शिकार। वह अपनी खबरों में भी बड़बोलापन बोए रहता था। भाषा जैसे उसकी गुलाम थी और इसकी लगभग दुरुपयोग करते हुए वह जाने कितने रिकार्ड बना चुका था। जैसे कि शुरू के कुछ दिनों तक वह लगातार एक चीज का शिकार रहा। जैसे ही कोई मरता वह फोन पर जूझ जाता और आनन-फानन ढेर सारे लोगों के बयानों से भरी एक भावुक रिपोर्ट लिख मारता। साथ ही कुछ सनसनीखेज बयान खोंस देता। भले ही दूसरे दिन कई लोगों के खंडन आ जाते। कि हमने तो ऐसा नहीं कहा था। या हमारी आपके संवाददाता के कोई बात नहीं हुई। जब खंडनों का तांता लगने लगा। तो आजिज कर कुछ दिनों तक उन खंडन वाली चिट्ठियों को डिस्पैच क्लर्क को मिला कर वह गायब करा देता। पर जब लोग दफ्तर खुद आने लग गए तो अंतत: उसने अपना विकास कर लिया। अब वह प्रतिक्रियाएं बटोरकर लिखने के बजाय संस्मरण लिखने लग गया। वह चाहे कोई महान हस्ती मरी हो या कोई माडल आत्महत्या कर गई हो या किसी जाने पहचाने आदमी या औरत की हत्या हो गई हो। आलोक जोशी फौरन संस्मरण लिख मारता और उसमें यह जिक्र जरूर कर देता कि मरने के या आत्महत्या के पहले वह उससे मिला था। “वह बहुत खुश थी” या “उसके चेहरे पर आतंक की रेखाएं थी” “वह डरा हुआ था” जैसी बातें भी वह जरूर जोड़ देता।

एकाध बार ऐसा भी हुआ कि किसी चीफ सब ने उसके लिखे ऐसे अंश अगर काट दिए तो वह दूसरे दिन उससे भिड़ जाता कि, “क्यों काटा?”

“इसलिए कि वह सब अनर्गल था, झूठ था।”

“क्या मतलब? मतलब कि मैं झूठ लिखता हूं।” वह हांफने लगता, “कोई खंडन आया है आज तक?”

“मरे हुए लोग खंडन नहीं भेज सकते। नहीं जरूर आ जाता।”

“डफर!” वह गुर्राता, “खुद तो एक लाइन लिख नहीं सकते। काटने की भी तमीज नहीं। जो मन में आया काट दिया।” वह जोड़ता, “निकाल लिया अपना फ्रस्ट्रेशन!” और पैर पटकता वह चला जाता। धीरे-धीरे यह सब उसकी रोजमर्रा में शुमार हो गया।

संजय ने उन्हीं दिनों एन.एस.डी. पर लिखी वह रिपोर्ट अप टु डेट कर के छापने को दे दी थी। जो बड़ी होने के नाते उस पत्रिका में नहीं छप पाई थी। पर दैनिक मे जब पूरे पेज की वह रिपोर्ट छपी तो एन.एस.डी. के छात्र नाराज हो गए। दैनिक के कार्यालय पर बाकायदा तख्तियां लेकर वह प्रदर्शन पर उतर आए। रिपोर्ट में अल्काजी, कारंत और वर्तमान निदेशक की कार्यप्रणाली का फर्क, इनका गैप और अल्काजी की सालने वाली कमी के प्रोजेक्शन के साथ ही शराब, लड़कियां, ड्रग और आत्महत्या के गिनाए गए कारणों से एनएसडियन नाराज थे। इस प्रदर्शन की रिपोर्ट आलोक ने लिखी तो वह फिर प्रदर्शन करने आ धमके। आलोक बोला, “मैं इस प्रदर्शन का फिर रिपोर्ट चाहता हूं।” संपादक ने मना कर दिया। और सचमुच आलोक उनके बीच जाता तो पिट जाता। संजय यह सब देखकर पछताने लगा।। उसने सोचा कि वह चौधरी वाली रिपोर्ट भी अगर वह आज संभाल कर रखे रहता तो आज मजा आ जाता। हुआ यह था कि जब चौधरी वाला वह आइटम उस पत्रिका के संपादक ने छापने से मना कर दिया तो उसने वही सामग्री अंग्रेजी में ट्रांसलेट करवा कर कलकत्ता की एक अंग्रेजी पत्रिका में भेज दिया। क्यों कि वह यह जान गया था कि हिंदी में वह सामाग्री कभी नहीं छाप पाएगी। और दिल्ली में तो कतई नहीं। क्योंकि बागपत पास था। और किसे अपने दफ्तर में आग लगवानी थी?

पर दिलचस्प यह रहा कि अंग्रेजी में छपी वह चौधरी वाली सामाग्री एक दिन उसने उस हिंदी पत्रिका में भी छपी देखी। बिलकुल वही ब्यौरे, वही अंदाज। पर धार वह नहीं थी। फायरी लैंग्वेज कमनीयता के साथ परोसे गए ब्यौरे में मर गई थी। और मजा यह कि क्रेडिट साभार के बजाय विशेष संवाददाता की थी। उसने सोचा कि फोन कर उस संपादक से पूछे कि, “अंग्रेजी से उड़ा कर छापी गई सामाग्री डिफरमेटरी नहीं होती क्या?” पर वह टाल गया।

एन.एस.डी. वाली रिपोर्ट पर जब बवाल मचा तो एक दिन उस संपादक का फोन आया, “रिपोर्ट तो मैंने तुम्हें पहले ही बताया था कि अच्छी है। पर इस्तेमाल भी बढ़िया हुई है। भाषा भी तुम्हारी अच्छी है।”

लगभग उन्हीं दिनों जब उसने एक कुष्ठाश्रम पर लंबी रिपोर्ट लिखी और उसमें पर्दाफाश किया कि कैसे एक माफिया उस कुष्ठाश्रम और कुष्ठ रोगियों को चूस रहा है तो समाचार संपादक ने वह रिपोर्ट छापने से सिरे से मना कर दिया। उसके बहुत जोर देने पर समाचार संपादक ने कहा, “क्या फिर बवाल का इरादा है?”

“नहीं तो!”

“तो वह माफिया वाला हिस्सा काट दो।”

“लेकिन तब तो पूरी रिपोर्ट ही मर जाएगी!”

“मरने दो।” समाचार संपादक ने उसे घूरा, “तुम नहीं जानते वह कितने खतरनाक लोग हैं।” अंतत: संजय ने जब कोई चारा नहीं देखा तो समाचार संपादक से कह दिया, “जो काटना हो आप खुद काट लीजिए। मैं नहीं काट पाऊंगा।”

“फिर आलोक की तरह हल्ला मत मचाना कि रिपोर्ट की आत्मा ही मार डाली।”

“ठीक है।” उसने कह तो दिया। रिपोर्ट छप भी गई। पर उसकी आत्मा उसे रह-रह कचोटती रही। रात को सपने में वह कुष्ठ रोगी आ-आ कर उसके सामने खड़े हो जाते। वह परेशान हो गया। अंतत: उसने फिर से बल्कि और फायरी लैंग्वेज में वह कुष्ठाश्रम वाली रिपोर्ट लिखी। और कलकत्ता वाली हिंदी पत्रिका में भेज दिया।

“माफिया की गोद मे कुष्ठाश्रम” शीर्षक से छपी रिपोर्ट में काट छांट तो हो गई थी पर माफिया को भरपूर इंगित करने वाला हिस्सा आ गया था। रिपोर्ट क्या छपी, संजय का जीना मुश्किल हो गया। धमकियां उसे पहले भी कई बार मिल चुकी थीं पर अबकी सिर्फ धमकी भर नहीं थी। धमकियां कलकत्ता की उस पत्रिका तक पहुंची। मामला कोई खतरनाक मोड़ लेता कि चुनाव की घोषणा हो गई। वह माफिया चुनाव लड़ने में मशगूल हो गया। और जेल से ही वह चुनाव संचालन करने लगा। संजय उससे इंटरव्यू के लिए जब जेल मे मिला तो वह बिलकुल बदला हुआ था। उसके कारिंदों ने इशारों-इशारों में बताया भी कि, “यही है वह।” तो भी वह बड़ी संजीदगी से टाल गया। चलते समय जब संजय ने उसकी ओर से मिली धमकियों का जिक्र किया तो वह बिलकुल अनजान बन गया, “राम राम! यही सब हम करेंगे अब?” और दूसरे ही क्षण उसने बड़ी विनम्रता से धमकियों के लिए माफी मांग ली। तभी संजय ने सोचा कि यह माफिया सरगना अगर राजनीतिक में खुदा न खास्ता एंट्री पा गया तो बड़ा शातिर निकलेगा। संजय का सोचना सही निकला। हालांकि वह माफिया उस बार तो इंदिरा लहर के चक्कर में संसदीय चुनाव हार गया। पर अगली बार जेल से ही चुनाव लड़कर वह विधान सभा में जीत कर आ गया था। फिर बाद के दिनों में तो वह मंत्री भी बना।

तो जब माफिया ने कलकत्ता वाली पत्रिका का दफ्तर खून से रंग देने की धमकी दे दी और दिल्ली में संजय को आतंकित करने लगा तब फिर आलोक इसके विरोध की मुहिम में लग गया। बाद में बात आई गई होगी। एक दिन कैंटिन में बैठा वह हरदम की तरह गपिया रहा था। बात चली उस कन्या की जो उस दैनिक में इकलौती थी। वह लड़की उन दिनों सब सहयोगियों की आशिकी से आजिज हो गई थी। कुछ लोग उसे काम नहीं आता, वह जर्नलिज्म कर ही नहीं सकती जैसे जुमले बोल-बोल कर रूला देते। जब वह रोने लगती तो उसी में से कोई सांत्वना देने आ जाता। सांत्वना देते-देते उसकी पीठ सहलाने लगता, आंसू पोंछने के बहाने उसके गालों पर हाथ फेरने लगता। ऐसे में वह बिलकुल असहाय हो जाती। और बचने के लिए फला जी कहने के बजाय भाई साहब, भाई साहब, जैसे संबोधन को बचाव के लिए हथियार बनाती। और उस दैनिक में तब ज्यादातर लोगों की आंखों में शर्म का पानी था। “भाई साहब” कहते ही बेचारे किनारा कस लेते। पर कुछ फिर भी लगे रहते तो उन्हें वह “भइया-भइया” कहने लगती। फिर वह बेचारे भी कटने लगते उस लड़की से।

तो इस गप गोष्ठी में प्रसंग यही चल रहा था। बात ही बात में आलोक कहने लगा, “चूतिए हैं सब साले। कन्या साधने का गुन नहीं जानते।”

“पर जब वह भइया-भइया कहने लगती है तो फिर कोई रास्ता रह जाता है? भाई इतनी नैतिकता तो अपन में है।” ताजा-ताजा भइया बना उमेश बिलबिला रहा था।

“पर देखना वह मुझे भइया नहीं कहेगी। और मैं सक्सेस भी रहूंगा। इस साली को नाप के न दिखा दूं तो कहना।”

“और जो न नाप पाए तो?”

“जिंदगी में लाइन मारना छोड़ दूंगा।” वह तफसील में चला गया, “देखो भई अपनी तो एक ही लाइन है। कि कोई लड़की अगर आपसे हरदम हंस-हंस कर बात करे। चाय पीने, कहीं साथ-साथ घूमने और सिनेमा जैसे आफर मान ले तो समझिए कि आपको वह नापसंद नहीं करती। बस उसे आप की पहल का इंतजार होता है। और मैं उनमें से नहीं हूं कि दो-दो, तीन-तीन साल या फिर पूरी जिंदगी सिर्फ घूमने या साथ चाय पीने, सिनेमा देखने में गुजार दूं। भई मैं दो चार मुलाकातों के बाद सीधा-सीधा प्रस्ताव रख देता हूं कि साथ सोना हो तो बोलो। नहीं ऐसे ही सिर्फ घूमने घमाने से समय खराब करना हो तो गुड बाई।

“बिलकुल खुल्लमखुल्ला?” सुजानपुरिया जाने कहां से आ टपका था और बिस्मित होता हुआ बोला!

“तो क्या!” आलोक चिढ़ता हुआ बोला, “मैं उनमें से नहीं हूं जो साले साल, दो साल सिर्फ लड़की का हाथ छूने भर में ही गंवा देते हैं। यहां तो बस सीधा-सीधा मेन प्वाइंट!”

“और जो लड़की बुरा मान गई तो?”

“मान जाए साली। अपनी बला से। जब वह अपने काम ही नहीं आ सकती तो उसे खुश रखने से ही क्या फायदा?”

“यह तो साला सिर्फ बकचोदी करता है।” आलोक को इंगित करते हुए उमेश ने सुजानपुरिया से कहा, “श्रीमान जी, कहीं आप इसका फार्मूला ट्राई मत कर लीजिएगा, नहीं ऐसी धुलाई होगी कि पायजामे का नाड़ा नहीं मिलेगा। यह दिल्ली है आगरा नहीं।”

“तो क्या हमको बिलकुल चूतिया समझ रिया है?” कहते हुए गर्दन भीतर धंसाते हुए सुजानपुरिया पायजामा उठा कर वहीं धप्प से बैठ गया, “मैं तो भइया जगह देख कर हाथ डालता हूं।”

“बड़े छुपे रूस्तम हैं आप तो। पर हाथ डाल कर काम चलाते हैं आप सुजानपुरिया जी! छी-छी। यही गड़बड़ है।” कहते हुए आलोक वहां से उठने लगा तो सुजानपुरिया ने उसे रोक लिया। कहा कि, “भइया तुमसे एक काम है।”

“भइया कहने का इंफेक्शन आपको भी लग गया।”

“तुमको तो मजाक सूझ रिया है। पर जरा मामला गंभीर है।”

“अच्छा, बताइए क्या बात है?”

“तुम तो भइया दिल्ली में पहले ही से हो। सब जानते हो यहां का हाल। हमको कुछ मालूम नहीं हियां के बारे में।”

“भूमिका मत बांधिए। सीधे प्वाइंट पर आइए।”

“सर्दी आ रही है। गरम कपड़ा बनवाना था।”

“बजट क्या है?”

“बजट तो कुछ नहीं बनाया है। पर कुछ खर्चा काट कूट कर बनवाना तो है ही। सुना है यहां जाड़ा बहुत पड़ता है। और हमको जाड़ा लगता बहुत है।”

“स्वेटर बिनवाना है, रिडिमेड लेना है, कोट या सूट सिलवाना है। पहले यह तय कर लीजिए। नहीं, वह मकान वाला किस्सा मत दुहरा दीजिएगा जैसे डेढ़ सौ रुपए में आप साऊथ डेलही में कमरा ढूंढ रहे थे।” आलोक कुछ-कुछ खीझता हुआ बोला।

“जो हो, दाद देनी पड़ेगी सुजानपुरिया की। कि भले जमुनापार जरा उजाड़ में ही सही पर लिया कमरा तो डेढ़ सौ रुपए में।” उमेश बोला।

“वो भी बिजली पानी सहित।” सुजानपुरिया उचकते हुए बोला।

“फिर ठीक है। तीन सौ में आपको सिलाई सहित सूट मिल जाएगा।” आलोक सर्रे से बोला।

“कहां भइया!” सुजानपुरिया उचक कर खड़े हो गए, “कल ही दिलवाये दो।” पर तुरंत सवाल भी कर बैठे, “मजबूत तो होगा। चल जाएगा दो चार साल?”

“बिलकुल।” मजबूत इतना कि बड़े होकर आपके बच्चे भी पहनेंगे।

“फिर कल्है चलइ चलौ।” सुजानपुरिया उत्साहित हो गए थे।

“कल क्या आज ही चले चलिए।”

“नहीं, आज नहीं।”

“क्यों?”

“कल पैसा लेकर आएंगे तब।”

“आएंगे क्या सीधे लालकिला के पिछवाड़े चले जाइएगा। वहीं मिल जाएगा। बस दिक्कत यही है आपके नाप का मिलेगा कि नहीं?”

“धत्। हुआं तो हम होइ आए हैं। वो तो पुराना-पुराना है।”

“तो क्या हुआ। ड्राई क्लीन करवा लीजिएगा। दूसरा क्या जानेगा कि आप ने पुराना खरीदा कि नया।”

“पर सुना है एड्स हो जाता है। ना भाई ना।” कहते हुए सुजानपुरिया पायजामा खोंसते, कमीज की कालर का बटन बंद करते खिसक लिए।

बाद के दिनों में सुजानपुरिया ने गरम कपड़े के बाबत दफ्तर के छोटे-बड़े लगभग सभी से कंसल्ट किया। जाड़ा आ गया पर गरम कपड़ा नहीं बना। लेकिन अचानक एक दिन वह रूई वाला जाकेटनुमा लिहाफ पहने दिखे। बड़े खुश। आलोक ने देखते ही उन्हें टोका, “तो सुजानपुरिया जी आप की समस्या साल्व हो गई?”

“और नहीं तो क्या। पर तुम तो एड्स दिला रिया था और लूट अलग से रिया था।” वह जाकेट दिखाते हुए आलोक से कहने लगा, “यह देखो तीस रुपए में। सिर्फ तीस रुपए में। एकदम नया। और तू हमें तीन सौ रुपए में एड्स दिला रहा था। रैकेटियर कहीं का।”

“क्या कहा?”

“रैकेटियर।” वह हाथ उठा कर बोले, “और हमीं नहीं यहां सभी तुम्हें रैकेटियर कहते हैं।” और सुजानपुरिया यह बात कुछ ऐसे रिदम में कह रहे थे जैसे, “हमीं नहीं सभी लाजवाब कहते हैं।” फर्क था तो सिर्फ मुहम्मद रफी की गायकी और सुजानपुरिया की झक्की स्टाइल का। पर वजन और लय बिलकुल वही।

आलोक अभी सुजानपुरिया से कैसे पिंड छुड़ाए यह सोच ही रहा था कि तब तक उमेश आ गया।

“कितने मे लिया सुजानपुरिया जी!” उसने उनका रूई वाला जाकेट छूकर देखते हुए पूछा।

“तीस रुपए में।” सुजानपुरिया ठसक में थे।

“सिर्फ तीस रुपए में?”

“और क्या?”

“अरे बस का टिकट भी तो लिया होगा?” उमेश जाकेट गौर से देखते हुए बोला।

“नहीं।”

“विद आऊट टिकट?”

“नहीं-नहीं। टिकट सुरेश ने लिया। उसी ने खरीदवाया जनपथ से आज।”

“फिर तो सेलीब्रेट करिए। ज्यादा कुछ नहीं, चाय से भी काम चल जाएगा।”

“अभी तक आलोक लूट रिया था। तीन सौ में एड्स दिला रिया था। अब तू लूटने आया है।”

“एक कप चाय में क्या लुट जाएंगे सुजानपुरिया जी!”

“बड़ा चूतिया है। तुझे एक कप पिलाऊंगा तो सभी हड्डे की तरह पीछे पड़ जाएंगे। किस-किसको पिलाऊंगा।” मेरा तो भट्ठा बैठ जाएगा। जाकेट से ज्यादा चाय में चला जाएगा। जाकेट से ज्यादा चाय में चला जाएगा।” सुजानपुरिया पूरे फार्म में थे, “जा अपना काम कर!”

आलोक के लिए वह दिन बड़ा भारी था। उससे एक बड़ी खबर छूट गई थी। सुबह-सुबह संपादक ने डांटा संपादक से छुट्टी मिली तो सुजानपुरिया सवार हो गए। और उस लड़की को भी जो नहीं कहना चाहिए था उसे उस दिन ही कह दिया था। हालां कि संपादक की डांट धोने की गरज से वह टाई वाई बांध कर आया था और रह-रह कर टाई की नॉट दिन भर टाइट करता रहा। टाई की नॉट तो टाइट रही दिन भर, पर उसका चेहरा फिर भी टाइट नहीं हो पाया। ढीला-ढीला वह घूमता, जेब में हाथ डाले कभी इस फोन, कभी उस फोन पर जूझता रहा।

शाम को वह उदास चेहरा लिए पर झूमती चाल से जब कैंटीन में घुसा तो सबकी नजरें उसी पर थीं। संजय ने उसे देखा, सिगरेट सुलगाई और उसे पुकारा, “आलोक इधर आओ।”

“बोलो।” वह आता हुआ बोला।

“सुना आज उसने तुमको भी भइया कह दिया?” संजय उससे खेलते हुए बोला।

“तो क्या हुआ?” आलोक ने हिकारत से पूछा।

“कुछ हुआ ही नहीं?” संजय जब यह आलोक से पूछ रहा था तो कैंटीन में मौजूद लोग आलोक का जवाब सुनने के लिए और पास खिसक आए। और जैसे अपने-अपने कान खड़े कर लिए।

“तुम लोग शायद एक बात मेरे बारे में नहीं जानते हो।” उसने सबको एक साथ घूरते हुए कहा, “मैं बहन चोद भी हूं। बहनचोद! समझे!” उसने टाई की नॉट ढीली की और बोला, “सिर्फ बकचोद नहीं। मैं फिर दुहरा रहा हूं, उसे नाप कर दिखाऊंगा।”

कैंटीन की भीड़ छट गई थी। पर संजय और आलोक बैठे रहे। बैठे-बैठे दुष्यंत कुमार की गजलों, अरुण साधू के उपन्यास बंबई दिनांक, पंजाब में भिंडरांवले की वह वहशतियाना हरकतों और डी.टी.सी. बसों की बदहाली तक के बारे में बतिया गए। जब काफी देर हो गई तो संजय उठ कर जाने लगा। आलोक उसे पकड़ कर बैठाने लगा तो संजय ने उससे कहा, “क्यों आज खबर नहीं लिखनी?”

“नहीं। आज झांट एक खबर नहीं लिखूंगा। देखता हूं कौन क्या उखाड़ता है।” आलोक सचमुच उखड़ा हुआ था।

“पर मुझे तो लिखनी है।” कह कर संजय जाने लगा तो आलोक भावुक होता हुआ बोला, “बैठो तो सही।”

“जल्दी बोलो!” वह उसकी भावुकता धोता हुआ बोला।

“क्या बोलें। साले, सुपरफास्ट हुए जा रहे हो।”

“फिर भी?”

“बताओ तुम्हें तकलीफ नहीं होती। कि सबसे ज्यादा एक्सक्लूसिव स्टोरिज फाइल करो। और एक दिन एक झांट सी खबर छूट जाए तो साले लौंडा़ काट कर हाथ में थमाने लगते हैं। सिंसियरिटी का पाठ पढ़ाने लगते हैं। बास्टर्ड! सरकुलेशन और साख समझाने लगते हैं।” आलोक उखड़ा-उखड़ा बोलता जा रहा था, “साले बनिये का कच्छा धोती-धोते-धोते संपादक बन गए तो दिमाग खराब हो गया है। अरे जाओ साले अइसे ही है तो सरकुलेशन मैनेजर हो जाओ, जनरल मैनेजर हो जाओ, कच्छे धोती से प्रमोशन पर पेटीकोट, पैंटी और ब्रा धोने को मिलेगा। हिप्पोक्रेट साले!”

“पर एडीटर तो यार तुम्हें मानता है।”

“तभी न जब-तब मेरी मारता रहता है।”

“तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है।” कह कर संजय चल दिया। आलोक ने उसे फिर टोका, “सुनो तो सही।”

“सॉरी, अभी नहीं। अब एक डढ़े घंटे बाद।” कहते हुए संजय जाने लगा तो आलोक बोला, “लगता है आज कोई लंबा थाम के आए हो।” कहते हुए उसने टांट किया, “बाटम है कि लीड?”

“अरे कुछ नहीं!” कह कर संजय चला गया पर आलोक बैठा रहा।

उन दिनों आलोक दफ्तर की एक टेलीफोन आपरेटर को भी नापने में लगा हुआ था। उस टेलीफोन आपरेटर के कई आशिक थे। जिनमें एक फिल्म क्रिटिक सुरेंद्र मोहन तल्ख भी था। तल्ख उर्दू पत्रकारिता करते-करते अचानक बुढ़ौती में हिंदी पत्रकारिता में समा गया था। अक्सर गलत हिंदी लिखता था पर रहता ऐंठा-ऐंठा। बेवजह ऐंठे रहना उसकी आदत में शुमार था। पर लड़कियों या महिलाओं को देखते ही वह पानी-पानी हो जाता। तब उसकी सारी अकड़ फड़फड़ा कर जाने कहा उड़ जाती थी। लगता ही नहीं था तब यह तल्ख वही तल्ख है। अक्सर वह लाल किले के पीछे वाली मार्केट या जामा मस्जिद वाली पुराने कपड़ो के मार्केट से खरीदी पैंट पहनता। ऐसे वाले सूट भी उसके पास तीन चार थे। पर सारे सूटों पर वह जाने क्यों हमेशा एक ही टाई बांधता था। शायद वह नई थी। पर सुर्ख लाल। उसकी कमीज की कालर और सूट के कोट की कालर, दोनों ही बड़ी-बड़ी कुत्ते की कानों की तरह लटकी होती। इन कालरों के बीच बंधी टाई को देखकर चपरासी की टिप्पणी, “रजिया फंस गई गुंडों में” सबको मजा देती। पर तल्ख इन सब चीजों से बेखबर अकड़ा, ऐंठा बैठा रहता।

इत्तफाक से उस इकलौती लड़की की सीट भी तल्ख के पास ही था। उससे मिलने जब-तब कोई न कोई लड़की मिलने आती रहती। और कई बार वह तीन-चार-पांच की संख्या में भी होतीं। तल्ख उन लड़कियों की फौरन गिनती करता चपरासी बुलाता और गिनती से दो चाय समोसा या सुहाल सहित मंगवा भेजता। उनके बीच चाय भिजवा कर तल्ख उनके पास जाकर खड़ा हो जाता। कहता, “मे आई ज्वाइन योर कंपनी?” और दूसरे ही क्षण कुर्सी खींच कर उनके बीच बैठ जाता। वह लड़की कई बार इस बाबत तल्ख से ऐतराज जताते-जताते थक गई, कई बार उन चायों के पैसे देने की कोशिश की, शिकायत की। सब बेकार। तल्ख इस तरह अक्सर उस लड़की और उसकी सेहिलियों के बीच बैठ उनका मन, मिजाज और माहौल तल्ख कर देता। पर इसका उसे इल्म नहीं रहता। उर्दू अखबारों की राय का छोटा सा पीस लिखने में उसे दो-दो, तीन-तीन लग जाते। तब जब कि वह इसमें युद्ध स्तर पर लगा रहता।

वह जब-तब उस लड़की को उर्दू सिखाने की भी पेशकश करता रहता। कहता, “मैं तुम्हें उर्दू, सिखा देता हूं तुम मुझे हिंदी सिखा दो।” लड़की कहती, “मैं अप्रेटिस! कैसे सिखा सकती हूं आपको हिंदी। और मुझे उर्दू सीखनी नहीं।” पर तल्ख फिर भी “मैं तुम्हें उर्दू, तुम मुझे हिंदी” की चरस बोए रहता। संपादक उसे अक्सर समझाता रहता कि बोलचाल की हिंदी लिखा करिए। हिंदी की आचार्य किशोरी दास वाजपेयी वाली वर्तनी भी उसके लिए दर्द बनी रहती। इस चक्कर में कई बार तल्ख कुछ का कुछ कर बैठता। जैसे कि एक फिल्मी लेख में यह जिक्र था कि शत्रुघ्न सिन्हा सीधे दिल्ली रवाना हो गए। तल्ख ने हेडिंग इस तरह लगाई, “शत्रुध्न सिंहा सीधा हुआ।” ऐसे कई गपड़ चौथ वह अक्सर करता रहता। लोग चिढ़ाते रहते। पर वह अकड़ा- ऐंठा दफ्तर में भी धूप का चश्मा लगाए जब तब सिगरेट फूंकता रहता। चिड़चिड़ाता रहता। तो उस टेलीफोन आपरेटर को भी जब तब वह चाय पिलाता रहता।

…जारी…

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