अपने-अपने युद्ध (8)

भाग (7) से आगे… तब वह दिल्ली में जंगपुरा एक्सटेंशन में रहता था। घर पहुंच कर संजय ने रगड़-रगड़ कर नहाया। पर रीना की देह गंध जैसे उसके अंग-अंग में समा गई थी, निकल ही नहीं रही थी। “रात भर कहां थे?” होंठ गोल करते हुए उसके ऊपर रहने वाले श्रीवास्तव ने पूछा। श्रीवास्तव भी एक न्यूज एजेंसी में रिपोर्टर था। वह कमरा उसी ने संजय को दिलवाया था। श्रीवास्तव भी अजीब चीज था। एक से एक बेढब काम करता रहता। जैसे बिना रेजर के, बिना शेविंग क्रीम के हाथ में ब्लेड लेकर शेव बना डालता। जाने कैसे? गंजे सिर वाले श्रीवास्तव का नाम बहुत कम लोग लेते थे। उसे “लाला, लाला” बोलते। तो संजय लाला का सवाल पीते हुए बोला, “लाला, आज जरा दफ्तर फोन कर देना। कह देना तबीयत ठीक नहीं है, आज नहीं आऊंगा।” कहते हुए संजय सोने के लिए बिस्तर की चादर ठीक करने लगा।

“पर रात थे कहां?” लाला का सवाल उसके होंठों से अभी छूटा नहीं था।

“बस! वैसे ही रतजगा हो गया।”

“पर थे कहां?” जैसे वह किसी रहस्य का पर्दाफाश कर देना चाहता था।

“कुछ नहीं, माडल टाऊन वाले अंचल के यहां रह गया था।” वह झूठ को सच बनाते हुए बोला, “गपियाते-गपियाते रात ज्यादा हो गई तो उसने कहा यहीं सो जाओ। सुबह चले जाना।”

“कौन अंचल? वही दिल्ली प्रेस वाला?”

“हां।”

“पर रात को तो वह तुमसे मिलने यहीं आया था।” लाला उस पर रौब मारते हुए बोला।

“हां, बता रहा था कि तुमने कोई थर्ड क्लास रम भी पिला दी थी।” संजय यूं ही अंधेरे में तीर मारता हुआ बोला। पर निशाना ठीक लग गया था।

“ओल्ड मंक भी अगर घटिया रम है तो बात ही खत्म!” कहता हुआ लाला मायूस सा कमरे से बाहर जाने लगा, “मैंने तो तुम्हारे लिए बड़ा इंतजाम किया। तुम्हारी भाभी ने चिकन भी बनाया था।”

“अच्छा!” संजय लाला का एहसान मानते हुए बोला, “कोई बात नहीं, मेरे हिस्से की बची तो होगी, इस समय खा लूंगा।”

“खाक बचेगी!” लाला झल्लाया, “वो साला अंचल बचने देता तब न! आधी बोतल ओल्ड मंक भी घसीट गया और चिकन की लेग पीसें भी।” वह हाथ नचाता हुआ बोला, “फिर भी घटिया रम बताया साले ने।”

“अरे नहीं, नहीं। वह तो बड़ा तारीफ कर रहा था।” संजय ने बात मोड़ते हुए कहा, “वो तो मैं ही जरा तुम्हें छेड़ने के लिए झूठ बोल गया।”

“तो रात कहां थे?” लाला ने जैसे म्यान से तलवार निकाल ली।

“अंचल के घर। और कहां?” संजय फिर भी अडिग रहा। लाला जब मायूस जाने लगा तो संजय उसे बुलाते हुए बोला, “लाला फोन जरूर कर देना। और, हां, एक इनायत और कर देना!”

“क्या?”

“भाभी से कह देना, दिन का मेरा खाना भी बना देंगी। अब होटल जाने में आलस लग रही है।”

“ठीक है।” लाला उसी मायूसी से बोला। और दरवाजा बंद करता हुआ चला गया।

दूसरे दिन संजय जब आफिस पहुंचा तो रिसेप्शनिस्ट ने बताया कि रीना कल दो बार आई थी। संजय ने सोचा कि रीना को फोन करे। पर उसका काशन “यू डोंट” याद आ गया। दफ्तर में एडीटर वैसे ही भन्नाया पड़ा था।

दो हफ्ते बीत गए। रीना का कहीं पता नहीं था। एक शाम उसका फोन आया। हालचाल पूछा तो बोली, “बाहर गई थी।” फिर, “दो दिन बाद भेंट होगी।” कह कर उसने फोन रख दिया। एक दिन बाद उसका फोन आया, “कल का दिन मेरे लिए खाली रखना।”

“मिलोगी कहां?”

“मैं फोन करके बताऊंगी। और हां, फार गाड शेक, कल सिगरेट मत पीना।” कह कर उसने फोन रख दिया।

दूसरे रोज उसका फोन आया, “ओबेराय होटल आ जाओ। तुरंत।”

“ओबेराय में कहां?”

“लॉबी में। और कहां।” वह बोली, “और हां, अगर लॉबी में न मिलूं तो हेयर ड्रेसर के पास आ जाना।”

“हेयर ड्रेसर?”

“भूल गए?” वह चहकी, “वही जिसका तुमने इंटरव्यू लिया था।”

“अच्छा-अच्छा हबीब।”

“हां। वही।” और “ओ.के.” कह कर उसने फोन रख दिया।

हबीब! जो कहता था कि राह चलते भी अगर औरतों के बालों की स्टाइल उसे बेढंगी दिखती है तो उसका मन करता है उसे वह वहीं ठीक कर दे। वह कहता कि अगर कुदरत ने खूबसूरत घने और लंबे बाल दिए हैं तो उसके प्रति लापरवाही माफ नहीं की जा सकती। रीना को इंटरव्यू में छपी हबीब की बात क्लिक कर गई। और वह ओबेराय होटल में हबीब की शाप पर पहुंच गई। बन गई उसकी परमानेंट क्लाइंट। रीना के बाल थे भी घने, खूबसूरत और लंबे। जब वह कभी कभार जींस-टी शर्ट पहन कर निकलती तब जरूर उसके लंबे बाल उसका मजाक उड़ाते। एक बार संजय ने कहा कि, “थोड़े छोटे करवा लो।” तो वह बिदक गई, “क्यों?”

“तो जींस-टी शर्ट मत पहना करो।”

“क्यों?”

“क्यों क्या, पूरी कार्टून लगती हो।” संजय मुंह बिगाड़ते हुए बोला, “लंबी-लंबी काया, लंबे लंबे केश, जिस पर जींस-टी शर्ट और….।”

“और?”

“कुछ नहीं बुरा मान जाओगी।” पर वह बुरा मान गई थी।

“आज कह दिया, फिर कभी नहीं कहना।”

“क्या?”

“बाल कटवाने को।” वह रुआंसी हो गई थी।

“क्यों क्या बात हुई?”

“मेरी मां को मेरे बाल बहुत पसंद थे।” वह भावुक हो गई थी, “मां ने कहा था कि कभी कटवाना नहीं।”

“वेरी सॉरी!” संजय ने रीना को इतना भावुक पहले कभी नहीं देखा था। रीना मां-बाप की इकलौती थी। चार साल पहले उसकी मां कैंसर से मर गई थी। तबसे वह जब कभी भी मां की चर्चा करती तो रो पड़ती।

रीना के घने, लंबे बाल संजय को भी अच्छे लगते। खास कर जब वह शैंपू करके बाल खोले मिलती तो गजब का कहर ढाती। बड़े-बड़े काले-काले बालों और कजरारे नयनों के बीच उसके गोरे-गोरे गाल ऐसे लगते जैसे कोई सी-बिच। संजय सोचता क्या वह फिर से कविताएं लिखना शुरू कर दे?

आज ओबेराय होटल की लॉबी में चिकन की कलफ लगी बादामी साड़ी में बाल खोले रीना मिली तो संजय को वह बिलकुल किसी अप्सरा-सी लगी। लपक कर वह उसका हाथ थाम लेना चाहता था। उसके लहराते खुले बालों को प्यार कर लेना चाहता था। पर उसकी कजरारी नशीली आंखों के जादू भरे संकेत ने उसे रोक दिया।

“यहां कैसे?” संजय ने पूछा।

“आते ही डिटेल्स लेने शुरू कर दिए?” वह अपनी आंखों में जैसे ढेर सारा नशा उडेलती हुई बोली, “रिपोर्टिंग के लिए नहीं बुलाया यहां तुम्हें।” वह पल्लू संभालती हुई बोली, “आओ पहले कुछ खा पी लेते हैं।” उसने जोड़ा, “तुम बड़ा भुखाए दिखते हो।”

“हां, पर तुम्हारी भूख भी नहीं देखी जा रही।”

“डबल मीनिंग डायलाग से मुझे कोफ्त होती है! यू नो?” कहती हुई वह चलने लगी।

“देखो मैं चला जाऊंगा।” संजय तैश में आता हुआ बोला, “बार-बार तरह ह्यूमिलिएट मत किया करो।”

रीना कुछ बोली नहीं और हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई।

“चलो।” संजय पसीजते हुए बोला।

खाने के दौरान दोनों चुप रहे। यंत्रवत कमरे में आए। कमरे में भी देर तक दोनों चुप बैठे रहे। यह पहली बार हो रहा था कि दोनों कमरे में अकेले थे और अलग-अलग, चुप-चुप बैठे थे। रीना के खुले-खुले बाल, उसका रूठा-रूठा चेहरा, संजय को ऊब हो रही थी। आखिरकार संजय उठा, रीना के पास गया और खड़े-खड़े ही उसने रीना के बालों से खेलना शुरू किया। पर रीना कुछ नहीं बोली। उसे चूमा वह फिर कुछ नहीं बोली। उसने उसके ब्लाऊज में हाथ डाल दिया वह फिर भी चुप रही। धीरे-धीरे संजय ने उसकी साड़ी उतार दी, ब्लाउज उतार दिया, पेटीकोट पर उसने हलका सा प्रतिरोध जताया। पर जब ब्रा और पेंटी पर उसने हाथ लगाना चाहा तो उसने दोनों हाथों से उसका हाथ पकड़ लिया। हालांकि संजय अब बेसब्र हो रहा था, पर रीना पूरी की पूरी उदासीन थी। संजय ने उसे उठा कर खड़ा कर दिया। कमरे में लगे आइने में वह अपनी देह घूरने लगी। उसका भरा-भरा बदन देख कर संजय जैसे बउरा गया। पर रीना ने कोई रिस्पांस नहीं दिया। संजय “रूपदंभा बड़ी कृपण तो हो, अल्पव्यसना कसे वसन हो तुम” जैसी कविताएं भी पढ़ गया पर वह निश्चेष्ट खड़ी-खड़ी अपने आपको देखती रही। संजय उसे सिर से पांव तक अनवरत चूमता रहा, उसे बाहों में भरता रहा पर रीना तो जैसे बुत बनी खड़ी रही तो खड़ी रही। संजय ने आहिस्ता से उसके बांलों को कंधों पर से हटाया और गोद में उठाते हुए बिस्तर पर लिटा दिया। उसकी बाहों को सहलाते हुए, “ये तुम्हारी कोपलों सी नर्म बांहें और मेरे गुलमुहर से दिन” वाला गीत पढ़ा तो रीना के होंठ हलके से मुसकुरा कर रह गए। क्षण भर खातिर। पर वह बोली फिर भी नहीं। “इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं” और “गुलमुहर गर तुम्हारा नाम होता, मौसमे गुल को हंसाना भी हमारा काम होता” जैसे फिल्मी गीत भी उसकी देह को सहलाता हुआ संजय सुना गया। पर रीना के मन में, रीना की देह में कहीं कोई स्पंदन नहीं हुआ। “मैंने तुम्हें छुआ, और कुछ नहीं हुआ” कहने पर भी वह जब कुछ नहीं बोली, बर्फ की तरह ठंडी पड़ी रही तो संजय का धैर्य टूट गया। उसके भीतर का जानवर जैसे जाग गया। उसने लगभग जबरिया रीना की पैंटी उतारी, उसकी देह से ब्रा नोची, उसकी टांगे उठाई और हांफने लगा। रीना जैसा कि हमेशा करती थी, उसे दबोच लेती थी, उसकी पीठ दोनों बाहों से जकड़ लेती थी, सिर के बाल एक खास स्टाइल में सहलाने लगती थी, ऐसा कुछ भी नहीं किया उसने। हां, पर उसने विरोध भी नहीं किया। अलबत्ता जब वह हांफता-हांफता उसकी देह पर बेसुध होकर ढीला पड़ गया तो वह उसे अपनी देह पर से सरकाते हुए चिपट गई। चिपट कर सुबकने लगी। पर संजय कुछ नहीं बोला। थोड़ी देर बाद जैसे वह होश में आई तो उठ कर लिहाफ ओढ़ कर संजय से चिपट गई। पर अब वक्त संजय के उदासीन रहने का था। थोड़ी देर बाद रीना फुसफुसा रही थी, “संजय प्लीज, संजय प्लीज।” पर संजय लाख कोशिश के बावजूद उत्तेजित नहीं हो पा रहा था। उसका मन उचट गया था। और जब रीना ने उसे बहुत परेशान कर दिया तो वह उसे उलट कर उसकी पीठ पर लेट गया। वह फिर भी कसमसाती रही। रीना की पीठ पर लेटे-लेटे वह ऊब ही रहा था कि रीना की हिप कुछ अजीब ढंग से उछलने लगी। संजय सहसा उत्तेजित हो गया। फिर तो जैसे अनायास रीना की हिप और उठती गई और संजय बेकाबू होकर उस पर सवार हो गया। संजय के लिए इस तरह का यह पहला अनुभव था। संजय जब थक कर बिस्तर पर गिरा तो रीना उसे चूमते हुए बोली, “फैंटास्टिक!”

संजय ने देखा बिस्तर की चद्दर, गद्दा तकिया सब कुछ अस्त व्यस्त हो गया था। पर उसने नोट किया रीना सहज हो गई थी।

अब वह बोलने लगी थी।

“होटल का कमरा लेने की क्या जरूरत थी?” संजय ने पूछा।

“मैंने नहीं लिया।”

“तो?”

“मेरे पापा के दोस्त राजस्थान में मिनिस्टर हैं। उनकी फेमली आई है।” उसने जोड़ा, “वही लोग यहां ठहरे हुए हैं। मैं जानती थी वह लोग घूमने जाएंगे। साथ मुझे भी जाना था। मैंने प्रोग्राम तो बनाया पर ऐन वक्त पर दिमाग काम कर गया। मैंने कल ही तुमसे यहां मिलने का प्रोग्राम बना डाला। और जब सुबह आज वह लोग घूमने जाने लगे। मैंने अचानक तबीयत खराब होने का बहाना बनाया। रुक गई। और तुम्हें बुला लिया।” कहते-कहते जैसे उसने बात पूरी की, “एनीथिंग एल्स?”

ऐसे ही इस या उस बहाने मिलती रही संजय से। बीच-बीच में वह अपनी शादी का जिक्र करती। बताती कि लड़के वाले देखने आ रहे हैं। कभी बताती कि लड़के वालों ने हां कर दी है। एब बार उसने यह सूचना भी दी कि उसकी शादी तय हो गई है। और जैसे अल्टीमेटम देती हुई बोली, “अभी कोई बात नहीं बिगड़ी है। तुम हां कर दो तो मैं मना कर दूंगी।” वह यह और ऐसे कई किस्म के दबाव बनाती रहती। पर संजय हर बार या तो चुपचाप उसकी ऐसी सूचनाएं पी जाता या फिर, “क्या फायदा?” जैसे संक्षिप्त संवाद बोल कर बात टाल जाता। ऐसे ही एक बार वह बिलकुल चरम क्षणों में बुदबुदाई, “देख रही हूं तुम्हारे नसीब में मेरे लिए आह भरना ही लिखा है।”

“वो तो है।” संजय लापरवाही से बोला।

“तो क्या तुमने मेरे बच्चों का मामा बनने का फैसला कर लिया है?” वह जैसे संजय को बिच्छू की तरह डंक मारती हुई बोली, “मामा बनना ही चाहते हो तो मैं क्या कर सकती हूं।” उसने जोड़ा, “पर मुझे अच्छा नहीं लगेगा।”

“क्या बेवकूफी की बातें करती हो?” कहते हुए संजय ने बात टाल दी। पर इस वाकये के बाद वह रीना के बारे में गंभीरता से सोचने लगा।

शिद्दत से।

उन्हीं दिनों रमेश शर्मा की फिल्म “न्यू डेलही टाइम्स” की शूटिंग दिल्ली में हो रही थी। संजय ने उस शूटिंग पर सर्रे की शूटिंग रिपोर्ट लिखने के बजाय एक दिलचस्प रिपोर्ताज लिखा। साथ में फिल्म के हीरो शशी कपूर से एक बेलौस इंटरव्यू भी। इस इंटरव्यू में शशी कपूर ने बड़ी मासूमियत से उस बात का भी जिक्र किया था कि जब वह छोटे थे तो कैसे अपने पापाजी यानी पृथ्वी राज कपूर की एक हिरोइन को दिल दे बैठे थे। और संयोग देखिए कि शशी कपूर का एक बेटा भी छुटपन में ही उनकी एक हिरोइन से प्यार कर बैठा था। इस पूरे प्रसंग को जिस मन से, जिस मासूमियत और मुहब्बत से शशी कपूर ने बयान किया था, लगभग उसी मन और पन से संजय ने लिखा भी था। इंटरव्यू में शशी कपूर की फिल्मों पर, उनकी जिंदगी पर विस्तार से चर्चा थी। उन्होंने बताया था कि अपनी लगातार फ्लाप फिल्मों से वह एक समय बहुत परेशान हो गए थे। उन्हीं परेशानी के क्षणों में वह एक बार एस.डी. बर्मन से मिले। बर्मन दा ने उन्हें दिलासा दिलाया और कहा कि घबराओं नहीं, हम कुछ करेंगे। और उन्होंने किया। ‘शर्मीली’ में बर्मन दा ने जो संगीत दिया, उसने शशी कपूर के गिरते कैरियर को थाम लिया। “खिलते हैं गुल यहां, खिलके बिखरने को, मिलते हैं दिल यहां” गीत जो शशी कपूर पर फिल्माया गया था, शशी कपूर ने उसे अपने कैरियर का महत्वपूर्ण पड़ाव माना था। “जुनून” “36 चौरंगी लेन” और “कलयुग” जैसी उनकी महत्वपूर्ण फिल्मों की चर्चा भी संजय ने विस्तार से और कई शेड्स में की थी। संजय ने शशी की यह बात भी हाईलाइट की थी कि अब उन्हें अपनी बेटी की उम्र के बराबर की लड़कियों के साथ झाड़ियों के आगे पीछे गाना गाते दौरान खुद भी अच्छा नही लगता।

यह सब पढ़ कर रीना का दिमाग खराब हो गया। वह कहने लगी कि वह उसे भी क्यों नहीं साथ ले गया। उसने लगभग जिद पकड़ ली कि वह उसे शशी कपूर से अभी चल कर मिलवाए।

“क्या बंबई चलोगी?”

“क्यों?”

“क्योंकि शशी बंबई जा चुके हैं।” संजय ने उसे बताया, “चलो अगली बार जब वह आएंगे तो जरूर मिलवा दूंगा।”

“जाओ मैं तुमसे नहीं बोलती।” वह किसी छोटे बच्चे की तरह तुनक कर बोली।

“क्या शशी कपूर की हिरोइन बनने की तमन्ना है?” संजय ने उसे चिढ़ाया, “कि अब अगला प्रपोजल शशी कपूर को देना है?”

“तुमसे मतलब?” वह फिर तुनकी।

“नहीं, शशी कपूर को भी अगर अपने “स्कोर बोर्ड” में शुमार करने की तैयारी में हो तो बताओ, उन्हें फोन करके फौरन बुला दूं।” संजय रीना को छेड़ता हुआ बोला।

“फौरन बुला दूं!” उसकी बात दुहराती हुई वह मटकी, “शर्म भी नहीं आती यह कहते।” कहते हुए उसने संजय की बांह में जोर से काट लिया। संजय जोर से चिल्लाया और लपक कर उसने मुंह पर हाथ रख दिया और काटी हुई जगह पर फूंक मार-मार कर सहलाने लगी। बोली, “तुमने ऐसी बात की ही क्यों?” वह उसे घूरती हुई बोली, “तुम क्या मझे कैरेक्टरलेस समझते हो?”

“अच्छा चलो, तुम्हें ए.के. हंगल से मिलवा दूं।” संजय रीना को खुश करता हुआ बोला, “वह दिल्ली में अभी हैं।”

“मुझे नहीं मिलना।”

“क्यों?”

“बस, कह दिया कि नहीं मिलना!”

“पछताओगी।” संजय बोला, ”हंगल साहब से मिलना एक अनुभव से गुजरना है। वह स्टार नहीं न सही, पर अभिनेता जबरदस्त हैं। बिरले ही होते हैं ऐसे अभिनेता। और आदमी वह अपने अभिनेता से भी अच्छे हैं।”

“ठीक है।” वह उठती हुई बोली, “फिर कभी।” वह ठीक वैसे ही बोली जैसे लाइफबाय प्लस साबुन के विज्ञापन में पसीने की बदबू से उकताई लड़की बोलती है, “फिर कभी।” और जैसे दूसरे दृश्य में वह तरल और मादक बन जाती है कुछ-कुछ वही हाल रीना ने किया। वह संजय से लिपट गई।

मंडी हाउस के श्री राम सेंटर में एक ड्रामा फेस्टिवल के दौरान रीना जब संजय से पहली-पहली बार अलका के साथ मिली थी तो संजय ने उसे भर आंख देखा भी नहीं था। अलका की उपस्थिति मात्र से ही संजय की आंखें नत हो जाती थीं। तबसे जबसे अलका ने उसे पुरुष मानसिकता से संचालित होने वाला व्यक्ति बता कर राखी बांधने की मंशा जता दी थी।

उस रोज श्री राम सेंटर के गलियारे में रीना से बड़ा रूटीन सा परिचय इस तरह के संबंध में बदल जाएगा, संजय ने सोचा भी नहीं था। गिरीश कार्नाड लिखित हयबदन नाटक की समीक्षा में संजय ने स्त्री-पुरुष संबंधों को जो नाटक में इंगित और वर्णित था, उसकी एक नई व्याख्या, एक नया भाष्य भाखते हुए, उसे रेखांकित करते हुए कुछ दृष्टिगत बातें गौरतलब कराई थीं। रीना को वह सारी संभावनाएं और स्थापनाएं जो संजय ने बतौर बहस रेखांकित की थीं, इतनी भा गई थी कि दूसरे दिन वह संजय से ऐसे लपक कर मिली, जैसे वह उसे कितने वर्षों से मिलती रही हो। पर संजय को तो यह ठीक से याद नहीं था कि यह रीना वही रीना है जो कल मिली थी। अलका ने उसे छेड़ा, “क्या रजनीश सिर से उतर गए जो लड़कियों की नोटिस लेना भी श्रीमान भूल गए?” उसने जोड़ा, “कि कहीं समाधि अवस्था में तो नहीं पहुंच गए?” वह बोली, “अगर ऐसा है तो बड़ बुरा हुआ। क्या होगा देश का, क्या होगा बेचारे रजनीश का?” अलका लगातार चुटकी लेती जा रही थी। बात किसी तरह अजय ने संभाली, “क्यों परेशान करती हो बेचारे को।” पर रीना तो जैसे इन सारी चीजों से बेखबर अपनी ही धुन में थी, “पहली बार किसी प्ले की रिव्यू इस तरह पढ़ने को मिली। रिव्यू में इस तरह की इमैजिनेशंस, प्ले से भी आगे की बात करना आसान नहीं है।”

“पर यह तो अक्सर ऐसे ही रिव्यू लिखता है।” अजय ने हस्तक्षेप करते हुए कहा, “शायद पढ़ा नहीं तुमने?”

“नहीं, रिव्यूज तो मैं अक्सर पढ़ती हूं।” रीना बोल रही थी, “पर हमेशा एक ही ढर्रा। कि स्टोरी सच एंड सच, फला-फला ने ठीक काम किया, फला-फला ने सो एंड सो। और कुछ ऐसी ही कील कांटे वाली बातें गोया रिव्यू नहीं किसी मशीन का नट बोल्ट कस रहे हों।” वह कंधे उचकाती हुई बोली, “बिलकुल रूटीन-रूटीन सी रिव्यू। बासी बासी बातें।” वह संजय की ओर मुखातिब होती हुई बोली, “पर आपकी रिव्यू ने तो सोचने पर मजबूर कर दिया।”

वह चहकी, “बाई गाड इस तरह की रिव्यू अब तक तो पढ़ने को नहीं मिली थी।”

“ज्यादा तारीफ मत करो।” अजय रीना से बोला, “इससे भी अच्छी रिव्यू भारद्वाज ने लिखी है।”

“आप अंग्रेजी अखबार पढ़ती हैं?” संजय ने रीना से पूछा।

“आफकोर्स!”

“तो अंग्रेजी अखबार पढ़ना बंद कर दीजिए।” संजय बोला, “अगर कचरा रिव्यू पढ़ने से बचना चाहती हों तो।”

“अच्छा?” रीना सोच में पड़ गई।

“क्योंकि एक प्रसिद्ध चित्रकार का कहना है कि सपने हमेशा मातृभाषा में आते हैं।” संजय ने जोड़ा, “और आप लाख कंधे उचकाएं, अंग्रेजी में गिटपिटाएं, मैं समझता हूं आपकी मां हिंदी बोलती होंगी। मतलब साफ है कि आप की मातृभाषा हिंदी होगी।” संजय ने कहा, “अगर हिंदी न सही, कोई और भाषा सही, जो भी हो, आप वह भाषा पढ़िए, बंगला, पंजाबी, असमी, तेलगु जो भी हो। वह पढ़िए।” उसने लगभग चेताते हुए कहा, “पर अंग्रेजी छोड़ दीजिए।”

“इसकी बातों में मत आना।” अजय बोला, “यह तो लोहियावादी है।”

“सवाल सिर्फ लोहियावादी का नहीं है यहां।” संजय तुनका, “सवाल मातृभाषा का है, सवाल हिंदी का है, सवाल अपनी भाषा के प्रति सम्मान का है, अपने आत्म सम्मान का है, सवाल अंग्रजी की गुलामी से छुट्टी पाने का है। क्योंकि अंग्रेजी में न तो कोई संभावना है, न कोई सपने हैं हमारे लिए।”

“अच्छा चलो, रीना पर तुम्हारी इन बातों का इंप्रेशन नहीं जमने वाला।” अजय संजय को खींचते हुए बोला, “नाटक की घंटी बज गई है।”

“सॉरी!” कहते हुए संजय ने सिगरेट सुलगा ली थी।

नाटक के बाद रीना फिर संजय की ओर लपकी। ऐसे हिलमिल के बात करने लगी कि संजय खुद भी मुश्किल में आ गया था। दो ही संक्षिप्त मुलाकातों में कोई सुंदर सी लड़की किसी फंटूश के गले पड़ जाए, यह उसके लिए पहला अनुभव था। फिल्मों में तो ऐसे फ्रेम उसने देखे थे, पर खुद के साथ यह फिल्मी फ्रेम घटित होते हुए वह पहली बार महसूस कर रहा था। उसके भीतर एक अजीब-सी हलचल, एक अजीब-सी गुदगुदी हो रही थी, अजीब-सी रासायनिक क्रिया हो रही थी, उसके भीतर ही भीतर। यह क्या हो रहा था।?

तुरंत-तुरंत कोई निष्कर्ष वह नहीं निकाल पा रहा था।

इस सबके बावजूद संजय फिर संजय था। रीना की मादक और उत्सुक उपस्थिति उसे बहका तो रही थी पर अलका की उपस्थिति उसे ऊहापोह में डाले हुए थी। वह एक अजीब से संकोच में सकुचाया, रीना के खिंचाव में भकुआया, किसी बंद दरवाजे जैसा चुप-चुप था पर रीना जैसे अपने भीतर बाहर की सारी बात, “यू नो, यू नो” कह-कह कर खोल कर रख देना चाहती थी। अजय जैसे संजय को चिढ़ाते हुए रीना से बोला, “बशीर बद्र का वह शेर सुना है कि, कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से। तो तुम इतना इसके गले में मत पड़ो।”

“स्साले।” संजय अजय को खींचता हआ उसके कान में धीरे-से बुदबुदाया, “मेरी लाइन काटता है।”

“तुम क्या गंदे आदमी का शेर लेकर बैठ गए?” अजय कुछ कहता, उससे पहले ही अलका अपना पुराना राग लेकर बैठ गई।

“क्यों प्रोग्रेसिव शायर हैं बशीर बद्र तो।” रीना बोली, “और उनके शेर भी एक से एक होते हैं।”

“जैसे बबर शेर।” संजय ने टांट कर रीना की बात पूरी की।

“एक्जेक्टली।” रीना चहकी।

“पर वो आदमी मुझे पसंद नहीं।” अलका बोली, “जो आदमी किसी औरत के लिए अपने बीवी-बच्चों को यतीम बना कर सड़क पर भीख मांगने के लिए छोड़ सकता है। वह आदमी, अच्छा आदमी कैसे हो सकता है।” वह बिफरी, “और जो अच्छा आदमी नहीं हो सकता है वह अच्छी शायरी कैसे कर सकता है, अच्छा शायर कैसे हो सकता है? प्रोग्रेसिव तो कतई नहीं।” उसने जोड़ा, “ऐसे लोगों का तो सोशली बायकाट होना चाहिए।”

“क्या अलका तुम भी?” अजय उसे गुरेरता हुआ बोला।

“देखो अलका, तुम चाहे जो कहो, बशीर बद्र का शायरी में जवाब है नहीं।” संजय भावुक होता हुआ बोला, “फिराक और फैज के बाद इतने बोलते हुए शेर, जिंदगी के बदलते हुए तेवर को शायरी में ढालने का काम जिस शऊर, संवेदनशीलता और शिद्दत से बशीर बद्र और हां, दुष्यंत कुमार ने किया है, मुझे कोई और नहीं दिखता।” संजय बोलता रहा, “रही बात निजी जिंदगी की, तो होगी कोई बात। क्या पता कहां और किस पक्ष से गलती हुई हो। और क्या पता, ‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, वरना यूं कोई बेवफा नहीं होता।’ जैसा शेर इन्हीं स्थितियों में लिखा गया हो।”

“जो भी हो, पर मैं ऐसे लोगों को माफ नहीं कर सकती।” अलका ने माहौल काफी गंभीर कर दिया था।

“अच्छा, मैं चलूं?” संजय बोला, “मुझे प्रेस भी जाना है।” अलका की ओर घूरते हुए उसने कहा, “यह बहस फिर कभी।”

“फिर कभी!” वह ऐंठी, “आप घर भी आते हो कभी?”

“आऊंगा, आऊंगा।” संजय चलने लगा।

“मैं छोड़ दूं आपको?” रीना फिर लपक कर बोली।

“नो थैंक्यू! मैं चला जाऊंगा।” संजय हाथ जोड़ते हुए बोला, “आप क्यों तकलीफ करती हैं।”

“नहीं, तकलीफ की कोई बात नहीं।” रीना बोली, “बहादुर शाह जफर मार्ग पर ही तो जाएंगे आप?”

“जाहिर है।”

“तो आइए।” रीना अपनी फिएट का फाटक खोलती हुई बोली, “दो मिनट में पहुंचाती हूं।”

“सुनो!” संजय रीना की कार में बैठने लगा तो अजय धीरे से उसके कान में फुसफुसाया, “फिसल मत जाना राजा जी!”

“चुप्प स्साले!” संजय बुदबुदाया और रीना से झटके से बोला, “चलिए!”

“ओह, श्योर।” कहते हुए रीना ने कार स्टार्ट कर दी।

रास्ते में भी संजय शर्माया-शर्माया कनखियों से रीना को देख लेता। रीना की मादक देह से बिलकुल सनका देने वाले सेंट की खुशबू आ रही थी। पर संजय का मन नहीं डोला। क्योंकि रीना, अलका की सहेली थी। और संजय के बारे में अलका की ‘पुरुष मानसिकता’ वाली साइक्लॉजिकली एनालिसिस संजय की सहज मानसिकता पर भी सांकल चढ़ाए खड़ी रहती। पर रीना पर कोई सांकल नहीं चढ़ी थी। वह इस छोटे से रास्ते में, “कहां रहते हैं, कहां के हैं, घर में कौन-कौन है, दिल्ली में कब से हैं?” जैसे ढेरों सवालों में लगी रही। चलते-चलते उसने अपने घर का पता बताया और कहा, “कभी फुर्सत से आइएगा। इट्स माइ प्लेजर।” और “बाय-बाय” कह कर चली गई।

पर वह नहीं गया। रीना के घर।

कुछ दिन बाद अलका का फोन आया। उसने घर बड़े आग्रह से बुलाया।

“बात क्या है?” पूछने पर वह बोली, “एक खुशी सेलीब्रेट करनी है।”

“क्या हो गया?” पूछा संजय ने।

“आना, खुद ही पता चल जाएगा।” कह कर उसने फोन रख दिया।

संजय उस शाम जल्दी से कामकाज निपटा कर जब अलका-अजय के घर पहुंचा तो देखा उपेंद्र सूद, वीना वगैरह एन.एस.डी.एन. तो थे ही रीना भी थी। पता चला टी.वी. से एक डांस कंसायनमेंट अलका को मिली थी, रीना के पापा के सौजन्य से, वही सेलीब्रेट हो रहा था।

संजय बहुत दिनों बाद अलका-अजय के घर आया था। पहुंचते ही उसने गिलास, बर्फ और बोतल मांगी। अजय पहले ही से शुरू था। बना बनाया पेग लेकर संजय को थमा दिया। संजय ने मना कर दिया, “जूठी नहीं पीऊंगा।”

“साले अभी शुरू भी नहीं हुआ। और चढ़ गई?” अजय बोला।

“देखो, मैं अपना पेग खुद बनाऊंगा।” संजय बोला, “एंड नो फरदर डिसकसन।”

“अंग्रेजी बोल रहा है लोहियाइट। दे दो भाई।” अजय उपेंद्र से बोला।

संजय अभी पहला पेग पर ही था और रीना पर बराबर ध्यान दिए था। पर शो यही कर रहा था कि उसने उसकी नोटिस नहीं ली है। अभी कुछ इधर उधर की हांक रहा था कि उपेंद्र पेशाब करने चला गया और अजय फ्रिज से पानी निकालने लगा। इसी बीच रीना संजय के पास आई। और लगभग सट कर बैठती हुई धीरे से बोली, “आप आए नहीं?” रुकी और बोली, “नाराज हैं क्या?”

“नहीं तो।” वह रीना की देह से सेंट सूंघता हुआ बोला, “सॉरी आ नहीं पाया।” उसने जोड़ा, “पर आऊंगा।”

“कब?” कहते हुए रीना उठने लगी।

“जल्दी ही।”

“मैं इंतजार करूंगी।” वह आंखों में अजीब-सा इसरार उडेलती हुई बोली, “बहुत-सी बातें करनी हैं।” कह कर वह वहां से उठ गई थी।

“क्या बातें हो रही थी?” अजय पानी की बोतल रखता हुआ बोला।

“कुछ नहीं बस यूं ही।”

“वही रिव्यू, वही फिसलन, वही फसाना?” अजय ऐसे बोल रहा था जैसे किसी नाटक का संवाद बोल रहा हो।

संजय अभी दूसरे पेग पर था कि उसने देखा रीना जा रही थी। उसने गौर किया रीना को उसकी यह मयकशी अच्छी नहीं लग रही थी। और वह जैसे उकता सी गई थी। उसे जाते देख संजय बोला, “जा रही हैं?”

“हां।” वह संक्षिप्त सा बोली।

“आज हमें घर नहीं छोड़ेंगी?”

“चलिए, अभी छोड़ देती हूं।” वह चहकी ऐसे जैसे उसकी ताजगी लौट आई हो।

“अभी नहीं, जरा देर रुकिए तो चलूं।”

“सॉरी, मुझे जल्दी घर पहुंचना है।”

“रीना तुम जाओ।” अलका किचन से हाथ पोंछती हुई आई, “इन शराबियों के चक्कर में मत पड़ो। नहीं तो रात भर तुम्हें घुमाते रहेंगे।”

“ओ.के.।” कहती हुई रीना अलका के घर से ऐसे भागी जैसे वह दंगाइयों से बच कर भाग रही हो।

दूसरे दिन सचमुच संजय भरी दुपहरिया में रीना के घर पहुंच गया, पंडारा रोड पर।

उसने बड़ी खातिरदारी की। खूब खिलाया पिलाया। अपने घर में भी वह मादक अदाएं बिखेरती रही।

अमूमन नौकर चाकर और एक बूढ़ी दाई के अलावा कोई उसके घर में नहीं होता था। उसके पिता कभी होते, कभी नहीं होते। ज्यादातर वह अपने राजनीतिक दौरों पर रहते। संजय जब-तब जाने लगा। उसने देखा रीना कभी-कभी जान बूझ कर आते-आते उससे सट जाती, पर अभिनय ऐसा करती जैसे वह अनायास ही छू गया हो। अनायास ही सही, संजय की देह में करंट सा दौड़ जाता। पर उसकी पूरी देह में जैसे जैसे तनाव भर जाता। उसका चेहरा बिगड़ जाता। पर मारे संकोच के वह चुप ही रहता। फिल्म, थिएटर, राजनीति, कला और दुनिया की तमाम बातें वह बतियाता रहता। पर उसके भीतर क्या घट रहा है, कौन सा ज्वालामुखी भीतर ही भीतर दहक रहा है, वह उसके बारे में नहीं बतिया पाता। वह सोचता, क्या पता रीना खुले दिमाग की लड़की है, खुद ही प्रपोज करे! पर ऐसा हो नहीं रहा था। हो यह रहा था कि जब कभी रीना की देह से वह छू जाता उसकी देह दहकने लगती। एक अजीब सी उथल-पुथल मच जाती, भीतर ही भीतर। ऐसे ही किसी क्षण में एकांत पाकर उसने रीना से कह दिया, “अगर बुरा न मानिए तो एक बात कहूं।” संजय ने यह बात इतने संकोच, इतनी शिद्दत और नरमी से कही थी कि रीना शायद उसकी बात का अर्थ समझ गई थी या क्या पता नहीं, पर मुंह से वह बोली कुछ नहीं, आंखों ही आंखों में सिर हिला कर होंठ गोल कर मानो पूछा कि, “क्या बात है?”

संजय चुप रहा। तो वह “ऊं” करके फुसफुसाई। संजय कहना चाहता था कि आपके साथ सोना चाहता हूं। पर उसके मुंह से जो अस्फुट सा कुछ निकला यह था, “आपको चूमना चाहता हूं।”

“बस!” कह कर उसने संजय को खुद ही इतने कस कर चूमा कि कुछ क्षण के लिए स्तब्ध रह गया। फिर तो सहज ही वह सब कुछ घट गया जो संजय चाहता था। और इतना जल्दी घट गया कि वह कुछ समझ ही नहीं पाया। उसने पाया कि उससे ज्यादा तो रीना आतुर थी उसके साथ संभोग के लिए। पर नारी संकोच उसे विवश किए हुए था। और वह चाहती थी की पहल संजय की ओर से ही हो। ऐसा उसने बाद में बताया कि, “पर तुम वक्त इतना लंबा खींचते जा रहे थे कि उस दिन या किसी और दिन तुम नहीं प्रपोज करते तो मैं ही प्रपोज कर देती।” वह बोली, “तुम्हारी मासूमियत पर कभी तरस आता तो कभी गुस्सा।”

हां, वह दोनों आप-आप से अब तुम पर आ गए थे।

पर यहां चेतना अभी आप-आप पर ही थी। जाने यह लखनऊ की नफासत थी, उसका सलीका था या वह उससे खास दूरी बनाए रखना चाहती थी। चेतना के साथ-साथ लखनऊ में घूमते हुए संजय को एक दिक्कत यह महसूस होती कि लखनऊ दिल्ली नहीं था। दिल्ली में जहां-जहां को पहचानने वाले लोग नहीं मिलते। पर लखनऊ में कदम-कदम पर पहचानने वाले “भाई साहब, भाई साहब” कहने वाले मिल जाते। दिल्ली में भारी आबादी के बावजूद निर्जन और एकांत जगहों की लंबी फेहरिस्त थी। पर लखनऊ में निर्जन और एकांत जगहें थीं ही नहीं।

बुद्धा पार्क, नींबू पार्क, शहीद स्मारक, रेजीडेंसी, इमामबाड़ा से लगायत, चिड़ियाघर, कुकरैल तक वही भीड़ वही जान पहचान के चेहरे चहुं ओर घूमते मिल जाते। लखनऊ का छोटा शहर होना संजय को साल जाता। आखिर कहां बैठे वह चेतना को लेकर? उसे रह-रह दिल्ली, रीना, नीला और साधना की याद आ जाती। ऐसा भी नहीं था कि लखनऊ में इन जगहों पर जोड़े नहीं घूमते थे, बल्कि वह देखता चिड़ियाघर में तो सुबह-सुबह दस बजे ही स्कूली लड़कियां ड्रेस पहने ही अपने साथियों के साथ आ जातीं, दफ्तर जाने वाली लड़कियां दफ्तर बाद में जातीं, पहले वह अपने प्रेमी से मिलतीं। पर हर कोई उन्हें पहचानने वाला नहीं होता। क्योंकि उनकी पहचान नहीं थी। पर संजय का सार्वजनिक जीवन जीने की एक पहचान थी। पुलिस से लेकर, मिनिस्टर्स, तक उसे पहचानते थे। चेतना के साथ रास्ते चलते तो कोई बात नहीं थी, पर किसी ऐसी जगह वह उसके साथ बैठता तो झेंप आती। ऐसे ही एक दिन नींबू पार्क में बैठे-बैठे संजय ने सोचा कि वह अब और समय खराब करने के बजाय चेतना को सीधे प्रपोज कर दे। उसने आंखों में कुछ वैसा ही भाव भरा और बोला, “तुमसे एक बात करनी है।”

“पर मैं अब चलना चाहती हूं।”

“क्यों?”

“क्योंकि अंधेरा हो रहा है।”

“क्या अंधेरे से डर लगता है?”

“नहीं।”

“तो क्या मुझसे डर लग रहा है?”

“नहीं।”

“तो?”

“बस चलिए।”

“चलो।” संजय थोड़ा नाराज होता हुआ उठ खड़ा हुआ।

“नाराज क्यों हो रहे हैं?”

“क्यों, नाराज क्यों होऊंगा?”

“अच्छा बैठिए।” वह फिर से बैठती हुई बोली।

“नहीं, अब चलो।” संजय बैठा नहीं।

“कुछ कहना चाहते थे आप?”

“नहीं।”

“कुछ कहना तो चाहते थे आप।” वह मायूस होती हुई, मनाती हुई सी बोली।

“अब मूड खराब मत करो, चलो।” संजय का मूड सचमुच खराब हो रहा था।

वह उठ खड़ी हुई और पहली बार संजय के आगे-आगे चलने लगी। बाहर आकर वह स्कूटर पर नहीं बैठी। संजय ने कहा भी कि, “बैठो।”

“नहीं, मैं चली जाऊंगी।” उसने जोड़ा, “आप जाइए”

“ड्रामा मत करो, चलो बैठो।” थोड़ी-सा ना-नुकुर के बाद वह बैठ गई। पर रास्ते भर दोनों चुप रहे।

संजय उस शाम दफ्तर नहीं गया।

दूसरे दिन दफ्तर गया तो उसकी एक खबर पर हंगामा मचा हुआ था। वह खबर जो संजय एक दिन पहले दे गया था। खबर एक अधिकारी के बारे में थी। जाते ही रिपोर्टर्स मीटिंग में संजय की खबर ली गई कि, “यह खबर कैसे लिखी आपने?” पूछा सरोज जी ने।

“खबर थी इसलिए लिखी।”

“पर इस तरह की खबर छपने की परंपरा नहीं रही है हमारे अखबार में।” सरोज जी दहाड़े।

“खबर क्या होती है, आप जानते भी हैं?” संजय भी उखड़ गया। पर उसने गौर किया तो त्रिपाठी वहां बैठे-बैठे, मंद-मंद मुसकुरा रहा था। वह समझ गया यह सारी खुराफात त्रिपाठी की थी। सरोज जी को उसी ने “पंप” किया हुआ था। यह तो वह जान गया। पर सरोज जी के आगे वह घुटने टेकने को तैयार नहीं था। वह डटा रहा और दुबारा तिलमिलाया, “खबर की समझ भी है आपको?”

“नहीं।” उसने जोड़ा, “हमको क्या गरज पड़ी है।” वह तंज करते हुए बोला, “जिंदगी बीत गई आपकी और खबर नहीं समझ पाए अब तक तो, अब मैं क्या समझाऊंगा।”

“तो अब अइसी खबर नहीं छपेगी हमारे अखबार में।” सरोज जी का “हमारे” शब्द पर जोर ज्यादा था। सरोज जी को कभी इस तरह मोर्चा लेते नहीं देखा था संजय ने। पर आज उनका मोर्चा लेना संजय को विस्मय में डाल रहा था। तो उसने सोचा सरोज जी की भांग सुबह-सुबह बोलने लगी है। सरोज जी लगातार उच्चारते रहे, “हमारे अखबार में ऐसा नहीं छपेगा। ई सब अब नहीं चलेगा हियां।”

“क्या पहाड़ टूट पड़ा है?” संजय सरोज जी पर उबल पड़ा, “आखिर क्या गड़बड़ है उस खबर में।” वह रुका और सरोज जी को समझाते हुए बोला, “हफ्ते भर हो गया उस अधिकारी का ट्रांसफर हुए और उसे चार्ज नहीं दिया जा रहा है। क्योंकि अधिकारियों की एक लॉबी नहीं चाहती कि वह वहां चार्ज ले। वह लॉबी अपनी पसंद का कोई अधिकारी उसकी कुर्सी पर बैठाना चाहती है। और एक सीनियर आई.ए.एस. अफसर जो इन दिनों लंदन में है वह लंदन से ही इस लॉबी का नेतृत्व कर रहा है।” संजय फिर रुका और बोला, “बस यही तो है खबर में?” उसने जैसे पूछा, “तो इसमें गड़बड़ क्या है? गलत क्या है?”

“ये ठाकुर लॉबी का क्या मतलब है?” सरोज जी जैसे सुलग गए।

“अब ठाकुर लॉबी ऐसा कर रही है तो लिखने में क्या हर्ज है?”

“हर्ज है!” सरोज जी की आंखों में जैसे आग छलकने लगी, “आपका ई ब्राह्मणवाद नहीं चलेगा हियां।” सरोज जी बोलते-बोलते हांफने लगे, “अब ई सब नहीं चलेगा हमारे अखबार में।”

“देखिए सरोज जी, यहां सवाल ब्राह्मणवाद या ठाकुरवाद का नहीं, नियम और कानून का है।” उसने जोड़ा, “सरकार का एक आदेश है और उसका अनुपालन हफ्ते भर से नहीं हो रहा है तो यह खबर है।” संजय उत्तेजित हो गया, “रही बात ब्राह्मणवाद, ठाकुरवाद की तो यह सब घटिया और सतही बातें आप ही कह सकते हैं, मैं इन सब चीजों को नहीं मान पाता, न ही मुझे इस तरह की घटिया बातें पसंद हैं।”

“पर अब मैं यह सब नहीं होने दूंगा।” सरोज जी हांफते जा रहे थे, “देखता हूं कैसे लिखते हैं अइसी खबरें आप?”

“देखिए, आप हमसे ऐसी ऊटपटांग बातें मत करिए। खबर संपादक को मैंने दी थी, संपादक ने ही उसे पास किया है, आप संपादक से ही इस बारे में बात करिए तो बेहतर होगा।” संजय सरोज जी को इंगित करता हुआ बोला, “आज का जो एसाइनमेंट हो तो बताइए।”

“कुछ नहीं है।” सरोज जी तमतमाए।

संजय मीटिंग से उठ कर चला गया। उसका मूड बिलकुल आफ हो गया था। वह वापस घर जाकर सो गया। शाम को लोक लेखा समिति की रिपोर्ट पर एक खबर “ठीक-ठीक” करके वह दफ्तर पहुंचा तो जो खबर उसे मिली, सुनकर वह सन्न रह गया।

उसके पसंदीदा संपादक नरेंद्र जी का इस्तीफा हो गया था और सरोज जी कार्यवाहक संपादक बना दिए गए थे। आज सुबह सरोज जी का बार-बार यह कहना कि, “अब ई सब नहीं चलेगा हमारे अखबार में” का मर्म संजय की समझ में अब आ रहा था।

संजय का मन हुआ कि वह भी इस्तीफा दे दे। छोड़ दे लखनऊ चला जाए वापस दिल्ली।

वह दिल्ली, जिसका दंश उसे रह-रह डाहता है।

संजय ने अपनी सीट पर जा कर चपरासी से एक गिलास पानी मांगा। पानी पिया और एक लाइन का “निजी कारणों से इस्तीफा दे रहा हूं” लिखा और लेकर उठ खड़ा हुआ।

“ई काव कर रहे हो?” चपरासी ने संज की बांह पकड़ते हुए पूछा। संजय को चपरासी द्वारा अचानक इस तरह बांह पकड़ना बुरा लगा। वह उसकी ओर कुछ कहने के लिए पलटा, तो देखा चपरासी इमोशनल हो रहा था। अपनी मूंछे ठीक करता हुआ फिर बोला, “ई काव कर रहे हो?” संजय को उस चपरासी पर दया आ गई और उसने देखा कि वह चपरासी भी उसे दया भाव से देख रहा था। बल्कि कहीं ज्यादा कातर ढंग से। दया भाव से देखते-देखते क्षण ही भर में उसने संजय को जैसे काबू कर लिया और उसके हाथ से इस्तीफे वाला कागज खींच कर फाड़ते हुए बोला, “ई बेवकूफी कब्बो करिहो ना। हम बहुत पत्रकारों को देखे हैं हियां। अंग्रेजी को भी। बड़ों बड़ों की शेखी निकरते देखी है।” अपनी मूंछ ठीक करते हुए वह बोला, “मन जियादा खराब हो तो चुपचाप घर जाओ। दूइ चार रोज की छुट्टी ले लो। फिर आओ। पर ई बेवकूफी कब्बो नाई करिहो। नाहीं बड़ा पछितइहो।”

“ठीक है फूल सिंह।” कह कर संजय ने चपरासी के कंधे पर हाथ रख कर जैसे उसे दिलासा दिया कि वह इस्तीफा नहीं देगा। और जेब में सिगरेट तलाशने लगा जो जेब में नहीं थी।

“सिगरेट लावें का?” उसे सिगरेट ढूंढ़ते देख फूल सिंह ने पूछा। संजय चुप रहा तो फूल सिंह ने फिर दुहरा कर पूछा, “सिगरेट लावें का?”

“नाहीं फूल सिंह रहने दो।” संजय अपने बालों को दोनों हाथों भींचता हुआ बोला, “आज तो तुम अपनी बीड़ी ही पिला दो।”

“लेव पियो।” फूल सिंह खुश होते हुए ऐसे बोला जैसे उसने पानीपत की लड़ाई जीत ली हो। संजय की बीड़ी सुलगाता हुआ वह बोला, “तुम्हारे बीवी बच्चे हैं। एह तर गुस्सा में फइसला करिहो त का होई।” और जैसे वह खुद से ही पूछता हुआ बोला, “हयं?” उसने जोड़ा, “का करते भला?”

“दिल्ली चले जाएंगे।” संजय कुर्सी पर पीठ टिकाते हुए बोला।

“का हुआं तुरंत नौकरी धरी है, पलेट में सजा के?”

“क्यों?” संजय ने उससे कहा, “आखिर मैं दिल्ली से ही आया हूं।”

“एतने जो भली होती दिल्ली तो तुम आते काहें हुआं से?”

“हां, सो तो है।” कह कर संजय बीड़ी का कश लेने चला तो देखा कि बीड़ी बुझ गई है। बीड़ी फेंक कर जेब से पैसा निकाल कर फूल सिंह से संजय ने कहा, “जाओ सिगरेट ले ही आओ।”

“हम पहिलवै कहत रहे।”

कहता हुआ फूल सिंह चला गया। तो संजय ने सोचा कि एक चपरासी भी पत्रकारिता की विसंगतियों को किस तल्खी से समझता है। वह सोचने लगा कि अगर फूल सिंह ने अभी न रोका होता तो वह आज इस्तीफा तो दे ही देता। और जैसी कि सुबह सरोज जी के चिकचिक हुई तो इस्तीफा मंजूर भी हो जाता। तब भला वह क्या करता?

दिल्ली वापस जाता?

दिल्ली में ही कौन तुरंत नौकरी मिल जाती। बाद में भी मिलती कि नहीं, क्या पता? उसने सोचा। क्या दिल्ली में बेकार पत्रकारों की लंबी फौज नहीं है? और वह भी हिंदी में! वह खुद ही कहता फिरता रहता कि दिल्ली में हिंदी पत्रकारिता की स्थिति बिलकुल अछूतों जैसी है, हरिजनों जैसी है। जैसे हरिजनों को संवैधानिक आरक्षण तो है पर उनका फिर भी कल्याण नहीं है, ठीक वैसे ही हिंदी देश की राजभाषा तो है पर देश की राजधानी दिल्ली में हिंदी का कोई नामलेवा नहीं है। लोग या तो पंजाबी बोलते हैं या फिर अंग्रेजी। रही बात हिंदी पत्रकारिता की तो बस उसके भगवान ही मालिक हैं। वह जब यूनिवर्सिटी में पढ़ता था तो अपने छोटे से शहर में पत्रकारों को अंग्रेजी डिक्शनरियों में सिर खपाते देखता तो उसे उनसे घिन आती। पर दिल्ली में तो और बुरी हालत थी। काम हिंदी अखबार में करना, और अंग्रेजी जानना, अंग्रेजी से हिंदी में टीपने की कला जानना पहली शर्त होती। चलिए झेला। पर अंग्रेजी की जूठन चाटने से फुर्सत यही नहीं मिलती थी। दिक्कत तब होती जब दिल्ली में हिंदी पत्रकारों की जब तक क्या हरदम ही हेठी होती रहती। हालत यह कि दिल्ली में पोलिटिकल सर्किल हो या ब्यूरोक्रेटिक वह सबसे पहले फारेन प्रेस को तरहीज देते हैं और उनके ही सामने दुम हिलाते रहते हैं। टाइम, न्यूजवीक, आब्जर्वर, बी.बी.सी. हो या खलीज टाइम्स, उनकी दुम सिर्फ अपने जिक्र भर के लिए ही सही हिलती रहती है। फिर दूसरे नंबर पर टेलीविजन वाले यानी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। भले चौखटा न दिखे पर कैमरे के सामने बैठकर “रिकार्डिंग” कराने का सुख ही कुछ और है। चैनलों की बाढ़ ने इस काम में ऐसा इजाफा किया है कि मत पूछिए। खैर इस तरह तीसरे नंबर पर आता है इंडियन प्रेस। और इंडियन प्रेस में भी जाहिर है कि अव्वल नंबर पर अंग्रेजी अखबार और उनके पत्रकार ही होते हैं। हिंदी अखबार और उनके पत्रकार अपना नंबर आते-आते इतनी दयनीय और कारुणिक स्थिति को प्राप्त हो जाते हैं कि कभी-कभी सोच कर भी रुलाई आ जाती है।

संजय को याद है कि एक बार इंदिरा गांधी की प्रेस कांफ्रेंस में बड़े जुगाड़, मान मनौव्वल और लगभग अपमानित होने की सारी प्रक्रियाओं से गुजरता हुआ वह पहुंचा और अपमानित होने की सारी कड़ियां लगभग भुलाता हुआ सीना तान कर जब वह अपनी निश्चित कुर्सी पर बैठा था तो एक अजीब से गुरूर से वह भर उठा था। पर जब प्रेस कांफ्रेंस शुरू हुई तो उसे अजीब सी हताशा महसूस हुई। उसके सीने में जलन होने लगी। हलक सूखने लगा। वह सारी प्रक्रिया ही इतनी अपमानजनक थी कि उसे एक बार लगा कि उसका दम घुट जाएगा। पर उसने जब अलग-बगल बैठे पत्रकारों पर नजर दौड़ाई तो देखा सब के सब सीना तान कर बैठे हैं। तो उसने भी पानी पीकर सूखते हलक को तर किया और सीना फुला कर बैठ गया। सबका नंबर आता रहा था। पर उसका नंबर नहीं आ रहा था। सभी सवाल पर सवाल किए जा रहे थे। दो सवाल संजय की सूची से पूछे जा चुके थे। हर सवाल के बाद वह सोचता अबकी अगर उसका नंबर आया तो फलां कविता पढ़ेगा। पर कवि सम्मेलनों में भी उसका नंबर जल्दी नहीं आता था। यहां भी नहीं आ रहा था। वैसे तो उसने ढेरों प्रेस कांफ्रेंस अटेंड की थी। और नेताओं को बात-बात में घेर लेता। पर यह पी.एम. की प्रेस कांफ्रेंस पहली बार थी। वह बैठा-बैठा इधर-उधर की बातें नोट करता रहा। और जब कोई पौन घंटे बाद उसके सवाल पूछने का नंबर आया तो वह जो बड़ी तैयारी से अंग्रेजी में सवाल लिख कर लाया था, उस सूची को दरकिनार कर गया। जैसे उसका स्वाभिमान भीतर से उस पर हमला कर बैठा, जैसे उसका हिंदी जीवी होना, उसे चाबुक सा मारता हुआ उसके भीतर हिलोरें मारने लगा, हिंदी उसकी जबान पर सारी रटी अंग्रेजी को जैसे लात मार कर चढ़ गई और उसने हिंदी में ही लगातार एक ही जगह दो सवाल पूछ डाले। सवाल पूछते समय उसकी नजरें सीधे इंदिरा गांधी पर टिकी थीं। उसने देखा कि इंदिरा गांधी को उसका हिंदी में सवाल पूछना नहीं सुहाया था और उन्होंने उसे हिकारत भरी नजरों से घूरते हुए सर्रे से अंग्रेजी में जवाब दे दिया था। दूसरे सवाल का जवाब भी जब वह अंग्रेजी में देने लगीं तो संजय की हिंदी, हिंदी स्वाभिमान उसके भीतर जैसे तूफान मचा गया, वह फिर से उठा और बड़ी विनम्रता से बोला “प्रधानमंत्री जी, मैंने सवाल हिंदी में किया था, जवाब भी हिंदी में दीजिए।” पर इंदिरा गांधी उसकी विनती पर गौर किए बिना अंग्रेजी में जवाब देती रहीं। संजय ने उन्हें फिर टोका कि, “हिंदी में।” और दो तीन बार टोका, “हिंदी में।” पर इंदिरा गांधी को जैसे यह सब कुछ सुनाई देते हुए भी सुनाई नहीं दे रहा था। वह उसे अनसुना करते हुए बोलती रहीं। पर इसी बीच दो तीन और हिंदी पत्रकारों का जमीर जाग गया। वह भी खड़े हो गए और “प्रधानमंत्री जी, हिंदी में” की विनती कर बैठे। तब कहीं जाकर इंदिरा गांधी ने बड़े-बड़े शीशों वाला चश्मा उतारा, उसकी कमानी होंठों से लगाई और हिंदी में बोलीं, “हिंदी में जवाब इसलिए नहीं दे रही हूं कि यहां फारेन प्रेस के लोग भी बैठे हैं।” बस वह चश्मा आंखों पर लगा फिर अंग्रेजी में चालू हो गईं। संजय ने देखा कि प्रधानमंत्री का सूचना सलाहकार उसे खा जाने वाली नजरों से घूर रहा था। संजय बुरी तरह फ्यूज हो गया। वह भीतर ही भीतर सुलग कर रह गया। उसकी यह सुलगन शेयर करने के लिए सिगरेट भी उसके पास नहीं था। बाहर सिक्योरिटी वालों ने रखवा ली थी। माचिस सहित। वह पूरी प्रेस कांफ्रेंस में भस्म होता रहा, अफनाता रहा और पछताता रहा कि क्या करने वह यहां आ गया। हिंदी पत्रकारिता के बेमानी होने का पहला अहसास उसे तभी हुआ था।

प्रेस कांफ्रेंस खत्म होने के बाद भारी-भारी कदमों से वह उस एयरकंडीशंड हाल से भीतर ही भीतर खौलता हुआ निकल रहा था तो उसने गौर किया कि सोकाल्ड इंडियन प्रेस के लोग उसे ऐसे घूरते चले जा रहे थे जैसे उसने कोई बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो। तो कुछ उसे देख कर ऐसे मंद-मंद मुसकुरा कर मजे ले रहे थे जैसे वह आदमी नहीं मदारी का बंदर हो। एक हिंदी पत्रकार ने उसका हाथ पकड़ते हुए चुटकी ली, “जब अंग्रेजी नहीं आती तो यहां आने की क्या जरूरत थी?” और कंधे उचकाता हुआ आगे बढ़ गया। एक अंग्रेजी अखबार का पत्रकार जो यू.पी. का था और संजय को जानता था सो उसने उसकी हालत पर सहानुभूति जताई, “बात तो तुमने ठीक कही थी पर कुछ वैसे ही जैसे किसी मुजरे की महफिल में कोई भजन की फरमाइश कर बैठे।” संजय के उदास मन को यह उपमा अच्छी लगी थी पर वह उदास इतना ज्यादा था कि तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पाया। तभी उसने देखा, उसके ही संस्थान की वह अंग्रेजी पत्रकार जो उसके साथ ही आई थी, उसे देख नथूने फुला कर, गाल चिपका कर ऐसे आगे बढ़ गई जैसे किसी ने उसकी नाक काट ली हो। जैसे किसी ने उसका शील भंग कर दिया हो। संजय ने सोचा क्या हिंदी बोलना सचमुच इतना बड़ा अपराध है? वह यह सोच ही रहा था कि पीछे से कस कर किसी ने उसका कंधा दबाया। वह एक पल को डर गया कि शायद प्रधानमंत्री की सिक्योरिटी वाले पकड़ने आए हों। उसने पलट कर दहशत भरी नजरों से देखा। अपना ताम-झाम लिए मुसकुराते हुए बी.बी.सी. के मार्क टुली खड़े थे। अपनी ब्रिटिश लहजे वाली हिंदी में ही कंधे उचकाते हुए वह बोले, “हमको तो हिंदी आटी है।” मार्क टुली के “हमको तो हिंदी आटी है” कहने की लय ऐसी थी कि वह अपना हिंदी ज्ञान बताने के बहाने इंदिरा गांधी और उनकी अंग्रेजी को तमाचा मार रहे हों। और जैसे साड़ी वाली महिला से पूछ रहे हों कि, “बोलो, तमाचा भरपूर है कि नहीं?” मार्क टुली ने अपनी आवाज में और मिठास घोली पर कहने की लय को तल्ख किया और अचानक ठिठक कर खड़ी हो गई उस महिला से फिर बोले, “हमको तो हिंदी आटी है।”

“हमको भी हिंदी आती है।” वह महिला एकदम खिलखिला कर ऐसे बोली जैसे एकदम, अचानक किसी घुटन से उबर गई हो। पर मार्क टुली फिर बुदबुदाए “हमको तो हिंदी आटी है।” संजय को लगा जैसे उसे घर जाने की राह मिल गई हो। और उसने बढ़ कर मार्क टुली का हाथ पकड़ा और झुक कर चूम लिया। बिलकुल राजकपूर स्टाइल में।

संजय दफ्तर बाद में पहुंचा पर उसका हिंदी बोलने वाला किस्सा इस पुछल्ले के साथ कि अखबार की कैसे हेठी हुई, बहुत पहले पहुंच चुका था, सीन दर सीन। ऐसे-जैसे पूरी पटकथा हो। पांच मिनट की बात पचास मिनट के किस्से में ऐसे तब्दील हो गई थी जैसे आधी से अधिक प्रेस कांफ्रेंस में सिर्फ संजय और इंदिरा गांधी संवाद ही हुआ हो। सारा किस्सा सुन-सुन कर, जवाब दे-दे कर संजय का दिमाग पक गया था। बिलकुल किसी फोड़े की तरह। सिगरेट सुलगा कर वह अपनी सीट पर बैठा ही था कि संपादक का बुलावा आ गया। संपादक की केबिन में घुसना ही था कि वह शुरू हो गए, “यही सब करने गए थे? नहीं अंग्रेजी बोल पाए तो चुप ही रहे होते। इतनी छीछालेदार तो नहीं होती। प्राइम मिनिस्टर को नाराज करने का मतलब समझते हैं आप? आपकी जाहिलयत का बयान करने वाले कितने टेलीफोन आ चुके हैं। मालूम हैं? आप जाने हैं स्टाफ में कितने लोगों को नाराज करके आपको भेजा था, आपकी बीट नहीं थी, फिर भी?” कहते हुए संपादक ने एजेंसी से आए हुए तारों का पुलिंदा थामते हुए कहा, “ले जाइए। कम से कम प्रेस कांफ्रेंस संजीदगी से लिखिएगा।” उन्होंने जोड़ा, “इसमें हिंदी के तार भी हैं।” और ऐसे कि जैसे वह तमाचा मार रहे हों। संजय तारों का पुलिंदा लिए संपादक की केबिन से निकला तो उसे लगा जैसे उसका दिमाग फट जाएगा।

बाहर आकर उसने एजेंसी के तारों से एक रूटीन सी प्रेस कांफ्रेंस की खबर बनाई। और साथ ही अपनी नोट बुक निकाल कर प्रेस कांफ्रेंस की इनसाइड स्टोरी लिखी जिसमें इंदिरा गांधी के जवाबों का रंग और प्रेस कांफ्रेंस के कई-कई शेड्स और मूवमेंट्स के ब्यौरे बटोर कर उसने पूरी स्टोरी को एक इमोशनल टच दिया। साथ ही हिंदी वाले मसले पर मार्क टुली का जिक्र करते हुए एक बाक्स आइटम भी बनाया।

संपादक ने जब एक साथ तीन-तीन “स्टोरी” देखी तो फिर पसर गए। बोले, “क्या पूरे अखबार में प्रेस कांफ्रेंस छपेगा?”

“अब जो है आप देख लीजिएगा। जो न समझ में आए फेंक दीजिएगा।” कह कर संजय केबिन से बाहर आ गया। दूसरे दिन उसने देखा कि प्रेस कांफ्रेंस की मेन स्टोरी के साथ इनसाइड स्टोरी भी काट छांट के साथ छपी थी पर हिंदी वाला आइटम गायब था। जिक्र तक नहीं था। उसे तब और ज्यादा दुख हुआ जब उसने देखा कि उस यू.पी. वाले अंग्रेजी पत्रकार ने “क्वेश्चन इन हिंदी” करके एक बढ़ीया बाक्स आइटम लिखा था।

वह यह सब सोच ही रहा था कि लखनऊ में तो दिल्ली जैसा नहीं है। यहां जो लिखो वह छपता है। क्या हुआ जो यहां प्रधानमंत्री नहीं है। मुख्यमंत्री तो है और एक नहीं पचास सवाल पूछो, जवाब तो देता है। वह भी हिंदी में। यहां तो अंग्रेजी वाले जब हिंदी में सवाल पूछते हैं तो संजय को मन ही मन मजा आ जाता है। दिल्ली में जो कदम कदम पर हिंदी पत्रकारिता का नरक है वह नरक लखनऊ में सिर्फ डेस्क तक ही सीमित है। और उसको डेस्क से क्या लेना देना? उसने सोचा। फिर क्या रखा है दिल्ली में? फूल सिंह ने ठीक ही किया जो उसे इस्तीफा देने से रोक लिया। नहीं, दिल्ली में भी कहां है अब नौकरी? जिसने दिल्ली न देखी हो वह जाए दिल्ली। वह तो अपने हिस्से की दिल्ली भुगत आया है। और पत्रकारिता की ऐसी कौन सी चिरकुटई हो जो लखनऊ में है और दिल्ली में नहीं? सारी उलटबासियां, विसंगतियां, चमचई, चाकरी और धूर्तई हर ओर समायी हुई हैं। वह यह सब अभी सोच ही रहा था कि सरोज जी का बुलावा आ गया। सरोज जी अब उसके नए संपादक थे।

“किस चूतिए से पाला पड़ गया है।” बुदबुदाता हुआ वह संपादक की केबिन की ओर बढ़ गया। संपादक की केबिन में अभी भी नरेंद्र जी को बैठा देख कर वह चकित रह गया। नमस्कार करते हुए वह बोला, “तो क्या जो खबर उड़ी वह गलत है?”

“मेरे इस्तीफे की?” नरेंद्र जी बोले, “सही है।”

“तो फिर अभी तक आप बैठे हैं?”

“हां।” नरेंद्र जी बोले, “मैं तो जा रहा था पर सरोज जी ने कहा कि प्यारे, जरा काम धाम समझा दो तब जाना। एम.डी. ने भी रुकने को कहा।”

“तो आप रुक रहे हैं?” संजय चहका।

“नहीं, कल से नहीं आऊंगा। इस्तीफा तो दे दिया है।”

“पूंजीपतियों की नौकरी में तो यह सब होता ही रहता है।” संजय बोला, “फिर भी मेरे लिए कुछ हो तो बताइएगा।”

“बिलकुल।” नरेंद्र जी गर्मजोशी से बोले।

संपादक की केबिन से वह निकल ही रहा था कि सरोज जी भीतर जाते दिख गए। उसने उन्हें खबर थमाई तो वह उसे घूरने लगे। पर वह उनकी ओर देखे बिना ही निकल गया। घर जाते समय तक बड़ा उदास हो गया। रास्ते भर वह रमानाथ अवस्थी का गीत, “गंगा जी धीरे बहो, यमुना जी धीरे बहो, नाव फिर भंवर में है” गुनगुनाता रहा। उस अंधियारी रात में विधान सभा मार्ग से गुजरते हुए उसे वह सड़क ही नदी में तब्दील होती लगी और गुनगुनाता रहा, “गंगा जी धीरे बहो, नाव फिर भंवर में हैं”

वह जैसे बेबस हो गया था।

इतना बेबस उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था और इस तरह “गंगा जी धीरे बहो” नहीं गुनगुनाता था। गुनगुनाते-गुनगुनाते उसे अपने शहर की यूनिवर्सिटी रोड की याद आ गई। उन दिनों वह अपने क्लास की एक लड़की के प्यार में पगलाया घूमता रहता था। और जब वह लड़की सड़क से गुजर जाती तो अपनी साइकिल के पैडिल मारता वह सोम ठाकुर का गीत, “जाओ पर संध्या के संग लौट आना तुम, सेज की शिकन संवारते न बीत जाए रात।” गुनगुनाता घूमता फिरता। उसने आज एक बार “जाओ पर संध्या के संग लौट आना तुम” भी गुनगुनाया पर इस समय उसे यह गीत गुनगुनाना बड़ा अटपटा लगा और तुरंत ही, “गंगा जी धीरे बहो” पर वापस लौट आया। विधान भवन के सामने से गुजरते हुए जैसे बेवजह तर्क पर उतर आया कि कैसी गंगा, और काहे की गंगा? यहां तो गोमती हैं, जो बहती ही नहीं। और जब बहती ही नहीं तो भंवर कहां से आएगा?

गोमती, जहां सड़ा पानी हिलोरें मारने के बजाय ठहरा हुआ पानी बन कर बदबू मारता है। जैसे दिल्ली में यमुना का पानी। उसने सोचा सरोज जी और गोमती के बदबूदार पानी में आखिर फर्क क्या है? फिर उसने खुद को ही जवाब दिया कि भंवर से तो बचा जा सकता है पर बदबूदार पानी से? हरगिज नहीं। और फिर सरोज जी ही क्यों? समूची पत्रकारिता ही जब बदबूदार पानी हो गई हो तो क्या करें?

“तह के ऊपर हाल वही जो तह के नीचे हाल / मछली बच कर जाए कहां जब जल ही सारा जाल।” पाकिस्तानी शायर आली का यह मशहूर दोहा उसे आज की पत्रकारिता का हाल बयान करने के लिए बड़ा मौजू लगा।

पत्रकारिता का चाहे जो हाल हो पर फिलहाल तो उसे सरोज जी से निपटना था, श्याम सिंह सरोज से। उसने सोचा कि अगर वह उनसे नहीं निपटा तो सरोज जी तो उसे निपटा ही देंगे।

सरोज जी मतलब श्याम सिंह सरोज अजीब व्यक्तित्व के मालिक थे। देखने में सीधे सादे, निरीह पर भीतर से उतने ही धूर्त, कुटिल और काइयां। आप समझें कि आपने उन्हें “बना” दिया पर बाद में पता चलता उन्होंने आपको जड़ से ही काट कर रख दिया। पत्रकारों में कवि, कवियों में पत्रकार। अपने अखबार में वह आदि पुरुष माने जाते थे। क्योंकि अखबार शुरू होने के दिन से ही वह थे। जाने कितने लोग आए और चले गए। रिटायर हो गए, मर गए पर सरोज जी के साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। अखबार के मालिकों की तीसरी पीढ़ी काम संभालने लग गई थी पर सरोज जी जस के तस थे। चूंकि वह हाई स्कूल भी पास नहीं थे सो उनकी उम्र का कोई हिसाब नहीं था। उनके अखबार में पत्रकारों के रिटायरमेंट की उम्र पहले साठ वर्ष थी, फिर घटा कर अट्ठावन वर्ष कर दी गई। पर सरोज जी की उम्र की कोई थाह नहीं थी। सो वह रिटायर नहीं हुए थे। लोग कहते दादा की उम्र सालों से चालीस साल पर ठहरी हुई है। उस अखबार में सरोज जी के मुकाबले फूल सिंह चपरासी भर था। अखबार के पहले दिन से ही काम वह भी करता था पर चूंकि वह चपरासी था, इसलिए वह आदि पुरुष नहीं कहलाता। पर उसका दावा था कि वह सरोज जी से भी सीनियर है। वह कहता, “मैं चार साल सीनियर हूं। जब दस बरस का लौंडा था तबसे हियां पानी पिलाय रहा हूं। और यहां हिंदी अखबार नहीं छपता था, सिर्फ अंग्रेजी वाला ही छपता रहा, तबसे ही हूं।” पढ़ाई लिखाई का कोई सर्टिफिकेट फूल सिंह के पास भी नहीं था सो उसकी उम्र भी ठहरी हुई थी। सरोज जी, और फूल सिंह के रिटायरमेंट की जब भी बात आती फूल सिंह कहता, “जब सरोज जी आए तब अधेड़ थे और मैं लौंडा, पहिले सरोज जी को रिटायर करो।”

सरोज जी को रिटायर करने के लिए कंपनी ने बाकायदा डायरेक्टर बोर्ड की मीटिंग कर एक नियम बनाया कि चालीस वर्ष तक काम करने के बाद कर्मचारी रिटायर कर दिया जाएगा। माना गया कि बालिग होने के उम्र अठारह वर्ष है और बालिग होने से पहले कोई नौकरी नहीं कर सकता। तो चालीस साल बाद कर्मचारी अट्ठावन वर्ष का हो जाएगा और उसे रिटायर कर दिया जाएगा। फिर सरोज जी तो दो अखबारों में नौकरी करने के बाद इस अखबार में आए थे। उन्हें नौकरी करते हुए भी चालीस वर्ष से ज्यादा हो गए थे। बोर्ड से नियम पास करा लेने के बाद भी सरोज जी को रिटायरमेंट का कागज देने के लिए प्रबंधकों को बाकायदा रणनीति बनानी पड़ी। एम.डी. और जी.एम. शहर छोड़कर “टूर” पर निकल गए और टाइम आफिस के एक घाघ किस्म के बाबू को उन्हें कागज देने की जिम्मेदारी सौंप गए। सरोज जी रात जब दफ्तर से निकलने ही वाले थे तो वह बाबू उनके रिटायरमेंट के कागज लेकर उनकी केबिन में पहुंचा। सरोज जी में कुछ “ऐसा वैसा” सूंघ लेने की क्षमता कुत्तों से भी ज्यादा थी। उन्हें अंग्रेजी ठीक से नहीं आती थी पर अंग्रेजी अखबार के रिपोर्टरों के सामने बैठ कर टाइप करती उनकी उंगलियां देख कर ही वह खबर सूंघ लेते थे। तो उस बाबू को रात आठ बजे अपनी केबिन में घुसते देख कर ही वह भड़क उठे, “क्या बात है?” वह “जी-जी” ही बोला था कि सरोज जी पूरी ताकत से भड़के, “बाहर चलो, अभी खबर लिख रहा हूं।” वह बाबू “जी-जी” करता केबिन के बाहर आ गया। पर वह भी एक घाघ था। केबिन के ठीक बाहर ही कुर्सी लगा कर बैठ गया। सरोज जी परेशान। चपरासी को बुलाया। पानी मंगवाया। पानी पिया। चपरासी के आने-जाने के बहाने केबिन के खुलते, बंद होते दरवाजे से वह उस बाबू को बैठे देख चुके थे। उनकी परेशानी और बढ़ गई। वह बाबू को डांट कर भले कह दिए थे, “बाहर चलो, अभी खबर लिख रहा हूं।” पर खबर तो वह कबकी लिख चुके थे और अब उस बाबू को “बाहर चलो” कहकर खुद बाहर जाने को तड़फड़ा रहे थे। बिलकुल किसी तोते की तरह जो नया-नया पिंजरे में बंद हुआ हो। रात के आठ बजे से नौ बज गए। पर न तो सरोज जी केबिन से बाहर आए, न वह टाइम आफिस का बाबू वहां से हिला। संजय लगातार देख रहा था। अंतत: जब सवा नौ बज गए तो सरोज जी ने चपरासी से फिर पानी मंगवाया और उससे कहा कि “टाइम बाबू से पूछो, वह यहां क्यों बैठा है?” चपरासी ने वापस आकर सरोज जी को बताया कि, “वह कोई कागज देना चाहता है।”

“कागज तुम ले लो। और कह दो वह यहां से जाए।”

“हमने यही कहा साहब, पर ऊ कहता है, कागज जरूरी है, आप को ही देगा।” चपरासी ने बताया।

“अच्छा ठीक है तुम जाओ।” कह कर सरोज जी केबिन में बंद हो गए। सरोज जी केबिन में थे और बाबू बाहर। दोनों ही नहीं हिल रहे थे।

रात के दस बज गए।

सरोज जी केबिन से निकले ही थे कि बाबू उनके पीछे पड़ गया, “यह रिसीव कर लीजिए।”

“हुईं!” सरोज जी चौंके और गरजे, “तुम्हारी ये हिम्मत। अब तुम हमको कागज रिसीव करवाओगे?”

“यह ऐसा वैसा कागज नहीं है दादा!”

“तो?”

“आपका पर्सनल है।” बाबू रिरियाया।

”हुईं” वह चकित होते हुए बोले, “काव कहि रहे हो।” और उसे वापस केबिन में बुलाते हुए बोले, “भीतर आओ, भीतर आओ। बाहर काहें खड़े हो।” सरोज जी अब नरम पड़ गए थे। भीतर गए, कागज देखा। कागज देखते ही सरोज जी फिर भड़के, “ई काव है?”

“आप ही देख लें सर!” बाबू उनके रिटायरमेंट के कागज की दूसरी प्रति दिखाते हुए बोला, “और इस पर रिसिवंग दे दें।”

“न हम कुछ लेंगे न रिसीव करेंगे।” सरोज जी उस पर बिगड़े, “अभी हम जी.एम. से बात करते हैं।”

“जी.एम. साहब तो हैं नहीं बाहर गए हैं।” बाबू ने बताया।

“तो एम.डी. को फोन करता हूं।”

“वो भी नहीं है। बाहर गए हैं सर!” बाबू ने सूचित किया।

“सब बाहर गए हैं तो तुमहू बाहर जाओ। हम नाहीं लेंगे।”

“पर देना तो सर आपको आज ही है।” बाबू फिर बोला, “हमें आदेश है कि आपको हर हाल में आज ही रिसीव करवा दिया जाए।”

“हम नहीं करेंगे रिसीव।” सरोज जी फिर बिगड़े।

“पर सर!”

“अब तुम्हीं बताओ, हम अब कइसे रिटायर होइ जाएं।” सरोज जी फिर नरम पड़ गए, “अबहिन परसों तो बात भई है एम.डी. से कि हम रिटायर नाहीं होब।” सरोज जी अब हताश हो रहे थे, “ऊ खुदै हमसे कहिन दादा आप हमेशा आते रहिए। आपकी नौकरी जिंदगी भर की है।”

“तो आने को आप कल भी आइएगा।” बाबू ने जोड़ा, “आप सचमुच रिटायर थोड़े ही किए जा रहे हैं। यह तो सिर्फ कागजी कार्रवाही है। बस! आप कागज भर ले लीजिए।”

“रिटायर नाहीं हो रहे हैं हम न?” सरोज जी ने बाबू से कहा, “फिर कागज क्यों देइ रहे हौ।”

“कागज तो हम देंगे सर!” बाबू बोला, “कागज अपनी जगह है और आप की सेवा अपनी जगह।”

“अच्छा जाओ कल लइ लेब।” सरोज जी बाबू को टालते हुए बोले।

“सर, कागज ले लीजिए।” वह रुका और हचकते हुए बोला, “नहीं तो….!”

“नहीं तो?” सरोज जी घबराए।

“आज अखबार में छपने चला जाएगा, बतौर नोटिस।”

“हुईं!” कह कर सरोज जी हांफने लगे, “जिंदगी भर की सेवा का इ फल दिया है लाला ने?” वह हांफते हुए बोले, “लइ आओ।” और उन्होंने रिटायरमेंट का कागज रिसीव कर लिया और बोले, “अब तो नहीं छपेगा?”

“नहीं सर!” कहता हुआ बाबू चला गया।

संजय ने समझा अब सरोज जी कल से दफ्तर नहीं आएंगे। पर वह दूसरे दिन सुबह मीटिंग में हमेशा की तरह मौजूद मिले। ऐसे जैसे कल रात कुछ हुआ ही न हो। हालांकि उनके “रिटायर हो जाने” की खबर सारे शहर में हो गई थी। उनसे मीटिंग में इशारों-इशारों में पूछा भी गया पर वह टाल गए। त्रिपाठी ने मीटिंग से उठ कर, एकाउंट्स में जाकर एक बूढ़े की आवाज बना कर सरोज जी को फोन किया और रिटायरमेंट के बाबत पूछा तब भी सरोज जी सहज रहे। बोले, “कुछ नहीं, अफवाह है। हम तो हरदम की तरह दफ्तर आए हैं। और हरदम आएंगे।” वह हंसते हुए बोले, “हमारे बिना ई अखबार चल पाएगा भला?” और फोन रख दिया।

इस तरह सरोज जी के तमाम किस्सों में उनके रिटायरमेंट का भी एक किस्सा जुड़ गया। हालांकि बाद में पता चला कि तबके जमाने में छ हजार रुपए महीना पाने वाले सरोज जी अब एक हजार रुपए के बाउचर पेमेंट पर आ गए थे। पर लिखते विशेष प्रतिनिधि ही थे। त्रिपाठी ने उन्हें कई बार टोका भी कि, “दादा यह तो अपमान है आपका।” तो सरोज जी एक दिन नाराज हो गए, “काव अपमान है?” वह हांफते हुए बोले, “आप लोग काव चाहते हैं, घर जाकर बैठ जाऊं?”

नहीं दादा। त्रिपाठी ने चमचई की, “आप के बिना अखबार चल पाएगा भला?”

“तो?”

“हम तो पैसे की बात कर रहे थे दादा।” त्रिपाठी मक्खन लगाते हुए बोला, “इतने कम पैसे में?” बोलते-बोलते वह रुका, “एक हजार से ज्यादा तो अप्रेंटिस भी पाता है।”

“हुईं!” सरोज जी चौंके।

“अच्छा दादा, आपकी ग्रेच्युटी वगैरह मिल गई?” संजय ने पूछा।

“नहीं तो।” सरोज जी बोले, “जी.एम. ने कहा है जिस दिन घर बैठने का मन करे ले लीजिएगा।”

“कोई एक लाख रुपए तो बनेंगे ही दादा!” त्रिपाठी कूद पड़ा।

“का पता प्यारे, हमने तो जोड़ा नहीं।” सरोज जी बिलकुल नरम पड़ गए, “तुम लोग जोड़ो।”

“ठीक-ठीक तो एकांउट्स वाले बताएंगे।” त्रिपाठी बोला, “पर मोटा-माटी तो एक लाख से ऊपर ही जाएगा।”

“अच्छा!” सरोज जी की आंखे फैल गईं।

“फिर तो दादा आप बहुत बड़े बेवकूफ हो।” त्रिपाठी सरोज जी को मात देते हुए बोला।

“काव अंट शंट बकि रहे हो।” सरोज जी नाराज होते हुए बोले।

“अंट शंट नहीं दादा।” त्रपाठी सरोज जी की नब्ज पकड़ते हुए बोला, “सच-सच बोल रहा हूं कि लाला आपको लंबा बेवकूफ बना रहा है।”

“कैसे?” सरोज जी की आंखे फिर फैल गईं।

“आप के एक लाख रुपए जो अभी नहीं मिले हैं बाजार दर से उसका सूद दो हजार रुपए मोटा मोटी हो जाएगा। और लाला आपके ही पैसे के सूद से एक हजार आपको दे रहा है और एक हजार अपनी जेब में डाल रहा है। आप ही के पैसे से आपको तनख्वाह भी दे रहा है, आप से काम भी ले रहा है, और आप पर एहसान भी लाद रहा है।” त्रिपाठी ने पूरा गणित सरोज जी को समझाया तो उनकी आंखे और चौड़ी हो गईं और बोले, “तो ई बात है प्यारे!” हम आज ही अपना हिसाब मांग लेते हैं। और वह उठ कर खड़े हो गए।

मीटिंग बर्खास्त हो गई थी।

सरोज जी सचमुच अपना हिसाब लेने जनरल मैनेजर के पास चले गए। जहां उनकी बड़ी किरकिरी हुई। उन्हें साफ बता दिया गया कि हिसाब लेने के बाद कंपनी को उनकी सेवाओं की एक दिन की भी जरूरत नहीं रहेगी। सो सरोज जी ने एकाउंट्स से हिसाब नहीं लिया। पर त्रिपाठी का हिसाब लगाने में वह जरूर लग गए। वह रिपोर्टर्स मीटिंग में जब तब त्रिपाठी पर बेवजह बिगड़ जाते। और खोज-खोज कर उसकी खामियां निकालते, उसे खराब से खराब एसाइनमेंट पर भेजते। असल में सरोज जी को किसी ने समझा दिया था कि त्रिपाठी हिसाब के लिए उन्हें उकसा कर उनकी छुट्टी कराना चाहता था। और सरोज जी के मूढ़ दिमाग में यह बात गहरे घुस गई। और चमचई, मक्खनबाजी में सिद्धहस्त त्रिपाठी की सारी कलाओं पर पानी फेरते हुए सरोज जी उसका हिसाब लेने पर नहा धोकर जुट गए। दफ्तर में एक कहावत थी कि सांप का काटा आदमी एक बार जी सकता है पर सरोज जी का काटा आदमी मर के भी छुट्टी नहीं पाता। वह उसे फिर भी मारते रहते हैं। पर सरोज जी एक शै थे तो त्रिपाठी दूसरी शै। खेल सरोज जी जरूर रहे थे पर बिसात त्रिपाठी ने ही बिछाई थी। त्रिपाठी के पास चमचई की इतनी कलाएं, इतनी उक्तियां थीं कि अच्छे-अच्छे अकड़ओं को वह वश में कर लेता था। सरोज जी सांप नाथ थे तो त्रिपाठी नागनाथ। बल्कि कई बार तो इच्छाधारी नाग कहने को जी हो जाता। वह जिसको जैसे चाहता, वैसे नचाता, वैसे टहलाता, बैठाता और बोलवाता। सरोज जी किसी के भी वश में नहीं आते, त्रिपाठी के वश में फौरन आ जाते। त्रिपाठी ऐसा झुक कर, हाथ जोड़ कर बोलता कि अच्छे-अच्छे उसके वश में क्या, सम्मोहन में बध जाते। लोग जानते थे कि त्रिपाठी कैसा है, क्या है, पर उसके सामने सभी विवश हो जाते और ऐसी लंगड़ी मारता, इतनी शराफत और नफासत से मारता कि आदमी का पैर टूट जाए फिर भी उसे शुक्रिया कहता जाए। दरअसल सरोज जी और त्रिपाठी दोनों एक ही नाव के दो सवार थे। दोनों की सोच, सनक और एप्रोच लगभग एक थी। बस स्टाइल जुदा-जुदा थी। सरोज जी एक शराब फैक्ट्री के मालिक की दलाली करते-करते पत्रकारिता में आ पहुंचे थे तो त्रिपाठी ट्रक पर क्लिनरगिरी और फिर टेलीफोन आपरेटरी करते-करते रिपोर्टिरी तक आ पहुंचा था। ट्रक पर ड्राइवर की जी हुजूरी कर-कर उसकी आंख में धूल झोंकने का जो रियाज त्रिपाठी ने किया था उसे अब वह जिंदगी का दस्तूर बना चुका था। टेलीफोन आपरेटरी में उसने नफासत की चाशनी घोलनी भी सीख ली। जिससे उसकी शराफत का रंग पक्का हो जाता और लोग उसकी बातों में आ जाते।

पर सरोज जी अबकी उसके किसी दांव में फंसने को तैयार नहीं थे। एक दिन मीटिंग में सरोज जी त्रिपाठी पर बुरी तरह बिगड़े और हांफने लगे। सरोज जी जब भी किसी पर नाराज होते तो हांफने लगते और आप कह कर संबोधित करते तो वह डर जाता। क्योंकि इस आप का मतलब सरोज जी के नाराज होने की भूमिका होती थी। और सरोज जी जिस भी किसी पर नाराज होते, वह कोई हो उसका कुछ न कुछ नुकसान सरोज जी जरूर कर या करवा देते। यह उनकी खास खासियत थी। तो उस दिन सरोज त्रिपाठी पर बिगड़ते हुए हांफने लगे। बोले “आप चाहते क्या हैं?”

“क्या बात है दादा!” त्रिपाठी ने बड़ी विनम्रता से मक्खन चुपड़ कर यह संवाद फेंका।

“बात पूछते हैं?” सरोज जी गरजे, “आपने आज कल कहीं उठना बैठना मुश्किल कर दिया है।”

“क्यों क्या हो गया दादा?” त्रिपाठी हाथ जोड़ कर बोला।

“ई अमीनाबाद में जो पटरी दुकान लगा रखी है आपने,” वह हांफे, “आपने तो अखबार की नाक ही कटवा दी है।”

“नहीं दादा! पटरी दुकानदारों की मांग जेनुइन है।” त्रिपाठी उसी विनम्रता से बोला, “उनको दुकान के लिए जगह तो चाहिए।”

“खाक जेनुइन है।” सरोज जी फिर बिगड़े, “किसी दुकान पर बैठना मुश्किल हो गया है।”

“तो आप बैठते ही क्यों हैं किसी दुकान पर?” त्रिपाठी की विनम्रता मेनटेन थी, “आपको यह शोभा नहीं देता।”

“हमको यह शोभा नहीं देता।” सरोज जी ने त्रिपाठी का कहा उसी की तरह नकल करके दोहराया और उसको खा जाने वाली नजरों से घूरा, “और आपको पटरी दुकानदारों से पैसे लेना शोभा देता है?”

“क्या कह रहे हैं दादा आप?”

“मैं ठीक कह रहा हूं।” सरोज जी ने जोड़ा, “मेरे पास सुबूत है।”

“मेरे पास भी सुबूत है कि आप अमीनाबाद के बड़े दुकानदारों से पैसा लेते हैं।” त्रिपाठी की विनम्रता अब उसकी जीभ से उतर रही थी, “और नियमित लेते हैं।”

“अब आप हम पर आरोप लगाएंगे?” सरोज जी अब बुरी तरह हांफ रहे थे। ऐसे जैसे कोई कुत्ता बहुत दूर दौड़ कर आया हो और हांफ रहा हो। वह बोले, “यह झूठ है।”

“तो वह भी झूठ है।” त्रिपाठी की विनम्रता वापस उसकी जीभ पर आ गई थी। त्रिपाठी-सरोज संवाद के दौरान दिलचस्प यह रहा कि मीटिंग में बैठे बाकी रिपोर्टरों में से कोई भी कुछ नहीं बोला।

संजय के लिए तो जैसे यह एक अनुभव था। हिला देने वाला अनुभव। कि एक ठीक ठाक अखबार के दो पत्रकार इस स्तर पर भी जा सकते हैं भला? पर जैसे काफी नहीं था। आदत से मजबूर त्रिपाठी मीटिंग से निकलते ही सरोज के बारे में जो भी कुछ कह सकता था, एक अभियान के तहत कहना शुरू कर दिया। कि सरोज जी एक भी सामान नहीं खरीदते। राशन, दूध, घी, कपड़ा, साबुन पेस्ट तक कहां, कहां से उनके घर मुफ्त आता है पूरी फेहरिस्त वह परोसने लगा और बताने लगा कि बुढ़वा एक नर्स से भी फंसा पड़ा है। त्रिपाठी यह सारे ब्यौरे अपने मोहक और रहस्यमय अंदाज में परोसता और कहता कि, “यह बुड्ढा खुद ही घूम-घूम शहर भर में अखबार की नाक कटवाता फिरता है और दूसरों को हड़काता रहता है कि तुमने अखबार की नाक कटवा दी।” इस सबका असर यह हुआ कि सरोज जी ने दूसरे रोज त्रिपाठी को एक ऐतिहासिक एसानमेंट सौंपा। वह बड़े प्यार से बोले, “त्रिपाठी जी आप मेहनती आदमी हैं। और यह काम आप ही कर सकते हैं।”

“आज्ञा दीजिए दादा!” त्रिपाठी भी मक्खन लपेट कर बोला।

“क्या है कि शहर की एक बहुत बड़ी समस्या है मेनहोल का खुला रहना।” सरोज जी त्रिपाठी को समझाते हुए बोले, “इस पर आप कुछ करिए!”

“बिलकुल दादा!” त्रिपाठी हाथ जोड़ कर विनम्रता पूर्वक बोला, “यह बहुत बड़ी समस्या है। और वह भी राजधानी में। यह तो हद है दादा।” उसने जोडा़, “आज ही देखता हूं।” कह कर त्रिपाठी ने हाथ जोड़ लिए।

“तो इसमें क्या करेंगे आप?” सरोज जी ने बिलकुल बाल सुलभ जिज्ञासा जताई।

“बस अभी निकलता हूं। और महापालिका वालों को दुरुस्त करता हूं।” त्रिपाठी उठता हुआ हाथ जोडे़ बोला।

“बैठ जाइए।” सरोज ने त्रिपाठी को तरेरा, “मैं जानता था आप यही करेंगे।”

“तो फिर दादा?” त्रिपाठी बैठ गया।

“मैं चाहता हूं कि आप इस पर इनवेस्टिगेटिव रिपोर्ट लिखें।” सरोज जी बड़ी गंभीरता से बोले।

“दादा, इनवेस्टिगेटिव तो संजय जी ही करते हैं।” त्रिपाठी पूरी तन्मयता और विनम्रता से बोला।

“मैं चाहता हूं कि यह आप ही करें।” सरोज जी बोले, “यह संजय के मान का नहीं है। ई अभी पूरा लखनऊ नहीं जानते तो काव देखेंगे, काव लिखेंगे।”

“हम बता देंगे दादा! और लखनऊ भी इस बहाने ये देख लेंगे।” त्रिपाठी पूरी आदर से बोला।

“नहीं, हम चाहते हैं कि यह रिपोर्ट आप ही लिखें।” सरोज जी आदेशात्म लहजे में बोले, “और इसके लिए महापालिका आप न जाएं, बल्कि मुहल्ला-मुहल्ला घूम कर सर्वे करें कि कितने मेनहोल खुले हैं, उनकी गिनती करें जितने दिन लगे, लगा लें। और फिर रिपोर्ट लिखें। आप चाहें तो इस बीच दफ्तर भी न आएं। और पूरे मनोयोग से लग जाएं।”

“अच्छी बात है दादा!” हाथ जोड़ता हुआ त्रिपाठी बोला और उठने लगा।

“आप समझ गए न सब?” सरोज जी ने पूछा।

“बिलकुल दादा!”

“श्योर!” सरोज जी जैसे आश्वस्त हो लेना चाहते थे कि पासा ठीक पड़ा है कि नहीं।

“श्योर दादा!” त्रिपाठी की बिसात फिर बिछ गई थी। संजय समझ गया। इस खेल में भी सरोज जी की मात पक्की है।

“तो कब से?” सरोज जी ने पूछा।

“आज ही से।” त्रिपाठी बोला, “बल्कि अभी से।”

“गुड!” सरोज जी विजयी भाव से बोले, “बस लग जाओ प्यारे!” उन्होंने जोड़ा, “बहुत अच्छी स्टोरी बनेगी!”

“सब्जेक्ट ही बहुत अच्छा है!” त्रिपाठी फिर बड़ी विनम्रता से बोला।

सरोज-त्रिपाठी का यह संवाद सुन कर संजय का दिमाग घूम गया। उसने सोचा कि किन कंजड़ों के बीच आकर फंस गया वह।

थोड़ी देर बाद उसने देखा त्रिपाठी जनरल डेस्क पर बैठा एक हाथ से सर टेके दूसरे हाथ से दाढ़ी नोच रहा है। मनोहर उसकी यह दशा देख कर पूछ बैठा, “क्या हो गया पंडित जी?”

“पूछिए मत।” त्रिपाठी सरोज जी को गाली देते हुए बोला, “साले बुड्ढे ने आज फंसा ही दिया।”

“क्यों क्या कर दिया?”

“कितने मेनहोल लखनऊ शहर में खुले हैं, आप बता सकते हैं?” त्रिपाठी बिफरा।

“अपने मुहल्ले का बता सकता हूं। अपने आने-जाने के रास्ते का बता सकता हूं।” मनोहर ने मजाक किया, “क्यों मेनहोल में कूदने की तैयारी है?”

“फिलहाल तो लगता है, यही करना पड़ेगा।”

“बात भी बताएंगे पंडित जी कि पहेलियां ही बुझाते रहेंगे।” मनोहर अब गंभीर हो गया था।

“बात यह थी कि शहर में कितने मेनहोल खुले हैं सर्वे करके, इसकी गिनती करके, “इनवेस्टिगेटिव” रिपोर्ट लिखनी है।”

“बस!” मनोहर कुर्सी खींच कर बैठता हुआ बोला, “तो फिर पंडित जी आज से आपकी मौज है।”

“यहां नौकरी की पड़ी है और आपको मौज की पड़ी है।” त्रिपाठी बोला, “दिमाग कुछ काम नहीं कर रहा है। बॉस कुछ आप ही बताइए।”

“बता तो रहा हूं।” मनोहर चहका।

“मजाक छोड़िए।”

“मजाक नहीं, वेरी सिरियसली।” मनोहर बोला, “हरामीपने की एसाइनमेंट के साथ हरामीपने वाला ट्रीटमेंट करिए।” उसने चुटकी बजाई, “वेरी सिंपल। महापालिका से आंकड़ा लीजिए कि कितने मेनहोल हैं। जितने मेनहोल हों उनमें से सिक्सटी, या सेवेंटी परसेंट खोल डालिए, और इतने खुले ही रहते हैं, खास-खास मुहल्लों, रास्तों के नाम खोंसिए। इनवेस्टिगेटिव रिपोर्ट तैयार! और हफ्ते भर सर्वे करिए सिनेमाहालों में। आपकी तो बस मौज ही मौज!”

“मान गए भई।” कह कर त्रिपाठी उठ गया।

“चाय भी नहीं पिलाएंगे। मनोहर बोला, आखिर इतनी बढ़िया सलाह दी है।”

“अगले हफ्ते।” कह कर त्रिपाठी निकला तो सचमुच अगले हफ्ते ही आया।

वह रोज सिनेमा देखता, या इधर-उधर घूमता, शराब पीता और शाम को ही सरोज जी को फोन कर देता और किसी दूर के मुहल्ले का नाम बताता और कहता आज इसी इलाके में हूं। साथ ही आंकड़ा भी बता देता कि इतने मेनहोलों में से इतने मेनहोल खुले हैं, इतने चोक है, पब्लिक परेशान है, इतनी दुर्घटनाएं हुई हैं वगैरह-वगैरह। इधर से सरोज जी कहते, “बस लगे रहो प्यारे!”

यही सिलसिला जब रोज का हो गया तो एक दिन सरोज की समझ में आ गया कि त्रिपाठी उन्हें बना रहा है।

वह बोले, “आप ऐसा करिए कि दफ्तर आ जाइए। अभी।”

“पर अभी कई महत्वपूर्ण इलाके बाकी है दादा!” त्रिपाठी ने मक्खन लपेट कर कहा, “वहां की गिनती अभी बाकी है।”

“आप गिनती छोड़िए और आफिस आइए। तुरंत!”

“पर मैं बहुत दूर से बोल रहा हूं, चौक इलाके में ठाकुरगंज से।”

“आप जिस भी इलाके से बोल रहे हों, अभी आइए तुरंत हमें रिपोर्ट कीजिए।” कह कर सरोज जी ने फोन रख दिया, और चपरासी बुला कर समझा दिया कि, “त्रिपाठी ज्यों आएं, उन्हें अंदर भेजो।”

सरोज जी बड़ी देर तक त्रिपाठी को पूछवाते रहे, पर त्रिपाठी नहीं आया। काफी देर बाद त्रिपाठी बिलकुल लुटा-पिटा सा दफ्तर में दाखिल हुआ। चपरासी ने उसे बता दिया कि सरोज जी कई बार पूछ चुके हैं और कहा है कि तुरंत अंदर भेज दो।

“अच्छा ठीक है पहले पानी पिलाओ।” कहता हुआ त्रिपाठी कुर्सी में ऐसे धंसा जैसे कितने दिन का थका हुआ हो।

“आ गए प्यारे!” बातचीत सुन कर सरोज जी केबिन से खुद बाहर निकल आए, “कितने मेनहोल खुले हैं?” सुन कर त्रिपाठी ने अपनी जेब से नोट बुक निकाली और बता दिया कि इतने हजार कुल मेनहोल हैं, इसमें से इतने हजार का सर्वे किया जिनमें से इतने हजार खुले हैं, इतने सौ चोक हैं, इतनी दुर्घटनाएं हुई हैं। वह पूरी फेहरिस्त खोल कर बैठ गया।

“गुड!” सरोज जी त्रिपाठी की पीठ ठोंकते हुए बोले, “बस अब लिखी डालो प्यारे।” उन्होंने जोड़ा, “आज की बाटम लीड यही रहेगी।”

“कुछ फोटो-वोटो भी तो करवा लो दादा।” त्रिपाठी टालता हुआ बोला।

“फोटो हो गई है, बस तुम लिख डालो।”

“तो दादा, लिख तो अब आप लो।” त्रिपाठी अपने पांव खुद दबाता हुआ बोला, “मैं तो बहुत थक गया हूं। हां, आंकड़े और मुहल्ले आप नोट कर लीजिए।”

“हूं?” एक लंबी सांस खींची सरोज ने, “तो कल लिख लाना।”

“कल की तो दादा, दे दीजिए छुट्टी। कल आराम करूंगा। बहुत थक गया हूं। अबकी साप्ताहिक अवकाश भी तो नहीं लिया इस मेनहोल के चक्कर में।” कह कर उसने सरोज जी से भी लंबी सांस छोड़ी। और कहा, “दादा इसको अब आप ही लिख लो।”

“अब आपकी लंतरानी हम लिखें!” सरोज हांफने लगे, “जाइए आराम करिए।” और वह अपनी केबिन में घुस गए। त्रिपाठी उठ कर मंद-मंद मुसकुराता अभी चल ही रहा था कि अंग्रेजी वाला एक रिपोर्टर आकर त्रिपाठी को धर बैठा, “बॉस वो मेनहोल वाले आंकड़े हमें भी दे दीजिए और डिटेल्स भी।”

“तो आपको भी यही एसाइन हुआ है?” त्रिपाठी उसकी जेब से सिगरेट निकालता हुआ मुसकुराया।

“नहीं, हमें यूं ही पता चला तो।”

“अच्छा-अच्छा।” त्रिपाठी खेलने के मूड में आ गया। बड़ी विनम्रता से बोला, “हमने आंकड़े और डिटेल्स सरोज जी को दे दिए हैं, खबर वही लिख रहे हैं, उन्हीं के पास चले जाइए।”

“मेनी-मेनी थैंक्स!” कह कर वह अंग्रेजी अखबार का रिपोर्टर सरोज जी की केबिन में घुस गया। उसने सरोज जी से खुले मेनहोल के आंकड़े मांगे। सरोज जी और चिढ़ गए। वह गरजे, “चले जाइए यहां से!” और वह बेचारा उलटे पांव उनकी केबिन से बाहर आ गया। इस तरह सरोज जी के किस्सों में एक मेनहोल का यह किस्सा भी जुड़ गया।

संजय जब नया-नया लखनऊ आया था तो सबसे पहले सरोज जी से ही पाला पड़ा। जिस दिन उसने ज्वाइन किया, संपादक की केबिन में बैठे पहली नजर में वह उसे भडुआ सरीखे लगे थे। खद्दर के सलीकेदार गरम कपड़ों में बैठे बड़े देर तक वह संजय की जी हुजूरी में लगे रहे। तब संजय को पता नहीं था कि यह सरोज जी हैं, इस अखबार में विशेष प्रतिनिधि और रिपोर्टरों के इंचार्ज। इत्तफाक ही था कि संपादक को उसी रोज इलाहाबाद कि बनारस यूनिवर्सिटी के किसी सेमिनार में जाना था। शाम को आई.ए. एस. वर्सेज पी.सी.एस. पर संजय ने उस पहले दिन पहली खबर लिखी और मजबूरन सरोज जी को दी। सरोज जी ने खबर देखी। बोले, “गुड! पहिले ही दिन बड़ी बढ़िया खबर मारि लाए।” पर दूसरे दिन उसने देखा अखबार में वह खबर छपी ही नहीं थी। दूसरी शाम संपादक के वापस आने पर उसने यह बात बताई। तो संपादक ने सरोज जी से कहा, “इनकी खबर रुकनी नहीं चाहिए।”

“आज ही दे देते हैं!” कह कर सरोज जी खिसक लिए! पर खबर उन्होंने नहीं दी तो नहीं दी। संपादक ने भी कहा, “जाने दीजिए।” पर सरोज जी तब से संजय की चमचई में लग गए। उन दिनों संजय प्रेस क्लब में ठहरा हुआ था। यह जानकर सरोज जी ने बड़ी चिंता जताई। बोले, “हम आपको मकान दिलवाते हैं। फर्स्ट क्लास, वो भी सरकारी।” वह संजय को लेकर यहां वहां लोगों से मिलवाने लगे। मुख्यमंत्री के यहां भी सरोज जी उसे ले गए। मुख्यमंत्री के यहां सरोज जी जब लगातार संजय की तारीफ करते रहे और रह-रह याद दिलाते रहे कि दिल्ली से आए हैं। “बहुत काबिल बहुत तेज।” जैसे अलंकरण भी लगाते रहे। और जब बहुत हो गया तो मुख्यमंत्री ने कहा, “मैं जानता हूं सरोज जी।” इसके बाद संजय को सरोज जी के बारे में पता चला कि सरोज जी त्रिपाठी से आपरेट हो रहे थे और भीतर ही भीतर उसे काटने में लगे थे। त्रिपाठी ने सरोज जी को समझा दिया था, “संजय कंपनी के चेयरमैन यानि मालिक का आदमी है और इसे गिराया नहीं दादा तो आप की कांग्रेस बीट, आपका रुतबा और कुर्सी खा जाएगा।” त्रिपाठी ने सरोज जी को बता दिया था कि, “आखिर इसे दिल्ली से लाया ही इसीलिए गया है कि आपको काटा जा सके।”

सरोज जी के साथ एक बड़ी कमजोरी यह थी कि उनसे चाहे जो बीट ले ली जाए पर कांग्रेस नहीं। कांग्रेस को कवर करके वह खुद को सत्ता में बैठा हुआ पाते थे। और उनको लगता था कि एक न एक दिन वह एम.एल.सी. जरूर बन जाएंगे। उनकी जिंदगी के दो सपने बाकी रह गए थे, एक संपादक बनने का सपना, दूसरा एम.एल.सी. बनने का सपना। और इसकी खातिर कोई इनके मुंह पर थूक भी दे तो भी वह उसे पोंछ कर फिर से तरो ताजा खड़े मिलते। तो कांग्रेस बीट उनकी विवशता, उनकी जरूरत, उनका सपना थी। वह उनसे कोई छीन ले, उन्हें किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं था, मंजूर नहीं था। जाने यह उनकी विवशता थी, आदत थी, नियति थी, वह संजय के खिलाफ पहले ही दिन से साजिश में शामिल हो गए थे। पर साथ ही वह यह भ्रम भी जीते रहते कि संजय चेयरमैन का आदमी है सो सलीके से पेश आते। जिस दिन सरोज जी संजय को मुख्यमंत्री से मिलवा कर लाए, पूरे दफ्तर में इसकी चर्चा फैल गई। क्योंकि सरोज जी के चरित्र से यह परे था। कहा जाता है कि वह किसी के कटे पर पेशाब भी नहीं करने वाले आदमी थे। जैसे कि एक बार एक प्रेस कर्मचारी उनके घर के पास किसी विवाद में पड़ा गया तो उसने अपने को प्रेस का बताया और तसदीक के लिए सरोज जी का नाम ले लिया कि चाहें तो उनसे पूछ लें। उसे सरोज जी के घर ले जाया गया। पर सरोज जी ने उसे पहचानने से साफ इंकार कर दिया। नतीजतन उस कर्मचारी पर शामत आ गई। उसकी बड़ी पिटाई हुई जबकि सरोज जी उसे बहुत अच्छी तरह जानते थे। ऐसे ही एक बार एक दादा किस्म के रिपोर्टर मिश्रा ने सरोज जी से कुछ कहासुनी के बाद उन्हें सीढ़ियों पर से ढकेल दिया तो विनय ने मिश्रा से टोका टाकी की। मिश्रा ने विनय को पीट दिया। विनय ने शिकायत की। जांच शुरू हुई। जांच के दौरान विनय ने बताया कि मिश्रा ने सरोज जी को सीढ़ियों से ढकेल दिया था, सरोज जी की धोती खुल गई, मुंह फूट गया। सरोज जी चूंकि बुजुर्ग हैं, उनकी मदद करना उसका फर्ज था सो उसने मिश्रा को टोका। टोकने पर मिश्रा ने उसकी पिटाई कर दी। साक्ष्य के लिए सरोज जी बुलाए गए। सरोज जी ने बयान दिया कि उनको किसी ने कभी सीढ़ियों पर से ढकेला ही नहीं। रही बात मुंह फूटने की तो वह घर में बाथरूम में फिसल कर गिर गए थे। विनय खिसिया कर रह गया। सरोज जी दरअसल थे ही बड़े विचित्र जीव। एक बार मनोहर, प्रकाश और संजय शाम को दफ्तर के बाहर गेट पर बैठे सड़क पर आती जाती औरतों को घूर रहे थे। मनोहर बोला, “अगर इन औरतों की देह पर कोई केमिकल लगा कर जांच की जाय तो सबसे ज्यादा संजय की आंख के निशान मिलेंगे।” प्रकाश ने पूछा, “कैसे?”

“देख नहीं रहे हो कि कोई औरत आ रही है तो जहां तक इसकी आंख का कैमरा पहुंचता है, वहीं से यह उस औरत को रिसीव करता है और जहां तक इसकी आंख का कैमरा पहुंचता है, पलट कर पूरा लांग शाट लेते हुए उसे सी आफ करके ही छोड़ता है।” मनोहर अभी बतिया ही रहा था कि सरोज जी आते दिख गए। प्रकाश बोला, “लो संजय, एक नई चीज रिसीव करो।” संजय ने सरोज जी को देखा और कहा, “क्या बेवकूफी की बात करते हो।” फिर भी तीनों सरोज जी की ही ओर देखने लगे। सरोज जी हरदम पैदल ही सारा लखनऊ धांग मारते थे। उस दिन भी पैदल ही खड़बड़-खड़बड़ चले आ रहे थे। बिलकुल किसी खच्चर की तरह। जब तक करीब आ गए तो तीनों ने एक साथ सरोज जी को नमस्कार किया। पर सरोज जी उन तीनों के नमस्कार की परवाह किए बगैर आगे बढ़ गए। ऐसे जैसे उन्होंने उन तीनों को देखा ही न हो। वह कुछ दूर आगे बढ़े ही थे कि अचानक एक आदमी दूसरी तरफ से बड़ी तेजी से हाथ उठाए आया और पलट कर सरोज जी की पीठ पर कस कर हाथ मारा। सरोज जी पर उसका प्रहार इतना जबरदस्त था कि सरोज जी लड़खड़ा गए, लगा कि वह गिर जाएंगे। मनोहर, प्रकाश और संजय तीनों सरोज जी के तरफ दौड़े। पर दृश्य फिर दंग करने वाला था, सरोज जी ने पलट कर पीछे देखा ही नहीं, वह ऐसे आगे बढ़ गए, जैसे उनके साथ कुछ घटा ही नहीं, जबकि उनके पीछे तब तक ठीक-ठाक भीड़ इकट्ठी हो गई थी। सड़क पर जो जहां था, दौड़ कर आया। मनोहर चिल्लाया भी, “सरोज जी!” पर सरोज जी उसे भी अनसुना कर दफ्तर के गेट में घुस गए। बाद में पता चला कि सरोज जी की पीठ पर मारने वाला एक पागल किस्म का आदमी था, जो जब तब किसी न किसी को मार देता था। एक पान वाले ने यह बताया तो मनोहर उबल पड़ा, “पर सरोज जी को तो यह बात नहीं मालूम कि वह पागल है, और कि पागल ने ही मारा है। हम लोग तो उनके लिए दौड़ कर गए। पर उन्होंने पलट कर देखा तक नहीं।” मनोहर बड़ी देर तक नाराज रहा। उसकी नाराजगी इस पर थी कि सरोज जी के चक्कर में अभी-अभी सुलगाई सिगरेट भी उसे फेंकनी पड़ी थी।

खैर, उस दिन जब सरोज जी संजय को मुख्यमंत्री से मिलवा कर आए तो पूरे दफ्तर में यह चर्चा पूरे शबाब पर थी। हर कोई संजय से यही पूछता रहा, “सुना है सरोज जी मुख्यमंत्री से मिलवा लाए?” सुन-सुन कर संजय के कान पक गए। सिर्फ मनोहर ने सवाल बदला। बोला, “मुख्यमंत्री ने तुमको केला खिलाया कि नहीं?”

“क्या मतलब?” संजय बिदका।

“इसमें नाराज होने की क्या बात है?” मनोहर ने जोड़ा, “सरोज जी को तो मुख्यमंत्री केला खिलाते हैं।”

“आप लोग भी!” संजय बिफरा, “मैं प्रधानमंत्री से मिल चुका हूं।” वह बोला, “तो फिर मुख्यमंत्री से मिलना कौन सी बड़ी बात है, मैं अकेले भी मिल सकता था, गलती हुई जो सरोज जी के साथ चला गया।” उसने जोड़ा, “बाई द वे मुख्यमंत्री मुझे दिल्ली से ही जानते हैं। मैं पहले भी उनसे कई बार मिल चुका हूं। वह कोई टैबू नहीं हैं।”

“मैंने कब कहा टैबू हैं और कि तुम मिल नहीं सकते।” मनोहर खेलने के मूड में था, “मैंने तो सिर्फ यह पूछा कि मुख्यमंत्री ने तुम्हें भी केला खिलाया कि नहीं?”

“यह केले की क्या कहानी है?” संजय बोला, “जरा बताइए तो सही।” वह अब सहज हो रहा था।

“बताइए पंडित जी। इनको सरोज जी को मुख्यमंत्री द्वारा केले खिलाने की कहानी सुनाइए।” मनोहर ने वहीं बैठे त्रिपाठी से कहा। और अपने आगे रखी खबरें जांचने लगा।

“यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है।” त्रिपाठी बोला, “छपी हुई है, बकलम सरोज जी। चाहो तो पुरानी फाइल निकाल कर देख सकते हो।” त्रिपाठी नमक मिर्च लगा कर चालू हो गया, “हुआ यह कि पिछले चुनाव में सरोज जी मुख्यमंत्री के साथ हेलीकाप्टर में उनके चुनाव क्षेत्र की रिपोर्ट करने गए। अब चूंकि उन्हें रिपोर्ट में चुनावी गणित बताने से ज्यादा जरूरी लगा कि वह मुख्यमंत्री के साथ हेलीकाप्टर में गए, यह बताएं।” सो उन्होंने आधी रिपोर्ट में हेलीकाप्टर वर्णन किया। उसमें यह भी जिक्र किया कि वह मुख्यमंत्री के बगलगीर थे। मुख्यमंत्री जब केला खाने लगे तो सरोज जी से अनुरोध किया कि “ले लीजिए।”

“नहीं। आप खाइए।” सरोज जी ने कहा।

“ले लीजिए।” मुख्यमंत्री उवाच।

“नहीं, आप।” कह कर सरोज जी सकुचाए।

“ले लीजिए सरोज जी।” मुख्यमंत्री का फिर अनुरोध।

“नहीं।” सरोज जी फिर सकुचाए।

“अब ले भी लीजिए सरोज जी।” इस तरह मुख्यमंत्री ने जब बहुत जोर दिया तो सरोज जी पिघल गए और जैसा कि उन्होंने रिपोर्ट में लिखा, “और मैंने केला ले लिया।” त्रिपाठी सारा वाकया बताते हुए बोला, “अक्षरश: सत्य है।” उसने जोड़ा, “सरोज जी ने जो अपनी रिपोर्ट में लिखा है।”

“अब तुम बताओ कि मुख्यमंत्री ने तुम्हें भी केला खिलाया कि नहीं?” मनोहर खबरे जांचता हुआ बोला।

“मैं कोई हेलीकाप्टर में तो मुख्यमंत्री से मिला नहीं?” संजय भी खेल में शामिल होता हुआ बोला। और उठ कर वहां से चलने लगा। बोला, “जब हेलीकाप्टर में मिलूंगा तो खा लूंगा।”

“मुख्यमंत्री का केला!” त्रिपाठी डबल मीनिंग डायलाग पर आ गया। पर संजय ने उसे टोका नहीं। अलबत्ता उसे रीना की याद आ गई जो अक्सर उसे टोकती रहती, “डबल मीनिंग नहीं!” संजय अभी सोच ही रहा था कि त्रिपाठी फिर बोला, “केला खा लेना तो बताना जरूर। चुपचाप गोल मत कर जाना।”

“क्या?” मनोहर ने टोका।

“वही मुख्यमंत्री का केला!” त्रिपाठी मनोहर से आंख मारता हुआ बोला।

संजय को बार-बार त्रिपाठी का “मुख्यमंत्री का केला” कहना बुरा लगा पर वह उलझने के बजाय वहां से चुपचाप चल दिया। चलते-चलते उसने सोचा कि त्रिपाठी या तो बहुत बढ़ा चढ़ा कर सरोज जी की रिपोर्ट और “मुख्यमंत्री का केला” बखान रहा है या फिर सरोज जी ने रिपोर्ट ही बहुत बढ़ा चढ़ा कर लिखी होगी। अब त्रिपाठी और सरोज जी दोनों ही चूंकि एक ही डाल के पत्ते थे, एक ही मानसिकता, एक ही सोच और एक ही सिक्के के दो पहलू थे, इसलिए दोनों में से कौन अति पर है यह तय कर पाना संजय को मुश्किल लगा। साथ ही उसने सोचा की सरोज जी तो कुछ भी कर सकते हैं। कभी भी, कुछ भी। सारी कल्पनाओं, परिकल्पनाओं और परंपराओं को धूल चटा सकते हैं।

संजय को लखनऊ आए अभी गिनती के कुछ ही दिन हुए थे। सरोज जी ने जबसे उसकी पहले ही दिन, पहली खबर रोकी थी, बेवजह ही, तब ही से वह उनके प्रति पूर्वाग्रही हो गया था। वह उनको एक बेवकूफ से ज्यादा कुछ नहीं समझता था। इस बात का वह सरोज जी को पूरी कोशिश करके एहसास भी दिला देता था और बार-बार। उसके व्यवहार में क्षण-क्षण सरोज जी के प्रति उपेक्षा उपजती रहती। वह ऐंठा-ऐंठा सा पेश आता उनसे। जाहिर है सरोज जी को यह सब हरगिज नहीं सुहाता था। संजय के सामने यदा-कदा वह भी अकड़ जाते। संजय फिर भी उनकी परवाह नहीं करता। सरोज जी ने संपादक से उसकी शिकायत भी की तो संपादक ने उनसे कह दिया कि, “कोई काम करने वाला आदमी आता है तो उसके भी पीछे मत पड़ा करिए सरोज जी।” सरोज जी को यह बात लग गई। पहले तो वह ऐंठे। पर फिर उनके मन में संजय के प्रति जाने कहां से स्नेह उमड़ आया। दरअसल सरोज की खूबी कहिए या खामी वह यही थी कि वह कब आप पर कृपालु हो जाएं और कब कुपित कुछ ठिकाना नहीं होता था। पता चला कि सबुह वह आप पर ढेर सारा स्नेह उडेल दें और उसी शाम वह आप पर बरस पड़ें, सरेआम आपको बेइज्जत कर दें। यह अंतराल सुबह से शाम के बजाय पांच मिनट का भी हो सकता था। फोटोग्राफर सुनील कहता भी था कि, “दादा को तो चढ़ने के लिए हर हफ्ते एक आदमी चाहिए। बिना इसके उनकी भांग हजम नहीं होती।” सुनील चूंकि स्ट्रिंगर फोटोग्राफर था इसलिए सरोज जी को सबसे गरीब वही मिलता और अक्सर वह अपनी भांग उसी पर बरस कर हजम करते। वह सुनील से कभी चांदनी रात में गोमती नदी की फोटो तो कभी सावन में नाचते मोर की फोटो मांगते ही रहते जो वह कभी दे नहीं पाया। सुनील जो एक पूर्व विधायक का बेटा था और सरोज जी के ही जिले का रहने वाला था। सो सरोज जी अपने जिले का होने के नाते उस पर कभी तो स्नेह बरसाते तो कभी कुपित होकर उसकी ऐसी तैसी कर डालते। कह देते, “अब आप ऐसे नहीं चल पाएंगे हियां।” लगभग ऐसे उस रोज संजय से वह बोले, “आइए आज आपको हम दिखाएं कि लखनऊ में हमारी कितनी प्रतिष्ठा है!” उनके इस कहने में स्नेह भी था और कोप भी। स्नेह इस बात के लिए था कि “आइए आप लखनऊ में हमारी प्रतिष्ठा देखिए” और कोप इस बात के लिए था कि “तुम हमें कुछ समझते क्यों नहीं हो?”

संजय को लखनऊ आए चूंकि गिनती के ही कुछ दिन हुए थे। और सरोज जी का व्यवहार घटते बढ़ते चंद्रमा की तरह लगातार उन्हें पहेली बनाता जा रहा था इसलिए सहसा उनका यह आमंत्रण पाकर वह उलझन में पड़ गया कि वह क्या करे? पूछा, “बात क्या है सरोज जी?” सरोज जी को संजय की यह बात भी बहुत बुरी लगती थी कि वह उन्हें “सरोज जी” क्यों कहता है? और सबकी तरह, “दादा” क्यों नहीं कहता? पर सरोज जी आज यह सारी शिकायत जैसे भूल जाना चाहते थे। कुर्सी में धंसे बैठे, गर्दन धंसाए बोले, “एक सम्मान समारोह है, वहीं आपको ले चलना चाहता हूं।”

“आपका है?” पूछते हुए संजय ने अपने शब्दों में थोड़ी सी मिठास घोली और बोला, “बधाई हो।”

“नहीं।” सरोज जी थोड़ा मायूस हुए, मुसकुराए, खिसियाते हुए बोले, “मुझे अध्यक्षता करनी है।” कह कर उन्होंने जेब से एक कार्ड निकाला और संजय की ओर बढ़ा दिया। संजय ने कार्ड देखा और मेज पर रखते हुए कहा, “सरोज जी आपको इस समारोह में नहीं जाना चाहिए।”

“क्यों?” सरोज जी अचकचा गए।

“आप वहां जाकर अपनी बेइज्जती करवाएंगे।” संजय ने साफ तौर पर कह दिया।

“अइसा काव हो गया?” सरोज जी जिज्ञासा में मुंह बाकर बोले। लगा जैसे उनके प्राण निकल जाएंगे।

“आप इस व्यक्ति को जानते हैं जिसका सम्मान हो रहा है?” संजय ने पूछा।

“हां।” सरोज जी हड़बड़ाए, “कवि है।”

“कवि नहीं है वह, यही तो बात है।” संजय बोला, “कविता के नाम पर कलंक है यह।”

“हुईं!” सरोज जी चौंक पड़े। बोले, “आप कइसे जानते हैं?”

“यह जो महेंद्र मधुकर है, हमारे जिले का ही है।” संजय बोला, “इसलिए जानता हूं और अच्छी तरह जानता हूं।”

“तो इ कवि नहीं है?”

“बिलकुल नहीं है।”

“पर हमको तो कविता की अपनी किताब दई गया है।” सरोज जी ने आंखें चौड़ी कर यह बात ऐसे कहीं जैसे कोई पानी की थाह लेने के लिए उसमें कंकड़ फेंके।

“हां, दे गया होगा।” संजय बोला, “चार कविताओं में गोता मार कर कविता निकाल लेने में महारथ है उसे।”

“मतलब कविता लिखता है?” सरोज जी खुश होते हुए बोले, “अऊर ई गोतामारी तो बहुत कवि करते हैं। बड़े-बड़े कवि, महाकवि करते हैं।”

“हां, पर वह महाकवि लोग अंग्रेजी में गोतामारी करते हैं। पर यह तो हिंदी में ही गोतामारी करता है। कभी-कभी तो पूरी की पूरी कविता ही कुछ शब्दों के हेर फेर के साथ पार कर लेता है।” संजय बोला, “बात यहीं तक हो तो गनीमत हो। पर यह मधुकर तो कवि सम्मेलनों में आप मंच पर बैठे रहिए, आपके सामने ही आपकी कविता पढ़ डालेगा, खूब वाहवाही लूटेगा और वापस आकर आपके पांव छू लेगा कह देगा कि भाई साहब क्षमा कीजिएगा जरूरत पड़ गई थी। और कभी-कभी तो आपकी कविता आप ही को समर्पित कर पढ़ डालेगा।”

“हुईं।” सरोज जी बिदके, “बड़ा रागिया है।”

“और आप उसके सम्मान समारोह में अध्यक्षता करने जा रहे हैं।” संजय ने जोड़ा, “वह कविताओं की चोरी तो करता ही है, निजी जिंदगी भी उसकी छल, कपट, धूर्तई और नीचता से सनी पड़ी है।”

“संजय जी आपको चलना तो पड़ेगा एह समारोह में।” सरोज जी बड़े आग्रह के साथ बोले, “ई समारोह में खाली महेंद्र मधुकर का सम्मान भर नाहीं है। एहमां शहर के अऊर भी बहुत लोगों का सम्मान होना है।” उन्होंने जोड़ा, “सिर्फ एक आदमी के गड़बड़ होने भर से पूरा समारोह तो गड़बड़ नहीं हो जाएगा।”

“तो आप जाएंगे इस समारोह में?”

“जाना तो पड़ेगा।” सरोज जी बोले, “सब अपने शिष्य हैं। बड़े आग्रह से बुलाए गए हैं। नहीं जाएंगे तो उनका दिल टूट जाएगा।” कह कर वह कार्ड उठा कर दिखाने लगे, “अब नाम भी हमारा छाप दिया हे। हम नहीं जाएंगे तो बेचारे उदास हो जाएंगे। फिर ऐन वक्त पर कहां ढूंढेंगे अध्यक्ष?” कह कर सरोज जी ने आंखे गज भर फैला दीं, “अब जाना तो पड़ेगा।”

“आप जाइए, पर मैं नहीं चलूंगा।” संजय खिन्न होकर बोला।

“नहीं संजय जी, आपको भी चलना पड़ेगा।” कह कर सरोज ने उसका हाथ थाम लिया। संजय विवश हो गया। आदत और रवायत के खिलाफ सरोज ने रिक्शा रोका, संजय से

“पहले आप, पहले आप” कह कर रिक्शे पर बिठाया, खुद बैठे और लाल बारादरी जो समारोह स्थल था, बताकर रिक्शे वाले से बोले, “चलो।”

रिक्शा चल पड़ा।

रास्ते भर दोनों चुप रहे। सरोज जी मारे खुशी के और संजय मारे खिन्नता के।

खिन्न था वह महेंद्र मधुकर के सम्मान समारोह में जाते हुए। मधुकर जो सिरे से फ्राड था। संजय ने महेंद्र मधुकर को पहली बार अपने शहर के एक रेस्टोरेंट में देखा था। तब वह पढता था, तभी एक लड़की से प्यार में मुब्तिला उसे कविता से भी मुहब्बत हो गई थी। वह कविताएं तो लिखने ही लगा था, बातचीत भी वह कविताओं, शेर और मुक्तकों में करता था। कविताओं का जुनून सा सवार था उस पर उन दिनों। वह इमर्जेंसी के दिन थे। इमर्जेंसी के दिनों में आलम यह था कि कवि अपनी घुटन और हताशा साफ-साफ बयान करने के बजाय प्रेम कविताओं की शरण लेते थे। इमर्जेंसी की ज्यादतियों को बिंबों में बांधकर वह प्रेमिका की ज्यादतियों ढालते और प्रतीकात्मक विरोध दर्ज करते। यह जैसे उन दिनों की कविताओं की परंपरा हो गई थी। कवि, प्रेमिका की आंखों में प्यार, उपेक्षा, उदासी, खुशी देखने के बजाय उसकी आखों के अंगार, अहंकार और फट पड़ने वाला आसमान देखते और आह भरते हुए उसे ऐसे दुत्कारते जैसे व्यवस्था को, इमर्जेंसी को ललकार रहे हो। पर सब कुछ बिंबों, प्रतीकों में। साफ-साफ कुछ भी नहीं। उन दिनों विशुद्ध प्रेम कविताएं लिखने वालों की भी इस चक्कर में दुर्गति हो जाती। जैसे एक बार संजय की खुद की दुर्गति हो गई। आकाशवाणी द्वारा आयोजित एक स्टूडियो गोष्टी में जब उसने एक लंबी प्रेम कविता की पांच-सात पंक्तियां ही पढ़ी “आंखें/तुम्हारी आंखें/उदास, सूनी बेचैन और बिमार आंखें/जिनमें मैं/एक छोटी सी, उजली सी/खुशी की एक किरन तलाशना चाहता हूं/सिर्फ अपने लिए।” यह पंक्तियां सुनते ही रिकार्डिंग करने वाले अधिकारी ने तुरंत रिकार्डिंग रोक दी। बोला, “यह उदास सूनी, बेचैन बीमार आंखें नहीं चलेंगी।”

“क्यों?” संजय ने पूछा।

“क्योंकि इसमें इमर्जेंसी की आलोचना है।” अधिकारी बोला, “कोई खुशी की कविता हो वह पढ़िए। इसको रहने दीजिए। यह नहीं चलेगी। बिलकुल नहीं।”

“पर इस कविता का इमर्जेंसी से क्या लेना देना? यह तो विशुद्ध प्रेम कविता है!” संजय हैरान होता हुआ बोला। कुछ और साथी कवियों ने संजय की पैरवी की। पर वह अधिकारी नहीं माना। कहने लगा, “दूसरी कविता पढ़िए।”

“पर मेरे पास दूसरी कविता नहीं है।” संजय खीझ कर बोला।

“तो इसी कविता से वह उदास, सूनी, बेचैन जैसे शब्द हटा दीजिए।” वह अधिकारी बोला।

“यह तो नहीं हो सकता।” संजय ने साफ-साफ अधिकारी से कहा।

“क्यों?”

“क्योंकि कविता की ध्वनि उसका मकसद, उसकी बुनावट, शिल्प और उसकी आत्मा मर जाएगी। क्योंकि इस कविता में आगे और भी ऐसे शब्द आएंगे।” संजय बिफरता हुआ बोला, “कहां-कहां और क्या-क्या बदलूंगा?”

“कुछ भी हो।” वह अधिकारी बोला, “यह कविता नहीं चलेगी। मैं अपनी नौकरी खतरे में नहीं डाल सकता।” बात जब नौकरी की आ गई तो संजय चुप हो गया। वह घर जाकर अपनी कविताओं की कापी उठा लाया और उसमें से दो तीन छोटी-छोटी कविताएं उस अधिकारी को दिखाता हुआ बोला, “इनसे तो नौकरी नहीं जाएगी आपकी?”

“नहीं।” कविताएं देखता हुआ वह अधिकारी बोला, “अच्छी है। इन्हें कहीं छपने के लिए भेज दीजिए।”

“छप चुकी हैं धर्मयुग में।” बताते हुए संजय चहका।

“तब तो यह भी नहीं चलेंगी।”

“क्यों?” संजय उबल पड़ा, “अब क्या हो गया?”

“छपी हुई भी नहीं चलेंगी।”

“ओफ!” कह कर संजय ने सिर पकड़ लिया। बोला, “तो फिर मुझे आज्ञा दीजिए। क्योंकि इस कापी में लिखी लगभग सारी कविताएं कहीं न कहीं छपी हुई हैं।” वह अधिकारी अंतत: मान गया कि, “कोई भी कविता पढ़ दीजिए। बस इमर्जेंसी का विरोध नहीं।” उस दिन उसने देखा कि बाकी तीन कवियों में से दो ने परिवार नियोजन, पेड़ लगाने जैसे नारों पर “कविताएं” गा-गा कर पढ़ीं और तीसरे ने कइन, गौरेया, फूल, पत्ते जैसी बिंब विधान वाली कविताएं पढ़ीं।

सचमुच उन दिनों कविताओं की तो छोड़िए सार्वजनिक जगहों, चाय या पान की दुकानों पर इमर्जेंसी या सरकार के खिलाफ कुछ कहना, या कोई भी उत्तेजित करने वाली बात करना गुनाह क्या अपराध माना जाता था। उन तनाव और घुटन भरे दिनों में यह महेंद्र मधुकर उस रोज रेस्टोरेंट में सिगरेट फूंकता एक के एक खौलते हुए शेर सरेआम सबको सुना रहा था। उसके शेर सुनने वालों की संख्या दो से चार, चार से दस, दस से बीस होती जा रही थी। वह शेर भी गजब के पढ़ रहा था और बिलकुल झूमके, “कैसे-कैसे मंजर सामने आने गले हैं/ गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं/अब तो इस तालाब का पानी बदल दो/ये कंमल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।” शेर बिलकुल ताजा हवा के झरोंके की मानिंद थे। संजय और उसके साथी महेंद्र मधुकर की बेंच के पास जाकर खड़े हो गए। वह शेर पढ़े जा रहा था, “सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए/मेरे सीने में हो या तेरे सीने में सही हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।”

संजय और उसका साथी राय, मधुकर से बड़ा प्रभावित हुए। और उससे बड़ी गर्मजोशी से मिले। राय ने कहा, “बड़ी हिम्मत का काम है इस तरह खुलेआम ऐसे शेर पढ़ना। हम लोग आपको बधाई देना चाहते हैं।” कहते हुए राय ने पूछा, “यह शेर बाई द वे हैं किसके?”

“ये खुद ही मशहूर कवि हैं।” मधुकर के पास बैठा एक मरियल सा व्यक्ति उसकी तारीफ करता हुआ बोला। “खाकसार को महेंद्र मधुकर कहते हैं।” वह राय की ओर हाथ बढ़ाते हुए बोला, “आप साहबान की तारीफ?”

“हम लोग छात्र हैं। यूनिवर्सिटी में हैं।” कहते हुए राय ने फिर पूछा, “यह शेर किसके हैं?”

मैं अपने ही पढ़ता हूं। सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए मधुकर ने बोला, “दूसरों के शेर पढ़ना मेरी आदत नहीं। अपनी तौहीन समझता हूं।”

“तो आपको डबल बधाई।” राय मधुकर से दुबारा हाथ मिलाते हुए बोला, “एक इतना जिंदा, धड़कता हुआ शेर लिखने के लिए, दूसरे इस तरह इसे सरेआम सुनाने के लिए।” राय ने जोड़ा, “इसके लिए बड़ा भारी कलेजा होना चाहिए। बधाई, बहुत-बहुत बधाई।”

“शुक्रिया।” दोनों हाथ जोड़कर माथे से लगाते हुए मधुकर बोला, “यहां तो खून से लिखते हैं, और आवाम की धड़कन बन जाती हैं।” उसने जोड़ा, “आवाम जो चाहती है उससे दो कदम आगे की हम सोचते हैं, खून पसीना जलाते हैं तब जाकर कहीं एक रचना कागज पर शक्ल अख्तियार करती है। हम उसे खून पसीने से सींचते हैं, अपने आपको निचोड़ डालते हैं तब कहीं जाकर आप सबकी “वाह-वाह” मिलती है।” कह कर उसने माथे पर आया पसीना रूमाल से पोंछा और लगे हाथ उसने तीन शेर और सुना दिए, “आहों में जो पाया है गीतों में दिया है/इसपर भी सुना है कि जमाने को गिला है/हम फूल हैं औरों के लिए हैं खुशबू/अपने लिए ले दे के बस इक दाग मिला है।” सुनाते हुए वह बोला, “शेर सुनिएगा कि, जो साज से निकली है वह धुन सबने सुनी है/ जो तार पे गुजरी है, वो किस दिल को पता है।” सुना कर वह अभी कुछ बोलता कि एक मजनूनुमा बूढ़ा झूमा। बोला, “यह तो फिल्मी गाना है। तलत महमूद ने गाया है।”

“हां, पर लिखा साहिर लुधियानवी ने है।” मधुकर ने तुरंत पैंतरा बदल लिया, “और क्या लिखा है साहब कि, जो तार पे गुजरी है वो किस दिल को पाता है?” वह बोला, “तो साहब, यह हम कवियों का दिल ही जानता है कि कहां-कहां से गुजर कर, क्या-क्या जी कर लिखना पड़ता है।” रूमाल से पसीना पोंछते हुए वह बोला, “फिर भी हमें दाग मिलता है, क्योंकि हम फूल हैं। और फूल कि नियति है सबको खुशबू देना। और अपने हिस्से दाग लेना।”

“अच्छा परिभाषित किया है आपने।” संजय बोला, “और आपके कहने का अंदाज भी खूब है।”

“आप नौजवानों से मिल कर खुशी हुई।” कहते हुए उसने सिगरेट का लंबा कश खींचा और उतना ही लंबा धुआं भी फेंका। बोला, “कभी घर पर मिलिए।” उसने अपना पता भी लिख कर दिया। और कहा कि, “कभी आए जरूर खुशी होगी।”

“हमलोग भी कविताएं लिखते हैं।” राय शर्माते हुए बोला।

“तो इसमें शर्माने की क्या बात है?” मधुकर बोला, “कभी किसी कवि गोष्ठी या सम्मेलन में नहीं दिखे आप लोग?” मधुकर उन दोनों को खारिज करता हुआ बोला।

“पर हमारी कविताएं छपी हैं।” कह कर संजय ने कुछ पत्रिकाओं के नाम गिना दिए।

“गुड!” मधुकर बोला, “पर सिर्फ छपने भर से तो काम नहीं चलेगा।” सिगरेट का धुंआ फेंकता हुआ वह बोला, “जनता के बीच आना पड़ेगा। नहीं तो बंद कमरे में कविता लिखने और छप जाने का क्या मतलब है?” वहा बोला, “परसों डॉक्टर साहब के यहां कवि गोष्ठी है। अरे वही होम्योपैथी वाले, उन्हीं के यहां, आप लोग आइए।”

उस गोष्ठी में राय और संजय बड़ी तैयारी से गए। मधुकर ने उन दोनों का वहां उपस्थित कवियों से परिचय कराया। पर संजय ने गौर किया कि किसी ने भी उन दोनों की नोटिस नहीं ली। गोष्ठी क्या थी चू-चू का मुरब्बा थी। दो तीन को छोड़ कर किसी ने कभी कायदे की कोई कविता नहीं पढ़ी। दो तीन कवि तो सरस्वती वंदना में ही लगे रहे। कोई अमराइयों तो कोई गोइयां, सइयां के गीत गाता रहा। संजय ऊब सा गया। संजय और राय ने भी दो-दो कविताएं पढ़ी। यूनिवर्सिटी के एक अध्यापक ने, “बहुत सुंदर, बहुत सुंदर” कहा। पर बाकी “अच्छा प्रयास है।” कह कर चुप हो गए। मधुकर के कविता पढ़ने की जब बारी आई तो राय ने उससे रेस्टोरेंट वाले शेर पढ़ने का अनुरोध किया। कहा कि, “मधुकर जी वही सुनाइए।” पर मधुकर टाल गया। बोला, “जनता के बीच जनता की बात, कवियों के बीच कवियों की बात।” कहते हुए खानाबदोशी पर कविता पढ़ने लगा। गोष्ठी में संजय और राय को बिलकुल मजा नहीं आया। कम से कम जिस तैयारी से वह दोनों गए थे, उस हिसाब से तो बिलकुल नहीं। हां, खाने-पीने की व्यवस्था उन्हें अच्छी लगी।

बाद में मधुकर उन दोनों को कवि सम्मेलनों में भी बुलवाने लगा। कवि सम्मेलनों से पैसा भी मिलता। जो उन दोनों की जेब खर्च के काम आता। कुछ दिनों बाद संजय ने सारिका में वही शेर दुष्यंत कुमार के नाम से छपे देखे जो मधुकर ने उस दिन रेस्टोरेंट में सुनाए थे और खूब दाद बटोरी थी। संजय ने राय को वह पत्रिका दिखाई तो वह बोला, “यह तो साला पक्का चोर निकला।” राय बोला, “चलो आज उसके यहां चलते हैं, उस दिन साले को दाद ही थी, आज खाज दे देते हैं।”

वह दोनों उस शाम मधुकर के यहां वह पत्रिका लेकर पहुंचे तो उसने बड़ी आवभगत की। कुछ देर लिए दोनों उससे असली बात करने से टालते रहे। पर राय ज्यादा देर नहीं टाल पाया। पत्रिका दिखाते हुए बोला, “मधुकर जी आपकी गजले इसमें छपी हैं। पर?”

“पर दुष्यंत कुमार के नाम से छपी हैं।” मधुकर बोला, “वह गजलें हैं ही दुष्यंत की।” उसने सिगरेट का धुआं छोड़ा, “क्या लिखता है, कलेजा निकाल लेता है।”

“पर उस दिन तो आप अपने शेर बता रहे थे।”

“कब कहा कि वह शेर मेरे लिखे हैं?” वह बोला, “हां!” माथे पर हाथ फिराते हुए वह कहने लगा, “वह शेर अब हम सबके हैं, सबकी धड़कन हैं। कोई भी उन्हें पढ़ सकता है, सुना सकता है, क्योंकि हम सब उसी दौर से गुजर रहे हैं, उसी तकलीफ, उसी घुटन, संत्रास और सांघातिक तनाव से गुजर रहे हैं, जिससे वह शेर गुजर रहे हैं। दुष्यंत की आवाज हम सकबी आवाज है।”

“पर मधुकर जी यह तो चोरी है।” राय ने जोर देकर कहा।

“क्या हमने अपने नाम से छपवा लिया?” मुधकर बोला, “शेर पढ़ना चोरी नहीं है। और ये खौलते हुए शेर पढ़ना, सार्वजनिक तौर पर पढ़ना वो भी आज के दौर में आसान है क्या? है किसी का जिगरा, है किसी में हिम्मत? शेर दुष्यंत का सही पर उसे पढ़ कर मैंने लोगों को झिंझोड़ा, यह क्या कम है?” कहते हुए वह बोला, “लो सिगरेट पियो।” और उसने सिगरेट की डिबिया दोनों की ओर बढ़ा दिया।

“नहीं, मैं सिगरेट नहीं पीता।” संजय हाथ जोड़ते हुए बोला।

“सिगरेट नहीं पिएंगे, शराब नहीं पिएंगे और कविता लिखेंगे?” वह आंख मटकाता हुआ बोला, “यह तो नहीं हो पाएगा।” उसने जोड़ा, “मीर, गालिब फिराक फैज सबने पी। बिना पिए का गुजारा नहीं हुआ।”

“हम लोग पीने नहीं, आपकी चोरी की चर्चा करने आए हैं।” राय बोला, “आपको कवि कहलाने का हक नहीं है।”

“तो अब आप हमें कवि होने का सर्टिफिकेट देंगे?” मधुकर उबला, “मैं चोर हूं! अरे कौन साला चोर नहीं है?” वह पसीना पोंछता हुआ बोला, “यें पंत, निराला, अज्ञेय किस-किस को चोर कहेंगे आप? इन लोगों ने सीधे-सीधे बायरन, इलियट, मिल्टन और जापानी हाइकूज पार कर दी हैं और मशहूर हो गए। जाने कहां-कहां डुबकी मार-मार कर, पानी-पी-पी कर हिंदी साहित्याकाश में एक से एक कवि, महाकवि दुकान लगाए बैठे हैं। आप लोग, जिनको हमने ही पैदा किया, हमने ही शहर में लोगों से मिलाया, वही लोग आज हमें कठघरे में खडा़ कर चोर बताना चाहते हैं?”

“नहीं बात यह नहीं है।” संजय बोला।

“तो क्या बात है?” मधुकर बोला, “टेक इट इजी।”

बाद में पता चला कि मधुकर की कारस्तानी शहर के अमूमन सभी कवि जानते थे। इसलिए हर कोई उससे कटता रहता था। पर चूंकि शहर के तकरीबन सारे सरकारी कवि सम्मेलनों का संयोजक, संचालक वह ही होता था सो उससे बिलकुल कट कर भी कोई नहीं रह पाता। डी.एम., कमिश्नर सबको पटाने में वह माहिर था। उन दिनों वह एक अनियतकालिक पत्रिका भी निकालता था सो छपने की लालसा भी कई नए पुराने कवियों को उसके पास घसीट ले जाती। फिर भी ढेर सारे लोग उसे नापसंद करते, उसकी आदतों, हरकतों और चार सौ बीसी के कारण। पत्रिका के विज्ञापन के लिए फोन कर वह कमिश्नर, डी.एम., विधायक, मंत्री कुछ भी बन जाता। खुद ही अला फला बनकर वह खुद ही की सिफारिश कर लेता। राय ने उसे एक बार टोका तो मधुकर कहने लगा, “किसे लूटता हूं? पूंजीपतियों को ही न?” वह बोला, “वह साले जनता को लूटते हैं, मैं उन्हें लूट लेता हूं, अपना हिस्सा ले लेता हूं। साहित्य के लिए खर्च करता हूं। कोई महल, अटारी तो खड़ा नहीं कर रहा?” कह कर वह सिगरेट के धुएं में खो जाता।

महेंद्र मधुकर रेलवे में क्लर्क था। पर बाहर वह अपने को अधिकारी ही बताता। और दफ्तर महीने में ज्यादा से ज्यादा दस दिन जाता। संजय पूछा, “काम कैसे चलता है?”

“चल जाता है। मधुकर लापरवाही से बोला।”

“फिर भी?”

“अरे पचास रुपए आजू, पचास रुपए बाजू की सीट वालों को दे देता हूं। साले, अपना काम बाद में करते हैं, मेरा काम पहले निपटा देते हैं। बस! और जाता हूं तो सालों को नाश्ता करा देता हूं, बॉस को कवि सम्मेलनों की वयस्तता बता कर, दो चार कविताएं सुना देता हूं।”

सचमुच संजय देखता, मधुकर हफ्तों कमरे में सोया रहता, अचानक शहर में निकलता और बताता कि, “अटैची उठी हुई थई।” और चार छह दूर दराज के शहरों के नाम गिनाते हुए कहता, “कवि सम्मेलन से आ रहा हूं।” जबकि वह कहीं नहीं गया होता। हकीकत में कवि सम्मेलनों में जाने के लिए हरदम बेताब रहता और बेशर्मी पर उतर आता। जिन-जिन कवियों को अपने संयोजकत्व वाले कवि सम्मेलनों में बुलाता उन्हें पलट कर चिट्ठी लिखता कि “अब आप मुझे बुलवाइए।” किसी-किसी को वो लिखता, “अगर आपको दस बार मैं बुलाता हूं को कम से कम तीन या चार बार आप भी हमको बुलवाइए।” इस पर भी बात नहीं जमती तो वह लिख देता, “तो अब आपको बुलाने के लिए हमें सोचना पड़ेगा।” और दिलचस्प यह कि ज्यादातर जगह उसकी दाल गल जाती। बाद में तो वह कवियों के तय पारिश्रमिक में से अपना कमीशन भी काटने लगा। कभी-कभी आधा से ज्यादा काट लेता। कई संकोची कवि सब कुछ जानते हुए भी चुप रहते। तो एकाध कवि अगर मुंह खोल भी देते तो वह कहता, “मालूम है आपका रेट क्या है और बाकी कवि सम्मेलनों में आप कितना पाते हैं? और उससे तो यह ज्यादा ही है।”

लोकल कवियों को वह मार्ग व्यय भी नहीं देता। कहता, “अभी टूटे नहीं है, बाद में ले लीजिएगा। कहीं भाग थोड़े ही जा रहा हूं”। और फिर उसका वह “बाद में” कभी नहीं आता। एकाध बेहया कवि फिर भी पीछा नहीं छोड़ते तो वह कहता, “ठीक है अगली बार से आप मत आइएगा।” वह कहता, “एक तो इनको मंच दो दूसरे ये सूदखोर की तरह पीछे पड़ जाएंगे। माफ करो भाई।”

कवि सम्मेलनों के मंच पर भी वह कवियों को अलग-अलग ढंग से पेश करता। वह जिसको चाहता उसकी तारीफ के पुल बांध देता, उसे राई से पहाड़ बता देता, नहीं हूट करवा देता। श्रोताओं में पांच सात हूटर वह हमेशा “तैयार” रखता। उसके पैसा मार लेने की आदत से कुछ कवि बहुत परेशान रहते। जैसे कि शेखर! शेखर भी रेलवे में क्लर्क था और कई बार मधुकर की काट वही बनता। पर उसे सलीका नहीं आता। और बड़ी जल्दी एक्सपोज हो जाता। पर मधुकर के स्तर पर आकर काटना वही जानता। जैसे कि एक बार कवि सम्मेलन में वह एक निरीह टाइप के कवि को लेकर पीछे श्रोताओं में पहुंच गया। बोला, “कवियों को चाय पिलाने भर का पैसा नहीं है। आप लोग कुछ चंदा दीजिए तो कवियों को चाय नसीब हो।” और पैसा वसूल लाया। उस सरकारी कवि सम्मेलन का संयोजक मधुकर था। उसकी बदनामी भी हुई और खिंचाई भी। बाद में शेखर अक्सर ऐसा करने लगा। तो मधुकर माइक पर ही एनाउंस कर देता कि कोई चंदा मांगने जाए तो उसे पकड़ कर मंच पर लाइए। इससे कवि सम्मेलन की शालीनता खत्म हो जाती। राय ने एक बार मधुकर से कहा कि, “शेखर को बुलाते ही क्यों हैं?” तो मधुकर धुआं उड़ाते हुए बोला, “वह साला भी तो दस कवि सम्मेलनों में बुलाता है।” उसने जोड़ा, “और शेखर साला इतना काइयां है कि न बुलाऊं तो भी आ जाएगा और मंच पर सीना फुला कर बैठ जाएगा। अब भगा तो सकता नहीं। आखिर सार्वजनिक मंच होता है।”

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