बिजनेस स्टैंडर्ड की महिला पत्रकार अजंता कृष्णामूर्ति और उनके पिता बेहद मुश्किल दौर में, आर्थिक मदद की जरूरत

बहुत जुझारू लड़की है. 7 साल से खुद कैंसर से जूझ रही है. अब पिता को भी कैंसर हो गया है. बिजनेस स्टैंडर्ड वाले फंडिंग किए हैं लेकिन वह पर्याप्त नहीं है. अभी भी इस महिला पत्रकार की दुर्दशा है. पत्रकार का नाम है अजंता कृष्णामूर्ति. अजंता खुद कैंसर से जूझीं और कैंसर को मात देकर उठ खड़ी हुईं. अपना जीवन खुद जीने की कोशिश करने लगीं. लेकिन दुर्भाग्य देखिए, इसी बीच उन्हें पता चलता है कि उनके पिता को भी कैंसर हो चुका है. कभी पिता ने पत्रकार बेटी का इलाज कराया और अब पत्रकार बेटी अपने पिता का इलाज करा रही है.

एक ही घर में दो-दो कैंसर पेशेंट की यह कहानी आपके रोंगटे खड़ी कर देगी. ईश्वर न करें किसी के साथ ऐसा हो. अजंता बेहद जीवट, जीवंत और जुझारू हैं. इसलिए वे इस पूरे दुश्कर दौर को हिम्मत-हौंसले के साथ झेल जा रही हैं. लेकिन वो बिना आर्थिक ताकत के कब तक यह युद्ध लड़ती रहेंगी. बिजनेस स्टैंडर्ड, जहां वह काम करती हैं, ने अपने पत्रकार की मदद की है. अजंता बेहद स्वाभिमानी हैं. वे नहीं चाहतीं कोई उन पर दया करे. लेकिन अब उनकी हालत ऐसी है कि हम सभी को लगना पड़ेगा.

बिजनेस स्टैंडर्ड से भी उन्होंने मदद नहीं मांगी थी और संस्थान की तरफ से मदद के आफर को ठुकरा दिया था. लेकिन बिजनेस स्टैंडर्ड एक संवेदनशील मीडिया समूह है जिसने अपनी महिला पत्रकार और उसके पिता की हालत को महसूस कर खुद ब खुद अपनी तरफ से मदद इकट्ठा कर अजंता के एकाउंट में डलवा दिया. इस नेक काम के लिए बिजनेस स्टैंडर्ड दिल्ली की स्थानीय संपादक निवेदिता बधाई की पात्र हैं. लेकिन अजंता को अब भी मदद चाहिए. अजंता को फौरन आर्थिक मदद चाहिए. जिस साथी से जितना बन पड़े, वह नीचे दिए गए अजंता के एकाउंट में डाले….

Name : Ajanta Krishnamurthy
Account Number : 6711590397
IFSC Code : KKBK0000172
Bank : Kotak Mahindra
Branch : KG Marg, New Delhi

मैं खुद निजी तौर पर अपनी तरफ से दो हजार रुपये की एक छोटी-सी राशि अजंता के उपरोक्त एकाउंट में भेज रहा हूं. आप अजंता की कहानी जानने के लिए उनके आफिस में कार्यरत शिखा शालिनी की नीचे दी गई पोस्ट जरूर पढ़ें. अजंता की इच्छा के चलते उनकी तस्वीर का प्रकाशन यहां नहीं किया जा रहा है. अजंता से उनकी मेल आईडी ajanta.krishnamurthy@bsmail.in के जरिए किया जा सकता है.

-यशवंत, एडिटर Bhadas4Media.com


वो हंसते हुए बोली- अब तो कोई मिरैकल ही मुझे बचा सकता है!

Shikha Shalini : वो मुझे ऑफिस के वॉशरूम में मिली, बड़ी तसल्ली से अपने छोटे बालों को संवारते हुए. कितने सालों से देखती आई हूं उस लड़की को. बड़े उत्साह से काम करते हुए, ख़बरों की चर्चा करते हुए. अखबार के पन्ने संभालते हुए. इतनी फुर्ती किसी में नहीं दिखती जितनी उसमें दिखती है. पर बात कभी नहीं की थी उससे. आज मैंने अचानक ही पूछ लिया कि पापा कैसे हैं आपके? उसने सवाल किया, “आपको कैसे पता मेरे पापा के बारे में?” मैं बस इतना ही कह पाई कि पता है. उसने कहा, “ठीक नहीं हैं, हमें जो करना है वो सब कर रहे हैं. Gastro-Oesophageal cancer की वजह से पेट की सर्जरी करनी पड़ी और अब सारे अंग धीरे धीरे काम करना बंद कर रहे हैं. उनके पेट का काम इंटेस्टाइन कर रहा है और इंटरनली ही खाना देना पड़ता है”.

कैंसर की कई शब्दावली में अपनी बातें बताती रही. आख़िर में उसने जो कहा उसके बाद मेरे पास कहने के लिए कोई शब्द ही नहीं बचे, “मैं भी breast cancer survivor हूं. 2012 में जिस दिन बिज़नेस स्टैंडर्ड की नौकरी का ऑफर मिला उसी दिन मुझे डॉक्टर ने बताया कि मेरे पास जीने के लिए सिर्फ तीन महीने हैं. सोचने का वक्त नहीं था फिर भी इलाज शुरू हुआ और 28 सीटिंग की रेडियेशन थेरेपी और कीमोथेरेपी के 8 दौर से गुजरने के बाद डॉक्टर ने कहा कि अब पांच साल की मोहलत है और इस बीच फिर से कैंसर अपना प्रभाव दिखा सकता है क्योंकि तुम्हारी बीमारी rare है. क्या बताऊं आपको कीमोथेरेपी तो ऐसा लगता है जैसे शरीर में आग लगा दी हो किसी ने. पापा कहते थे कि तुम बहादुर हो ध्यान दूसरी तरफ लगाओ और मैं कहती थी, नहीं होता पापा. अब मैं ये सब पापा को समझाती हूं.

मैंने इसके बाद 2015 में बिज़नेस स्टैंडर्ड की नौकरी करनी शुरू कर दी. लेकिन कई तरह के साइड इफेक्ट्स अब दिखने लगे हैं. जैसे कि Gynecological complications, Lymphedema, thickened endometrium जैसी समस्या. जब पापा के कैंसर का पता चला तो मैं इत्तफाक से उसी हॉस्पिटल के कमरे में गई और नर्स-डॉक्टर की टीम ने मुझे पहचानते हुए कहा तुम हो अभी ज़िंदा? एम्स का कमरा नंबर 311 वैसा ही था. बस इस बार पापा पेशेंट थे और मैं उनकी अटेंडेंट. सारे डॉक्टर्स और नर्स को मैं याद रहती हूं क्योंकि खूब सारी गप्प और जोक क्रैक करती हूं वहां भी. अब ऑफिस से जाकर रात भर उनकी नर्सिंग का काम करती हूं. सुबह चार-पांच घंटे सोती हूं. दिन में मां सब संभालती हैं. 75 साल की हो गईं ना, अब थक जाती हैं. मां बहुत निराश हो गईं कि घर में दो बीमार हैं. माहौल निगेटिव सा होने लगा. अब मैं उन्हें अपनी परेशानी नहीं बताती, खूब खुश रहती हूं, ऑफिस आती हूं. उनको इससे भरोसा होता है कि मैं ठीक हूं.”

मैंने पूछा उससे कि उसके बारे में अब क्या कहते हैं डॉक्टर. उसने आंख मटकाते हुए कहा, “पांच साल पूरे हो गए हैं ना, इसलिए अब डॉक्टर के पास कम जाती हूं, कहती हूं कि आप बार-बार मेरा आखिरी वक्त बताते हो. मुझे ये सब नहीं सुनना, कुछ अच्छा सुनाओ तो आ जाऊंगी. आजकल खूब जंक फूड खाती हूं. जो मन करता है वो सब करती हूं. देखकर नहीं लगा ना कि मैं पेशेंट हूं? बस मैं यही चाहती थी कि मां को भी मेरी तकलीफ न दिखे और ऑफिस वालों को भी.” उसने कहा, “मुश्किल है, दो-दो पेशेंट हो गए ना घर में, मेडिकल खर्च, फॉलो अप, स्क्रीनिंग टेस्ट सब इतना महंगा है. एक बार क्राउडफंडिंग की कोशिश की थी, लेकिन ज्यादा कुछ नहीं हुआ.

ऑफिस ने भी मदद की लेकिन दो-दो पेशेंट के लिए सब कम पड़ जाता है. ये बीमारी ही ऐसी है सब इम्पोर्टेड चीजों से ही इलाज होता है.” इसके बाद खुद को शीशे में निहारते हुए हंसने लगी. मेरे पास बोलने के लिए शब्द नहीं थे, मेरी आंखें डबडबा रहीं थीं लेकिन उसने इतनी सारी बातें मुस्कराते हुए, माथे पर बिना किसी शिकन के बता दीं. एक ही ऑफिस में रहते हुए ज्यादातर लोगों को उसके बारे में नहीं पता था. लोग उस लड़की के उत्साह, चेहरे की चमक, बिंदास हंसी में दर्द की एक रेखा तक इतने सालों में नहीं पढ़ पाए जैसे कि मैं. मैं बस इतना ही कह पाई उससे कि दुआ करूंगी कोई चमत्कार हो सके तो. वो भी हंसते हुए बोली अब तो कोई मिरैकल ही मुझे बचा सकता है.

पत्रकार शिखा शालिनी की फेसबुक वॉल से.

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Pauri Journey – ये पत्रकार इस घनघोर पहाड़-जंगल में भटक क्यों रहे हैं?(भड़ास एडिटर यशवंत सिंह, पत्रकार राहुल पांडेय, पर्यावरणविद समीर रतूड़ी और युवा दीप पाठक की टीम का घनघोर जंगल में क्या कर रही है, जानिए इस वीडियो के जरिए.)

Bhadas4media ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಶನಿವಾರ, ಜನವರಿ 26, 2019
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